बिहार विधानसभा चुनाव 2020 से पहले यशवंत सिन्हा की निरर्थक राजनीतिक चाल?

 Staff report

‘बेहतर बिहार बनाओ’ इस नारे के साथ भाजपा के पूर्व नेता और केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने बिहार में तीसरे मोर्चे का गठन किया है. यशवंत सिन्हा ने राजनीति से पूरे दो साल के संन्यास के बाद कोशिश तो की है कि वे बिहार विधानसभा चुनाव से धमाकेदार वापसी करें लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं कि यशवंत सिन्हा किसी जमाने में दिग्गज राजनेता और केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. लेकिन अब वो गुजरे जमाने की बात हो गयी है. यशवंत सिन्हा बिहार विधानसभा में अपनी किस्मत आजमाने के लिए तो उतर गये हैं, लेकिन उन्हें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके पास चुनावी मैदान में युद्ध करने के लिए हथियार कैसे हैं और जो हैं, उनमें जंग तो नहीं लग गया है. जरूरी है कि सबसे पहले तो हम यह समझ लें बिहार की राजनीति अभी कौन सी करवट ले रही है.
बिहार में अभी विधानसभा चुनाव की घोषणा तो नहीं हुई लेकिन राजनीतिक दल और चुनाव आयोग की गतिविधि इस बात के संकेत दे रही है कि बिहार में विधानसभा चुनाव अक्तूबर-नवंबर तक हो जायेंगे. चुनाव आयोग पिछले सप्ताह 12 पार्टियों के नेताओं के साथ बैठक कर चुका है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने कार्यकर्ताओं को चुनाव के लिए कमर कस लेने को कहा है.
बिहार में अभी विधान परिषद के लिए चुनाव हो रहे हैं. इस चुनाव को राजनेता ट्रेलर की तरह ले रहे हैं और इस चुनाव के आधार पर अपने-अपने वोट बैंक को साध रहे हैं. इधर रघुवंश बाबू की राजद उपाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे देने के बाद राजद में घमासान मचा है. रघुवशं बाबू के इस्तीफे के बाद पूर्व विधायक और राजद नेता विजेंद्र यादव ने भी इस्तीफा दे दिया है. यह राजद को विधानसभा चुनाव से पहले लगने वाला झटका है. उसके पांच एमएलसी भी पार्टी छोड़कर जदयू में जा चुके हैं. तो यह स्थिति है उस राजनीतिक दल की जो पिछले विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरा था.

पिछले चुनाव और इस बार के चुनाव में सबसे बड़ा फर्क यह है कि लालू प्रसाद यादव इस बार चुनावी मैदान में नहीं है. पिछले चुनाव में बिहार में लालू यादव ने महागठबंधन बनाया था और नीतीश कुमार के साथ मिलकर भाजपा को पटखनी दी थी. पिछले चुनाव में भाजपा और जदयू अलग-अलग थे और यह महागठबंधन एकजुट था. लालू और नीतीश के एक मंच पर आने के बाद भाजपा बिहार में धराशायी हो गयी थी, जबकि 2014 के मोदी लहर में भाजपा ने पूरे देश में जबरदस्त जीत दर्ज की थी. महागठबंधन में जदयू, राजद, जनता दल सेक्यूलर, इंडियन नेशनल लोकदल और समाजवादी जनता पार्टी साथ आये और उन्हें कांग्रेस पार्टी का भी साथ मिला था. राजद चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और उसे 81 सीट मिले, जबकि जदयू को 70 और भाजपा को 53 सीट मिला था.
लेकिन लालू और नीतीश की दोस्ती ज्यादा दिनों तक चली नहीं सत्ता में आते ही राजद ने कुछ ऐसे कार्य किये जिससे नीतीश कुमार की छवि को धक्का पहुंचा, बस अपनी छवि को धूमिल ना होने देने की चाह रखने वाले दिग्गज राजनेता नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर दोबारा भाजपा के साथ जाने का मन बना लिया. जिसके बाद बिहार में भाजपा और जदयू की सरकार एकबार फिर बनी.

चारा घोटाला मामले में लालू के जेल जाने और लगातार अस्वस्थ रहने के बाद राजद पर से उनकी पकड़ ढीली होने लगी है और उनके दोनों ही बेटे सही मायनों में उनके उत्तराधिकारी नहीं बन पाये हैं. तेजप्रताप तो खैर राजनीति के लिए बने ही नहीं हैं, इस बात को लालू भी जानते थे इसलिए उन्होंने तेजस्वी को अपना मुख्यमंत्री बनाया और चाचा नीतीश की सरकार में वे उपमुख्यमंत्री भी बने थे. लेकिन सच्चाई यह है कि राजद में ही उन्हें सर्वमान्य नेता के रूप में स्वीकृति प्राप्त नहीं है. मीसा भारती की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं और उन्हें तेजप्रताप का साथ है. ऐसे में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए तेजस्वी ने जब रामा सिंह की ओर देखा तो लालू के पुराने सहयोगी और विश्वासपात्र रघुवंश बाबू नाराज हो गये और पार्टी उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. अब तेजस्वी उन्हें मनाने में जुटे हैं. राजद नेतृत्व की कमी से जूझ रहा है, जिसका लाभ बेशक जदयू और भाजपा को मिलता दिख रहा है अभी तक के गणित के अनुसार.

ऐसे में यशवंत सिन्हा का बिहार की राजनीति में कदम रखना और यह दावा करना कि वे चुनाव में विकल्प बनेंगे, समझ से परे जान पड़ता है. इसका सबसे बड़ा कारण है उनकी टाइमिंग. एक तो यशवंत सिन्हा अब राजनीति में सक्रिय नहीं है और ना ही कभी उनका चार्म इस तरह का रहा है, जिसे देखकर जनता उनकी तरफ दौड़ी चली आये. दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस चुनाव में उनके साथ आयेगा कौन? यशवंत सिन्हा जिस फ्रंट की घोषणा कर रहे हैं, उसमें शामिल होने के लिए बिहार का कोई भी बड़ा नेता उनके मंच पर प्रेस काॅन्फ्रेंस में नहीं दिखा था. यशवंत सिन्हा चुनाव लड़ेंगे या नहीं यह भी अभी स्पष्ट नहीं है. अगर वे चुनाव लड़ते भी हैं, तो उससे कोई खास फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा है. चुनाव के वक्त छोटी पार्टियां उसी के साथ जाती हैं, जिनका पलड़ा भारी रहता है, ऐसे में भाजपा और जदयू के बल्ले-बल्ले हैं. राजद और कांग्रेस तो यशवंत सिन्हा के तीसरे मोर्चे में शामिल होंगे नहीं, ऐसे में यशवंत सिन्हा का तीसरा मोर्चा बिहार की राजनीति में कोई धमाका करता प्रतीत तो नहीं होता है.


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