ऋषि कपूर: केवल स्टार ही नहीं कलाकार भी

ओम प्रकाश सिंह*

सन् 1979-80 के सर्दियों की बात है ।चाचा जी के साथ पहले पहल मैं पटना आया हुआ था । किसी के गृह प्रवेश के मौके पर । पटना से लौटते समय चाचा जी के साथ मैंने एक फिल्म देखी,’दुनिया मेरी जेब में’!तब मेरी उम्र कोई दस की रही होगी और ये मेरे जीवन की पहली फिल्म थी । कुछ खास समझ में तो नहीं आयी फिल्म, ,लेकिन अपराधियों को रगेदती पुलिस,अकेले दस दस गुंडों को ढेर करता हीरो,पेड़ों के आगे पीछे  नाचते-गाते, छेड़छाड़ करते हीरो हीरोइन को देखकर खूब मजा आया । मगर फिर भी इस फिल्म के एक  दृश्य ने मेरे बाल मन पर कब्जा कर लिया था,एक छोटे भाई का अपने घायल बडे भाई को गोद में लेकर अस्पताल जाना । इस दृश्य में पृष्ठभूमि से रफी साहब की आवाज़ में एक गाना चलता है–‘मैंने तो मांगी है बस ये दुआ तेरे जैसा भाई सबको मिले…….।’ अगले कई महीनों तक मैं अकेले में छुप छुपाकर ये गाना गुनगुनाता रहा और मेरी आँखों के सामने बड़े भाई को अपनी गोद में उठाये छोटे भाई का वो मासूम सा उदास-निराश-परेशान चेहरा घूमता रहा ।अभिनेता ऋषि कपूर से ये मेरा पहला परिचय था,जो इस फिल्म में छोटे भाई की भूमिका में थे ।

ये सच है कि अपनी शानदार फिल्मी पृष्ठभूमि की वजह से ऋषि कपूर की फिल्मों में एन्ट्री बड़ी आसान रही। महज तीन साल की उम्र में उन्हें फिल्मी परदे पर जगह मिल गई थी ।अपने पिता राजकपूर की फिल्म श्री 420 के सुप्रसिद्ध गीत ‘प्यार हुआ इकरार हुआ …….’ के एक दृश्य में कुछ सेकंड के लिए बालक ऋषि कपूर परदे पर दिखाई दिए थे ।राजकपूर की ही फिल्म ‘मेरा नाम जोकर ‘ से बाल कलाकार के रूप में उन्होंने बाकायदा अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की । फिर अभिनेता के तौर पर उनकी पहली फिल्म ‘बाॅबी’ भी उनके पिता द्वारा ही निर्मित निर्देशित थी। लेकिन बस पिता का साथ यही तक रहा ।इसके आगे का रास्ता ऋषि कपूर ने अपने दमखम और अपनी मौलिक प्रतिभा के सहारे ही तय किया ।

1970 के बाद का दौर  भारतीय समाज के संक्रमण का काल था।

1970 के बाद का दौर  भारतीय समाज के संक्रमण का काल था। देश की आजादी के समय भारतीय जनमानस द्वारा सजाया गए सपने बिखरने लगे थे। सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे संतु निरामया: की परिकल्पना पुस्तकों के पन्नों तक ही सिमटी नजर आने लगी थी। भूख, भय और भ्रष्टाचार सामाजिक सच्चाई बनते जा रहे थे। समाज में असंतोष, हताशा, गुस्सा, बगावत संक्रामक रोग की तरफ फैल रहे थे। जाहिर है ऐसे माहौल में, दूर कहीं कानन में दिन दुनिया से बेखबर तारों की छांव में सरोवर के तट पर बांहों में बांहें डाले संगीत की मीठी धुन पर छुप छुप कर प्रेमालाप करते नायक नायिका भला किसको सुहायेंगे। सो भारतीय सिनेमा भी बदलाव की तरफ अग्रसर था। फिल्मी पर्दे पर वर्जनायें टूटने लगी थी।

