1873-74 का बंगाल/बिहार का अकाल और 2020 में कोविड-19 से लड़ने की हमारी रणनीति

Sunil Jha

आख़िर 15 साल होते ही कितने हैं! यूँ बीत जाते हैं। 1857 की क्रान्ति को बस 15 साल ही हुए थे और हिन्दुस्तान की हुक़ूमत अब सीधे-सीधे इंग्लैंड के सम्राट के हाथों में थी। हुआ यूँ कि साल 1872 में बंगाल और अवध प्रांत के एक बड़े हिस्से में सावन-भादो की बारिश ठीक-ठाक नहीं हुई। किसानों ने जैसे-तैसे फ़सल उगायी। नतीज़तन आबादी के एक बड़े हिस्से के पास अनाज की भारी किल्लत हो गयी। साल 1873 में बंगाल, बिहार, अवध और देश के उत्तर-पश्चिमी भाग के एक बड़े हिस्से (लगभग 1.40 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र) में सूखा पड़ा और बंगाल प्रान्त का एक बड़ा हिस्सा अकाल/दुर्भिक्ष की चपेट में आ गया। लोग ज़ाहिर तौर पर बहुत ज़्यादा परेशान थे। दाने-दाने को मोहताज़ लोग जीने की मज़बूरी में चोरी, छिनतई और डकैती जैसे अपराधों को अंजाम देने लगे थे। अंग्रेजी सरकार के लिए जहाँ यह बिगड़ती कानून-व्यवस्था का सवाल था वहीं भूखी और अकाल-पीड़ित जनता के लिए जीने की रणनीति। दूसरी तरफ़ जिनके यहाँ चोरियाँ हो रही थी उनके भीतर भी अंग्रेजी शासन के ख़िलाफ़ आक्रोश बढ़ रहा था। सिपाही विद्रोह (1857) के कड़वे अनुभव अंग्रेजों के लिए बहुत पुराने नहीं हुए थे। बड़ी मुश्किल से महारानी विक्टोरिया की सत्ता को बचाया जा सका था। एक बात ब्रिटिश शासकों को अच्छे तरीके से मालूम थी कि पिछली बार विद्रोह की जो चिंगारी सिपाहियों के बैरकों से और राजा-रजवाड़े-ज़मींदारों के महलों/किलों से निकली थी, इस बार अगर वही विद्रोह जनता के भूखे पेट से निकलती है तो ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज पूरब में ही अस्त हो जाएगा।

किस प्रकार अकाल और भूखमरी की स्थिति में अपराध बढ़ जाते हैं, विशेषकर चोरी/house trespass के, इसका उदाहरण तब के अभिलेखों से मिलता है। मसलन शाहाबाद डिवीज़न (आरा, बक्सर, रोहतास, कैमूर) में जहाँ जुलाई 1872 में चोरी/हाउस ट्रेसपास इत्यादि संपत्ति से जुड़े अपराधों की संख्या 148 थी, वहीं जुलाई 1873 में यह बढ़कर 180 और अगले साल जुलाई, 1874 में कुल 232 अपराध हो गए। गया डिवीज़न में भी जहाँ सूखे की मार ज़्यादा पड़ी थी वहां इन आपराधिक घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि दर्ज़ की गयी। अभिलेख बताते हैं कि गया डिवीज़न (गया, जहानाबाद, अरवल, नवादा, औरंगाबाद) में जुलाई 1872 में संपत्ति से जुड़े कुल 328 अपराधों को अंजाम दिया गया था, वहीं ये जुलाई 1874 में 41% की वृद्धि के साथ बढ़कर 562 हो गए। साल 1874 के Calcutta Gazetteer में शाहाबाद डिवीज़न में आपराधिक घटनाओं के आंकड़ों को जब देखते हैं तो एक दिलचस्प बात का ज़िक्र मिलता है। जो शाहाबाद डिवीज़न मवेशियों की चोरी के लिए बदनाम हुआ करता था, वहाँ अकाल के इन तीन सालों में मुश्किल से मवेशी चोरी की घटना दर्ज की गयी। जाहिर है एक ऐसा इलाका जहाँ लोगों को खाने के लिए अनाज तक नसीब नहीं था, वहां मवेशियों के लिए चारा कहाँ से आता! मवेशी अब सम्पदा नहीं बल्कि गृहस्थ के लिए बोझ थे।

बंगाल के 1873 का यह अकाल जिसे Bihar Famine of 1873 भी कहा जाता है, ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन वाले भारत का पहला अकाल भी था। इसलिए तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड नॉर्थब्रूक के सामने दो चुनौतियाँ थी- एक, ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ बढ़ रहे असन्तोष को कम करना और दूसरा, जनता के बीच राहत कार्य चलाकर ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति उसकी निष्ठा और मज़बूत करना। लॉर्ड नॉर्थब्रूक ने इस काम के लिए बंगाल सिविल सर्विसेज के तेज़-तर्रार ऑफिसर और अपने लेफ़्टिनेंट गवर्नर रिचर्ड टेम्पल को चुना। रिचर्ड टेम्पल का बिहार अकाल (187३-1874) में जनता के बीच चलाया गया राहत कार्य आज भी एक नज़ीर है।

