कैसे पूरा हुआ फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ का बेहतरीन संगीत?

 Nandani Agrawal

बात कमाल अमरोही की उस जादूगरी की जो उन्होंने सोची सन् 1955 में थी। जिसे आप और हम फिल्म इतिहास में एक जादू के रूप में मान सकते है। एक ख्वाब जिसे कमाल साहब ने देखा और नाम दिया ‘पाकीज़ा’ । कमाल साहब उन दिनों अपनी बेगम मशहूर अदाकारा मीना कुमारी के साथ भारत के दक्षिण में सुकून के दिन गुजार रहे थे। कमाल साहब ने ये सोचा कि जैसे लोग ताजमहल देखकर उसे दो प्यार करने वाले की निशानी के रूप में याद करते है। कुछ ऐसा हो कि सिनेमा में जब भी बात हो तो कमाल-मीना का नाम लोग ताउम्र याद करें । ऐसे में कमाल साहब ये भी चाहते थे कि एक ऐसी फिल्म बने जिससे मीना कुमारी इस सिनेमा जगत में एक स्टार के रूप छा जाएं और भारतीय सिनेमा में महान अदाकारा के नाम से जानी जाएं।
अपने दिल की बात कमाल साहब ने मीना कुमारी को बतायी और मीना जी ने हामी भरी। उसके बाद सन् 1958 में कहानी तो लिखी जा चुकी थी। फिर खोज़ शुरू हुई मशहूर फिल्म ‘पाकीजा’ के दमदार संगीत और गाने को लिखने वाले दिग्गज की। कमाल साहब ने मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी, मजरूह सुल्तानपुरी और कैफ़ भोपाली से बात की। गीत लिखने के बाद बात संगीत की हुई और गुलाम मोहम्मद साहब को इस ऐतिहासिक फिल्म के लिए कहा गया। गुलाम मोहम्मद साहब ने बेहतरीन संगीत तो दिया लेकिन फिल्म में देरी की वजह से ( देरी के कारण भी आनेवाले पोस्ट में लिखूंगी) तब तक मौत हो चुकी थी। कमाल और मीना कुमारी के बीच रिश्तो की तकरार की वजह से 1958 में शुरू हुई शूटिंग को रोकना पड़ा। फिर ये शूटिंग शुरू 1968 में हुई यानि 10 साल बाद ‘पाकीज़ा’ फिर ‘साउंड, लाइट और एक्शन’ की आवाज़ सुनी। चूँकि 10 साल की देरी की वजह से बहुत कुछ बदल चुका था और उन दिनों संगीतकार गुलाम मोहम्मद की तबियत भी नासाज़ सी रहती थी। गुलाम साहब ने अपनी तबियत का हवाला देते हुए नौसाद साहब को कहा कि बचे हुए संगीत और इसकी रिकॉर्डिंग को आप पूरा करवा दे। ‘पाकीज़ा’ के गाने ‘ठाड़े रहियो ओ बाके’ की रिकॉर्डिंग के दौरान तबियत ख़राब होने की वजह से स्टूडियो में गाने रिकॉर्ड किये जा रहे थे, तब गुलाम मोहम्मद साहब रिक्शे में बैठकर स्टूडियो पहुँच गए और गानों को अपने सामने रिकॉर्ड करवाया। इसके अलावा कहा जाता है कि ‘यूँ ही कोई मिल गया था सरे राह चलते-चलते’ गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान गुलाम मोहम्मद साहब ने करीब 20 से 21 रिटेक लिए थे। ऐसे में कमाल अमरोही समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर गुलाम भाई चाह क्या रहे? लेकिन जिसको अपनी कला से प्यार हो और जो कलाकार को पहचानता हो वो बेहतरी के लिए चुप ही रहता है और कमाल साहब भी ऐसी नज़ाकत को समझते थे। 20 या 21 टेक के बाद जो संगीत और सुरों की मिठास कानों को सुनने को मिली वो असर कुछ आज भी ऐसा है कि आप और हम इस गीत के साथ खुद को जोड़कर गुनगुना जाते है। कुछ गीत जो अधूरे रहे उसे बाद में पूरा किया गया। क्योंकि फ़िल्म 1972 में रिलीज़ हुई और गुलाम मोहम्मद साहब ने 1968 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इंतकाल के बाद कई लोगों ने कमाल साहब को कहा कि कुछ गाने के संगीत को बदल दिया जाये क्योंकि अब सिनेमा में म्यूजिक का ट्रेंड बदल चुका है। तब तक शंकर-जयकिशन छा चुके थे और दोस्तों ने सुझाव दिया कि बचे हुए गाने का ज़िम्मा इन्हें दे दिया जाए। लेकिन कमाल साहब ने कहा किसी मरे हुए इंसान के साथ ये करना गद्दारी होगी और मैं ये नहीं कर सकता। बाकी गानों को नौशाद ही पूरा करेंगे।
‘पाकीज़ा’ 1972 को पर्दे पर आई और इसका संगीत लोगों के ज़हन में घर कर गया। लेकिन इस बड़ी कामयाबी को देखने के लिए वो मशहूर सितारा नहीं रहा। जिसने अपनी धुन से एक नये इतिहास के अध्याय को लिखा था।