ऐसे ही बदलते सामाजिक परिवेश में सितंबर 1973 में नायक के रूप में ऋषि कपूर की पहली फिल्म ‘बॉबी’ का प्रदर्शन हुआ। एक करोड़पति बिजनेसमैन का मासूम,शर्मिला और कमसिन नौजवान एक साधारण मछुआरे की बेटी के लिए न केवल अपने पिता की नजरों से नजरें मिलाकर सवाल जवाब करता है बल्कि करोड़ों की संपत्ति और ऐशो-आराम की जिंदगी को ठोकर मार देता है। याद करें देवदास को। अपनी प्रेमिका के लिए वह अपने पिता से बात तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है और अंत में घुट घुट कर खुद ही खत्म हो जाता है। हमारा यह नया प्रेमी खुद खत्म होने वाला नहीं है बल्कि हर उस अवरोध  को खत्म कर देने वाला है जो उसके और उसके प्रेम के रास्ते में आता है। बगावती प्रेमी की भूमिका में ऋषि कपूर खूब जमे। दर्शकों को भी ऋषि कपूर का यह बगावती अंदाज खूब भाया और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपर डुपर हिट रही। फिल्म ‘कभी-कभी’ का वह दृश्य जिसमें एक युवक (ऋषि कपूर) अपने पिता (शशि कपूर) से कहता है कि उसे प्यार हो गया है और इस पर खुशी में झूमते हुए उसके पिता उसकी मां से कहते हैं कि …Our son is in love….. दर्शकों को बेहद पसंद आई थी।

इस तरह ऋषि कपूर ने फिल्मी पर्दे पर प्रेम करने के अंदाज को ही बदल दिया और यह अंदाज दर्शकों को खूब भाया। फिर क्या था,’खेल-खेल में’,’अमर अकबर एंथनी’,‘नसीब’,‘लैलामजनू’,’सरगम’आदि  एक पर एक हिट फिल्में ऋषि कपूर के खाते में दर्ज होने लगीं।

80 का दशक खत्म होते-होते ऋषि कपूर एक स्टार के रूप में स्थापित हो चुके थे।

80 का दशक शुरू होते-होते ऋषि कपूर एक स्टार के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनके पास फिल्मों की कमी न थी। लेकिन सभी फिल्मों में वही घिसी पीटी कहानियां। पेड़ों के आगे पीछे नायिकाओं के साथ चक्कर काटना, कुछ रोना-धोना और अंत में नायक नायिका का एक दूसरे का हो जाना। ऋषि कपूर के अंदर के कलाकार को इन सबसे  संतुष्टि नहीं मिल रही थी। वह बाहर आने के लिए मचल रहा था। इसकी एक झलक राजेंद्र सिंह बेदी की 1986 में प्रदर्शित फिल्म ‘एक चादर मैली सी’ में देखने को  मिलती है। लुंगी कुर्ता पहने, मूंछ दाढ़ी लगाए इस फिल्म में ऋषि कपूर ने एक तांगे वाले का किरदार निभाया है।पंचायत के दबाव और पूरे परिवार के रोजी रोटी की मजबूरी में न चाहते हुए भी अपनी मां समान विधवा भाभी से शादी करने को मजबूर होना और शादी के बाद अपनी प्रेमिका और विधवा भाभी के साथ अपने संबंधों के बीच के द्वंद को ऋषि कपूर ने पर्दे पर बड़ी खूबसूरती से उकेरा है। लीक से हटकर कहानी होने के कारण दर्शक इसे पचा नहीं पाए सो ये  फिल्म बॉक्स ऑफिस पर  नहीं टिक सकी। ऋषि कपूर का कलाकार अंदर ही अंदर छटपटाता रह गया। इन्हीं दिनों चांदनी, नगीना, दीवाना जैसी हिट फिल्में आयीं जरूर लेकिन इनमें ऋषि कपूर के करने के लिए कुछ खास नहीं था।

1990-92 के बाद के सालों में ऋषि कपूर ‘दामिनी’ जैसी फिल्मों से चरित्र भूमिका की ओर मुड़े।

1990-92 के बाद के सालों में ऋषि कपूर ‘दामिनी’ जैसी फिल्मों से चरित्र भूमिका की ओर मुड़े। उनके उम्र का वो ये पड़ाव था जिसमें उन्हें लवरब्वॉय की भूमिका कोई देना नहीं चाहता था और दर्शकों के दिमाग में लवरब्वॉय से इतर उनके लिए कोई और छवि थी नहीं। फिर भी इक्के दुक्के, छोटी मोटी चरित्र भूमिकाएं करना उन्होंने जारी रखा। 1999 में फिल्म ‘आ अब लौट चलें’ से उन्होंने निर्देशन में अपना हाथ आजमाया।मगर शायद वह केवल अभिनय के लिए ही बने हुए थे। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गई। निर्देशक के रूप में उनके कैरियर का यही समापन हो गया।

