यात्रा-वृत्तांत: मेरी कॉम के देस इम्फाल (मणिपुर) में

भारती पाठक

नक्शे में उत्तर-पूर्व को देख कर हमेशा रोमांच सा होता था कि कब वहां की यात्रा संभव होगी और जब मौका मिला तो लगातार साल दर साल जाना हुआ । 2018 में मणिपुर जाने का अवसर आया तो बहुत उत्सुकता थी क्योंकि ये उत्तर पूर्व की पहली यात्रा थी और अच्छा था कि साथ में विशाल गुप्ता भी थे जो हमारे शहर के ही और पूर्व परिचित जिनके साथ पहले भी मैं खेल टीम लेकर तेलंगाना जा चुकी थी ।
हमें इम्फाल जाना था जिसके लिए वायुमार्ग से सीधा इम्फाल पहुंचा जा सकता है लेकिन हमारा आरक्षण ट्रेन से था जो कि मुगलसराय ( पंडित दीन दयाल उपाध्याय नगर ) से दिन में 11 बजे थी जिसके लिए हम फैजाबाद से रात में निकले कि देर सवेर होने पर ट्रेन के छूटने का खतरा न रहे ।
इम्फाल के लिए ट्रेन से पहुँचने का आखिरी स्टेशन दीमापुर है जो कि नागालैंड में पड़ता है । यहाँ से इम्फाल की दूरी करीब 215 किलोमीटर की है । आगे की यात्रा बस अथवा किसी अन्य वाहन से ही करनी पड़ती है ।
छोटी बहन उन दिनों गुवाहाटी में ही थी । स्टेशन हमारे रास्ते में ही पड़ने वाला था । उसे फ़ोन से सूचना दे दी थी तो वह अपने पति के साथ स्टेशन पर ही मिलने आई साथ में ढेर सारा खाना लेकर जो हम कई लोगों के लिए पर्याप्त था । इस तरह मिलने का भी अपना रोमांच होता है, हाँ ये स्नेह और मिलने की व्यग्रता दोनों ओर हो तब । ये खुशकिस्मती है कि अभी हम सभी भाई बहन ( चचेरे, मौसेरे, फुफेरे, ममेरे ) इस स्नेह डोर में बंधे हुए हैं और मिलने के कोई अवसर सहज नहीं छोड़ते ।
जब ट्रेन दीमापुर पहुंची तो सुबह के चार बज रहे थे । हमें इम्फाल तक पहुँचाने की व्यवस्था में लगे कर्मचारियों को फ़ोन किया तो उन्होंने 5 बजे स्टेशन आने को कहा । एक घंटे का समय हमने फ्रेश होने, प्लेटफार्म का चक्कर लगाने और चाय पीकर बिताया । जब वे कर्मचारी हमें लेने आये तो हम स्टेशन से बाहर निकले । माहौल कुछ अजीब सा तनाव भरा लग रहा था । हो सकता है ये बहुत सुबह होने की वजह से हो ये सोचकर हम अपने लिए निर्धारित बस में बैठ गए । ट्रेन में भी बहुत आराम नहीं मिला था तो अपनी सीटों पर बैठते ही नींद ने अपनी आगोश में ले लिया । बस चल पड़ी ।
मणिपुर यानि आभूषणों का शहर, जो कभी इतना रूखा सूखा हुआ करता था कि इसे ड्राई लैंड कहते थे । कहते है अर्जुन ने यहाँ की राजकुमारी चित्रांगदा से विवाह किया तब से यह नगर कृष्णमय हो गया । मणिपुरी नृत्यों में भगवान् श्री कृष्ण से सम्बंधित लीलाओं का सुन्दर प्रदर्शन होता है ।

