यात्रा वृतांत: उत्तरकाशी की यात्रा

भारती पाठक

सन 1997 दिसम्बर की 23 तारीख को पता चला कि मुझे और नीतू उपाध्याय, जो एन सी सी में मेरी सीनियर थीं, को नेहरु इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनियरिंग के एडवेंचर कोर्स के लिए 26 दिसम्बर को उत्तरकाशी जाना है । एक तो इससे पहले कभी उत्तर भारत की कोई यात्रा नहीं की थी, दूसरे एडवेंचर और घूमने का शौक, तो मन ही मन मैं बहुत उत्साहित थी । चूंकि यात्रा सरकारी खर्चे पर और सुरक्षित थी तो घर से भी ख़ुशी ख़ुशी अनुमति मिल गयी ।

हमें अपने एन सी सी के सर के साथ ही वहां जाना था । निश्चित दिन हम स्टेशन पहुँच गए और ट्रेन में सवार भी हो गए और शुरू हुआ यादों को गढ़ने का सिलसिला ।

हमारी ट्रेन अगले दिन हरिद्वार पहुंची जहाँ से बस से हम दोपहर 2 बजे ऋषिकेश पहुंचे । वहाँ से तांगे से टैक्सी स्टैंड और फिर टैक्सी लेकर चल दिए उत्तरकाशी । आज पढ़ने वालों को तांगा सुनकर शायद आश्चर्य हो लेकिन जिन दिनों की यह बात है उन दिनों तांगे चला करते थे ।

ऋषिकेश से उत्तरकाशी करीब 170 किलोमीटर की दूरी पर है । एक तरफ गहराई में कल कल बहती अलकनंदा और दूसरी तरफ ऊंचे पहाड़, पूरा माहौल स्वर्गिक आनंद देने वाला लेकिन कुछ कुछ डरावना भी ।

उत्तरकाशी पहुंचते-पहुंचते शाम के 7.30 बज गए । टैक्सी वाले ने हमे स्टैंड पर उतार दिया जहाँ से एन आई एम (नेहरु इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनियरिंग ) करीब 4.5 किलोमीटर था जहाँ वो टैक्सी वाला जाने को तैयार नहीं था । एक दूसरा टैक्सी वाला दुगुना किराया लेकर जाने को तैयार हुआ जिसने हमे 8 बजे वहां पहुंचा दिया ।

मुझे पहाड़ों के घुमावदार रास्तों में चक्कर आते हैं तो रास्ते भर उल्टी से परेशान थी मैं, लेकिन शायद वही पहली और आखिरी बार था जब पहाड़ी यात्रा में उल्टी की परेशानी हुई हो, उसके बाद कभी नहीं हुई । अब तो कहीं न कहीं जाना होता ही है साल में एक दो बार पहाड़ों पर लेकिन कोई दिक्कत नहीं होती ।

वहां पहुँच कर हमें तुरंत हॉस्टल में कमरा मिल गया लेकिन सर को वहां रुकना मना था, तो उन्हें वापस जाना पड़ा ।

पर्वतारोहण के इस संस्थान की स्थापना पंडित नेहरू के जन्मदिन यानि 14 नवम्बर 1965 को की गयी थी । नेहरू जी पहाड़ों के शौक़ीन थे और इसका नाम उन्हीं के नाम पर नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ़ माउंटेनियरिंग रखा गया । यह भारत के प्रमुख पर्वतारोहण संस्थानों में से एक है । यहाँ बच्चों और व्यस्कों को पर्वतारोहण और साहसिक पाठ्यक्रम में प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है । प्रशिक्षण के दौरान पर्यावरण के नियमों का विधिवत पालन किया जाता है और लोगों में जागरूकता फैलाई जाती है ।

वहां कानपुर, टिहरी गढ़वाल, उत्तरकाशी, जयपुर, गुजरात और पटना से भी लड़कियां आई थीं । कुल मिला कर 39 लडकियां थीं जिन्हें अलग अलग समूहों में बांटा गया था । उन्हें पेट्रोल कहते थे । जाते ही मुझे पेट्रोल 3 और नीतू दीदी को पेट्रोल 1 में भेज दिया गया ।

