सिल्वर स्क्रीन का प्रेमाख्यानक महाकाव्य है The Japanese Wife

अविश्रांत

ग्यारहवीं की अंग्रेजी की किताब में जी.श्रीनिवास राव की एक कहानी है-‘The Pen Pal’ जिसमें कथा नायक लाॅस ऐन्जेलिस की रहने वाली एक महिला एलिस एच से पत्र-मैत्री करता है। बिना एक दूसरे से मिले और देखे दोनों एक-दूसरे को पत्र लिखते हैं। हालांकि यह कहानी आगे नहीं बढ़ती। कथानायक दुनियावी जीवन में व्यस्त हो जाता है, शादी करता है और अपने पत्र-मित्र को लगभग भूल ही जाता है। कुछ वर्षों बाद एक दिन अचानक उसके लिए लास एंजिलिस से एक बड़ा पैकेट आता है। उसे खोलने पर पता चलता है कि उसकी पत्र-मित्र एलिस की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गयी है।पैकेट से उसका एक फोटो भी निकलता है। वास्तव में एलिस एक 78 वर्षीय दयावान वृद्धा थी। इस तरह एक सच्चाई सामने आती है और कहानी खत्म हो जाती है।

The Japanese Wife इससे आगे की कहानी है। कुनाल बसु ने 2008 में इस नाम से एक कहानी लिखी थी जिसको आधार बनाकर 2010 मेंअपर्णा सेन ने इसी नाम से एक ट्राई लिंग्वल-अंग्रेजी, बांग्ला और जापानी भाषा में- फिल्म बनाई जिसने प्रेम, समर्पण और उत्सर्ग की नई परिभाषा हमारे सामने रखी। यह फिल्म सिल्वर स्क्रीन पर लिखा गया एक प्रेमाख्यानक महाकाव्य है। इसका एक-एक दृश्य कविता कहता प्रतीत होता है और उसे देखते हुए आप उसके दृष्टा भर नहीं रहते, भोक्ता हो जाते हैं।

कथानायक स्नेहमाॅय (राहुल बोस) बंगाल के सुन्दरवन इलाके के किसी गाँव में रहता है। माटला नदी यहाँ एक खुबसूरत एश्चुरी का निर्माण करती है।दृष्टि के अंतिम परास तक जल ही जल और घने-हरे वृक्षों से आच्छादित शस्य-श्यामला धरती। कैमरा इन भू-दृष्यों को पकड़ने में काव्यात्मक हो उठा है, पर वह इन्हें सिनेमाई आँख से नहीं देखता, एक शर्मीले बांग्ला युवक की आँख से देखता है। स्नेहमाॅय चटर्जी वहीं स्कूल मास्टर है। संकोची और शर्मीला अर्थमैटिक का यह मास्टर अपने निजी जीवन में बिल्कुल अकेला है मित्र-विहीन, इसलिए वह पत्र-मित्र बनाता है। दूर देश जापान की एक वैसी ही स्वभाव की लड़की मियागी (जापानी कलाकार चिगूशा कियाकी) उसकी पत्र-मित्र बनती है, जो उसके लिए किसी उपहार से कम नहीं है। वैसे मियागी का अर्थ भी तो ‘उपहार’ ही होता है न।

दोनों गहरी संवेदना में डूबकर एक-दूसरे को पत्र लिखते हैं। यह सिलसिला नामों का अर्थ जानने से शुरु होकर जीवन के अर्थान्वेषण तक पहुँचता है। इस प्रक्रिया में प्रेम के अनगिनत सोते फूटते जाते हैं और जीवन हरियर होता जाता है। उनके पत्रों में जो शब्द आकार लेते हैं वे एक दुनिया समानान्तर रचते हैं जिसके इकलौते नागरिक स्नेहामोय और मियागी हैं।

तीन साल की अवधि बीत जाती है। इस बीच स्नेहामोय की माशी (मौसमी चटर्जी) उसके लिए एक रिश्ता लेकर आती हैं। स्नेहामोय इन्कार कर देता है और मियागी को चिट्ठी लिखता है। मियागी जापान से एक अंगूठी भेजती है और स्नेहामोय इधर से चूड़ियाँ और सिन्दूर भेजता है। दोनों अब शादी-शुदा हैं। यह अदैहिक प्रेम अद्भुत है। न स्नेहामोय ने मियागी को देखा है और न ही मियागी ने स्नेहामोय को लेकिन दोनों ने भावना में भावना से एक-दूसरे का वरण कर लिया है। इस दृश्य का हिस्सा बनते हुए जयशंकर प्रसाद की काव्य पंक्ति बरबस ही याद आ जाती है-

इस अर्पण में कुछ और नहीं, केवल उत्सर्ग छलकता है
मैं दे दूँ और न फिर कुछ लूं, इतना ही सरल झलकता है।