अकाल और उससे उपजी भूखमरी और बढ़ती आपराधिक घटनाओं से निबटने के लिए रिचर्ड टेम्पल ने बड़े पैमाने पर राहत कार्यों की शुरुवात की। इन राहत कार्यों में रेलवे लाईनों और सड़कों का निर्माण किया गया ताकि अनाज सरप्लस क्षेत्रों से अकाल प्रभावित इलाकों में ज़रूरतमंदों के बीच हज़ारों टन अनाज की खेपें पहुंचायी जा सके। नहरों की श्रृंखला विकसित करने का काम शुरू किया गया ताकि नदियों के पानी को सूखे वाले इलाकों में पहुँचाया जा सके। लोगों को काम देना ताकि लोगों के पास पैसे हों और वो अनाज ख़रीद सकें और साथ ही साथ ज़रायम पेशे (अपराध) में लगे लोग आपराधिक गतिविधियां छोड़ काम पर लग जाएं और अपराध पर अंकुश लगे। सोन नहर कार्य 1873 में शुरू किया गया जिससे 41,000 लोगों को सीधे तौर पर रोज़गार मिला। अकेले गया डिवीज़न में एक पन्द्रहिया (१५ दिनों की अवधि) में 8,111 पुरुष, 6,051 महिलाएं और 2851 बच्चों को बेला रोड, काज़ी सराय रोड, शेरघाटी-मैनापुर रोड, वारसलीगंज रोड, ओबरा रोड, कुटुम्बा रोड वगैरह के निर्माण और मिटटी भराई जैसे कामों में लगाया गया। शाहाबाद डिवीज़न में 12 सड़कों के निर्माण/मिटटी भराई का काम शुरू किया गया जिसमें कुल 51,817 लोगों को काम मिला। इसमें 4,104 बच्चों को भी काम पर लगाया गया था। ऐसे काम बिहार के दुसरे डिवीजनों जैसे तिरहुत, पटना, सारण, मुंगेर में भी बड़े पैमानों पर हुए। वहीं कारीगरों को काम के बदले पैसा या अनाज़ के रूप में चना दोनों ही दिया गया। मसलन मुंगेर में 1,017 औरतों को सूत कातने और 136 जुलाहों को इनसे कपड़े बनाने का काम दिया गया।

बंगाल-बिहार में पीड़ितों के बीच कम दर पर या मुफ़्त में अनाज वितरण के लिए अंग्रेजों ने बर्मा से 4,50,000 टन चावल मंगाए। बर्मा में इरावती नदी घाटी रेलवे हो या उत्तर बंगाल (सिलीगुड़ी) को हावड़ा मेन लाईन से जोड़ने का काम हो, बिहार के तिरहुत, शाहाबाद, सारण और झारखण्ड के छोटानागपुर से झुण्ड के झुण्ड लोग इन जगहों पर गए। इन मज़दूरों को अंग्रेज कुली कहा करते थे। सिलीगुड़ी जंक्शन से सटा हुआ उन बिहारी प्रवासियों की एक बहुत बड़ी झुग्गी बस्ती अभी भी कुलीपाड़ा के नाम से मौजूद है। बर्मा गए कई प्रवासी वहाँ की औरतों से शादी कर वहीं बस गए। प्रवासी जहाँ गए अपनी संस्कृतियों को भी साथ ले गए और समय के साथ अपने मेजबान देश/क्षेत्र की संस्कृति में घुल-मिल गए।