मुझे जो कमरा मिला वो निचली मंजिल पर था । मुझसे पहले तीन और लडकियां कमरे में मौजूद थीं यानि मेरे कमरे में हम 4 ही थे और बाकी कमरों में 6-6 लोग थे । सोने के लिए बंक बेड था । मुझे नीचे की बेड मिल गयी थी । मेरे अलावा बाकी तीनों टिहरी से शिवानी, अवंतिका और प्रियंका । इनमें शिवानी 8 की और बाकि दोनों कक्षा 7 की छात्राएं थीं । कमरे से ही लगा साफ़ सुथरा बाथरूम और सामान रखने की आलमारी भी थी । मैंने सामान रख, हाथ मुंह धोया, तभी भोजन की घंटी बज गयी और हम भोजन कक्ष की ओर गये, जो सबसे नीचे था ।

यह एक बहुत बड़ा हाल नुमा कमरा था जिसमें पीछे की ओर भी दरवाजा खुलता था जहाँ बगीचा था । मुख्य दरवाजे से अंदर जाने पर दाहिनी तरफ काउंटर बने थे जिसमें एक तरफ थालियाँ और चम्मच रखे थे जिसे लेकर आगे बढ़ने पर बारी बारी से अपनी पसंद के शाकाहारी या मांसाहारी भोजन लेने की व्यवस्था थी । मैंने थोड़ा ही खाना लिया और खाकर वापस रूम में आई । थोड़ी देर बाद फिर घंटी बजी जिसका अर्थ था सभी को बूस्ट (दूध में चॉकलेट मिलाकर बनाया गया पेय पदार्थ ) पीना है, तो हम सब फिर से भोजन कक्ष में गए, दूध पिया और वापस आये । दिनभर की थकान में कब नींद आ गयी पता ही न चला ।

सुबह की पहली चाय वहां 5.30 पर मिलती थी जिसे पीकर जिस पेट्रोल की बारी होती थी उसे फ्लैग होस्टिंग के लिए जाना होता था । नियम था कि सबको नहा कर आना है । सुबह 4 बजे ही उठ गयी मैं और फ्रेश होकर नहाने गई तो पानी छूते ही होश ठिकाने आ गए । पानी क्या उसे बर्फ कहना ही ठीक होगा, माने जमने में बस एक-आध डिग्री ही शेष रहे हों इतना ठंडा पानी । लेकिन बहादुरी दिखाते हुए किसी तरह सांस रोककर 3-4 मग में ही शरीर भिगोकर बाहर आ गयी । भोजन कक्ष में जाकर चाय पी और फ्लैग होस्टिंग के लिए पहुंचे । 6.45 पर बिगुल बजाया जाता था और फिर झंडा चढ़ाया जाता जिसके बाद दिन भर के कार्यक्रम शुरू होते थे ।

रात में मुख्य भवन और उसके आस पास का वातावरण ठीक से देख नहीं पाई थी जिसपर अब नज़र पड़ी जब हम 7.30 बजे व्यायाम करने गए । नीचे बाज़ार से ऊपर चढने पर एक बड़ा गेट था जिस पर संस्थान का नाम बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था जिससे आगे जाने पर मुख्य गेट था जहाँ दरवाजा भी लगा था । उससे थोड़ा आगे बढ़ने पर रास्ता तीन भागों में बंटा था । एक रास्ता दाहिनी ओर जाता था, दूसरा सीधा ऊपर और तीसरा सीधा लेकिन नीचे की ओर जहाँ हॉस्टल का भवन था ।