‘पाकीज़ा’ फ़िल्म के कुछ अनछुए पहलू

जब फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ पूरी बन चुकी थी तो फ़िल्म की एडिटिंग का काम था चल रहा था और एडिटर ने फ़िल्म के कुछ आखिरी के हिस्से को काट दिया था उन्हें लगा कि ये सीन का कोई मतलब नहीं है। ऐसे में ये बात कमाल अमरोही साहब को पता चली। वो दौड़ते हुए एडिटर डी.एन. पाई साहब के पास पहुँचे। दरअसल वो सीन था जब मीना कुमारी की शादी हो जाती है और उनकी डोली जा रही होती है। उसी वक़्त एक लड़की छत पर खड़ी होकर बड़ी ही मासूमियत से अपनी हसरत से भरी निगाह से ये मंज़र देख रही होती है। एडिटर पी.एन. पाई साहब को लगा इस सीन की यहाँ कोई जगह नहीं है और बिलावजह (बिना वजह) इस सीन से फ़िल्म बड़ी हो रही है।


पी.एन.पाई ने कमाल साहब से पूछा आखिर क्या ख़ास बात है इस सीन में जो आप इस फ़िल्म में रखना चाहते है। कमाल साहब ने कहा- दरसअल इस सीन में जो लड़की आपको छत पर खड़ी होकर साहिबजान की डोली को जाते हुए देख रही है, उसकी भी हसरत थी कि शादी हो और कोई उसे इसी तरह डोली में लेकर जाये। पी.एन साहब दरअसल ये ही है असली ‘पाकीज़ा’ है। यह बात सुनकर पी.एन साहब ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा, कमाल साहब ये सीन में जोड़ तो देता हूँ लेकिन आपको क्या लगता है कोई भी इस बात को समझ पाएगा? इस सवाल को सुनते ही कमाल साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, अगर कोई एक भी इस सीन को समझ जाएगा तो मैं समझूँगा मेरा फ़िल्म बनाना सफल हुआ।
फ़िल्म रिलीज़ होने के लगभग एक साल बाद कमाल अमरोही के घर एक चिट्ठी आई। उस चिट्टी में लिखा था – आपकी फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ आपने बहुत बेहतरीन बनाई है इसके लिए आपको शुभकामनाएं। आगे ख़त में लिखा था कि मुझे उस छत पर खड़ी लड़की की तस्वीर चाहिए। फ़िल्म देखकर मुझे ऐसा लगा कि वही असली ‘पाकीज़ा’ है। कमाल अमरोही साहब इस बात से बेहद खुश हुए। उन्होंने एडिटर डी.एन को बुलाया और कहा कि ध्यान से पढ़ो, यही वो आदमी है जिसने मेरी फ़िल्म देखी है। एडिटर पी.एन.पाई ने चिट्ठी पढ़ते हुए मुस्कुरा कर कहा अब तो तुम्हारी फ़िल्म पूरी हुई। कमाल साहब ने कहा अभी कुछ और बाकी है और वो ये कि मैं इसको जवाब दे दूँ। कमाल साहब ने जवाबी चिट्ठी में लिखा और ये इजाज़त दी कि इसके बाद कमाल अमरोही साहब ने उस व्यक्ति को एक खत लिखा। ख़त में कमाल साहब ने यह इजाज़त दी कि वो भारत के किसी भी कोने में मेरी फ़िल्म देखेगा तो उसे उसके पैसे देने की जरुरत नहीं होगी।

फिल्म ‘पाकीज़ा’ की कुल कीमत थी मीना की आजादी !

