पुस्तक चर्चा/ निर्मल वर्मा का कहानी संग्रह “परिंदे”

भारती पाठक

इस बार निर्मल वर्मा की कहानियों से आपको परिचित कराते हुए मेरे मन में बहुत झिझक बनी है । इसलिए कि उन्हें लेकर कथा समीक्षा के तमाम खेमों में बहुत चख-चख रही है । जहां एक तरफ बहुत प्रशंसा हुई है तो वहीं बहुत तीखी प्रतिक्रियाएं भी हुई हैं । किसी के लिए उनका रचना-संसार रचनात्मकता का प्रतिमान जैसा है तो किसी के लिए वह पश्चिमी लेखन शैली की आधी-अधूरी नकल है । इस तरह वे शुरू से ही काफी विवादास्पद रहे हैं । फिर भी पाठक उन्हें प्यार करते रहे हैं और उनकी कहानियां अपनी गहरी संवेदनात्मकता के कारण दिल को छूती हैं ।

पर जैसा हमने कहा, हमें उन व्याख्या-विश्लेषणों से अधिक मतलब नहीं । हमें तो कहानियों को पढ़ना है और उनका सार-संक्षेप आपके साथ शेयर करना है ।

निर्मल वर्मा भारतीय कथाकारों की महान परंपरा की कड़ी में हैं जिनका व्यक्तित्व, जीवन और व्यवहार उनकी रचना की एकदम संगति में लगता है । उनके रचनाकर्म में कथा साहित्य और वैचारिक गद्य साहित्य में अद्भुत काव्यात्मकता और लयात्मकता है । अपने जीवन काल में ये साहित्य के लगभग सभी श्रेष्ठ सम्मानों से अलंकृत हुए और अक्टूबर २००५ में अपने निधन के समय भारत सरकार द्वारा औपचारिक रूप से नोबेल पुरस्कार के लिए नामित थे ।

निर्मल जी की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं । रात का रिपोर्टर, एक चिथड़ा सुख, लाल टीन की छत और वे दिन निर्मल जी की प्रमुख कृतियाँ हैं । उनकी कहानी परिंदे लोगों में बहुत लोकप्रिय हुई । जिस किताब को आज हम पढेंगे वह परिंदे शीर्षक से इसी लम्बी कहानी समेत निर्मल जी की सात कहानियों का संग्रह है ।

पहले ही यह बताना जरूरी है कि निर्मल वर्मा जिस तरह के कथाकार हैं, उनके लिए उनकी कहानियों का कथासार जानना ही पर्याप्त नहीं हैं बल्कि उसके पीछे जो बहुत सा अनकहा है, वह भी उतना ही महत्वपूर्ण है ।

पहली कहानी ‘डायरी का खेल’ लेखक और उसकी परिचित बिट्टो की कुछ यादों से जुड़ी है जिसकी फोटो लेकर वह अपनी चाची के कहने पर उसे लेने स्टेशन जाता है । बिट्टो के प्रति उसका आकर्षण, बिट्टो का रहस्यमय व्यक्तित्व और बातों के बीच हुआ डायरी का खेल औरअंत में बिट्टो का जाना जैसी कुछ घटनाएं इस कथा के केंद्र में है ।

लेखक ने कहानी की शुरुआत में ही लिखा है कि “जब वह आई थी, जिंदगी कुछ अधिक समझ में नहीं आती थी । आज जब थोड़ी बहुत समझ आई है, तो वह नहीं है ।“ प्रत्यक्ष अनुभव के अंतर्द्वंद्व पर गहनता से विचार कर मानवीय कमियों और खूबियों को उन्होंने बड़े ही सहज रूप में लिखा है ।

बरसात रुकने पर सिगरेट पीने के लिए लेखक बाहर निकलता है गंदले पानी के गड्ढों के पास से बचाकर गुजरता है तभी एक ढेला आकर उस गड्ढे में गिरता है और पानी की छींटे उसके कपड़ों पर पड़ती है साथ ही सुनाई देती है एक बच्ची की हंसी । स्कूल की छुट्टी होने के कारण वह खेल रही है ।

दोनों के बीच आत्मीयता से कई बातें होती हैं । बातों-बातों में लेखक बताता है कि उसकी तो रोज छुट्टी है (क्योंकि वो बेरोजगार है ) । बच्ची एक कहानी सुनाती है जो उसकी (जो खुद को बच्ची नहीं लता माथुर कहलाना पसंद करती है) जीजी ने उसे सुनाई कि ‘सात समंदर पार एक देश है, जो हीरे मोतियों की चमचमाती पहाड़ी पर बसा है और जिसके चारों ओर चांदी ही चांदी की रेत हवा में उड़ती है ………। जीजी कहती हैं कि उस देश के लोग काम की फ़िक्र नहीं करते उन्हें भी हमेशा हर दिन की छुट्टी रहती है।