जो रास्ता ऊपर को जाता था वहां ठीक मुख्य भवन के सामने झंडा लगाने की जगह थी, उसी के बगल से सीढियां नीचे भवन तक जाती थी । नीचे न जाकर आगे बढ़ने पर दाहिनी तरफ बास्केट बॉल का मैदान और थोड़ा नीचे उतर कर थ्रो बॉल का मैदान था जहाँ फुर्सत में खेल सकते थे ।

आगे जाने पर बांयी तरफ एक छोटा सा पोंड जैसा था जिसमें पानी भरा था और बीचों बीच एक मोटा सा पेड़ का तना जैसा आर पार रखा था जिसपर चढ़ कर उसे पार कर सकते थे। दूसरी तरफ कुछ ओब्सटिकल थे । कुछ दो पेड़ों को मिला कर बने, कुछ अकेले जिन पर रस्सियों से बनी सीढ़ी लटक रही थी । पीछे छोटा सा खाली मैदान और नीचे उतरने के लिए बना प्राकृतिक रास्ता ।

ये सारी चीजें मन में अजीब सा रोमांच पैदा कर रही थीं । रनिंग करने हम नीचे कस्बे तक गये । वापस आकर नाश्ता किया और तैयार होकर क्लास लेने गए । क्लास रूम काफी सुसज्जित और व्यवस्थित था । वहीं पहली बार मैंने प्रोजेक्टर पर कुछ पढ़ा था जब हमे माउंटेन के बारे में बताया गया और हमारी फर्स्ट आउटिंग के बारे में सामानों की लिस्ट दी गयी ।

धीरे धीरे हम आपस में परिचित होने लगे और मुझे पता चलने लगा कि मैं स्त्रियोचित बातों को करने, समझने में उन छोटी बच्चियों से भी बहुत पिछड़ी हूँ । मेरा सारा ध्यान बताई जा रही बातों और सबसे अच्छा करने के ध्यान में बीतता और वे सब मज़े से रहती जैसे वहां छुट्टियाँ बिताने आयी हों ।

उनकी बातों में उनका स्कूल, उसमें पढने बाले बच्चे खासकर लड़के ज्यादा होते थे तो मेरे जैसी लड़कियों के ही स्कूल में पढ़ी लड़की के लिए उसमें शामिल हो पाना कठिन होता था । उन्हें लगता मैं बहुत शर्मीली हूँ जबकि सच्चाई ये थी कि मेरे पास ऐसी कोई लड़कों से सम्बंधित कहानी ही नहीं थी जिसे मैं भी चटखारे लेकर सुनाती और ग्रुप में प्रभाव जमाती ।

29 दिसम्बर की सुबह हमें अपनी पहली आउटिंग पर जाना था तो उसके लिए जरूरी सामान दिए गए और जरूरी सावधानियां भी बताई गयीं । हमें दो दिन किसी टेखला पहाड़ी पर रुकना था तो उस लिहाज से कपडे, स्वेटर, जूते आदि ले जाना था । स्लीपिंग बैग और चटाई भी मिली, साथ ही एक लंच बॉक्स और पानी की बोतल भी जिसे पानी पीने के साथ ही दूसरे सभी कामों ( शौच आदि ) के लिए प्रयोग करना था ।

टेखला जाना एक तरह का ग्रुप कम्पटीशन भी था जिसमें हमें नक़्शे दे दिए गए थे और अपने आप रास्ते का पता लगा कर वहां पहुँचना था । जो ग्रुप पहले पहुंचता वह विनर होता । हमारे पेट्रोल के इन्चार्ज गुरुंग सर थे । गुरुंग सर वहां के सभी प्रशिक्षकों में सबसे ज्यादा मजाकिया और खुशमिजाज़ थे और उतने ही फुर्तीले ।

निकलने से पहले हमे टिफ़िन में लंच और बोतल में जूस दिया गया । पीठ पर 15 किलो का बैग लाद कर हम चल दिए । गिरते पड़ते दर्द से कराहते, कई तो रोते हुए किसी तरह टेखला पहुंचे । रास्ते की खूबसूरती अद्वितीय थी, कम से कम मेरे लिए तो स्वर्ग जैसी ।

