क्या रमा सिंह को तरजीह दिए जाने और राज्यसभा सदस्यता के लिए दरकिनार किये जाने से नाराज रघुवंश बाबू ने राजद से इस्तीफा दिया?

 Staff Report

बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी फूंका तो नहीं गया है, लेकिन सियासत गर्म हो चुकी है. एक ओर जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी कार्यकर्ताओं से चुनाव की तैयारी करने को कह दिया है वहीं चुनाव से पहले राजद को दोहरा झटका लगा है. पार्टी की नींव और लालू प्रसाद यादव का दाहिना हाथ समझे जाने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह ने पार्टी उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है. साथ ही एमएलसी चुनाव से पहले राजद के पांच एमएलसी पार्टी छोड़कर जदयू में शामिल हो गये हैं.
रघुवंश बाबू पार्टी के आधार हैं और उन्होंने हर परिस्थिति में लालू यादव का साथ दिया और हमेशा उनके साथ खड़े रहे, ऐसे में सवाल यह है कि आखिर ऐसी क्या बात हो गयी कि रघुवंश बाबू को उपाध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा. रघवुंश बाबू अभी बिहार में हैं, वे एम्स में भर्ती हैं और कोरोना का इलाज करा रहे हैं. उनका बयान आया है कि उन्हें अभी बहुत कुछ कहना है. बिहार में विधान परिषद का चुनाव होने वाला है, जो लोग विधान सभा चुनाव में जाना नहीं चाहते वे यहां जोर आजमाइश कर रहे हैं. विधान परिषद चुनाव के बहाने पार्टियां विधान सभा चुनाव की तैयारी कर रही हैं और अपने-अपने वोटर को साधने में जुटी है. इसी क्रम में राजद ने वैशाली के बाहुबली नेता रमा सिंह से संपर्क किया. बताया जा रहा है कि रामा सिंह तेजस्वी से मिलने उनके घर आये थे, हालांकि तेजस्वी ने इसपर कुछ नहीं कहा है और वे नाराज़ रघुवंश बाबू को मनाने में जुट गये हैं.

रमा सिंह बाहुबली नेता हैं . उनपर अपहरण, धमकी, रंगदारी, मर्डर जैसे संगीन अपराध के आरोप हैं. 90 के दशक में उनका वैशाली जिले में उनका दबदबा था. रमा सिंह पांच बार विधायक रहे हैं और 2014 के मोदी लहर में राम विलास पासवान की पार्टी लोजपा से वैशाली से सांसद चुने गए।. उन्होंने रघुवंश प्रसाद सिंह को हराया था. इसी हार के बाद रघुवंश प्रसाद रामा सिंह का नाम तक नहीं सुनना चाहते हैं. रामा सिंह बाहुबली हैं जबकि रघुवंश बाबू समाजवादी और मिलनसार नेता हैं.

बात सिर्फ रमा सिंह की ही नहीं है. लालू यादव के जेल में रहने के बाद से राजद बिखर गया है, वह नेतृत्व के लिए तरस रहा है. लालू यादव ने अपना उत्तराधिकारी तेजस्वी को तो बना दिया, लेकिन वे पार्टी को एकछत्र के नीचे ला नहीं पाये हैं. यहां तक की रघुवंश बाबू भी उन्हें अपना नेता नहीं मानते. तेजस्वी यादव में लालू यादव वाली बात नहीं है, ना उनमें उतना कलेवर है कि वे विपक्ष में रहते हुए सबको एक रख सकें. तेजप्रताप यादव के सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन के चर्चे उनके गले की फांस बने हुए हैं. लालू यादव की सुपुत्री और फिलहाल राज्यसभा सांसद मीसा भारती की भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं. कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि राजद में नेतृत्व को लेकर खींचातानी की स्थिति बनी हुई है. रघुवंश बाबू ऐसे व्यक्ति थे जिनमें वो सामर्थ्य था कि वे पार्टी को एक रख सकते थे और इसका नेतृत्व कर सकते थे. लेाकिन लालू प्रसाद यादव ने इसके लिए अधिकारिक घोषणा नहीं की, जिसके कारण वे पार्टी पर अपना अधिकार भी उस तरह से नहीं रख पाये, जैसा वे चाहते थे.
तो सवाल यह है कि अब रघुवंश बाबू क्या करेंगे? अबतक रघवुंश बाबू ने जिस तरह की राजनीति की है, लगता तो नहीं है कि वे भाजपा या नीतीश के साथ जायेंगे. ऐसे में उनके पास एक ही विकल्प दिखता है कि वे अलग पार्टी बना लें. लेकिन इसमें भी काफी चुनौतियां हैं.ऐन चुनाव से पहले नयी पार्टी को लाॅन्च करना और उसे जनता के लिए विश्वसनीय बना पाना काफी कठिन होगा.
खैर अभी चुनाव की घोषणा नहीं हुई, ऐसे में चुनाव से पहले बिहार की राजनीति किस करवट बैठेगी अभी बताना मुश्किल है. लेकिन रघुवंश बाबू का राजद के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा देना बड़े खतरे का सूचक है, यह तेजस्वी को समझना होगा. रघुवंश बाबू के पास बहुत अनुभव है और जनाधार भी. रघुवंश बाबू मनमोहन सिंह की सरकार में कृषि मंत्री रहे थे. इन्होंने मनरेगा को फलीभूत करने में अहम भूमिका निभाई है. उनके बारे में यह कहा जाता है कि जब वे मंत्री थे तो एक बार खाना खाकर आ जाते थे और दिनभर काम करते थे. रघुवंश बाबू ने गणित में एमएससी और पीएचडी किया है. उन्होंने युवा अवस्था में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्‍व में हुए आंदोलनों में भाग लेना शुरु कर दिया था.1973 में उन्‍हें संयुक्‍त सोशलिस्‍ट पार्टी का सचिव नियुक्त किया गया. रघुवंश प्रसाद 1977 में पहली मर्तबा विधायक बने थे. बेलसंड से उनकी जीत का सिलसिला 1985 तक चलता रहा. इस बीच 1988 में कर्पूरी ठाकुर का अचानक निधन हो गया. बिहार में जगन्नाथ मिश्र की सरकार थी. लालू प्रसाद यादव ने खुद को कर्पूरी ठाकुर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और इस वक्त में रघुवंश बाबू उनके साथ थे. यहां से लालू प्रसाद यादव और रघुवंश प्रसाद बीच की करीबी शुरू हुई. 1990 में बिहार विधानसभा के लिए चुनाव में रघुवंश प्रसाद सिंह 2,405 वोटों से हार गए थे.