इधर बिहार में राहत के रूप में आ रही अनाज के बोरों को ट्रेनों से उतारने के लिए मोकामा, बाढ़ और फतुहा में रेलवे साइडिंग का निर्माण किया गया, जिसके लिए क़रीब एक मील लम्बी रेलवे लाइन इन स्टेशनों में ब्रांच लाइन के तौर पर बनायी गयी। बाढ़ रेलवे स्टेशन के साइडिंग पर उतारे गए अनाज को दरभंगा डिवीज़न के अकाल पीड़ित इलाकों में पहुँचाने के लिए गंगा के उस पार मोहिउद्दीनगर से बछवाड़ा और फिर बछवाड़ा से दरभंगा शहर तक कुल 85 किलोमीटर रेलवे लाईन बिछाने का कार्य मात्र 58 दिनों में ही पूरा कर लिया गया। हालांकि अति उत्साह एवं अतयधिक हड़बड़ी के चलते रास्ते में आने वाली नदियों और उनसे फ़ूटने वाली सैकड़ों धाराओं की अनदेखी कर रेलवे लाइन बिछाने का काम किया गया, जिसके परिणामस्वरूप अगले मानसून में ही यह रेलवे लाइन क्षतिग्रस्त हो गयी। फिर भी 17 फ़रवरी 1874 को काम शुरू हुआ और 14 अप्रैल को दरभंगा वालोँ ने अपने शहर में सीटी बजाती भाप छोड़ती काली इंजन वाली विशालकाय ट्रेन पटरी पर दौड़ते हुए देखी। 17 अप्रैल 1874 को इस ट्रैक का विद्यिवत उद्घाटन बंगाल के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर लॉर्ड कैम्पबेल ने अनाज की बोरियों से लदी पहली मालगाड़ी रवाना कर के की। अगले 30 दिनों में दरभंगा डिवीज़न को 31,213 टन अनाज की सप्लाई ट्रेन से की जा चुकी थी। दुर्भिक्ष पीड़ित मिथिला के लोगों के लिए अनाज से भरी ये ट्रेनें उम्मीद की ट्रेनें थीं। रेलवे के ज़रिये जहाँ सुदूर क्षेत्रों में राहत सामग्री बांटने में सुगमता हुई वहीं अनाज की आपूर्ति होने से अनाज की दर में एक प्रकार का संतुलन भी लाया गया।

इनके अलावा अत्यंत गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए पुअर होम्स की स्थापना और मुफ्त अनाज़ का वितरण किया गया। रैयतों और बड़े किसानों को सरकार द्वारा अनाज़ ख़रीदने के लिए एडवांस के रूप में लोन दिए गए। इसके लिए तत्कालीन सरकार ने Calcutta Mint (आज का RBI) को एक रुपये के तांबे के विशेष सिक्के ढालने का आदेश दिया (नीचे तस्वीरों में देखें)।

इन सभी प्रयासों का नतीज़ा यह था कि 1873-1874 के इस भयानक दुर्भिक्ष में बहुत ही कम मौतें दर्ज़ की गयी। 1874 जुलाई-अगस्त में अच्छी बारिश हुई और अकाल राहत कार्यों को बन्द कर दिया गया। अकाल के कारण लाखों लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए रिचर्ड टेम्पल ने एक अभूतपूर्व काम किया, पर ब्रिटिश शासकों और अधिकारियों की नज़र में यह काफ़ी खर्चीला और ग़ैर-ज़रूरी था। इसको लेकर रिचर्ड टेम्पल की काफ़ी आलोचना भी हुई। ‘अपव्ययी’ कहे जाने को टेम्पल ने अपने दिल पर इतना अधिक ले लिया कि जो व्यक्ति 1873-1874 के बंगाल-बिहार अकाल हीरो था, वही व्यक्ति अपने दामन पर लगे इस ‘दाग़’ को धोने के लिए 1876-1877 में दक्कन में होने वाले अकाल से निबटने में उतना ही कंजूस बन गया जितना वह 1873-74 में उदार था। ख़ैर इस मसलेपर कभी और।

फ़िलहाल हमारे देश को एक ऐसी ही विपदा ने आ घेरा है जिसमें चारों तरफ़ भूखमरी की छाया मंडरा रही है। लाखों की संख्या में प्रवासी मज़दूर अपने घरों को लौट रहे हैं। आने वाले समय में यदि सरकार इन्हें इनके हाल पर ही छोड़ देती है तो भूख से होने वाली मौतों के लिए सरकार ही जिम्मेदार होगी। ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले दिनों मेंआपराधिक घटनाओं में भी वृद्धि देखने को मिलेगी। इनसे एक साथ निबटने के लिए सरकार को ऐसे रोजगार के उपायों पर ध्यान देना होगा जिसमें मशीनों का कम कम हस्तक्षेप हो। MGNREGA में सरकार ने बजट बढ़ाया है, जो कि एक अच्छा संकेत है। पर MGNREGA पर निर्भरता नाकाफ़ी होगी। बेहतर होगा कि सरकार निर्माण कार्यों में फ़िलहाल कोविड -19 के संक्रमण टलने तक मशीनों पर आत्मनिर्भरता न्यून कर दे ताकि अधिक से अधिक लोगों के हाथों में पैसा आए। रिचर्ड टेम्पल के कार्यों ने हमारे समक्ष एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है। क्या हम ये उम्मीद कर सकते हैं कि सरकार कुछ ऐसी ही योजना पर काम कर रही होगी!

संदर्भ एवं स्रोत:
1.Supplement to the Calcutta Gazette, No. 31 of 1874
2. Railways and the Famine of 1873-74 in Bihar, Pushpa Kumari, Proceedings of the Indian History Congress (2007)
3. Indian Migrants in Myanmar: Emerging Trends and Challenges, Medha Chaturvedi, India centre for Migration
4. Bihar Famine of 1873-74, Wikipedia
5. Sir Richard Temple, Wikipedia
6. Photo credit (website of Heritage Auctions) by google


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