जब ज़िगर मुरादाबादी की दाद सुनकर राजेंद्र कृष्ण ने फिल्मों में बतौर शायर किस्मत आजमाने का फैसला कर लिया…

Meenakshi Chaudhary

क्या आपने कभी किसी गुमसुम व्यक्ति को यह कह कर पूछा ‘चुपचुप खड़े हो, जरूर कोई बात है?’ या फिर अपने किसी खास के लिए, बेशक मन ही मन सही, रोमांस की यह हिंदी एंथम गायी हो: ‘पल-पल दिल के पास तुम रहती हो’? ये सभी पंक्तियां फ़िल्मी गीतकार राजेंद्र कृष्ण के गीतों के बोल हैं, जो हमारी भाषा का हिस्सा होकर हमारे बीच मौजूद हैं।

कविता लिखने के लिए कवि होना ज़रूरी है। लेकिन जब तक कवि को यह न बताया जाय कि वो कवि है तब तक उसे अपने सामर्थ्य पर अविश्वास रहता है। रामायण के चरित्र महाबली हनुमान की तरह। राजेन्द्र कृष्ण ने भी बचपन से ही साहित्य पढ़ा, डायरियों के पन्नों पर अपने मन के भाव कविता, शायरी, ग़ज़ल, कहानियों द्वारा दर्ज किये। कवि मन आकार लेने लगा। अख़बारों में कविताएं प्रकाशित होने लगी। मंचों पर कविता पढ़ने के लिए जाने लगे तो झिझक टूटने लगी। वाहवाही भी मिलने लगी परंतु खुद को कवि या शायर कहने का हौंसला न आया।

फिर एक दिन वो भी आया जिससे राजेन्द्र कृष्ण को विश्वास हो गया कि वे वहाँ पहुंच गए हैं जहाँ स्वयं को शायर या कवि कह सके। बात सन 1945-46 के दिनों की है। उन दिनों शिमला में बहुत बड़ा मुशायरा हुआ करता था, जिसमें बँटवारे से पहले के हिंदुस्तान के लगभग सभी बड़े शायर इकट्ठा हुआ करते थे। वहां राजेंद्र कृष्ण को न केवल अपनी ग़ज़ल पढ़ने का मौका मिला मगर उस पर कुछ ऐसी दाद मिली कि राजेंद्र कृष्ण को विश्वास आया कि हाँ, वे पक्के शायर हो चुके हैं।

बात यूँ हुई कि मुशायरे में जिगर मुरादाबादी को भी आना था। उन्हें कुछ देर हो गयी। पहुंचे तो किसी ने उनसे कहा कि “जनाब, आप इस नए शायर के कुछ गज़ब के शेर सुनने से रह गए।” ‘जिगर’ साहब ने नौजवान शायर से फिर से ग़ज़ल सुनाने को कहा। अब जिगर कहें और तामील न हो। राजेंद्र साहब ने मतला पेश किया: ‘कुछ इस तरह वो मेरे पास आए बैठे हैं; जैसे आग से दामन बचाए बैठे हैं’।

मतले को सुनकर जिगर साहब देर तक सिर हिलाते रहे। इतनी देर तक कि राजेंद्र साहब ने तय कर लिया कि अब उन्हें नौकरी से इस्तीफा दे देना है और एक शायर की ज़िंदगी जीनी है। तो साहब उस दिन संगीत प्रेमियों की किस्मत ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि राजेंद्र कृष्ण दुग्गल ने शिमला म्युनिसिपल कार्पोरेशन के क्लर्क की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और लेखक ‘राजेंद्र कृष्ण’ बनाने मुंबई चले आए।

मुंबई में जब भी आत्मविश्वास की ज़रूरत होती थी तो वे ज़िगर मुरादाबादी का दाद में देर तक हिलता हुआ सिर याद कर लिया करते थे। उन्हें कहीं अपने भीतर इस बात का विश्वास हो चुका था कि यदि ‘जिगर’ साहब ने मान लिया है, तो दुनिया भी मान ही लेगी।

राजेंद्र कृष्ण का पहला मशहूर गीत महात्मा गांधी की हिला देने वाली जघन्य हत्या के बाद लिखा गया गीत था। गीत जिसमें आँसू भी थे और दिवंगत महात्मा के जीवन का उत्सव भी। किसने नहीं सुना ‘सुनो सुनो ऐ दुनियावालों बापू की ये अमर कहानी’ को। पूरे देश के शोक को राजेन्द्र कृष्ण ने शब्द दिए। इस तरह आज़ाद भारत में ये पहला मौका था, जब राजेंद्र कृष्ण ने भारत की सामूहिक चेतना को आवाज़ दी थी. फिर इसके बाद कई दशकों तक ऐसे मौके आते रहे, जब देश राजेंद्र कृष्ण के गीतों में लहराया, डूबा, उभरा, रोया गाया। तो आज उनके जन्म दिवस पर सुनिए उनकी एक चर्चित और मशहूर ग़ज़ल। सुनिये प्रेम में डूबे एक प्रेमी का हाल। प्रेम कैसा भी प्रेम हो सकता है। महसूस करिए प्रेम की संभावनाये उसके ग़म, उसकी खुशियाँ। मुझे दूसरे शेर में जो विरोधाभास है वो बहुत खूबसूरत लगता है:

किसी की याद में दुनिया को है भुलाए हुए
ज़माना गुज़रा है अपना ख़याल आए हुए

बड़ी अजीब ख़ुशी है ग़म-ए-मोहब्बत भी
हँसी लबों पे मगर दिल पे चोट खाए हुए

हज़ार पर्दे हों, पहरे हों या हों दीवारें
रहेंगे मेरी नज़र में तो वो समाए हुए

किसी के हुस्न की बस इक किरन ही काफ़ी है
ये लोग क्यूँ मेरे आगे हैं शम्अ’ लाए हुए

~ राजेन्द्र कृष्ण


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