पुस्तक चर्चा: बहुचर्चित कथाकार उदयप्रकाश का कविता संग्रह ” अम्बर में अबाबील”

Dinesh Shrinet

उदय प्रकाश की बीते सालों में लिखी गई ज्यादातर कविताएं निर्वासित लोगों की कविताएं हैं। इन कविताओं में मौजूदा समय का यथार्थ हैरत कर देने की हद तक मौजूद है। इनमें वायरस है, अपना शहर छोड़कर जाते हुए लोग हैं, इसमें गूंगा कर देने वाले शोर का बयान है तो शातिर चुप्पियों की पड़ताल भी।

बीते साल के अंतिम महीनों में आए संग्रह ‘अम्बर में अबाबील’ की कविताओं को जब आप पढ़ना शुरू करते हैं तो वह किसी त्रासद नाटक के प्रोलॉग की तरह लगता है। जिस वक्त लाखों जिंदगियाँ उजड़कर किसी ठिकाने की तलाश में भटक रही हैं महीनों पहले ये कविताएं जैसे किसी दरार से इसे देख रही थीं।

इस संग्रह के बारे में आगे बात करने से ठीक पहले एक छोटी सी कविता पूरा पढ़ा जाना चाहिए। कविता का शीर्षक है ‘न्याय’।

उन्होंने कहा हम न्याय करेंगे
हम न्याय के लिए जाँच करेंगे

मैं जानता था
वे क्या करेंगे

तो मैं हँसा

हँसना ऐसी अंधेरी रात में
अपराध है

मैं गिरफ़्तार कर लिया गया

उदय प्रकाश के इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते वक्त मेरे आँखों के आगे कुछ दृश्य कौंधते हैं। ये दृश्य बिल्कुल किसी फिल्म की तरह आते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे इन पंक्तियों को लिखने वाला किसी खंडहर हो चुके मकान की खिड़की के पास दिवाल से सिर टिकाए बैठा है। बाहर युद्ध हो रहा है, गोलियां चल रही हैं और लोग मर रहे हैं। वह थोड़ा सहमा, थोड़ा रोष से भरा खिड़की के बाहर झांकता है। हम सिर्फ उसके चेहरे और आँखों का क्लोज़अप देख रहे हैं। इसके अलावा कुछ नहीं। हमें लगता है कि यह भयभीत छुपा हुआ व्यक्ति अचानक खिड़की फांदकर चीखता हुआ तनी हुई बंदूकों के बीच जा खड़ा होगा। बस, इतना ही और ऐसा ही तनाव ये कविताएं रचती हैं। इनमें कवि स्वर श्रेष्ठताबोध में डूबा हुआ नहीं है। उसमें एक निर्वासित मनुष्य का अवसाद, संशय और भय है और इसके अतिरेक से उपजे साहस की दहलीज तक खींचता हुआ कवि आपको ले जाता है। आप खुद अपने भीतर के उस साहस को टटोलते हैं जो किसी इनसान को तनी हुई बंदूक के सामने खड़ा कर देता है।

एक कविता है, ‘जलावतनी’, जो इन पंक्तियों के साथ खत्म होती है, “कितना अँधेरा है यहां?” / मैंने धीरे से कहा / किसी रोशनी से सराबोर सड़क पर चलता हुआ / शहर से निकाला गया मुझे / इतना बड़ा झूठ बोलने के लिए। ये जलावतनी, ये निष्कासन ही इस पूरे संग्रह का स्थायी भाव है। एक और कविता का शीर्षक है, ‘इस शहर में एक किसी रोज़ जब कोई विदा हुआ था’। एक कविता ‘डर’ है, जो पूछती है, ‘कहां से आया ऐसा वायरस? / फियर वायरस’। और इन पंक्तियों तक पहुँचती है, ‘कैसा डरावना है यह दौर / हर किसी के रोएं खड़े हो रहे हैं / शिराओं में दौड़ रही है झुरझुरी, / हर किसी की निहत्थी-निर्दोंष नींद में / भर गए हैं डरावने दुःस्वप्न’। यही कविता आगे कहती है, ‘दूसरे को देखते हर किसी की आँखों में है ख़ौफ / कहां से आया यह बैक्टीरिया सर्वव्यापी’। देखते-देखते शब्द कैसे हमारे समाज के सच में तब्दील होते जा रहे हैं।

गौर करें इन कविताओं को इस कोरोना समय से बहुत पहले रचा गया था। उदय के पास एक इतिहासदृष्टि है, जिसका इस्तेमाल वे अक्सर अपनी कविताओं और किस्सेनुमा कहानियों में करते हैं। वे अपने इसी इतिहासबोध से तात्कालिक यथार्थ को एक मेटॉफर में बदल देते हैं। उन्हें किसी रूपक या उपमा की जरूरत नहीं। अखबार और टीवी की खबरें ही उनके रूपक बन जाते हैं। भरोसा कविता में वे लिखते हैं, ‘साधु ठग निकल आये, बैंक बंद हो जाये / कतार में खड़ी खरे सर की अम्माँ मर जाये / जहाज़ का मालिक विदेश भाग जाये / कब कोई रस्ता राह भटक जाये’। यह भी भविष्य को बाँचती कविता लगती है जो आगे कहती है, कब बुख़ार में कराहता कोई जेल चला जाये और थोड़ा और आगे कहती है, ‘कब सारी जिंदंगी की हिंदी हो जाय / कब कोई प्रधानमंत्री जोकर बन जाय / कब हर हाथ ताली बन जाये’। ये थाली और ताली से बहुत पहले की कविता है।

उदय प्रकाश के साथ बातचीत में मैंने महसूस किया कि वे अक्सर पॉपुलर चीजों के पीछे नहीं भागते बल्कि अक्सर किताबों, लेखकों और सिद्धांतो को किसी उत्खननशास्त्री की तरह खोज निकालते हैं। मुझे लगता है कि शायद डिस्टोपिया भी उनका प्रिय विषय होगा तभी एक अन्य कविता ‘नाइनटीन एटीफोर’ की शुरुआत कुछ इस तरह होती है, ‘वह आरवैल का उपन्यास नहीं था / वह हमारी संवैधानिक जम्हूरियत थी’। लेकिन वे अपनी रचनाओं में मनुष्य में निहित अच्छाई, प्रेम और कोमलता के पक्षधर हैं। अपने तमाम इंटरव्यू में वे यह मानते हैं कि यथार्थ इकहरा तो नहीं ही है अब वो इतना जटिल हो चला है कि किसी आइडियोलॉजी के चश्मे से भी उसे परखना कठिन है। उसके लिए एक एक खास तरह की निगाह और भाषा को साधना जरूरी है।

बात उदय प्रकाश की भूमिका से समाप्त करते हैं, जहां वे कहते हैं, ‘इस धरती में उनका अपना भी कोई देश हो, जिसमें उनका जल-जंगल, ज़मीन हो, जहां हर एक कविता का अपना एक सुरक्षित, निजी, सार्वभौम कोना हो, जहाँ वह अपना घोंसला बना सके और जिसे उसकी आने वाली संततियां अपनी ‘जन्मभूमि’ और अपना ‘देश’ कह सकें।’ ठीक इसी वक्त जब आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं, आपके मन में सवाल कौंध उठता है, पैदल इस देश की धरती को नापते लाखों मजदूर किस देश को छोड़कर ‘किस देस’ की तलाश में जा रहे हैं?

(किताब के कवर की तस्वीर मैंने नवंबर उतारी थी, जिसमें सुबह खिड़की से आया ‘धूप का एक टुकड़ा’ भी शामिल है)


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