मणिपुर की राजधानी इम्फाल राष्ट्रीय राजमार्ग 39 द्वारा उत्तर में नागालैंड तथा पूर्व में म्यांमार से और राष्ट्रीय राजमार्ग 53 से पश्चिम में असम तथा 150 दक्षिण में मिजोरम से जुड़ी हुई है । इम्फाल उत्तरपूर्व भारत में सिमटा हुआ एक छोटा सा शहर और मणिपुर राज्य की राजधानी है । ये द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सुर्ख़ियों में आया जब इसने जापानियों से लोहा लिया । यह सात पहाड़ियों से घिरा हुआ है और प्रदेश की सांस्कृतिक और व्यवसायिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है ।
फिलहाल हम नागालैंड से होकर ही इम्फाल जा रहे थे । कहने को तो हमने सुना है कि ये सेवेन सिस्टर्स के प्रदेश हैं तो आपस में कुछ जुडाव जरूर होगा लेकिन जाते हुए रास्ते भर जो जांच प्रक्रिया चलती रही उससे आभास हो रहा था कि जैसे हम अपने नहीं किसी अन्य देश की यात्रा पर हों । पता चला ये सुरक्षा जांच और परिचयपत्र दिखाने की बाध्यता कुछ तो विदेशी घुसपैठियों के कारण है और कुछ नागालैंड और मणिपुर में सीमा विवाद के कारण होती है ।
पूर्वोत्तर के राज्यों में सूर्योदय देश के अन्य भागों की अपेक्षा जल्दी होता है तो जब बस एक ढाबे पर रुकी 7 बज रहे थे और धूप में भरी दुपहरी जितनी तपिश थी । थोड़ी देर के लिए हम बस से बाहर आये । जहाँ हम खड़े थे वो एक ऊँची पहाड़ी की आड़ में बना ढाबा था जिसके सामने काफी लम्बी चौड़ी जगह थी । सामने सड़क पार करने पर गहरी खाई । एक कप चाय पीने की तीव्र इच्छा ने मेरे कदम ढाबे की ओर बढ़ा दिए । चाय पीने के बाद हम फिर बस में बैठे । बस चल पड़ी और साथ ही चल पड़ी प्रकृति की सुन्दरता को करीब से महसूस करने की यात्रा ।
दीमापुर से इम्फाल है तो 215 किलोमीटर ही लेकिन पहाड़ी रास्ता होने और सड़क निर्माण चालू रहने के कारण हम पूरे नौ घंटे का सफ़र कर इम्फाल पहुंचे । हमारे रुकने की व्यवस्था खुमन लम्पाक स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स के हॉस्टल में की गयी थी । थोड़ी ही देर में हमे कमरे मिल गए ।
दोपहर का भोजन मेस में किया हमने जिसकी तारीफ़ करके उसे दोबारा याद नहीं कर सकती क्योंकि उसे खाने के बाद दो दिन मैंने बस फलों का जूस और चाय पीकर बिताए । और कुछ भूल भी जाऊं पर ये नहीं भूल सकती कि शाकाहारी खाने में वहां दिन में पत्तागोभी और रात को पनीर की कोई मीठी सी सब्जी के अलावा कोई और सब्जी बनती नहीं देखी मैंने । मांसाहारियों के लिए क्या बनता था उधर जाने की हिम्मत नहीं कर पाई । इसका मतलब ये नहीं कि वहां भोजन की वैरायटी नहीं उपलब्ध लेकिन पत्ता गोभी वहां के लगभग हर खाने और सलाद में प्रयोग होते देखा मैंने ।
शाम तक आराम करने से थोड़ा अच्छा लग रहा था तो सोचा कहीं निकला जाये । पता किया तो मालूम हुआ कि संगाई महोत्सव चल रहा है । संगाई महोत्सव 21 से 30 नवम्बर तक हर साल मणिपुर पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित एक वार्षिक सांस्कृतिक उत्सव है । संगाई मणिपुर में पायी जाने वाली हिरन की एक दुर्लभ प्रजाति है जो मणिपुर का राज्य पशु भी है । इसी के नाम पर इस महोत्सव का नाम रखा गया है । इसका उद्देश्य मणिपुर को विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में बढ़ावा देना है ।