रघुवंश प्रसाद भले ही चुनाव हार गए थे, लेकिन सूबे में जनता दल चुनाव जीतने में कामयाब रहा. लालू प्रसाद यादव नाटकीय अंदाज में मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे. लालू को 1988 में रघुवंश प्रसाद सिंह द्वारा दी गई मदद याद थी और लिहाजा उन्हें विधान परिषद भेज दिया गया. 1995 में लालू मंत्रिमंडल में मंत्री बना दिए गए. ऊर्जा और पुनर्वास का महकमा दिया गया.
1996 के लोकसभा चुनाव में बिहार के वैशाली से लालू यादव के कहने पर रघुवंश प्रसाद सिंह लोकसभा चुनाव लड़कर संसद पहुंचे. केंद्र में जनता दल गठबंधन सत्ता में आई. देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने. रघुवंश बिहार कोटे से केंद्र में राज्य मंत्री बनाए गए. पशु पालन और डेयरी महकमे का स्वतंत्र प्रभार. अप्रैल 1997 में देवेगौड़ा को एक नाटकीय घटनाक्रम में प्रधानमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी. इंद्र कुमार गुजराल नए प्रधानमन्त्री बने और रघुवंश प्रसाद सिंह को खाद्य और उपभोक्ता मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई.

रघुवंश प्रसाद सिंह 1996 में केंद्र की राजनीति में आ चुके थे लेकिन उन्हें असली पहचान मिली 1999 से 2004 के बीच. 1999 के लोकसभा चुनाव में शरद यादव और लालू प्रसाद यादव आमने सामने थे. बिहार की सबसे चर्चित सीट से शरद यादव जीतने में कामयाब रहे. 1999 में जब लालू प्रसाद यादव हार गए तो रघुवंश प्रसाद को दिल्ली में राष्ट्रीय जनता दल के संसदीय दल का अध्यक्ष बनाया गया. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी. रघुवंश प्रसाद सिंह विपक्ष की बेंच पर बैठे थे. संसद की कार्यवाही में जाते हुए रघुवंश प्रसाद सिंह को अरुण जेटली ने रोक लिया. मुस्कुराते हुए बोले, ‘तो कैसा चल रहा है वन मैन ऑपोजिशन?’

रघुवंश प्रसाद सिंह को समझ में नहीं आया. अरुण जेटली ने उस दिन का एक अंग्रेजी अखबार उनकी खिसका दिया. अखबार में चार कॉलम में रघुवंश प्रसाद की प्रोफाइल छपी थी. इसका शीर्षक था, ‘वन मैन ऑपोजिशन.’ 1999 से 2004 के रघुवंश प्रसाद संसद के सबसे सक्रिय सदस्यों में से एक थे. उन्होंने एक दिन में कम से कम 4 और अधिकतम 9 मुद्दों पर अपनी पार्टी की राय रखी थी. यह एक किस्म का रिकॉर्ड था. उस दौर में वाजपेयी सरकार को घेरने में रघुवंश प्रसाद सिंह सबसे आगे नजर आते थे. इस तरह से उन्होंने केंद्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई.

पर पारिवारिक हितों को साधने में व्यस्त राजद ने रघुवंश बाबू जैसे अपने योग्य नेता को पिछले दस सालों से राज्यसभा भेजने लायक भी नहीं समझा.


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