घने जंगल के बीच थोड़ी सी समतल जगह थी जहाँ हमे टेंट लगाना था । हमारे खाने की व्यवस्था के लिए कुक वहां पहले से पहुँच चुके थे । शाम हो चली थी तो हमें पंक्तिबद्ध कर पानी मिलने की जगह बताई गयी जो टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों से जाकर थोड़ी ऊँचाई पर थी । वापस आकर हमने खाना खाया, अपने बर्तन धोये, फिर टेंट में गए और अपने अपने स्लीपिंग बैग में घुस गए ।

थकान से झपकी जैसी आ रही थी तभी साथ की लड़कियों की बातों ने मेरा ध्यान खींचा । उन सबको लगा कि मैं सो गयी हूँ तो उन्होंने अपनी बातों का पिटारा खोला और अपने अपने बॉय फ्रेंड्स के बारे में बताने लगीं कि कैसे पहली बार किसने फूल या कार्ड देकर अपने प्यार का इज़हार किया । मैं मन ही मन अंदाजा लगा रही थी कि कितनी पिछड़ी हुई हूँ मैं, कॉलेज पहुँच गयी और कोई सीरियस बॉय फ्रेंड ही नहीं । ये छोटी-छोटी स्कूल की लड़कियां सबके बॉय फ्रेंड ! धिक्कार था मुझे और मन ही मन विचार किया कि वापस आकर सबसे पहले एक बॉय फ्रेंड बनाना ही पड़ेगा । सोचते-सोचते कब नींद आ गयी पता ही न चला ।

सुबह 5 बजे सीटी बजी तो आँख खुली । सुबह का दृश्य अलौकिक, गहरी धुंध में चिड़ियों की हल्की चहचहाहट, ठण्ड इतनी कि मुंह से निकलती भाप जमने लगे । फिर भी अपनी-अपनी बोतल उठाई, झरने तक जाकर पानी भरा और फ्रेश होने गए जिसके लिए खुद गड्ढा खोदना था और फिर उसे ढकना भी, ये नियम था ।

सूरज निकला तो नज़ारा देखने लायक था, ऊँची-नीची सतह पर सब तरफ चीड के घने जंगल । थोड़ी ऊंचाई पर बड़ी बड़ी चट्टानें थीं जिन पर हमें दिन में केवल हाथों पैरों की सहायता से रॉक क्लाइम्बिंग करना था । कुछ कक्षाएं भी चलीं । अगले दिन 31 दिसंबर था यानि साल का आखिरी दिन, तो सभी देर तक जागना और नव वर्ष मानना चाह रहे थे, लेकिन बस एक घंटे की अनुमति मिली ।

हम सुबह वाक पर गए तो ढेर सारे चीड़ के सूखे फल इकट्ठे किये कैंप फायर के लिए । आज हमने रैपलिंग की रोप के साथ यानि रस्सी की सहायता से रेंग कर पहाड़ पर चढ़ना था । रात में सबने 12 बजे तक धमाल किया जिसमें हमारे इंस्ट्रक्टर भी शामिल थे और हाँ डी सर भी । डी सर यानि डॉक्टर सर जो हमारे साथ आउटिंग में रहते थे कि यदि किसी को चिकित्सीय आवश्यकता हो तो दिक्कत न हो । इतने लोगों के बीच जाने क्यों मुझे उनका चेहरा सबसे जाना पहचाना लगता था । उनका शांत स्वभाव, मुस्कुराता चेहरा, उनका देखना, बातें करना और साथ होना अच्छा लगता था ।

साल का पहला दिन और बचपन से जो सुनते आ रहे थे कि ऐसा कोई काम मत करना कि डांट पड़े, की शुरुआत यहाँ भी हुई । आज रस्सी की सहायता से नदी को पार करना था जिसके लिए हमे गंगोरी जाना था । टेंट क्लोज किया गया और फिर से अपना सामान पीठ पर लाद कर हम गंगोरी के लिए निकल पड़े । गिरते पड़ते रास्ते की सुन्दरता में खोये हम करीब 10 बजे गंगोरी पहुंचे ।