हमें भी इस अनूठे सांस्कृतिक आयोजन का साक्षी होने का सौभाग्य मिला । ऑटो से जाने पर कुछ 10 मिनट की दूरी पर ही यह आयोजन स्थल था जहाँ हमें मणिपुर की संस्कृति और सभ्यता के अनूठे पहलू देखने को मिले । वहां हथकरघा, हस्तशिल्प, ललितकला, स्वदेशी खेल, भोजन और संगीत के साथ साथ साहसिक खेलों के प्रदर्शन के भी कार्यक्रम हो रहे थे । न केवल स्थानीय बल्कि देश विदेश के कलाकार इसमें हिस्सा लेते हैं । स्थानीय बैंड का संगीत प्रदर्शन, और लड़कियों के तलवारबाजी के प्रदर्शन मंत्रमुग्ध करने वाले थे । लौटते हुए काफी समय हो गया, दिनभर उल्टी से परेशान थी सो खाने की हिम्मत नहीं थी तो वापस आते ही सो गयी ।
जैसा कि बताया था वहां सूर्योदय जल्दी होता है तो सुबह नींद भी जल्दी ही खुल गयी और बालकनी से बाहर का नज़ारा अद्भुत था । सूरज अभी पूरा नही निकला था और चारों तरफ फैली धुंध में डूबी ऊंची पहाड़ियां सम्मोहित कर रही थीं । जाने कबतक मन्त्र मुग्ध सी उन्हें देखती रही तब तक चाय पीने का बुलावा कई बार आ चुका था ।
दो दिन तो काफी व्यस्तता में बीते । तीसरे दिन थोड़ा समय मिला तो सोचा कहीं घूम आते हैं । तभी मणिपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक मित्र अखिलेश शंखधर जी ने फ़ोन पर अपने आने की सूचना दी । उनसे करीब 18 साल बाद मुलाकात हुई थी लेकिन आत्मीयता ज्यों की त्यों, लगा ही नहीं कि हम इतने सालों बाद मिल रहे हैं ।
पास ही कांगला फोर्ट और मणिपुर राज्य का संग्रहालय है ये उन्ही से जानकर वहीँ जाने की योजना बनी । अन्य साथी व्यस्त थे तो मैं और विशाल सर घूमने निकल पड़े । मुख्य द्वार के सामने ही ऑटो मिल गया जिसने थोड़ी ही देर में हमें कांगला फोर्ट के सामने उतार दिया । यहाँ का प्रवेश शुल्क 10 रुपये है । यह सुबह 9 से शाम 4 बजे तक खुला रहता है और बुधवार को बंद रहता है । सामने ही डिस्प्ले लगा हुआ है और कांगला का पूरा नक्शा भी बना हुआ है कि भीतर हम क्या क्या देख सकते है ।
कांगला फोर्ट को मणिपुर का गौरव भी कहते हैं जो 17वीं सदी से आज तक अपनी जगह मजबूती से टिका है । कांगला मेइती शब्द से आया है जिसका अर्थ है शुष्क भूमि । यह कभी मेइती राजाओं का निवास हुआ करता था । ये इम्फाल नदी के किनारे पश्चिमी और पूर्वी दोनों ओर स्थित था । सड़क से लगा जो मुख्य द्वार था वो बेहद ऊंचा और फाटक युक्त था । कहते हैं कि मणिपुर राज्य की स्थापना और विकास कांगला में ही हुआ ।
फोर्ट क्योंकि काफी लम्बा चौड़ा और दूर तक फैला हुआ है तो घूमने के लिए किराये पर साइकिल या गोल्फ कार्ट भी उपलब्ध रहती है जिसका शुल्क क्रमशः 20 और 100 रुपये है जो आपको कम समय में ही सारी जगहें दिखा देती है । हम पहुंचे तो उस दिन किसी विशिष्ट अतिथि के आगमन के कारण ये दोनों सुविधाएं बंद थी तो हमे पैदल जाना पड़ा ।