अरसा बीतता है और अब लेखक रोजगार दफ्तर नहीं जाता लेकिन जब जब मेह बरसता है वह सिगरेट पीने के बहाने बाहर निकलता है, नाले में बहते पानी को देखता है और एक अपरिमेय रहस्यमयता की सुर लहरी में माया का मर्म गरजने लगता है ।

‘यहाँ से बहुत दूर, सात समंदर पार एक छोटा सा देश है…..’ फिर कहानी शुरु हो जाती है…. और मैं सुनने लगता हूँ ।

यह किताब की दूसरी कहानी ‘माया का मर्म’ है जो अपना निष्कर्ष कहीं न कहीं पाठक पर छोड़ती है कि वो इसे सकारात्मक दृष्टि से सोचता या नकारात्मक रूप में ।

संग्रह की तीसरी कहानी है ‘तीसरा गवाह’ जो क्लब रूम में शुरू होती है जिसमें लेखक अपने कुछ नियमित परिचितों के साथ स्कॉच पी रहा है । वकील मित्र द्वारा प्रेम और विवाह के सम्बन्ध में अपनी घिसी पिटी अवधारणा देने पर सबका ध्यान रोहतगी साहब की ओर जाता है जो स्कॉच का तीसरा पैग अपने हाथ से ले रहे थे । यह सबके लिए ही आश्चर्य की बात थी क्योंकि वे कभी एक या दो पैग से ज्यादा नहीं पीते थे ।

सबका ध्यान रोहतगी की ओर जाता है जब वे कहते हैं कि असली बात तो उस लड़की को ही पता होगी जो अपने पति को छोड़ कर गई है । बहस होती है कि ‘कौन होगी जो उसे छोड़ कर जाएगी जिसे वो दिल से चाहती हो । हाँ अगर पागल या सनकी हो तो और बात है ।’

“जिस लडकी को मैं जानता था, वह पागल या सनकी कुछ भी न थी, लेकिन फिर भी….।” कहते हुए रोहतगी अवसाद की स्थिति में आ गए । सबके आग्रह पर वे अपनी कहानी सुनाते हैं जिसमें उनकी प्रेमिका नीरजा है जिससे कोर्ट विवाह करने की सब तैयारी होती है लेकिन तीसरे गवाह के पहुँचने की देरी में नीरजा जाने किस मानसिक अवस्था में चुपचाप बिना बताये कोर्ट रूम से बाहर चली जाती है और फिर शहर से भी ।

रोहतगी शून्य में देखते हुए कहते हैं कि पहले मुझे लगता था कि नीरजा शायद मुझसे प्रेम नहीं करती, फिर लगा शायद कोर्ट में वे आखिरी के दस मिनट महत्वपूर्ण थे । कोर्ट का अजीब भयानक कमरा, उस क्लर्क की मनहूस मुस्कराहट, नीरजा का चले जाना, यह सब बस एक गलती से हुआ कि तीसरा गवाह सही समय पर नहीं आया ।

कहानी में जीवन्तता मुख्यतः बिम्बों द्वारा निर्मित वातावरण से उत्पन्न होती है जो कि निर्मल जी के लेखन की विशेषता है । उदाहरण – कहानी का एक दृश्य , “कोर्ट रूम का लम्बा अँधेरा कमरा, जहाँ दिन में भी बत्ती जला करती थी । मजिस्ट्रेट की कुर्सी खाली पड़ी थी । बीच में एक लम्बी मेज थी, जिसके दोनों ओर धूल से अटी पुरानी कुर्सियां रखी थी ।”

अगली कहानी ‘अँधेरे में’ बच्चे की मार्मिक वेदना को व्यक्त करती है । बच्चा बीमार है, किसी का उससे मिलना जुलना नही हो पाता । वह शिमला से दिल्ली आना चाहता है जो उसके ठीक होने पर ही संभव है । वह माता पिता के बदलते संबंधों की उलझनों को अपने बालपन की बुद्धि से बुनता उधेड़ता रहता है जिसमें उसकी साथी बानो है, मां की यादें जो आजकल घर में नहीं है और उसके वीरेन चाचा जिसे वह बहुत पसंद करता है ।

कहानी में दृश्य बिम्बों का प्रभाव देखते ही बनता है जो एक छोटी सी घटना में ही लम्बी कहानी की बुनावट की सम्भावनाएं खोल देता है । ‘अचानक वह दरवाजा दोनों बड़े बड़े काले पंखों सा फड़फड़ाता हुआ खुल गया, प्रकाश की पतली सी रेखा फर्श पर तेज़ी से लपकती हुई सामने की दीवार पर चढ़ गयी ।”