1958 में शुरू हुई फिल्म 1964 में आकर रूक गयी। मंजू (कमाल साहब मीना कुमारी को इसी नाम से बुलाते थे) ने कमाल के शक करने की आदत और लड़ाईयों से तंग आकर कमाल को छोड़कर अपनी बहन के घर आकर रहने लगी। कहा जाता है कि मीना कुमारी की बहन मधु से महमूद ने शादी इसलिए की थी क्योंकि एक बार महमूद साहब को लेकर कमाल साहब ने कुछ भला बुरा कह दिया था, जिसका बदला महमूद ने उनकी साली यानि मीना कुमारी की बहन मधु से शादी करके लिया। खैर जब मीना कुमारी अपनी बहन मधु के घर जाकर रहने लगी तो पीछे से कमाल साहब भी उन्हें मनाने वहां जा पहुंचे। बार-बार मनाने के बाद भी उन्होंने चंदन (मीना कुमारी इसी नाम से कमाल साहब को बुलाती थी) से बात करने से इनकार कर दिया। उसके बाद, न तो कमाल ने मीना को वापस लाने की कोशिश की और न ही मीना कुमारी वापस लौटीं।

हालांकि इस बीच में कमाल साहब कई पार्टियों में शिरकत करते रहे। घर में हो रही पार्टी के दौरान कमाल साहब ने ‘पाकीज़ा’ की स्टोरी दोस्तों को सुनाई। कहानी सुनकर सभी ने कहा ये बेहतरीन फिल्म है इसे जरूर पूरी करना चाहिए। ऐसे में सुनील दत्त साहब जो मीना कुमारी और कमाल साहब के नजदीकी दोस्त थे उन्होंने पहल करने की बात कही कि तुम मीना को खत लिखो।
24 अगस्त 1968 को कमाल साहब ने साहिबजान को एक खत लिखा। कमाल साहब ने लिखा मैं जानता हूं कि तुम इस फिल्म में सिर्फ एक ही शर्त पर काम करोगी, फिल्म पूरी होते ही मैं तुम्हें तलाक दे दूंगा। कमाल साहब ने आगे लिखा की उन्हें उनकी हर हात मंजूर है और वो उन्हें हर तरह से आजाद कर देंगे। कमाल साहब ने गुजारिश की वो इस फिल्म को पूरा करें क्योंकि कई लोगों की जिंदगी इस फिल्म से जुड़ी हुई है। ऐसा कहा जाता है कि कमाल साहब के जानने वालो में एक अंक ज्योतिष का जानकार था, उसने कमाल साहब को फिल्म के नाम को लेकर कहा कि इसके नाम को बदल दीजिए। आप खामखां की परेशानियों को दावत दे रहे है। इतना ही नहीं ये फिल्म बहुत मुश्किलों को दावत देगी और साथ ही किसी ना किसी की मौत भी होगी। हां अगर फिल्म पूरी हो गयी तो ये एक नये इतिहास को लिखेगी। कमाल साहब ने सबकी बातें सुनी लेकिन किया वहीं जो उनका मन किया फिल्म का नाम वही रखा जो उन्होंने तय किया था ‘पाकीज़ा’।

खैर कमाल साहब के ख़त के जवाब में मीना कुमारी ने कमाल साहब को सन 1969 में एक खत लिखा। ख़त में मीना कुमारी ने लिखा कि फिल्म पाकीज़ा उनके दिल के बेहद क़रीब है। वो हमेशा से फिल्म को करना चाहती थी और उन्हें फ़िल्म को पूरा करके बहुत ख़ुशी मिलेगी। साथ ही, मीना कुमारी ने कहा कि वह इस फ़िल्म के लिए सिर्फ 1 सिक्का बतौर मेहनताना लेंगी। हालंकि ये भी कहा जाता है कि उस ख़त में मेहनताना का कोई ज़िक्र नहीं था। चूंकि फिल्म 10 साल देर हो चुकी थी और अब मीना कुमारी में भी काफी बदलाव आ चुके थे। ज्यादा शराब पीने की वजह से मीना कुमारी की तबीयत भी ठीक नहीं रहती थी। ऐसे में फिल्म के कुछ हिस्से जो शूट हो चुके थे। उसके साथ मीना कुमारी को मिलाना आसान नहीं था। लेकिन कमाल अमरोही इसी के तो जादूगर थे। आप फिल्म के पहले हिस्से में देखेंगे कि मीना कुमारी के चेहरे को और थोड़ी ही देर बाद जब मीना कुमारी आपको दिखती है तो उम्र का पता चलता है। ऐसे में कमाल साहब ने पूरे फिल्म में जहां गाने के साथ नाचने के सीन है वहां पद्मा खन्ना और दूर से चलने वाले सीन में बिलकिस पर फिल्माया गया। बाद में कमाल साहब ने बिलकिस से निकाह भी कर लिया था। इसके साथ ही फिल्म के शुरूवाती दौर में धर्मेंद को लिया गया था लेकिन मीना और धर्मेंद्र की नजदीकी से खफा कमाल साहब ने फिल्म में धर्मेंद्र की जगह राजकुमार को ले लिया था। फिल्म में जब राजकुमार के शुरू के सीन में दूर से आते हुए शाट्स है उसमें आपको धर्मेंद्र ही दिखेंगे और नजदीक आते ही राजकुमार।

तीसरी कसम (1966): एक था हीरामन; एक थी हीराबाई !


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