स्नेहामोय जब अपनी मासी को अपने रिश्ते के बारे में बताते हैं तो वह अवाक रह जाती हैं।

अपनी पन्द्रहवीं वैवाहिक वर्षगाँठ के अवसर पर मियागी स्नेहामोय के लिए एक बड़े बाक्स में अपना तोहफा भेजती है। उसमें ढेर सारी जापानी परम्परागत पतंगें हैं माशी के लिए शाॅल हैं। माशी खुश है पर चिन्तित भी कि आगे उसके परिवार का क्या होगा? आखिर- ‘

शब्दों से नाती-पोते तो नहीं पैदा होते।’

स्नेहामोय उसे लिखता है-

“मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ
पत्नी के रूप में
मैं प्रतीक्षा कर रहा हूँ
अपने प्रेमालाप की
सितारों के बीच
चंद्रमा की किरनों से आवृत्त
सूरज की छाया में
एक छत के नीचे
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूँ।”

समय बीत रहा है। स्नेहामोय के घर एक जवान विधवा संध्या (राइमा सेन) अपने बच्चे पोल्टू के साथ रहने आ जाती है। वह मियागी को उसके बारे में लिखता है। यह भी बताता है कि वह सफेद साड़ी पहनती है। उसके बाल हैं या फिर दूसरी विधवाओं की तरह उसने बाल मुड़वा रखे हैं, वह नहीं जानता क्योंकि उसने उसे देखा तक नहीं है। वह मियागी को बताता है कि जो पत्नी अपने पति की स्मृतियों को बहुत चाहती है, वह विधवा होने पर केश मुड़वा लेती है। माशी चाहती है कि स्नेहामोय उससे विवाह कर ले। स्नेहामोय भी उसके बच्चे के साथ खेलता है और एक पिता की तरह स्नेह और उत्तरदायित्व का व्यवहार करता है। संध्या उसके साथ सौदा-सुलुफ लेने बाजार भी जाती है। दोनों बिना विवाह किये एक-साथ रहते तो हैं पर भावना की साझेदारी उनमें नहीं होती। स्नेहामोय के स्नेह का संबल तो मियागी ही है, उसकी पत्नी और उसकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता।
उधर जापान में मियागी की तबियत बिगड़ने लगती है। उसे कैंसर हुआ है। वह एक चिट्ठी में अपनी तबियत के बारे में लिखती है। स्नेहामोय चिंतित हो उठता है। वह तत्काल स्कूल से छह महीने की छुट्टी का आवेदन करता है। वह जापान जाना चाहता है लेकिन उसके पास पर्याप्त धन नहीं है। वह शहर के चिकित्सकों से मिलता है। आयुर्वेद, होम्योपैथ , यूनानी सभी डाक्टरों से संपर्क करता है। पत्नी दूर देश में है, बीमार है और स्नेहामोय अकेला उसके जीवन को बचाने की जद्दोजहद में लगा है। इन दृश्यों में राहुल बोस ने बहुत भाव प्रवण अभिनय किया है। एक-एक सीन में वह बेचारगी से भरते गये हैं। भाषा की समस्या, चिकित्सकीय जटिलतायें, छोटे शहर में संचार माध्यमों का अभाव आदि मिलकर एक नैराश्यपूर्ण परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। फिर भी वह मियागी को दवाइयां भेजता है। महंगे होने के बावजूद वह टेलीफोन पर बार-बार हालचाल पूछता है।

किसी ने उसे कोलकाता के प्रसिद्ध ओन्कोलाजिस्ट के बारे में बताया है। वह तूफान के बीच वहाँ के लिए निकल पड़ता है और खुद जानलेवा तूफान में फंस जाता है। भारी बारिश में भीगने के कारण उसे न्यूमोनिया हो जाता है। किसी तरह वह घर तो आ जाता है लेकिन बिस्तर पकड़ लेता है। संध्या उसकी दिन-रात सेवा करती है। उसका हाथ अपने हाथ में लेकर स्नेहामोय मियागी को याद करते हुए प्राण त्याग देता है।

अगले दृश्य में मियागी आती दिखती है, बिना बार्डर की सफेद साड़ी पहने और केश मुड़ाये। गहरी उदासी की प्रतिपूर्ति सरीखी संध्या और मियागी एक दूसरे से मिलती हैं। दोनों के चेहरे पर निर्वेद के भाव हैं।उनके बीच का सेतु स्नेहामोय अनन्त यात्रा पर निकल चुका है।

फिल्म के आखिरी दृश्य का रंग गहरा धूसर है, जिसमें स्नेहामोय के कमरे में पड़ा उसका सामान भी जीवन्तता नहीं ला सकता। आखिर सबकुछ खत्म जो हो गया है पर प्रेम कभी खत्म नहीं होता। आसमान में उड़ती पतंगों में यही संदेश निहित है।


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