अद्भुत शख्सियत थे बंगला के प्रख्यात कवि लेखक विचारक विश्वजीत सेन यानि नादू दा।

Sumant Sharan

अद्भुत शख्सियत थे बंगला के प्रख्यात कवि लेखक विचारक विश्वजीत सेन यानि नादू दा। बेइंतहा प्यार करने वाले तो अगले ही पल एकदम से लतियाने वाले भी। कोई गारंटी नहीं कि आपने उनकी अंतरंग बैठकी में लगातार पांचवीं चाय पी ली तो छठी चाय की बारी आते आते आपको उनके अपमान की कड़वी घूंट न पीनी पड़ जाये। अपनी इन्हीं आदतों के चलते नादू दा आखिरी वक्त में सबसे कट-छंट गये थे या कहिये गहन गोपन में चले जाने को विवश हो गये थे।

एक जीनियस और वह भी मार्क्सवाद में पारंगत मानुष अपनी ही ज्ञान-विलासिता का शिकार होकर अहंकार के किसी अंध कूप में अपने को कैसे कैद कर लेता है – इसके बेहतरीन मिसाल थे नादू दा!

नादू दा किस विषय के ज्ञाता न थे! इंजीनियरिंग का छात्र होने के नाते तकनीक और विज्ञान का ज्ञान तो वे मानो अपनी जेब में लिए फिरते थे; साहित्य का वैश्विक संसार जैसे उनका फुटबॉल का खेल का मैदान हो; द्वितीय विश्वयुद्ध के इतिहास का और खास तौर पर उसमें सोवियत फौजों की अकल्पनीय भूमिका का वर्णन तो इस रोमांचकता रोचकता के साथ करते जैसे वे स्वयं उन युद्धों में एक सैन्य विशेषज्ञ के रूप में शामिल हुए हो! कहना न होगा कि सैन्य मामलों की अपनी ऐसी सूक्ष्म और गहन जानकारी के मामले में वे कभी कभी फ्रेडरिक एंगेल्स के सैन्य ज्ञान को छू लेते प्रतीत होते थे। मार्क्सवाद की उनकी अपनी ही अनोखी व्याख्या थी जिसमें भारतीय चिंतन परंपरा और भारतीय परिस्थितियों के सम्मिश्रण का योग भी भरपूर होता था। रामकृष्ण परमहंस की जीवन गाथा के प्रति उनकी उतनी ही आसक्ति थी जितनी कि मार्क्स या चे के विराट व्यक्तित्व के प्रति।

कविता पाठ की उनकी सम्मोहक कला के भी क्या कहने। जीवनानंद दास उनके सर्वाधिक प्रिय कवि थे। नादू दा जब उनकी कविताओं की आवृत्ति करने पर उतर आते तो मानो प्रकृति की सतरंगी छवियां पानी की तरह सामने वाले के भीतर परत दर परत अपनी जगह बनाने लगती थीं! रोमांटिसिज्म उनमें कूट कूट कर भरा हुआ था। इस माने में वे चे गुवेरा के दिवाने थे। मुझे लगता है वाम राजनीति में सक्रिय भागीदारी की अपनी सीमाओं की पूर्ति वे वाम रोमांटिसिज्म के कल्पित भंवर में गोते लगाकर करना चाहते थे! चे गुवेरा के प्रेम पत्रों और उनकी प्रेम कविताओं पर बात करते हुए उनका मुखमंडल एक अजीब ओज से आभासित हो उठता था।