पिक्चर पोस्टकार्ड कहानी में नायक के अपनी सहपाठिनी के प्रति उपजे प्रेम और अन्तर्मुखी स्वभाव के कारण अंत तक कोशिश करने पर उसे अपने दिल की बात न बता पाने की कहानी है जो अधिकतर संवादों से बुनी गयी है जो वह अपने साथी के साथ करता है जहाँ दोनों साथ रहते हैं । अंत में नायक यह सोच कर खुश है कि वह नहीं कह पाया अपने दिल की बात क्योंकि ‘कुछ बातें है जो उम्र के संग जुडी रहती हैं, और अगर उम्र बीत जाये और वे अनकही रह जाएँ तो उन्हें कभी कहना नहीं होता ।’

निर्मल जी की कहानियां पाठकों के लिए अनंत वैचारिक सम्भावनाएं लिए प्रतीत होती हैं जिनमें वह अपने तरीके से जुड़ सकता है क्योंकि अतिसंवेदनशील होने के कारण उनकी कहानी का केंद्र केवल पात्र या घटनाएं ही नहीं वरन एक संवेदना है जो पात्र, घटनाओं और वातावरण को मिलकर एक बिम्ब का रूप ले लेती है ।

‘सितम्बर की एक शाम’ इस संग्रह की छठी कहानी है जिसका नायक पारिवारिक उपेक्षा को सहते हुए आर्थिक जद्दोजहद से गुजर रहा है । पिता से उसका टकराव है और जिस शहर में वह रहता है वहां उसकी बहन भी रहती है लेकिन उसमें भी भाई के प्रति कोई संवेदना नहीं है ।

वह कहती है कि : ‘अगर घर छोड़ कर भागना था, तो इस शहर में क्यों आये । माँ की चिट्ठियाँ आती हैं, तुम्हारे जीजाजी परेशान होते हैं, मुझे कोसते हैं । बताओ मैं क्या करूँ ? जब तक यहाँ इस शहर में रहोगे, मुझे छुटकारा नहीं मिलेगा ।’

बहन उसे घर जाने के लिए रेल के किराए के पैसे देती है पर वह पैसे लेकर एक बाजारू औरत के पास चला जाता है । कहानी में संभावना और व्यर्थता में अंतर्विरोध दिखता है । निर्मल जी की कहानियों का व्यक्ति समाज में रहकर भी प्रायः समाज से कटा कटा रहता है ।

संग्रह की आखिरी और सबसे प्रसिद्ध कहानी ‘परिंदे’ एक खोये हुए प्रेम की छटपटाहट को भोगने की कहानी है । लतिका पहाड़ पर स्थित एक स्कूल की वार्डन है जो एक मेजर से प्रेम करती थी । मेजर की असमय मृत्यु से लतिका का प्रणय युक्त मन कुम्हला जाता है । अतीत के दबाव में वह वर्तमान में अपने सहकर्मी हुबर्ट के प्रेम से आँखें चुराती है । एक अन्य सहकर्मी डॉक्टर मुखर्जी उसे समझाते हैं कि –

‘लैट द डेड डाई, मरने वाले के संग खुद थोड़े मरा जाता है । किसी चीज को न जानना यदि गलत है, तो किसी चीज को न भूलना, जोंक की तरह उससे चिपके रहना – यह भी तो गलत है ।’

लतिका आकाश में उड़ते परिंदों को देख कर सोचती है कि ये प्रेम के प्रतीक हैं । इन्हें प्रेम है ज़िन्दगी से क्योंकि जिंदगी में ऊष्मा बनाये रखकर ही ये अतीत की स्मृतियों के प्रति ईमानदार हो सकते हैं । लतिका में भी परिवर्तन दिखाई देता है । वह अपनी छात्र जूली के पकड़े गए प्रेम पत्र को चुपचाप वापस उसके तकिये के नीचे रख देती है ।

‘शायद कौन जाने जूली का यह प्रथम परिचय हो, उस अनुभूति से, जिसे हर लड़की बड़े चाव से संजोकर, संभालकर अपने में छिपाए रखती है ।’

लतिका भी मुक्त होना चाहती है….. अपनी स्मृतियों से, अपने पूर्व प्रेम से ।
निर्मल वर्मा का शिमला का जीवन और यूरोप में निवास उनमें एक खास तरह के लगाव और वीतरागता की मनःस्थिति एक साथ बनाते हैं । उनकी कहानियों की तटस्थता में एक ऐसी गहरी आत्मीय भावुकता झलकती है जो किसी के भी दिल को छूती है । इसीलिए निर्मल वर्मा हमारे कथा साहित्य के अनूठे रचनाकार हैं जिन्हें जितना पढ़ते हैं उतना ही और पढ़ने की ललक मन में जगती है ।


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