महानद सोन की परिणय गाथा एवं अन्य कवितायेँ कवि कुमार बिंदु की कलम से

कुमार बिंदु

1] महानद सोन
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(महानद सोन की परिणय गाथा)

सोन गावे पिरितिया के गीत रे
जुहिला नउनिया बनल कइसे मीत रे
सोन गावे सनेहिया के गीत रे

सोन के रूपवा सोना लेखा दमके
झक झक पनिया चानी जस चमके
जेकर जवनिया नया गढ़े रीत रे
सोन गावे पिरितिया के गीत रे

परबत के राजा मैकल के बिटिया
सुघर सोन के बनाई रे संघतिया
लेके सनेसा गइल बनल उहे तीत रे
सोन गावे पिरितिया के गीत रे

नरमदा के सखी रहे जुहिला नउनिया
रूप-रंग जेकर रहे धधकत अगिनिया
नरमदा समुझि के सोन गइले रीझ रे
सोन गावे पिरितिया के गीत रे

कैमूर पुरोहित केहेंजुआ पवनिया
चलली बिआह करे नरमदा दुल्हिनिया
सोन के रास देखी बर गइले खीस रे
सोन गावे पिरितिया के गीत रे

जुहिला अउर सोन से तूर के इयारी
पछिम के राह धइली नरमदा कुंआरी
हहर के भहरल सनेहिया के भीत रे
सोन गावे पिरितिया के गीत रे

सोन अउरी जुहिला बनले संघतिया
बांह गहि धरी लेले पूरब के रहतिया
तुरले मुलुक में जात-पात के रीत रे
सोन गावे पिरितिया के गीत रे

सोन के रहतिया केहेंजुआ जे रोकले
लकीर के फकीर के छाती सोन फरिले
कैमूर पुरोहिता नवां देले सीस रे
सोन गावे पिरितिया के गीत रे
।। कुमार बिन्दु ।।

नोट: यह गीत काव्य आदिवासियों के लोक कथा पर आधारित है। संभवतः भोजपुरी में पहली बार सोन की परणय गाथा इस गीत काव्य के जरिये दरपेश है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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2] हम कहीं नहीं जाएंगे
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तुम लंदन चले जाओगे
तुम कनाडा चले जाओगे
कभी भी सात समंदर लांघ जाओगे
तुम्हारे लिए बहुत आसान है
धरती के इस कोने से
उस कोने तक चले जाना
कहीं भी एक नई दुनिया बसा लेना
तुम जहां कहीं भी जाओगे
बाजार में सिक्के उछालोगे
तब मुल्क की मिट्टी, हवा और पानी
सब तुम्हारे जरखरीद गुलाम बन जाएंगे
मगर हमारी जेब में तो एक धेला भी नहीं है
पूर्वजों की चंद विरासत के सिवा
दामन में हमारे और कुछ भी नहीं है
तुम्हीं बताओ कि अपना मुलुक
अपने पुरखों की कब्र- मजार
बाप- दादे के बनाए घर दुआर
बचपन के सभी लंगोटिया यार
इन सबको छोड़कर कहां जाएंगे
हम कहीं नहीं जाएंगे
खुदा न करे हमें दर- बदर होना पड़े
ये सरजमीं छोड़कर कहीं जाना पड़े
फिर शबे बरात की मुकद्दस रात में
हमारी कई पीढ़ियों की कब्रगाह में
कौन पढ़ेगा फातिहा
कौन जलाएगा शमां
नहीं हम कहीं नहीं जाएंगे
भले तुम हमें गोधरा में जिंदा जला दो
भिवंडी में बंदूक की गोलियों से भून दो
हमारे मासूम बच्चों को भी कत्ल कर दो
हमारे घर की औरतों की अस्मत लूट लो
हम जिस मिट्टी में खेले- कूदे, पले- बढ़े हैं
उसी पाक मिट्टी में आज हमें दफन कर दो
हम इस मिट्टी में दफन हो जाएंगे
हम मर जाएंगे, हम मिट जाएंगे
मगर अपना यह मुलुक
अपना यह घर- दुआर
पुरखों की कब्र- मजार
यह सबकुछ छोड़कर हम कहीं नहीं जाएंगे
हम कहीं नहीं जाएंगे, हम कहीं नहीं जाएंगे

