सामाजिक सरोकार से जुड़ी एक खूबसूरत फिल्म “बाज़ार” का निर्माण कुछ यूँ हुआ…

Manish Pandey

सन 1976 में, हिंदुस्तानी सिनेमा के मशहूर फ़िल्मकार यश चोपड़ा साहब की एक फ़िल्म सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई.फ़िल्म का नाम था “कभी – कभी”.अमिताभ बच्चन,शशि कपूर,राखी,वहीदा रहमान,ऋषि कपूर,नीतू सिंह जैसे कामयाब और हुनरमंद फ़िल्मी सितारों से सजी इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस और दर्शकों के दिल पर अपनी चमक मज़बूती के दर्ज कराई.इसका नतीजा ये हुआ कि फ़िल्म ने गोल्डन जुबली मनाई और निर्माता – निर्देशक यश चोपड़ा को एक क़ाबिल फ़िल्मकार के रूप में भारतीय सिनेमा जगत के बीच स्थापित किया.फ़िल्म की इस बड़ी कामयाबी के पीछे, बहुत बड़ा हाथ फ़िल्म के लेखक सागर सरहदी साहब का था.फ़िल्म के संवाद,फ़िल्म की पटकथा इतनी शानदार थी कि वह सीधे दर्शक के दिल में उतरने में कामयाब हुई.फ़िल्म कभी कभी में किए गये,अपने इस शानदार लेखन के लिए सागर सरहदी साहब को चौबीसवे फ़िल्मफेयर अवार्ड्स में “सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक” के सम्मान से नवाज़ा गया.इस फ़िल्म की कामयाबी के बाद सागर सरहदी साहब को कई बड़ी फ़िल्मों में ऑफ़र आए,मगर उन्होंने सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए.सागर सरहदी साहब के भीतर एक ग़ुस्सा था,जो उन्हें अपनी मन की बात कहने के लिए उकसा रहा था.उन्हें लग रहा था कि इस तरह की रोमांटिक,कमर्शियल फ़िल्में लिखकर वह कहीं न कहीं अपनी बात कहने के रास्ते से दूर होते जा रहे हैं.उन्होंने फ़ैसला किया कि वह अपने मन के दर्द,ग़ुस्से और ग़ुबार को फ़िल्म के रुपहले पर्दे पर लेकर आएँगे.

इस ग़ुस्से की एक बहुत बड़ी और दर्दनाक वजह है.11 मई सन 1933 को सरहदी सूबे(मौजूदा पाकिस्तान का गाँव) में जन्मे सागर सरहदी साहब को हिंदुस्तान के विभाजन की वजह से अपने पूरे परिवार के साथ गाँव छोड़कर, श्रीनगर के रास्ते दिल्ली आना पड़ा और एक विस्थापित रिफ्यूज़ी की जीवन व्यतीत करना पड़ा.यहाँ रिफ्यूज़ी कैंप में रहते हुए सागर सरहदी साहब और उनके परिवार ने बहुत तकलीफ़ें झेली.परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए सागर सरहदी साहब ने नौकरी शुरू की,मगर अपने लेखन के प्रति लगाव के कारण ज़्यादा समय तक परिपाटी वाली ज़िंदगी न जी सके.उन्होंने मुंबई आकर फ़िल्मी दुनिया में क़िस्मत आज़माने का स्ट्रगल शुरू किया.यहाँ उन्होंने वह प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा से जुड़े ,जहाँ उनकी मुलाक़ात कैफ़ी आज़मी,अली सरदार जाफरी,साहिर लुधयानवी,बलराज साहनी जैसे कलाकरों से हुई.इन बड़े कलाकारों के क्रांतिकारी विचारों और सोहबत का सागर सरहदी साहब पर गहरा असर हुआ.

