वह बोरिस पास्तरनाक और रिल्के से एक साथ प्रेम करती थी…

विमल कुमार

आपको जानकर शायद थोड़ा आश्चर्य लगे रूस की वह कवयित्री शादीशुदा होने के बाद भी अपने समय के दो बड़े लेखकों के साथ एक ही समय में प्रेम करती थी जबकि उसने प्रेम विवाह किया था। उससे पहले भी युवावस्था में भी उसके मन में एक पुरुष के लिए प्रेम अंकुरित हुआ था लेकिन वह उसे अभिव्यक्त नही कर पाई थी और तब दो पुरुष उससे प्रेम करते थे। विवाह के बाद उसे एक और शख्स से एकतरफा प्रेम हुआ था लेकिन प्रेम और सौंदर्य की इस महान कवयित्री का जीवन अत्यंत दुखद रहा और महज 49 वर्ष की उम्र में यानी 1941 में उसने आत्महत्या कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। वह सिल्विया प्लाथ के बाद दुनिया की दूसरी महान कवयित्री थी जिसने अपने जीवन के दुख के कारण अवसाद की मनःस्थितियों में यह कदम उठाया।

इस कवयित्री की हिंदी में पहली बार एक सुंदर जीवनी युवा कवयित्री एवं पत्रकार प्रतिभा कटियार ने बड़ी मेहनत से डूब कर लिखी है। यद्यपि 1966 में अंग्रेजी में इस कवयित्री की पहली अंग्रेजी जीवनी आ चुकी थी और उसकी पुत्री ने भी अपनी मां पर एक संस्मरणात्मक किताब लिखी थी पर हिंदी में यह पहला प्रयास प्रतिभा ने किया है। यह इस रूप में उल्लेखनीय है कि वरयाम सिंह के शब्दों में किसी रूसी लेखक की सम्भवततः हिंदी में पहली जीवनी है। इस कवयित्री को दुनिया मे तब प्रमुखता से जाना गया जब अलेक्सेडर सोल्जेनितसिंन ने 1974 में एक इंटरव्यू में उसे बोरिस पास्तरनाक और अन्ना अखमातोव की तरहः महान लेखक बताया।

इस कवयित्री का जन्म 1892 में जन्म हुआ था, तब भारत में हिंदी कविता के छायावादी कवियों में प्रसाद को छोड़कर निराला, पंत या महादेवी वर्मा में किसी का जन्म नही हुआ था। मारीना इवानोव्ना त्सेवतेवा के समकालीन भारत में बनारसीदास चतुर्वेदी और राय कृष्णदास थे क्योंकि उनका भी जन्म 1892 में हुआ था। इस कवयित्री के जन्म से 9 साल पहले महान रूसी उपन्यासकार तुर्गनेव मर गए थे। टॉलस्टॉय जरूर जिंदा थे लेकिन जब इस कवयित्री ने होश संभाला तो उनका भी निधन हो गया था। गोर्की तो इस कवयित्री से 24 साल बड़े थे और वो उसे जानते थे लेकिन अच्छी राय नही रखते थे। चेखव तो इस कवयित्री के जन्म के 12 साल बाद मरे। बोरिस पास्तरनाक, मायकोव्स्की और नावकोव इस कवयित्री के समकालीन रहे। अलेक्सेद्र ब्लॉक सीनियर कवि थे और यह कवयित्री उनसे प्रभावित रही। उसने उन पर एक कविता भी लिखी थी। इस तरह इस कवयित्री के समय टॉलस्टॉय, दस्तोवस्की और तुर्गनेव जैसे बड़े उपन्यासकारों और चेखव जैसे बड़े कहानीकार रूस के साहित्य का परिदृश्य रच चुके थे। यह कवयित्री वैसे पुश्किन की भी प्रशंसिका थी।

जाहिर है रूस के इस साहित्यिक परिदृश्य में इस कवयित्री को अपनी पहचान बनाने में संघर्ष करना पड़ा। भारत में रूसी साहित्य से परिचय करने का श्रेय पीपीएच को जाता है और उसने रूसी साहित्य को बड़े पैमाने पर छापा लेकिन उसमें उस समय की लेखिकाएं नही थी बल्कि पुश्किन, गोर्की, चेखव टॉलस्टाय तुर्गनेव और दस्तोवस्की जैसे लेखक अधिक थे। इसलिए हिंदी पाठक इस कवयित्री से अधिक परिचित नही हो सके। भारत मे विश्व साहित्य की लेखिकाएं चाहे क्रिस्टीना रोसेटी जेन ऑस्टिन, एमिली ब्रांत हो सभी पाठ्यक्रमों के जरिये जानी गई पर रूसी कवयित्रियाँ पाठ्य पुस्तक का हिस्सा नही बनी।