गंगोरी में भागीरथी और असी गंगा (जो डोडीताल से आती है ) का संगम होता है । गंगोरी पर बना एक मात्र पुल उत्तरकाशी को चीन की सीमा से जोड़ता है । ये साहसिक ट्रैक करने वालों का प्रिय स्थान है ।
गंगोरी में नदी की तेज लहरें देख कर मन रोमांचित हो रहा था । नदी के आर पार रस्सी बंधी थी जिस पर लटक कर हमने नदी पार की । उसके बाद बिना रस्सी के नदी पार करनी थी जिसमे कई बार हम डूबते डूबते बचे क्योंकि पत्थरों वाली नदी में गहराई का अंदाजा नहीं मिल रहा था और पानी की धारा बहुत तेज थी । बर्फ जैसे ठन्डे पानी में हमने जाने कितने गोते खाए ।

बाहर निकलने पर सबने कपड़े बदले और कॉफ़ी के साथ बिस्कुट खाया । फिर से सामान लाद कर नीचे सड़क तक आये जहाँ हमारी बस खड़ी थी जिसे देख कर जान में जान आई कि अब पैदल नहीं चलना पड़ेगा । 4 बजे हम एन आई एम पहुँच गए । लंच किया, अपने कपड़े धोए और खेल के मैदान में गए बास्केटबॉल खेलने के लिए ।

शाम को डी सर की क्लास थी फर्स्ट एड की जो मेरे लिए सबसे रोचक क्लास थी । नीतू दीदी ने बताया कि प्रदीप सिंह का न्यू इयर का ग्रीटिंग कार्ड आया है हम दोनों के लिये । प्रदीप सिंह से हमारी मुलकात ट्रेन में आते समय हुई थी जो कि आर्मी में थे, बातों-बातों में उन्हें बताया था हमने कि हम कहाँ जा रहे हैं ।

आज का समय होता तो मोबाइल की सुविधा से संबंधो को जोड़ने में मदद मिलती लेकिन तब चिट्ठी या ग्रीटिंग कार्ड ही चला करते थे । हाँ घरों में लैंड लाइन था लेकिन इस 21 दिन के कैंप में घर से कोई बातचीत या संदेशों का आदान प्रदान नहीं होना सामान्य सी बात थी । आज जब मेरे बच्चे कैंप जाते हैं तो मैं भी उसी तरह निश्चिन्त रहती हूँ जैसे अपने समय में मेरे माता-पिता रहते थे, लेकिन बहुत सारे अभिभावकों को देखती हूँ कि दो दिन में ही टीचर की नाक में दम कर देते हैं और मना करने के बावजूद बच्चों को छिपाकर मोबाइल फ़ोन भी दे देते हैं ।

अगले दो दिन स्पोर्ट्स के इवेंट हुए जिसमें हमारी पेट्रोल प्रथम और तृतीय आई । तीन की शाम को हमें अगले दिन की ट्रैकिंग के बारे में बताया गया ।

4 जनवरी की सुबह 8 बजे हम अपनी दूसरी ट्रेकिंग पर निकले । रास्ता बेहद खूबसूरत, चारों ओर हरियाली और जगह-जगह पड़ने वाले छोटे झरनों का कल-कल । रुकते चलते करीब 6 घंटों की ट्रैकिंग के बाद हम फोल्ड पर पहुंचे । फोल्ड उत्तरकाशी के डुंडा ब्लाक में चार गांवों का केंद्र है । इस क्षेत्र को धनपति नदी की जन्मस्थली भी कहते हैं । यह पूरा हिन्दू गाँव है यहाँ किसी भी और धर्म के लोग बिलकुल नहीं हैं ।

