सती होने जा रही थी अहिल्या बाई होल्कर, ससुर ने समझाया, फिर राजपाट संभाला और इतिहास में जगह बनायी

नवीन शर्मा

ऐसे दौर में जब दिल्ली में मुगल सल्तनत का सूरज डूब रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी बंगाल पर कब्जा जमाने के बाद पूरे भारत को अपने शिकंजे में कसने के लिए हर तरह की शातिर चाल चल रही थी। ऐसे मुश्किल भरे वक्त में अहिल्या बाई होल्कर हमें भारत के इतिहास में ध्रुव तारे की तरह जगमगाती नजर आती हैं।
अहमदनगर के जामखेड में चोंडी गांव में 31 मई 1725 जन्मी महारानी अहिल्याबाई मालवा राज्य की होलकर रानी थीं, जिन्हें लोग प्यार से राजमाता अहिल्याबाई होलकर भी कहते हैं।
उनके पिता मनकोजी राव शिंदे, गांव के पाटिल यानी कि मुखिया थे। जब गांव में कोई स्त्री-शिक्षा का ख्याल भी मन में नहीं लाता था तब मनकोजी ने अपनी बेटी को घर पर ही पढ़ना-लिखना सिखाया। हालाँकि अहिल्या किसी शाही वंश से नहीं थीं पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

छुटपन से ही गरीबों की सेवा करती थीं

दरअसल, पुणे जाते वक़्त उस समय मालवा राज्य के राजा या फिर पेशवा कहें, मल्हार राव होलकर चोंडी गांव में विश्राम के लिए रुके। तभी उनकी नज़र आठ साल की अहिल्या पर पड़ी, जो भूखों और गरीबों को खाना खिला रही थी। इतनी कम उम्र में उस लड़की की दया और निष्ठा को देख मल्हार राव होलकर ने अहिल्या का रिश्ता अपने बेटे खांडेराव होलकर के लिए माँगा।

युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए पति
1733 को खांडेराव के साथ विवाह कर 8 साल की कच्ची उम्र में अहिल्याबाई मालवा आयी। पर संकट के बादल अहिल्याबाई पर तब घिर आये जब साल 1754 में कुम्भार के युद्ध के दौरान उनके पति खांडेराव होल्कर वीरगति को प्राप्त हुए।

सती होना चाह रहीं थी अहिल्या
अपने पति की मृत्यु के बाद जब अहिल्याबाई ने सती होने का निर्णय किया तो उनके ससुर मल्हार राव होलकर ने उन्हें रोक दिया। हर एक परिस्थिति में अहिल्या के ससुर उनके साथ खड़े रहे। पर साल 1766 में जब उनके ससुर भी दुनिया को अलविदा कह गए तो उनको अपना राज्य ताश के पत्तों के जैसा बिखरता नज़र आ रहा था।
उस वृद्ध शासक की मृत्यु के बाद राज्य की ज़िम्मेदारी अहिल्याबाई के नेतृत्व में उनके बेटे मालेराव होलकर ने संभाली। पर विधाता का आखिरी कोप उन पर तब पड़ा जब 5 अप्रैल, 1767 को शासन के कुछ ही दिनों में उनके जवान बेटे की मृत्यु हो गयी।

ससुर की मौत, जवान बेटा भी असमय खोया

कोई भी एक औरत, वह चाहे राजवंशी हो या फिर कोई आम औरत, जिसने अपने पति, पिता समान ससुर और इकलौते बेटे को खो दिया, उसकी स्थिति की कल्पना कर सकता है। पर अपने इस दुःख के साये को उन्होंने शासन-व्यवस्था और अपने लोगों के जीवन पर नहीं पड़ने दिया।

11 दिसंबर, 1767 को इंदौर की शासक बनीं

1766 में रानी अहिल्यादेवी मालवा की शासक बन गईं। उन्होंने तुकोजी होल्कर को सैन्य कमांडर बनाया। उन्हें उनकी राजसी सेना का पूरा सहयोग मिला। अहिल्याबाई ने कई युद्ध का नेतृत्व किया। वे एक साहसी योद्धा थी और बेहतरीन तीरंदाज। हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थी। हमेशा आक्रमण करने को तत्पर भील और गोंड से उन्होंने कई बरसों तक अपने राज्य को सुरक्षित रखा।

रानी अहिल्याबाई अपनी राजधानी महेश्वर ले गईं। वहां उन्होंने 18वीं सदी का बेहतरीन और आलीशान अहिल्या महल बनवाया। पवित्र नर्मदा नदी के किनारे बनाए गए इस महल के ईर्द-गिर्द बनी राजधानी की पहचान बनी टेक्सटाइल इंडस्ट्री। उस दौरान महेश्वर साहित्य, मूर्तिकला, संगीत और कला के क्षेत्र में गढ़ बन चुका था। मराठी कवि मोरोपंत, शाहिर अनंतफंडी और संस्कृत विद्वान खुलासी राम उनके कालखंड के महान व्यक्तित्व थे।
एक बुद्धिमान, तीक्ष्ण सोच और स्वस्फूर्त शासक के तौर पर अहिल्याबाई को याद किया जाता है। हर दिन वह अपनी प्रजा से बात करती थीं। उनकी समस्याएं सुनती थी। अपने कालखंड (1767-1795) में रानी अहिल्याबाई ने ऐसे कई काम किए कि लोग आज भी उनका नाम लेते हैं। अपने साम्राज्य को उन्होंने समृद्ध बनाया। उन्होंने सरकारी पैसा बेहद बुद्धिमानी से खर्च कर कई किले, विश्राम गृह, कुएं और सड़कें बनाईं। वह लोगों के साथ त्योहार मनाती और हिंदू मंदिरों को दान देती।