फोर्ट के अन्दर एक बड़ा और चारों तरफ पारदर्शी कांच लगा कमरा जिसमें ड्रैगन के मुंह के आकार की ‘हिजांग’ नावें रखी थीं जो पहले कांगला नदी में राज परिवार के लोग प्रयोग करते थे । वे नावें बेहद खूबसूरत और मणिपुर की रंगारंग संस्कृति को प्रदर्शित कर रही थी । उसी से थोड़ी दूर पर राधाकृष्ण का मणिपुरी शैली में बना सुन्दर मंदिर भी था । कांगला फोर्ट के मुख्य द्वार के ठीक सामने उत्तरा नाम की एक छोटी मंदिरनुमा जगह थी जिसके द्वार पर दो जानवरों की प्रतिमाएं थीं जिन्हें कांगला शा कहते हैं । ऐसा बताते हैं कि यहाँ के राजा की बर्मा के राजा से लड़ाई हुई तो जीतने के बाद वे दो शा वहां से ले आये थे । वहीँ हमारी मुलाकात वहां की देखरेख के मुख्य अधिकारी से हुई जिन्होंने बहुत रुचिपूर्वक हमें कांगला के बारे में बताया ।
आगे जाने पर कांगला के राजाओं का मुख्य भवन दिखा जो अब ढांचा भर ही रह गया है जिसको संरक्षित किया गया है लेकिन इसका वैभव अब भी महसूस किया जा सकता है । उसे देखने के लिए और भी पर्यटक आये थे, कुछ मणिपुरी युवक और युवतियां भी घूम रहे थे तो विशाल जी ने उनके साथ कुछ यादगार तस्वीरें लीं । उनका उन्मुक्त और सहयोगी, सरल स्वभाव हमें अच्छा लगा । पास ही एक कैफ़े भी था जहाँ आप कुछ स्नैक्स और चाय कॉफ़ी का आनंद ले सकते हैं । वहां से निकलते निकलते हमें 4 बज गए थे यानि पूरा 10 रुपये वसूल किया ।
बाहर आकर ऑटो किया और उससे कहा हमें किसी नजदीकी बाजार तक पहुंचा दे । उसने हमे जहाँ उतारा वो छोटा स्टेडियम था जहाँ पोलो खेल चल रहा था । पोलो के मैदान तो देखे थे मैंने लेकिन पोलो खेल होता हुआ नहीं देखा था सो थोड़ी देर हमने भी पोलो का मज़ा लिया जिसमें घोड़े पर सवार खिलाडी स्टिक लिए गेंद को विपक्षी के गोल पोस्ट में मारने का प्रयास करते हैं । यद्यपि यह खेल अंग्रेजों के समय में लोकप्रिय हुआ लेकिन उत्पत्ति मणिपुर में ही बताते हैं और इस मैदान को दुनिया का सबसे पुराना पोलो मैदान कहते हैं । इसे स्थानीय भाषा में ‘कंजई-बाज़ी’, ‘सागोल कान्ग्ज़े’ या ‘पुलु’ कहते थे जो बाद में ‘पोलो’ कहा जाने लगा ।
वहां से निकल कर हम टहलते हुए मार्केट तक गए । भूख लग आई थी तो खाने के लिए कुछ देखने लगे, सामने ही खोमचे वाले कुछ बेच रहे थे । ध्यान से देखा तो उबली हुई सफ़ेद मटर में पत्तागोभी चुकंदर प्याज लच्छे में नमक और कुछ मसाला डाल कर दे रहे थे । पत्तागोभी देखकर तो थोडा हिचक हुई फिर थोड़ा खाकर देखा तो स्वाद अच्छा लगा । फिर तो दो दोने लेकर खाया ये परवाह किये बिना कि कल क्या होगा । बाज़ार से छोटी मोटी चीजें भी लीं, फिर वापस हॉस्टल आ गए ।