मारीना इवानोव्ना त्सेवतेवा
इसलिए वे नही जानी गई। हिंदी साहित्य की दुनिया मे वर्जीनिया वुल्फ और कैथरीन मैन्सफील्ड की चर्चा बाद में तब हुई जब निर्मल वर्मा जैसे लेखकों ने इनका जिक्र किया। कुछ साल से शिम्बोर्स्का, टोनी मोरिसन और नॉरदन गाडीमर की चर्चा उनके अनुवादों से हुई लेकिन उनमें से किसी की जीवनी हिंदी में आज तक नही आई। इस लिहाज़ से प्रतिभा की यह किताब बहुत महत्वपूर्ण है और उसने 7 साल का समय लगाकर पूरे शोध के साथ इसे लिखा है। इस किताब से हिंदी पाठकों को पहली बार मारीना के जीवन और साहित्य के बारे में विस्तृत जानकारी मिलेगी और यह पता चलेगा कि उसके साथ वाकई कितना अन्याय हुआ।

मारीना ने 14 वर्ष की आयु में मां को खोया 25 साल की उम्र में पिता को खोया, 28 साल की उम्र में भूख और बीमारी से अपनी छोटी बेटी इरिना को खोया। तब उसकी बड़ी बेटी आल्या इतनी बीमार थी कि वह इरिना के अंतिम संस्कार में नही जा सकी। उसका सौतेला भाई भी चल बसा। उसकी बहन और आल्या को भी कारावास हुआ और वे स्तालिन के मरने के बाद ही वापस देश लौट सकी। इससे मरीना के अकल्पनीय दुख का सहज अन्दाज लगा सकते हैं। उसे रूस से 17 साल निर्वासित जीवन जीना पड़ा और उसका पति जासूसी की आरोप में पकड़ा गया और पुलिस ने उसे गुप्त स्थान पर रखा। वह अपनी पति के लिए भी छटपटाती रही।

वह 1939 में मारीना मास्को लौट पाई। इस तरह देखा जाए तो मारीना का जीवन बहुत ही कष्ट में बीता। वह स्टॅलिन के जमाने मे सत्ता के दमन और सत्ता परस्त वामपंथी लेखकों द्वारा तिरस्कार की भी शिकार रही। कुल मिलाकर उसका जीवन तनाव और संघर्ष में बीता और इसी दौरान उसने जावडस्की नामक एक अभिनेता से एक तरफाप्रेम किया और एक साल में 6 नाटक भी लिखे। उसका प्रेम लैन नामक एक युवक से भी हुआ भले ही वह लंबा न चला हो। फिर वह पास्तरनाक और रिल्के से प्यार करती रही। पास्तरनाक पर उसने एक कविता भी लिखी। लेकिन पुस्तक पढ़ने से पता चलता है कि वह रिल्के से अधिक प्यार करती थी।

मारीना का कई पुरुषों से प्यार होना इस बात को बताता है कि उसके जीवन मे बचपन मे मा का प्यार कम मिला। मारीना ने लिखा है— “मुझे प्यार नही चाहिए। मुझे पारस्परिक समझ चाहिए। मेरे लिए यही प्यार है। और जिसे आप प्रेम की संज्ञा देते हैं, बलिदान, वफादारी, ईर्ष्या उसे दूसरों के लिए बचाकर रखिये किसी दूसरे के लिए रखिये। मुझे यह नही चाहिए।” मारीना की इस बात को जानने के बाद यह लगता है कि कई पुरुषों से प्रेम के पीछे उसकी शायद वह तलाश थी कि दोनों में एक पारस्परिक समझ विकसित हो। उसकी प्रेम यात्रा इस समझ की एक तरह से खोज थी।