विधवाओं के हित में कदम उठाए

एक महिला होने के नाते उन्होंने विधवा महिलाओं को अपने पति की संपत्ति को हासिल करने और बेटे को गोद लेने में मदद की। इंदौर को एक छोटे-से गांव से समृद्ध और सजीव शहर बनाने में अहम भूमिका निभाई।

काशी के विश्वनाथ मंदिर सहित कई तीर्थ स्थल पर कराया निर्माण
अहिल्याबाई ने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार किया। उनका सबसे यादगार काम रहा, तकरीबन सभी बड़े मंदिरों और तीर्थस्थलों पर निर्माण। हिमालय से लेकर दक्षिण भारत के कोने-कोने तक उन्होंने इस पर खूब पैसा खर्च किया। काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथ पुरी के ख्यात मंदिरों में उन्होंने खूब काम करवाए।

अंग्रेजों की तुलना भालू से की

रानी ने अपने विश्वसनीय सेनानी सूबेदार तुकोजीराव होलकर (मल्हार राव के दत्तक पुत्र) को सेना-प्रमुख बनाया। मालवा की यह रानी बहादुर योद्धा और प्रभावशाली शासक होने के साथ-साथ कुशल राजनीतिज्ञ भी थीं। जब मराठा-पेशवा अंग्रेजों के इरादे न भांप पाए तब उन्होंने दूरदृष्टि रखते हुए पेशवा को आगाह करने के लिए साल 1772 में पत्र लिखा।
इस पत्र में उन्होंने अंग्रेजों के प्रेम को भालू के जैसे दिखावा बताते हुए लिखा, “चीते जैसे शक्तिशाली जानवर को भी अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर मारा जा सकता है पर भालू को मारना उससे भी मुश्किल है। इसे केवल सीधे उसके चेहरे पर ही मारा जा सकता है। क्योंकि अगर कोई एक बार इसकी पकड़ में आ जाये तो यह उसे गुदगुदी कर ही मार डाले। अंग्रेजों की भी कहानी ऐसी ही है इन पर विजय पाना आसान नहीं।”

तीस साल में इंदौर को गांव से बनाया शहर

इंदौर उनके 30 साल के शासन में एक छोटे से गांव से फलते-फूलते शहर में तब्दील हो गया। मालवा में किले, सड़कें बनवाने का श्रेय अहिल्याबाई को ही जाता है।
इसके अलावा वे त्योहारों और मंदिरों के लिए भी दान देती थी। उनके राज्य के बाहर भी उन्होंने उत्तर में हिमालय तक घाट, कुएं और विश्राम-गृह बनाए और दक्षिण में भी तीर्थ स्थानों का निर्माण करवाया।

राजधानी माहेश्वर बनी साहित्य, संगीत, कला और उद्योग का केंद्रबिंदु

भारतीय संस्कृतिेकोश के मुताबिक अहिल्याबाई ने अयोध्या, हरद्वार, कांची, द्वारका, बद्रीनाथ आदि शहरों को भी सँवारने में भूमिका निभाई। उनकी राजधानी माहेश्वर साहित्य, संगीत, कला और उद्योग का केंद्रबिंदु थी। उन्होंने अपने राज्य के द्वार मराठी कवि मोरोपंत, शाहिर अनंतफंदी और संस्कृत विद्यवान खुसाली राम जैसे दिग्गजों के लिए खोले।
अहिल्याबाई हर दिन लोगों की समस्याएं दूर करने के लिए सार्वजनिक सभाएं रखतीं थीं। इतिहासकार लिखते हैं कि उन्होंने हमेशा अपने राज्य और अपने लोगों को आगे बढ़ने का हौंसला दिया।उनके शासन के दौरान सभी उद्योग फले-फुले और किसान भी आत्म-निर्भर थे।

ऐनी बेसेंट ने की तारीफ

ऐनी बेसंट लिखती हैं, “उनके राज में सड़कें दोनों तरफ से वृक्षों से घिरें रहते थें। राहगीरों के लिए कुएं और विश्रामघर बनवाये गए। गरीब, बेघर लोगों की जरूरतें हमेशा पूरी की गयीं। आदिवासी कबीलों को उन्होंने जंगलों का जीवन छोड़ गांवों में किसानों के रूप में बस जाने के लिए मनाया। हिन्दू और मुस्लमान दोनों धर्मों के लोग सामान भाव से उस महान रानी के श्रद्धेय थे और उनकी लम्बी उम्र की कामना करते थे।”
अपने समय से आगे की सोच रखने वाली रानी को केवल एक ही गम था कि उनकी बेटी अपने पति यशवंतराव फांसे की मृत्यु के बाद सती हो गयी थी। रानी अहिल्याबाई ने 70 वर्ष की उम्र में अपनी अंतिम सांस ली और उनके बाद उनके विश्वसनीय तुकोजीराव होलकर ने शासन संभाला। बेसंट लिखती हैं, “इंदौर अपनी उस महान और दयालु रानी के लिए जितना शोक मनाये कम था। आज भी उनको सभी अपार सम्मान के साथ याद करते हैं।”  अहिल्याबाई होल्कर का चमत्कृत कर देने वाले और अलंकृत शासन 1795 में खत्म हुआ, जब उनका निधन हुआ। उनकी महानता और सम्मान में भारत सरकार ने 25 अगस्त 1996 को उनकी याद में डाक टिकट जारी किया। इंदौर के नागरिकों ने 1996 में उनके नाम से एक पुरस्कार स्थापित किया। असाधारण कृतित्व के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है। इसके पहले सम्मानित शख्सियत नानाजी देशमुख थे।


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