उस दिन हम फोल्ड में ही अपने टेंट लगा कर रुके जहाँ हमने कुकिंग का अभ्यास किया जिसमें अपना बनाया हुआ खाना हमें ही खाना था । खाना तो अच्छा और सबसे पहले बना लिया हमने बस नमक डालना ही भूल गए थे और इसके चलते प्रतियोगिता से बाहर हो गए ।

अगले दिन फोल्ड से चौरंगीखाल के लिए निकले जिसे बुश क्राफ्ट करते जाना था । रास्ता झाड़ियों और जंगल के बीच से था । झाडियां ऐसी की तेजी से चलना मुश्किल और नीचे इतने पत्ते कि घुटने तक पैर उनमें धंस जायें । वहां कुछ जंगली जानवर भी दिखे जो अकेले रहने पर खतरनाक हो सकते थे । दोपहर के एक बजे हम चौरंगी खाल पहुंचे ।

चौरंगी खाल यहाँ का प्रसिद्द ट्रैक है जहाँ से 3 किलोमीटर की दूरी पर नचिकेता ताल है जो अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है । कहा जाता है कि घने देवदार और बांझ के जंगलों के बीच बसे नचिकेता ताल का निर्माण वाजस्रवा ने किया था और अपने बेटे नचिकेता के नाम पर इसका नाम रखा था ।

चौरंगी खाल में जहाँ हमारे कैंप की जगह थी वह काफी उंचाई पर एक छोटे मैदान जैसी जगह थी जिसके एक तरफ ऊँचे पहाड़ और जंगल तथा सामने की ओर गहरी खाई । खाई से ठीक पहले बडी-बड़ी चट्टानें जैसे गिरने से बचने की प्राकृतिक व्यवस्था हो । हमने अपने टेंट लगाये, खाना खाया और थोड़ी देर आराम किया । ठण्ड इतनी कि हाथ पैर जम जाएँ, फिर भी सबने छोटे-छोटे टेंट बनाना सीखा । बुरी तरह थक गए थे सब तो लेटते ही गहरी नींद आ गयी ।

सुबह आँख खुली तो अद्भुत नज़ारा था । चारों ओर जैसे बर्फ की चादर बिछी हो, बाहर रखा पानी जम कर बर्फ की सिल्ली बन चुका था । हमारे जूते काले से सफ़ेद हो गए थे और अकड़ कर जैसे काठ । उठकर हम तैयार हुए और ट्रैकिंग पर निकल पड़े । इतने बड़े ग्रुप की ख़ास बात ये थी कि सबके अलग-अलग इंचार्ज थे और उनकी जिम्मेदारी बस अपने पेट्रोल की होती थी तो कहीं जाने पर सब निकलते भी पेट्रोल वार बारी-बारी से थोड़े-थोड़े अंतराल पर ।

आज हम हिमालय की कुछ चोटियों को करीब से देखने गए । जिनमें द्रोपदी का डांडा, श्रीखंड, गंगोत्री 1,गंगोत्री 2, गंगोत्री 3, मंकी टेल आदि प्रमुख थीं । पहाड़ के करीब होना, उसकी शांति को महसूस करना एक अलौकिक अनुभव होता है जिसका सही अनुभव वहां जाकर ही पाया जा सकता है । चौरंगी खाल की इसी सुन्दरता को देखने बड़ी संख्या में पर्यटक सर्दियों में यहाँ आते हैं ।

लंच तक हम वापस आ गए और खाना खाकर तुरंत फ्लोरा इकठ्ठा करने चल पड़े । सोचती हूँ इस तरह के कैंप व्यक्ति को अपनी क्षमताओं का आंकलन करने के लिए भी करना चाहिए इससे आप के शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य की भी परीक्षा हो जाती है ।

