TrainAccident : पटरी पर 16 मजदूर नहीं बेबसी सो रही थी, जिसे व्यवस्था ने बेमौत मार दिया

-रजनीश आनंद-

(लेखिका पेशे से पत्रकार हैं, यह आलेख उनके ब्लॉग से लिया गया है)

आज सुबह-सुबह एक ऐसी खबर आयी जो मनहूसियत से भरपूर थी. महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास 16 मजदूर एक मालगाड़ी की चपेट में आकर कट गये. कल के विशाखापट्टनम कांड से देशवासी उबर भी नहीं पाये थे कि यह एक और दर्दनाक हादसा. कोरोना वायरस के प्रभाव में दिहाड़ी मजदूर करने वालों पर आफत है, उनकी रोजी छीन गयी है और साथ ही रहने का ठिकाना भी. काम नहीं होने के कारण उनके पास पैसे नहीं हैं, ऐसे में घर का किराया देना उनके बस में नहीं है, चूंकि यह उनका देस भी नहीं है, इसलिए ऐसे समय में उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनी धरती की याद आ रही है. यह वाजिब बात है और किसी के साथ भी इन परिस्थितियों में ऐसा ही कुछ होता. परेशानी यह है कि पूरे देश में लॉकडाउन जारी है और रेल,सड़क और वायुमार्ग से आवागमन बंद है. ऐसे में बदहाली के कगार पर पहुंचे यह मजदूर अपनी धरती तक पहुंचने के लिए हजारों किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करने पर आमादा है. कोई साइकिल को जरिया बना रहा है तो कोई किसी तरह जुगाड़ करके अपने घर पहुंचने के लिए मीलों चल रहा है. बस एक ही चाह है अगर कोरोना मारने ही आया है, तो अपनी धरती पर मरें अपने लोगों के साथ.

बस इसी चाह में मध्यप्रदेश के 20 मजदूर महाराष्ट्र के जालना से पैदल मध्यप्रदेश अपने गांव जा रहा थे. यह सभी जालना की एक स्टील फैक्टरी में काम करते थे और कोविड-19 लॉकडाउन के कारण बेरोजगार हो गये थे और अपने घर पैदल लौट रहे थे. चूंकि सड़क मार्ग से जाने पर पुलिस रोकती-टोकती है, इसलिए वे पटरियों पर चल रहे थे. उन्हें यह तो मालूम है कि रेल इन दिनों नहीं चलती, लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम था कि मालगाड़ियां अभी भी चल रही हैं. कुछ रोटी को पोटली में बांध यह मजदूर पैदल चल रहे थे. चलते-चलते थककर वे पटरी पर ही सो गये. कुल 16 मजदूर सुबह पांच बजे के आसपास मालगाड़ी की चपेट में आ गये और बेमौत मारे गये. वे अपने घर से 30-40 किलोमीटर दूर थे. दुर्घटना औरंगाबाद जिले के आसपास हुई है. मजदूर मध्यप्रदेश के भुसावल के थे.

दुर्घटना की जो तसवीर सामने आयी है, उसमें मजदूरों के शव पटरी पर पड़े हैं. रेलगाड़ी से कटे शव. पटरियों पर बिखरीं रोटियां. किसी को भी भावुक कर सकती हैं. हम इसलिए भावुक ज्यादा हैं क्योंकि हम वैसे इलाके से आते हैं, जहां के लोग मजदूरी करने के लिए पूरे देश में जाते हैं. बिहार-झारखंड और उत्तर प्रदेश. पूरे देश में इन्हीं राज्यों से मजदूर जाते हैं.

सरकार का कहना है कि वह मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए 222 श्रमिक स्पेशल ट्रेन चला रही है, जिसका फायदा अबतक 2.5 लाख लोग ले चुके हैं. लेकिन सवाल यह है कि अगर मजदूरों को उनके घर तक पहुंचा ही रही हैं, तो क्यों नहीं सरकार ने यह फैसला पहले किया? अगर सरकार लॉकडाउन के तुरंत बाद या मजदूरों को पहले वापस भेजकर लॉकडाउन लगाती तो इन मजदूरों को इस तरह विवश नहीं होना पड़ता. ऐसी कई घटनाएं हमारे सामने हैं जो लॉकडाउन के दौरान देखने को मिल रही हैं. हम वह घटना भी नहीं भूले जब दिल्ली और मुंबई से वापस आने के लिए मजदूर लाखों की संख्या में सड़क पर आ गये थे. इनके पास खाने को नहीं है. कई लोग 5-6 तक भूखे हाईवे पर चल रहे हैं, क्योंकि दुकानें बंद हैं. ऐसे में हमारे राजनेताओं को इस बात का जवाब तो देना होगा कि आखिर इन मजदूरों की बदहाली का जिम्मेदार कौन है? क्या आज जो लोग ट्रेन से कटकर मरे हैं, उनकी मौत की जिम्मेदारी कोई लेगा? क्या यह केंद्र और राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं थी कि वह इन मजदूरों को या तो रोक कर रखे और भूखों मरने से बचाये?

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