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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3] मौसम बदल गया है
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मौसम बदल गया है
और मौसम के साथ- साथ
बदल गए हैं मेरे दोस्त
मेरे पड़ोसी
मेरे शहर के अधिसंख्य लोग
ऐसा लगता है
किसी डायन ने कर दिया है
सभी लोगों पर जादू- टोना
इसीलिए हर दिल और देह पर दिख रही है
रक्त पिपासु प्रेत की छाया
सिकुड़ गई हैं सबकी आंखें
तन गई हैं काली भौहें
फड़फड़ाते होंठ कर रहे मसान का मंत्रपाठ
उनके हृदय में धधक रही मरघट की आग
आंखों से बरस रहा दहकता अंगार
दोनों भुजाएं बन गई हैं नंगी तलवार
शहर के हर गली- मोहल्ले में प्रारंभ है
अब अश्वमेध यज्ञ का महा अनुष्ठान
फिर ऐसे माहौल में हम
साकी, शराब और मयखाने
चैत की चांदनी रात के दिलकश अफसाने
सुनाएं तो सुनाएं किसे
इश्क की महफिल में
हुस्न की हसीं कातिल अदाएं
दिखाएं तो दिखाएं किसे
कबीर के भजन और गालिब की गजलों का मर्म
बताएं तो बताएं किसे
चांद की, चिड़ियों की, परियों की कथाएं
पीर की, फकीर की, दरवेश की दुआएं
अपने संग- संग लेकर
अब हम कहां और किसकी देहरी पर जाएं
मैं सोच रहा हूं कि
इन हसीन और दिलकश सौगातों को
कहीं दिखें कुछ हँसते- गाते बच्चे
तो उनकी छोटी- छोटी जेबों में
कहीं मिलें कुछ युवा और अधेड़ औरतें
तो उनके खूबसूरत आंचल में चुपके से डाल दूं
मुझे पूरा यकीन है कि किसी दिन ये सौगात
मेरे शहर के बच्चों और औरतों की जमात
हिंसा और नफरत से भरी इस दुनिया को
प्रेम और करुणा से एकदिन भर देंगे
नर्क बनती जा रही इस प्यारी धरती को
जरूर स्वर्ग में तब्दील कर देंगे

 

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4] बोलो शंकराचार्य बोलो
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क्या तुम जानते हो शंकराचार्य
आलीशान इमारतों के झरोखे से
कैसा दिखता है
सड़क पर पैदल चलता हुआ आम आदमी
कैसी दिखती हैं
शहर के एक हिस्से में बनी झुग्गी- झोपड़ियां
क्या तुम जानना चाहते हो
इस प्रश्न का सही- सही उत्तर क्या है
तो बुद्ध की तरह किसी के कथन से नहीं
अपने अनुभव से सत्य को जानो
इक बार फिर परकाया प्रवेश करो
और किसी अमीरजादे की मगरूर आंखों से
उसकी आलीशान इमारत की दसवीं मंजिल से
सांझ की वेला में झरोखे से जरा नीचे झांकों
देखो शंकराचार्य देखो
क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि
जैसे सड़क पर रेंग रहे हों घिनौने कीड़े
क्या झुग्गी- झोपड़ियां ऐसी नहीं दिख रहीं
जैसे गू खाने वाले गंदे सूअरों के हों बाड़े
अब तुम्हीं बताओ महाज्ञानी शंकराचार्य
अमीरजादों के इस सभ्य शहर में
दिल्ली, मुंबई, मुजफ्फरपुर जैसे महानगर में
सैकड़ों कीड़े- मकोड़े मर भी जाएं तो क्या
सूअरों के सैकड़ों बाड़े टूट भी जाएं तो क्या
भला महानगरीय जीवन के इतिहास में
इन सबका अस्तित्व ही क्या है
ये मखमल में टाट के पैबंद ही तो हैं
हर किस्म के गुनाह के सबब ही तो हैं
इस हसीं शहर के चेहरे पर एक दाग ही तो हैं
फिर इनके जीने – मरने को लेकर
भला क्यों परेशान हो सरकार
क्यों बेकरार हो यह आधुनिक समाज
बोलो मनस्वी शंकराचार्य बोलो
मेरे प्रश्न का अनुभव जनित उत्तर दो
देखो परमज्ञानी शंकराचार्य देखो
इस जगत के सभी प्राणियों को तुम भी
बुद्ध की भांति प्रेम और करुणा भरी दृष्टि से देखो
दिल्ली में, गुजरात में, उड़ीसा में, बिहार में
सैकड़ों बीमार बच्चों को मरते हुए
उनके मां- बाप को रोते- बिलखते हुए
उनकी छोटी सी दुनिया को उजड़ते हुए
देवदत्त के तीर से घायल होकर तड़पते हुए
निरीह पंछी को स्वप्न नहीं सत्य मानकर देखो
उनके अनमोल जीवन के भी मोल को समझो
तुम इस संसार को मिथ्या और माया मत समझो
बोलो प्रछन्न बौद्ध शंकराचार्य बोलो
अपनी बंद आंखें और बंद मुंह खोलो
और मेरे प्रश्न का बुद्ध बनकर उत्तर दो