जंगल से फ्लोरा और फौना ( वनस्पति और जीवों से सम्बंधित किसी क्षेत्र विशेष की चीजें ) के साथ-साथ लकड़ियाँ भी बटोर कर लाये थे जिसे जलाकर रात खुले में किए उस कैंप फायर की यादें आज भी ताजा हैं । डी सर का वहां साथ होना मन को कुछ अजीब सी ख़ुशी दे रहा था जैसे रात बीते ही न और हम सब ऐसे ही बैठे रहें । लेकिन रात बीतनी भी थी और हमें वापस भी आना भी था । कोई भी ट्रिप और भी यादगार बन जाती है जब साथ में अलग-अलग प्रदेश के लोग हों जो अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं से कहीं न कहीं हमें समृद्ध कर रहे होते हैं ।

अगले दिन हमने 9 बजे टेंट क्लोज किया और वापस चल पड़े । रास्ते में हम झरने के पास देर तक रुके और प्लांट्स इकट्ठे किये । फोल्ड पहुंचे, वहां लंच किया और शाम को 6.30 पर हॉस्टल के लिए निकले ।

यह नाईट मार्चिंग थी जिसमें हमे टार्च की सहायता से अँधेरे को चीरते हुए से जंगल के रास्ते हॉस्टल पहुँचना था । मैं बचपन से ही अँधेरे से बहुत डरती थी तो मेरे लिए ये खुद को साबित करने जैसे था । रास्ते में दूर कहीं-कहीं किसी घर में दिखती रौशनी किसी जुगनू के जैसी लग रही थी । हम एक पंक्ति में एक दूसरे को सहारा देते, बातें करते, गीत गाते लगातार 5 घंटे चलकर 11.30 पर एन आई एम पहुंचे जहाँ हमारे लिए बोर्नविटा तैयार था । बताने की जरूरत शायद नहीं कि दूध पीने और अपने कमरे में जाने के बाद हमारी हालत क्या रही होगी ।

अगले दिन हम देर से सोकर उठे । आज बाधा दौड़ थी जिसमें मैं सेकंड आई । अगले दिन तीसरे ट्रैक के लिए जाना था तो प्रिंसिपल सर की क्लास थी लेकिन वे नहीं आये तो हम खेलने चले गए । रात में धरासू ट्रैक के लिए पैकिंग की ।

धरासू राष्ट्रीय राजमार्ग 34 पर स्थित उत्तरकाशी का ही एक बड़ा गाँव है जो भागीरथी नदी के किनारे बसा है । यह यमुनोत्री के मार्ग में पड़ता है जहाँ पॉवर हाउस का निर्माण काफी समय से चल रहा था । हम आस-पास के गाँव में लोगों का सामाजिक जीवन देखने गए । आज तो वहां काफी परिवार रह रहे हैं लेकिन उस समय गिनती के घर थे, क्योंकि वहां भू-स्खलन की समस्या बनी रहती है । टिहरी बाँध का पानी बढ़ जाने से भी पॉवर हाउस के लिए आये दिन कोई न कोई समस्या होती रहती है ।

सुबह हम 8-30 पर धरासू पॉवर हाउस पहुंचे, जगह देखकर अपने टेंट लगाये तब तक हमे राफ्टिंग (ऊँची नीची लहरों पर नाव से झूझने का साहसिक खेल ) सिखाने के लिए आर्मी से कुछ लोग आये थे जिन्होंने नदी के किनारे ही हमें अलग-अलग तरह की नावों के बारे में और नदी पार करने के कौशलों की मौखिक कक्षा ली । ये दिन इसी में बीता और शाम को टेंट बनाने की प्रतियोगिता हुई जिसमें सबने बहुत आनंद लिया ।

अगला दिन बहुत रोमांचकारी था जब हमने कई बार ग्रुप रिवर राफ्टिंग की । नदी के किनारे पत्थरों पर बैठकर अपनी बारी का इंतज़ार करना और ये जानते हुए भी कि हमारी सुरक्षा जिम्मेदार हाथों में है दूसरे पेट्रोल के प्रतिभागियों को भय से चीखते-चिल्लाते देख कर मज़ा आ रहा था । शाम की चाय वहीँ नदी के किनारे ही आ गई थी जब ठंडी हवा और सुहाने मौसम में हम पत्थरों पर बैठे थे । तभी सुना स्वाति का गाना पहली बार बहुत मीठी आवाज में । दिन कब गुजरा पता ही न चला ।