रात को भूख लगी तो विचार किया कि खाने की कुछ वैकल्पिक व्यवस्था खोजनी पड़ेगी । मध्यप्रदेश के कुछ साथी बाहर खाने जा रहे थे तो हम भी उनके साथ हो लिए । मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब देखा कि मुख्यद्वार के ठीक सामने एक ढाबा है जहाँ एकदम ताजा घर जैसा खाना बेहद कम दाम पर उपलब्ध था । खैर, तीसरे दिन ही सही खाने का हल तो मिला । तब से वहां रहने तक मैंने खाना वहीँ खाया ।
अगले दिन हम इम्फाल का विश्व प्रसिद्ध ‘इमा कैथल’ देखने गए । इस बाज़ार को ‘ख्वारम्बन्द बाज़ार’ या ‘नुपी किथेल’ भी कहते हैं । इस बाज़ार की अनूठी विशेषता यह है कि इसकी ३००० दुकानों में सभी की दुकानदार महिलाएं हैं जो कि मणिपुरी महिलाओं की स्वतंत्र भावना और उद्यमशीलाता को दर्शाता है । लोक कथाओं में कहा जाता है कि इन महिलाओं को देवी इमा द्वारा संरक्षित किया जाता है । यह बाज़ार सुबह 9 से शाम 7 बजे तक खुला रहता है ।
हम ये देखकर चकित रह गए कि उस बहुमंजिली इमारत की दुकानों में कोई भी दुकानदार पुरुष नहीं था । हाँ बाहर रोड पर कुछ दुकानदार पुरुष थे लेकिन बाकी सिर्फ औरतें जो कि खाद्य पदार्थों से लेकर ताजे फल सब्जियां, मांस मछली, शहद, पारंपरिक और आधुनिक कपड़े, बेच रही थीं । यह एशिया का सबसे बड़ा वीमेन मार्किट है । यहां पुरुष न तो व्यापार कर सकते हैं न कुछ बेच सकते हैं, हाँ खरीदने पर कोई मनाही नहीं है ।
इस बाज़ार के शुरू होने की भी कहानी है । कहते हैं कि राजा लोयुम्बा के समय में (1074-1112) पुरुषों से जबरन मजदूरी करवाने का प्रचलन था तो उन्हें राज्य के बाहर भेज दिया जाता था तब घर चलाने की ज़िम्मेदारी औरतों की होती थी । इसी कारण इस बाज़ार की शुरुआत की गई । खैर जो भी हो, अपने देश की ऐसी अनोखी संस्कृति पर गर्व होना स्वाभाविक है, मुझे भी हो रहा था । आगे जाने पर कुछ सडकों पर लगी दुकानें दिखीं जिनपर विदेशी कपड़े जूते आदि मिल रहे थे ।
हमारे साथ गए साथी वेद जी को कुछ खरीदने के लिए पैसे की जरूरत थी तो हम एटीएम खोजने आगे बढ़ गए । अचानक भगदड़ जैसी हुई, सब इधर उधर भागने लगे । समझ नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है । तभी देखा कि मिलिट्री के कुछ लोग सभी आदमियों को इकठ्ठा कर कतार लगवा रहे थे । मुझे तो कुछ नहीं कहा लेकिन वेद को लाइन में खड़ा कर दिया । वे सबसे पूछताछ करके परिचय पत्र देख रहे थे । वेद जी अपना परिचयपत्र हॉस्टल ही छोड़ आये थे तो उनकी हालत ख़राब थी । किसी तरह चुपके से वे लाइन तोड़कर वहां से निकल आये फिर हम न जाने किन किन गलियों से होते हुए मुख्य सड़क तक आ पाए । इस भागा दौड़ी में विशाल वापस हॉस्टल लौट चुके थे ।
लोगों ने बताया कि ये तो इनका आये दिन का काम है । बात कोई बहुत बड़ी नहीं तो छोटी भी नहीं थी क्योंकि अपने ही देश में रहते हुए इस तरह रोज रोज बीच चौराहे अपराधी की तरह खड़े होकर परिचय देना बहुत ही अजीब था लेकिन वहां लोग इसके अभ्यस्त थे तो हम ही क्या करते ।