सन` 2006 में आई फिल्म ‘फना’ से दर्शकों ने उन्हें चरित्र  अभिनेता के रूप में स्वीकारना शुरू कर दिया। इस फिल्म में आमिर खान और काजोल जैसे कलाकारों के बावजूद काजोल के पिता के रूप में ऋषि कपूर दर्शकों का ध्यान खींचने में सफल रहे। 2010में ‘दो दूनी चार’  तक आते-आते ऋषि कपूर अपने आपको एक स्टार चरित्र अभिनेता के रूप में स्थापित कर चुके थे।

और तब सन 2012 में प्रदर्शित होती है अग्निपथ! इसमें ऋषि कपूर ने अपने अभिनय से सबको हतप्रभ कर दिया। रितिक रोशन, संजय दत्त और ओमपुरी जैसे कलाकारों से सजी इस फिल्म में जिस किसी भी दृश्य में ऋषि कपूर रहते हैं वहां बाकी सब गौण हो जाते हैं। रौफ लाला का चरित्र दर्शकों में कांचा(संजय दत्त) से ज्यादा खौफ पैदा करता है। फिल्म का वह दृश्य जिसमें रऊफ लाला एक सहमी हुई कमसिन लड़की को बांहों से पकड़े जब भरे बाजार में उसकी बोली लगाता है तो  दर्शक एकबारगी  थर्रा जाते हैं। इस दृश्य के साथ ही साथ इसपूरे  फिल्म में ऋषि कपूर अभिनय  की बुलंदियों को छूते नजर आते हैं। इस फिल्म में ऋषि कपूर के अभिनय को दर्शकों के साथ-साथ फिल्म समीक्षकों ने भी जी खोलकर सराहा है ।

अग्निपथ के बाद ‘डी-डे’ और ‘मुल्क’ जैसी कई सफल फिल्में आई जिनकी कहानियां ऋषि कपूर को ही ध्यान में रखकर लिखी गईथीं। चरित्र भूमिका में होते हुए भी एक तरह से ऋषि कपूर ही इन फिल्मों के हीरो थे। किसी भी कलाकार के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और कुछ नहीं हो सकती है।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। ऋषि कपूर अपने पूरे रौ में थे कि गोया आसमान को उनका यह सुख देखा न गया। साल 2018 में उनको कैंसर का पता चला और वह भी तीसरे स्टेज में। उनके चाहने वालों पर जैसे वज्रपात हो गया। इलाज के लिए अमेरिका गए। अभी कुछ ही महीने पहले लौटे थे अमेरिका से। फिर अचानक न जाने क्या हुआ कि काल के क्रूर हाथों ने ऋषि कपूर को हमसे सदा के लिए जुदा कर दिया।

बेहतरीन अभिनेता के साथ-साथ ऋषि कपूर एक उम्दा इंसान भी थे।

बेहतरीन अभिनेता के साथ-साथ ऋषि कपूर एक उम्दा इंसान भी थे। वह एक निश्छल,निष्कपट और बड़े ही स्पष्टवादी व्यक्ति थे। उसकी दो एक  बानगी यहां पर उल्लेखनीय है।“हां मैं बीफ खाता हूं] और बीफ मुझे अच्छा लगता है”, उनके इस बयान ने भूचाल खड़ा कर दिया था। लेकिन अपने इस बयान से वे पीछे नहीं हटे क्योंकि खाने-पीने जैसी निजी मामलों  में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के वे जबरदस्त हिमायती थे। इसी तरह अपनी पुस्तक ‘खुल्लम-खुल्ला में’ उन्होंने अपने महान पिता स्वर्गीय राज कपूर के बारे में लिखा है—‘शादीशुदा होते हुए भी मेरे पिता के कई महिलाओं से संबंध थे।‘‘बॉबी’ के लिये सर्वश्रेष्ठफिल्मफेयर अभिनेता का पुरस्कार जीतने के बारे में उन्होंने कहा था—“हां, वह पुरस्कार मैंने  घूस देकर खरीदा था वरना वह पुरस्कार तो अमिताभ बच्चन को मिलने वाला था।“

ऋषि कपूर अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन जब तक हिंदी सिनेमा रहेगा ऋषि कपूर को भुलाया ना जा सकेगा।

*ओम प्रकाश सिंह उषा मार्टिन में इंजीनियर हैं , कहानी और फिल्म पर लिखते हैं.


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2 thoughts on “ऋषि कपूर: केवल स्टार ही नहीं कलाकार भी

  • May 6, 2020 at 07:41
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    Well written. Needs some more polish.

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  • May 9, 2020 at 02:38
    Permalink

    Well written needs more polished.

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