बोरिस पास्तरनाक
इस किताब का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय पास्तरनाक रिल्के और मारीना के बीच पत्र-व्यवहार है। प्रेम का यह त्रिकोण बहुत ही सुंदर है। रूसी साहित्य में यह दुर्लभ तो है ही विश्व साहित्य में लेखकों के बीच प्रेम के इस त्रिकोण के किस्से तो बहुत मिलते है पर पत्रों के माध्यम से इसके सबूत कम मिलते है। 1926 में बोरिस पास्तरनाक ने 30 अप्रैल को मरीना को एक पत्र लिखा— “प्रिय मारीना, आज मैं तुमसे वह कहना चाहता हूं जिससे मैं लंबे समय से अपने भीतर छुपाया हूं उन शब्दों को तुम्हें सौंपना चाहता हूं जिन की आग में मैं न जाने कबसे झुलस रहा हूं। मारीना तुम्हारे ख्याल का मेरे आस पास होना मुझे क्या से क्या बना देता है। तुम नहीं जानती, मैं तुम्हारे पास होना चाहता हूं। तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं हमेशा के लिए। तुम निसंकोच होकर अपनी भावनाओं के बारे में मुझे बताना क्योंकि मैं तुम्हारे कारणों को समझने की योग्यता रखता हूं। निकट भविष्य में मैं तुमसे मिलने की इच्छा रखता हूं। जब तुम कहो, जहां तुम कहो। तुम्हारा— बोरिस पास्तरनाक।” पास्तरनाक को यह पता चल गया था कि मारीना रिल्के को भी प्यार करती है।

इससे वह गहरे अवसाद में रहे। उसने 23 मई को मारीना को एक कटु पत्र लिखा— “यह तुमने क्या किया क्यों किया कैसे कर पाई तुम कल मुझे रिल्के से मिले पत्र ने तुम्हारे और इनके के बारे में सब कुछ बता दिया है। मैं इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता मरीना कि तुम्हारी जैसी प्यारी खूबसूरत दिल रखने वाली स्त्री जिसका जन्म समय के बाद पर मोहब्बत का राग आने के लिए हुआ है वह कैसे ऐसा बेसुरा राग छेड़ सकी मुझे नहीं पता। अपनी जिंदगी में मैंने इतना दुख और गुस्सा एक साथ पहले कब महसूस किया था। “पास्तरनाक ने उस दिन मारीना के नाम एक और खत लिखा— “मैं इस बारे में रिल्के को कुछ भी नहीं लिख रहा हूं मारीना क्योंकि मैं उन्हें भी तुम से कम प्रेम नहीं करता तुम यह सब क्यों ना देख पाए मारीना मेरे दो प्रिय लोगों को मुझसे छीन लिया तुमने”

इस किताब में प्रतिभा ने रिल्के के नाम मारीना के पत्रों का भी जिक्र किया है। यहां मारीना का एक पत्र पेश किया जा रहा है— “माय डियर राइनेयर, तुमने एक बार अपने किसी पत्र में लिखा था कि अगर मैं कभी गहन खामोशी में चला जाऊं और तुम्हारे पत्रों का जवाब ना दूं तब भी तुम मुझे लिख कर रहना मैंने इस बात का अर्थ यू लिया मेरे प्रिय कि तुम्हे एक खामोश राहत की दरकार होती है जिसमें तुम आराम कर सको। मैंने खामोशी में वही राहत तुम्हें पिछले दिनों देने की कोशिश की। उम्मीद है अब तुम अपनी शांति को जी चुके होगे और मेरे पत्रों का बेसब्री से इंतजार कर रहे होगे।मेरे प्रिय, तुम्हारा साथ मुझे आकाश की ऊंचाइयों तक ले जाता है और मेरे भीतर के समंदर की गहराइयों तक भी तुमसे मिलना असल में खुद से मिलना ही है और मिलना है समूचे संसार से। जब मैं तुमसे बात नहीं कर रही होती हूं असल में मैं तब भी तुम से ही बात कर रही होती हूं। मैं तुमसे मिलना चाहता हूं रिल्के। मिलकर तुम्हें बताना चाहती हूं कि एक व्यक्ति किस तरह दूसरे व्यक्तित्व का हिस्सा हो जाता है जैसे कि तुम हो चुके हो रात की गहन नीरवता में। तुम्हें हर पल अपने करीब पाती हूँ। रिल्के और खामोशी के बियाबान में खुद को गुमा देती हूँ। उम्मीद है तुम अच्छे हो गए –प्यार मरीना”