दूसरे छोर पर, वे अपनी स्वयं की कविताओं में मृत्यु से ऐसी आत्मीयता से साक्षात्कार करते प्रतीत होते हैं मानो मृत्यु एक सखा की तरह उनके जीवन में हर वक़्त मौजूद रही हो। मगर, क्या मजाल कि उनकी कविताएं हमें हताशा की बूंद भर भी स्वाद चखाती हो! उनकी कविताओं को पढ़ना अल् सुबह की लालिमा की भांति उम्मीदों से भरे एक भरपूर उजास से लकदक हो उठना है। हां, क्रांति की बेकल पुकार से वे अपनी कविताओं में सदा दूर ही दूर रहे हैं। यह अलग बात है कि बाद के समय में उनकी बैठकी में सशस्त्र क्रांति के अवगाहन में लगे कामरेडों की भी उपस्थिति खूब बढ़ गयी थी। हिंदी में उन्होंने कविताएं नहीं लिखीं मगर, हिंदी कवियों और कविता की प्रवृत्तियों पर जैसी पैनी निगाह उनकी थी, वह चमत्कृत कर देने वाली थी। भक्ति आंदोलन के कवियों से लेकर समकालीन हिंदी कवियों तक की उनकी सूची और उन पर उनकी आलोचनात्मक टिप्पणियां यदि सुरक्षित रहतीं तो वे किसी धरोहर से कम न होतीं।

उनका सधा गायन सुनना भी अपने आप में एक उपलब्धि होती थी। सार्वजनिक जगहों पर शायद ही किसी ने उनके गाने सुने हो मगर, अंतरंग बैठकी में भी उनके कंठ से स्वर लहरियां तभी निकलने को राजी होतीं जब उन्हें भरोसा हो जाये कि सामने वाला सुनने के काबिल है भी या नहीं! बंगला और हिंदी के गानों पर समान अधिकार प्राप्त था उन्हें मगर, तलत महमूद के ‘जलते हैं जिसके लिए… ‘ को वे जिस तन्मयता से गाते थे उसका जवाब नहीं। संगीत की उत्पत्ति और उसके विस्तार पर भी वे अपनी शास्त्रीय और मौलिक पकड़ से हमें लाभान्वित करने से बाज नहीं आते थे।

अब इस छोटी सी टिप्पणी में नादू दा के व्यक्तित्व के किस छोर को छोड़ा जाये और किसे समेटा जाये, यह प्रश्न ही बड़ा अबूझ है! मगर, कोई यह तो पूछ ही सकता है कि भई, विश्वजीत सेन यानि नादू दा को यहां इस विखंडित रूप से याद करने का क्या सबब है? इसके जवाब में मैं जो भी कहना चाहूंगा, वह शायद कम मसखरापन भरा न हो? दरअसल, नादू दा की बंगला कविताओं के हिंदी अनुवाद का एक छोटा सा संग्रह “सीढ़ी उतरती है अंधेरे गर्भगृह में” के नाम से साया हुआ था। हिंदी अनुवाद उनके अभिन्न मित्र और हिंदी के सुविख्यात कवि पत्रकार रामकृष्ण पांडेय ने किया था। नादू दा ने मुझे बड़े प्यार से वह किताब दी थी उस पर कुछ लिख कर देने की खातिर। मैंने उस पर अपनी टिप्पणी लिखी भी मगर, जैसा कि ऊपर वर्णित है, नादू दा का खब्तीपन यह था कि वे जिसे बेइंतहा प्यार करते थे उसे उन्हें लतियाते भी देर नहीं लगती थी। कहना न होगा कि उनके आखिरी समय के थोड़े दिन ही पहले मैं उनके इस खब्तीपन का शिकार हो गया। फिर हुआ ये कि मैंने भी खुंदक में उन्हें न अपनी टिप्पणी दी और न ही फिर कभी उनसे मिलने गया।

यह तो कल रात ही हुआ कि मैं रामू जी (दिवंगत रामकृष्ण पांडेय) का कविता संग्रह खोजने बैठा तो वह तो न मिला मगर, नादू दा के संग्रह पर लिखी पर दिमाग से उतर चुकी मेरी टिप्पणी अकस्मात मिल गयी। टिप्पणी क्या मिली, नादू दा की याद हहाकर उमड़ पड़ी। फिर क्या था, एक ही सांस में उलटा सीधा जो भी बन पड़ा, उनकी शख्सियत के अनेक रंगों को इस रूप में दर्ज करने की अपनी बेचैनी को मैं रोक न सका। उनके अनगिनत चाहने वाले हैं, यदि इसमें उन्हें बदतमीजी जैसी कोई बात दिखे तो क्षमा प्रार्थी हूं। उनके संग्रह पर लिखी अपनी टिप्पणी फिर कभी बाद में।


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