इस सब के बीच यश चोपड़ा साहब ने एक दिन सागर सरहदी साहब का लिखा नाटक “ मिर्ज़ा साहेबा” देखा,जिससे प्रभावित होकर उन्होंने सागर सरहदी साहब को फ़िल्म “कभी – कभी” ऑफ्रर हुई की.सागर सरहदी साहब ने फ़िल्म को पूरी शिद्दत से सँवारा.मगर इस सब में उनके मन में बसा हुआ विस्थापन का दर्द और सवाल,हरे ज़ख्म की माफ़िक ताज़ा थे.सो उन्होंने फ़िल्मी ग्लैमर को किनारे करते हुए,अपने दर्द और ग़ुस्से को बयां करने वाली फ़िल्म बनाने की ठानी.
जब सागर सरहदी साहब ने फ़िल्म के निर्माण की सोची,उसी दौरान एक घटना हुई.एक रोज़ सागर सरहदी साहब ने अख़बार पढ़ते हुए एक ख़बर देखी,जिसने उन्हें भीतर तक झकझोर के रख दिया.ख़बर हैदराबाद की उन मज़लूम और मासूम बच्चियों के बारे में थी,जिन्हें अरब देश से आने वाले धनी पुरुष,पैसों के बल पर ख़रीद कर ले जाते थे और कुछ वक़्त बाद लड़कियों को छोड़ देते हैं.

इस ख़बर के बारे में और जानने की उत्सुकता, सागर सरहदी साहब को हैदराबाद तक ले गई और उन्होंने एक ऐसी ही शादी में शिरकत की,जहाँ अरब से आए एक धनी पुरुष की पैसों के बल पर, एक नाबालिक लड़की से शादी हो रही थी.इस घटना का सागर सरहदी साहब पर ऐसा असर हुआ कि उन्होंने उसी वक़्त, इस सामाजिक समस्या को फ़िल्मी परदे पर फ़िल्माने का निर्णय कर लिया.

सागर सरहदी साहब ने सबसे पहले लेखक इब्राहिम रंगला,भद्रकांत ज़ेवरी और इनायत अख्तरी के साथ मिलकर फ़िल्म की कहानी मुक्कमल की.जब फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो गई तो,सागर सरहदी साहब ने कहानी अपने मित्रों को सुनानी शुरू की.ये वह दौर था, जब अमिताभ बच्चन का “एंग्री यंग मैन” भारतीय जनमानस पर छाया हुआ था.प्रयोगवादी सिनेमा का दूर – दूर तक कोई निशान नहीं था.ऐसे में जब सागर सरहदी साहब ने अपनी स्क्रिप्ट लोगों को सुनाई तो,सबने एक स्वर में कहा कि मौजूदा वक़्त को देखते हुए, इस तरह की फ़िल्म बनाना बेवकूफ़ी है.मगर सागर सरहदी साहब के हौसले बुलंद थे.उन्होंने फैसला कर लिया था कि चाहे,जो भी हो वो इस कहानी को फ़िल्मी पर्दे पर लेकर ही आएँगे.

सागर सरहदी साहब ने बतौर निर्माता – निर्देशक इस फ़िल्म की कहानी का निर्माण करने का फ़ैसला किया.हालाँकि यश चोपड़ा साहब ने सागर सरहदी साहब को फ़िल्म प्रोड्यूस करने की पेशकश की थी.मगर सागर सरहदी साहब ने इस पेशकश को स्वीकार नहीं किया.इसकी वजह यह थी कि सागर सरहदी साहब अपनी कहानी को अपनी तरह से कहना चाहते थे.किसी भी क़िस्म का दखल,उन्हें मंज़ूर नहीं था.वह जानते थे कि अगर यश चोपड़ा निर्माता बने तो ज़रूर कुछ न कुछ बदलाव की मांग करेंगे.इसलिए सागर सरहदी साहब ने यश चोपड़ा साहब से पैसे लेने की जगह अपने दोस्तों से पैसे जुटाए और फ़िल्म का निर्माण शुरू किया.यहाँ गौर करने वाली बात ये है कि यश चोपड़ा साहब ने सागर सरहदी साहब की इस चाहत का सम्मान किया और उन्हें हर तरह से सहयोग किया.चाहे कैमरा मुहैया करवाना हो या अन्य ज़रूरते हों,यश चोपड़ा साहब हर वक़्त सागर सरहदी साहब के लिए मौजूद रहे.इसके साथ ही अभिनेता शशि कपूर साहब ने भी फ़िल्म निर्माण के लिए सागर सरहदी साहब की मदद की.