लेकिन मारीना रिल्के को प्यार करते हुए पास्तरनाक को खोना नही चाहती थी। वह उससे प्यार करते रहना चाहती थी। रिल्के के नाम 4 जून को लिखा उसका एक पत्र इस पर रौशनी डालता है।” सुनो रिल्के न जाने क्यों मुझे लग रहा है कि मैं बहुत बुरी हूं बहुत ही बुरी पिछले दिनों की मेरी लंबी खामोशी इसी अहसास के चलते थे बोरिस पास्तारनाक को लगता है कि तुम्हें पत्र लिखकर और तुम्हारी करीबी का एहसास पाकर मैंने उसे कोई धोखा दिया है। राइनेर मैं सचमुच बुरी हूं मैंने उसका दिल दुखाया और पिछले पत्र में तुमसे इस बात का जिक्र भी नहीं किया। असल में मैं जब तुमसे बात करती हूं तो तुम्हें और खुद को खास और एकांतिक माहौल में रखना चाहती हूं जहां हमें किसी और का कोई ख्याल कोई और बात जो भी न सके लेकिन यह तो ठीक नहीं है।राइनर तुम्हारे और मेरे बीच सब पानी की तरह साफ होना चाहिए इसलिए आज तुम्हें यह पत्र लिख रही हूं। मैं अपनी जिंदगी में झूठ के लिए कोई जगह नहीं रखना चाहती हालांकि मेरे हिस्से में बहुतों के झूठे हैं फिर भी रिश्तो की इमानदारी और सच्चाई पर विश्वास करती हूं उम्मीद है तुम अपनी मारीना को समझ सकोगे— प्यार मारीना”

रिल्के
रिल्के ने मारीना पर एक कविता भी लिखी थी। और रिल्के का जब निधन हुआ तो मारीना ने एक मार्मिक पत्र पास्तरनाक को लिखा था। इस पत्रों और कविताओं से तीनों के खबसूरत रिश्ते का पता चलता है। हिन्दी साहित्य में इस तरह के रिश्तों को अभी मान्यता नही मिली है और इस तरह पत्र भी नही हैं जिसमे अपने समय के तीन महान लेखकों के बीच ऐसे सम्बन्धों का विवरण मिलता हो। इस किताब में गोर्की और मारीना के प्रसंग का भी जिक्र है जिससे रूस में लेखकों के आपसी पूर्वग्रह का पता चलता है। पास्तरनाक ने गोर्की को एक पत्र लिखा था— “मारीना एक महान लेखिका है और बहुत बुरे हालत में है उसे खुद अपने लेके कौशल के बारे में जानकारी नहीं है नहीं यह कि कैसे उसका इस्तेमाल किया जाए मैं उसकी सहायता के लिए कुछ भी करना चाहता हूं हर संभव कोशिश उसे हर कीमत पर वापस रूस लाना चाहता हूं। इस पत्र के जवाब में गोर्की ने काफी निराशाजनक जवाब दिया— “तुम मारीना के बारे में जिस उच्चता से सोचते हो, मैं उससे सहमत नहीं हूं। उसके लेखन में मुझे कुछ हिस्ट्रीक तत्व तो नजर आते हैं। उसे शब्दों पर पूरा अधिकार नहीं है नहीं उस उसके रिदम पर।

उसका ज्ञान भी काफी सीमित है और रुसी भाषा पर भी अच्छी पकड़ नहीं है। उसे लगता है फोनेटिक का इस्तेमाल करके शब्दों में संगीत भरा जा सकता है जबकि ऐसा नहीं होता। मारीना को जरूर रूस वापस लौटना चाहिए लेकिन वह मुझे आसान तो नहीं लग रहा। “अंत मे मारीना मास्को लौटती है लेकिन दो साल बाद वह आत्महत्या कर लेती है। उसकी आत्महत्या रूसी व्यवस्था की तानाशाही पर भी एक भी प्रश्न है। शायद ही दुनिया की किसी लेखिका ने इतना कष्ट और उपेक्षा झेली हो। आज लोग मानते है कि वह नोबल प्राइज की हकदार थी लेकिन उसे वह प्रसिद्धि नही मिली जो उसे मिलनी चाहिए थी। इस कवयित्री के जीवन में इतने उतार-चढ़ाव और भंगिमाएं तथा छवियां है कि उसमें फ़िल्म नाटक और उपन्यास तीनों की संभावना है। प्रतिभा ने इस किताब की अपनी भूमिका अंत मे दी है जबकि वह शुरू में देती तो बेहतर होता। उन्होंने बीच-बीच मे हर अध्य्याय के अंत में बुकमार्क देने का प्रयोग किया है। अगर प्रतिभा थोड़ी और मेहनत करती तो और बड़े फलक पर इसे लिखती तो उनकी यह किताब और चर्चित होती। अगर वरयाम सिंह जैसे लोग मारीना की कविताओं के अनुवाद सामने नही लाते तो हिंदी के पाठक कहां जान पाते। हिंदी समाज इन दोनों का सदैव ऋणी रहेगा।

मारीना : प्रतिभा कटियार [जीवनी], मू. 300 रुपये मात्र, संवाद प्रकाशन, मेरठ


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