अगली सुबह पहली बार पेट्रोल 2 की वजह से हम सब को सजा मिली और देर तक पी टी कराई गयी । आज रिक्की बोट और मोटर बोट पर राफ्टिंग का अभ्यास कराया गया जो अपने डर को जीतने जैसा था ।

शाम को तबियत कुछ ठीक नहीं थी तो मेरी पार्टनर सोहिनी ने दवा दी लेकिन आराम नहीं हुआ तो डी सर भी देखने आये । आज याद कर रही तो मुस्कुरा रही हूँ कि उम्र के उस खास दौर में किसी-किसी का आकर्षण दिल को सुकून देने वाला होता है जैसे डी सर का आना और मेरी तबियत के बारे में पूछना मेरे लिए उस दिन दवा से बढ़कर महसूस हो रहा था ।

अगले दिन दोपहर तक हम हॉस्टल वापस आ गए फिर बाकी दिन कई तरह की प्रतियोगिताएं हईं । हमारे मेडिकल चेक अप हुए, ग्रेजुएशन सेरेमनी का अभ्यास हुआ और एक गड़बड़ भी ।

हुआ यूँ कि 13 तारीख को शाम फ्लैग ऑफ करने की जिम्मेदारी हमारे पेट्रोल की थी । झंडा झुकाने से पहले बिगुल बजाया जाता था तो हमने भी बहुत प्रयास किया लेकिन वो नहीं बजा तो झंडा यूँ ही उतार कर रख दिया । हाथ में बिगुल लेकर रखने से पहले मैंने सोचा फूंक मार कर देखती हूँ और फिर वही हुआ जिसका डर, बिगुल तेज आवाज में बज गया और प्रिंसिपल सर ने सुन लिया । वे बहुत नाराज हुए और पूरे कोर्स को 2 घंटे नाईट मार्च का पनिशमेंट मिला ।

हमारे साथ-साथ हमारे पेट्रोल इंचार्ज को भी जाना पड़ा तो जो जिस हाल में था वैसे ही फाल इन हुआ और दो घंटे जंगल में टहलाया गया । कुछ नाईट सूट में थे, कुछ बिना स्वेटर, कुछ शॉर्ट्स में और मन ही मन मुझे गालियाँ देते हुए । आज ये लिखते हुए मैं मुस्कुरा रही हूँ और याद है कि उस रात भी हंस रही थी, मैं ही नहीं मेरी पूरी पेट्रोल और गुरुंग सर भी ।

आखिरी दिन भी हम इतने व्यस्त रहे कि कभी अपने पेट्रोल से अलग ज्यादा लोगों से जुड़ना नहीं हो पाया । मिले हुए सामानों को वापसी से पहले धूप दिखाना, जमा करना, प्रिंसिपल सर का इंटरव्यू और ग्रेजुएशन सेरेमनी सब अच्छे से निबट गए ।

अगले दिन सुबह हम आखिरी बार फाल इन हुए, सबसे गले मिले और दिलों में एक-दूसरे की यादें संजोये अपने घरों की ओर लौटने लगे । रास्ते में फिर वही नदी, पहाड़ और झरने थे लेकिन साथ ही थी इन सबसे दूर होने की उदासी ।

वहां के साथियों में प्रियंका उनियाल, रुचिका, सोहिनी, पिंकी (जिससे एक बार मेरी मुलाकात काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर बरसों बाद यूँ ही हो गयी थी), स्मिता (जिससे मेरी अक्सर लड़ाई होती थी), रीना लाम्बा, अवंतिका, टिम्सी, मनमीत अब भी मेरी स्मृति में हैं । आज 22 सालों बाद भी वो सारे पल आँखों के सामने हैं जो हमने साथ बिताए ।


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