इसके बाद सागर सरहदी साहब ने फ़िल्म निर्माण के लिए अपनी टीम बनानी शुरू की.फ़िल्म की स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी के लिए विजय हंगल को लिया गया,जो फ़िल्म एक्टर ए.के हंगल के पुत्र थे.फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी ईशान आर्य के ज़िम्मे थी.सागर सरहदी साहब चाहते थे कि फ़िल्म का संगीत,फ़िल्म की कहानी और जज़्बात को कहने वाला हो.इसके लिए उन्होंने मशहूर संगीतकार खय्याम साहब को चुना.खय्याम साहब ने शानदार धुनें तैयार की,जो फ़िल्म की आत्मा बन गई.इसके साथ ही सागर सरहदी साहब फ़िल्म में पारंपरिक गीतों की जगह कलात्मक गीत चाहते थे.इसके लिए उन्होंने उस्ताद शायर मीर तक़ी मीर और मखदूम मोहिउद्दीन,बशर नवाज़ की ग़ज़लें फ़िल्म में शामिल की.फ़िल्म की ग़ज़लों को गायक तलत अज़ीज़,भूपिंदर सिंह और गायिका लता मंगेशकर ने अपनी आवाज़ दी.

फ़िल्म की एक ग़ज़ल “ देख लो आज हमको जी भर के “ को गायिका जगजीत कौर जी ने आवाज़ दी.जगजीत कौर जी संगीतकार खय्याम साहब की पत्नी थी और फ़िल्म बाज़ार में उनकी चीफ़ म्यूजिक असिस्टेंट का काम भी देख रही थी.इस ग़ज़ल को शायर मिर्ज़ा शौक़ ने लिखा था.इस ग़ज़ल से एक मशहूर वाकया जुड़ा है.एक पुरानी किताब “ज़हर-ए-इश्क़” की कहानी में नायिका अपने प्रेमी से बिछड़ रही होती है और इसी ग़म में वो कहती है “देख लो आज हमको जी भर के “.सागर सरहदी साहब को ये चीज़ बहुत अच्छी लगी और उन्होंने इस अपनी फ़िल्म में शामिल कर लिया.आज सागर सरहदी साहब ख़ुद क़ुबूल करते हैं कि उन्होंने पुरानी किताब से इस सिचुएशन और ग़ज़ल को चोरी किया था.
इसके साथ ही फ़िल्म के एक गीत को यश चोपड़ा साहब की पत्नी पामेला चोपड़ा ने भी अपनी आवाज़ दी.
जब फ़िल्म के किरदारों की कास्टिंग की बात आई तो,सागर सरहदी साहब ने यह साफ़ कर दिया कि वह सिर्फ़ और सिर्फ़ रंगमंच की दुनिया के अभ्यस्त कलकारों को ही लेकर फ़िल्म बनाएँगे.इसकी वजह यह थी कि सागर सरहदी साहब को ऐसा लगता था कि रंगमंच के कलाकार अभिनय में अधिक कुशल होते हैं और समय और परिस्थिति के अनुसार स्वंय ही कई निर्णय लेकर,फ़िल्म को सही दिशा पर बनाए रखते हैं.

इसी सिलसिले में सागर सरहदी साहब ने अभिनेत्री स्मिता पाटिल को फ़िल्म में नजमा का रोल ऑफ़र किया.स्मिता पाटिल ने जब स्क्रिप्ट सुनी तो फ़ौरन हाँ कर दी.सागर सरहदी साहब ने स्मिता पाटिल को यह बताया कि वह अभी उन्हें पैसे नहीं दे सकेंगे इसलिए अगर स्मिता पाटिल फ़िल्म छोड़ना चाहें तो अभी छोड़ दें.स्मिता पाटिल साहिबा ने सागर सरहदी साहब को भरोसा दिलाया कि वह फ़िल्म बनने और रिलीज़ के बाद ही पैसे लेंगी.इस तरह स्मिता पाटिल फ़िल्म का हिस्सा बनी.उन्होंने इस फ़िल्म के लिए 40 हज़ार रूपये लिए.
इसके बाद सागर सरहदी साहब फ़िल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को साइन करने दिल्ली पहुँचे.नसीरुद्दीन शाह तब तक मुंबई नहीं आए थे.जब उन्होंने कहानी सूनी तो फ़िल्म का हिस्सा बनने पर सहमति जता दी.नसीरुद्दीन शाह ने इस फ़िल्म के लिए पच्चीस हज़ार रूपये लिए.