 

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5] शेरशाह
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उठो शेरशाह
अपनी कब्र से उठो
अब कयामत का इंतजार मत करो
कयामत से कम नहीं ये घड़ी है
सौ शक्लों में जो हर सू खड़ी है
आज तुझसे तेरा अजीम खुदा नहीं
तेरा मजहब नहीं, तेरा अकीदा नहीं
तेरे मुल्क के
तेरे शहर के
सियासतदां सवाल करेंगे
उठो शेरशाह
अपनी कब्र से उठो
हसीं मकबरे की सरहदों से निकलकर
इस शहर की हर गली- कूचे में घूमकर
अपनी बेगुनाही का सबूत दो
अपनी नेक नीयती का सबूत दो
ये बताओ कि इस हसीं मकबरे के लिए
तूने मंदिर कोई तोड़ा कि नहीं
अपने मजहब, अपने तख्तों ताज के लिए
किसी काफिर का वजूद लोढ़ा कि नहीं
तू ये बता कि झूठ है क्या और सच है क्या
ससरांव की सरजमीं से तेरा रिश्ता है क्या
इसकी मिट्टी को तेरी रूह चूमती है क्या
ओ मेरे नायाब शहंशाह शेरशाह
तेरी देशभक्ति आज दांव पर लगी है
तेरी हस्ती सियासत की सूली चढ़ी है
अपने वजूद बचाने के लिए
हर दिल को यकीं दिलाने के लिए
हसीन ख्वाबों की ताबीर के लिए
फिर इक बार तुझे नबी युसूफ की तरह
सियासी बाजार में बिकना होगा
या फिर इक बार सहाबी हुसैन की तरह
इस सरजमीं पर बे- मौत मरना होगा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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6] इतिहास के पन्ने
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बदल रहे हैं इतिहास के पन्ने
और बदल रहा है देश का इतिहास
इतिहास के नए पन्नों पर
अब अंकित होगा ग
स्कूल और कॉलेजों में बच्चे पढ़ेंगे
ग मायने गाय
ग मायने गदर
परीक्षा में छात्रों से पूछे जाएंगे प्रश्न
गाय और गदर का अंतर्संबंध क्या है
कैसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की जननी है गाय
इतिहास की नई पुस्तकों से गुम होगा
पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस
छब्बीस जनवरी उन्नीस सौ पचास
इतिहास के नए पन्नों पर
अब अंकित होगा
पहली आजादी अठारह सौ संतावन में मिली
दूसरी आजादी उन्नीस सौ सतहत्तर में खिली
वर्ष दो हजार चौदह से उन्नीस तक परवान चढ़ी
हिंदुस्थान की तीसरी और सच्ची आजादी
नया इतिहास कराएगा यह नवीन सत्य का बोध
नेहरु और गांधी नायक नहीं खलनायक थे
हमारे अखंड भारतवर्ष के क्रूर विभाजक थे
इतिहास के पन्ने अब बदल रहे हैं
और बदल रहा है इतिहास बोध भी
मेरी मानना है कि गौ मांस के भक्षक
विधर्मी वैज्ञानिक आइंस्टीन और न्यूटन का नाम
विज्ञान के पाठ्यक्रम से भी तुरंत हटा देना चाहिए
क्योंकि उन मलेच्छ वैज्ञानिकों के नाम से
पूज्य गौ माता के मांस की दुर्गन्ध आती है

.. कुमार बिन्दु…
पाली, डेहरी ऑन सोन
रोहतास- 821305
मोबाइल : 9431430360
9939388474

 

 


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