हमारे साथी विशाल जी को विश्वविद्यालय में कुछ काम था तो अगले दिन हम भी अखिलेश जी की मेहमाननवाजी लेने मणिपुर विश्वविद्यालय में उनके विभाग में गए जहाँ उन्होंने बड़े अपनत्व से हमारा स्वागत किया । उनकी शोध छात्राओं से मुलाकात बड़ी रोचक और यादगार रही जिन्होंने अपने घर के बने कुछ व्यंजन हमे खिलाये । विश्वविद्यालय भी कुछ कम दर्शनीय नहीं था, बेहद शांत और हराभरा वातावरण सम्मोहित करता सा ।
वहां से लौट कर हम मणिपुर राज्य का संग्रहालय देखने गए । मणिपुर की समृद्ध संस्कृति और विरासत को संरक्षित करने के लिए स्थापित यह संग्रहालय दर्शनीय है । सन 1969 में भारत की पूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने इसका उदघाटन किया था जिसमे पुरातत्व, मानव जाति विज्ञान, प्राकृतिक इतिहास और पेंटिंग्स के बारे में जानकारियों का भण्डार है ।
इसके अलावा मणिपुर आर्ट गैलरी और वॉर सेमेट्री भी यहाँ के दर्शनीय स्थल हैं जिन्हें देखने पर्यटक आते हैं । वैसे तो पूरा मणिपुर दर्शनीय है और सुन्दरता से परिपूर्ण है फिर भी समय कम होने के कारण हम लोक टेक झील देखने की इच्छा रहते हुए भी वहां नहीं जा पाए । कुछ जगहें देखने के बाद पता चला कि वे बहुत महत्त्व की हैं जैसे पूरा खुमान लेमपाक स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स ही बहुत दर्शनीय है जहाँ सुबह सुबह जॉगिंग या एक्सरसाइज करते राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय खिलाडियों को देखा और उनसे मिला जा सकता है ।
उसी कैम्पस में देश का पहला खेल विश्वविद्यालय स्थापित है जिनके डीन से मिलना भी यादगार रहा । उनके सहयोगी और स्नेह भरे व्यवहार ने हमारा दिल ही जीत लिया । उन्होंने हमे विश्वविद्यालय के विभिन्न पाठ्यक्रमों के बारे में विस्तृत जानकारी दी । मुक्केबाजी की क्वीन एम सी मेरी कॉम की कर्मस्थली भी देखने का सौभाग्य मिला और हमने उनसे मिलने का भी प्रयास किया, लेकिन पता चला वे उन दिनों किसी काम से दिल्ली गई हैं ।
इन पांच दिनों में मणिपुर की सुन्दरता, भाषा, संस्कृति के काफी पहलुओं को देखना अपने आप में अद्भुत अनुभव रहा । वापसी के दिन हम फिर बस द्वारा ही दीमापुर के लिए निकले और फिर बस की 8 घंटे की यात्रा करते हुए मन ही मन कसम खायी कि अब यदि इम्फाल आना है तो हवाई साधन की सेवा ही लेनी है । वैसे भी हम अनुभव से ही तो सीखते हैं । गुवाहाटी में इस बार बहन तो नहीं आ पाई लेकिन उसके पति राकेश भोजन के साथ पहुंचे । रिश्तों में छोटे छोटे पल और प्रयास कैसे संबंधों की ताजगी बरकरार रखते हैं ये हम भारतीय ही समझ सकते हैं ।


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