उनके अलावा फ़ारूक़ शेख,भरत कपूर,बी.एल चोपड़ा ने फ़िल्म में मुख्य किरदार निभाए.इस फ़िल्म से अभिनेत्री सुप्रिया पाठक को बतौर फ़िल्म अभिनेत्री काम करने का मौका मिला.फ़िल्म के लिए उन्हें सागर सरहदी साहब ने ग्यारह हज़ार रूपये दिए.

फ़िल्म में हज्जन बी के किरदार के लिए अभिनेत्री शौकत आज़मी साहिबा को लिया गया,जो कैफ़ी आज़मी साहब की पत्नी और एक्ट्रेस शबाना आज़मी की माँ थी.
फ़िल्म की शूटिंग हैदराबाद के इलाकों में हुई.क्योंकि फ़िल्म के सभी मुख्य किरदार हैदराबादी भाषा बोलने वाले थे, इसलिए भाषा के सटीक उच्चारण के लिए भाषाविद मसीन अंजुम साहब की सेवाएँ ली गई.
फ़िल्म की शुरुवात में स्मिता पाटिल पर एक संवाद फ़िल्माया गया जिसके बोल थे “हम हैं मता-ए –कूचा-ओ- बाज़ार की तरह,उठती है हर निगाह खरीददार की तरह”.दरअसल ये एक ग़ज़ल का शेर था जिसे शायर और मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने फ़िल्म दस्तक के लिए लिखा था.सन 1970 में आई फ़िल्म दस्तक की यह ग़ज़ल फ़िल्म बाज़ार की सिचुएशन पर सटीक बैठती थी.इसलिए सागर सरहदी साहब ने इसे शामिल किया और इसके लिए फ़िल्म की शुरुवात में, फ़िल्म “दस्तक” के निर्देशक राजेन्द्र सिंह बेदी साहब का धन्यवाद दिया.

फ़िल्म तक़रीबन 10 लाख रुपयों में बनकर तैयार हुई.
जब फ़िल्म “बाज़ार” बन कर तैयार हुई तो, सागर सरहदी साहब ने फ़िल्म की स्क्रीनिंग रखी.उनके सभी मित्रों ने फ़िल्म देखकर यही कहा कि इस तरह की फ़िल्म कामयाब नहीं हो सकती.फ़िल्म वितरकों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए.बहरहाल फ़िल्म सेंसर बोर्ड से पास हुई.वीपी साठे साहब जैसे मार्केटिंग एक्सपर्ट ने फ़िल्म की पब्लिसिटी की.रेडियो पर अमीन सयानी साहब ने फ़िल्म प्रचार का ज़िम्मा संभाला.

21 मई 1982 को फ़िल्म “बाज़ार” सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई.फ़िल्म की शुरुवात थोड़ी धीमी ज़रूर रही मगर जैसे जैसे लोगों ने फ़िल्म देखी,लोग इसके मुरीद होते चले गये.स्मिता पाटिल,नसीरुद्दीन शाह,फ़ारूक़ शेख,सुप्रिया पाठक के दमदार अभिनय,खय्याम साहब के संगीत और सागर सरहदी साहब ने निर्देशन ने दर्शकों के दिलों पर गहरा असर छोड़ा था.फ़िल्म ने सिल्वर जुबली देखी.ये कामयबी इसलिए भी ख़ास हो जाती है क्योंकि उस समय अमिताभ बच्चन शिखर पर थे और उनकी फ़िल्म नमक हलाल,सत्ते पे सत्ता,शक्ति सुपरहिट रही थी.ऐसे में एक अलग तरह की फ़िल्म का कामयाबी हासिल करना काबिलेतारीफ़ बात कही जाएगी.

फ़िल्म “बाज़ार” को सन 1983 में हुए फ़िल्मफेयर अवार्ड्स में 7 श्रेणियों में नामंकित किया गया.अपने शानदार अभिनय के लिए अभिनेत्री सुप्रिया पाठक को “सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री” के फ़िल्मफेयर अवार्ड से नवाज़ा गया.

फ़िल्म “बाज़ार” की कामयाबी के बाद सागर सरहदी साहब ने फ़ासले,चाँदनी जैसी कई कामयाब फ़िल्में लिखी मगर दुनिया में हमेशा हमेशा के लिए उनकी पहचान फ़िल्म “बाज़ार” के हवाले से स्थापित हो गयी.
इस तरह सामाजिक सरोकार से जुड़ी एक खूबसूरत फ़िल्म “बाज़ार” का निर्माण हुआ.


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