Water (2005): बनारस में रहने वाली विधवाओं की स्थिति पर रौशनी डालती हुई मीरा नायर की फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

मीरा नायर ने 2005 में वाटर फिल्म बनायी. इस फिल्म का विषय बनारस के विधवा आश्रमों में रहने वाली विधवाओं की स्थिति का चित्रण थी. इस फिल्म से पहले triology की पहली दो फ़िल्में अर्थ और फायर थीं. फायर ने भारत में ख़ासा विवाद पैदा किया था. दिल्ली की मध्यवर्गीय परिवार की दो महिलाओं, जिनके नाम मिथकीय चरित्रों के नाम पर रखे गए थे, के बीच लेस्बियन सम्बन्ध, भारत में समाज के कुछ तबके को नागवार गुजरा था और दक्षिणपंथी संगठनों ने इस फिल्म का काफी विरोध किया था. ऐसे में जब मीरा नायर ने बनारस में वाटर फिल्म की शूटिंग शुरू की, तो सेट पर धुर दक्षिणपंथी संगठनों ने तोड़ फोड़ की और फिल्म निर्माण को बाधित किया. फिल्म ऐसे में लम्बी खिंच गयी और अंततः इसकी शुटिंग बनारस के बजाय श्रीलंका में करनी पड़ी.

1930 के दशक में स्थापित फिल्म बनारस में गंगा तट पर स्थित एक विधवा आश्रम की कहानी है, जिसकी संचालिका मधुमती एक वृद्ध महिला है, जो आश्रम को चलाने के लिए आश्रम की खूबसूरत युवा विधवा कल्याणी को बनारस के अमीर सेठों के बंगलों में वैश्यवृति के लिए भेजा करती है. इस काम में मधुमती की मदद उसका साथी एक हिज़रा गुलाबी ( रघुवीर यादव) किया करता है. वह कल्याणी को रात के अँधेरे में नाव में गंगा पार स्थिति बंगलों में ले जाय करता है.
आश्रम में एक बार एक आठ वर्षीय लड़की चुहिया आती है, जो अभी हाल फिलहाल विधवा हुई है. उसके पिता उसे सिर मुंड़ा कर, एक जोड़ी सफ़ेद साड़ी में उसे आश्रम में छोड़ जाते हैं. चुहिया समझ नहीं पाती कि उसे अपने घर से दूर इस आश्रम में अजनबी महिलाओं के बीच पिता क्यों छोड़ गए हैं, उसे यकीन है कि उसके पिता उसे लेने आएंगे और वो अपनी मां के साथ सुकून से रह पाएगी. पर धीरे धीरे उसकी ये ग़लतफ़हमी दूर होने लगती है. आश्रम में उसकी बातचीत अन्य महिलाओं से होती है. एक है बेहद वृद्ध महिला, जिसे वह बुआ कहकर पुकारती है. उसे याद आती रहती है, स्वादिष्ट घी में बने लड्डुओं की. आश्रम में विधवाओं को हर तरह के स्वादिष्ट भोजन से, अच्छे रहन सहन से महरूम रखने की वजह से उपजी आकांक्षा की ओर फिल्म मेकर ने इशारा किया है. एक बार भीख में मिले पैसे से चुहिया ने उसके लिए लड्डू खरीद कर उसे खिलाया. लड्डू खाने के बाद उसकी मृत्यु हुई, जब उसने ये बात आश्रम में रहने वाली दूसरी औरत शकुंतला से कही, तो शकुंतला कहती है, “चिंता मत करो. बुआ लड्डू खाके सीधे स्वर्ग जाएगी. और अगर भगवान ने चाहा, तो अगले जन्म में पुरुष बनेगी.”

शकुंतला आश्रम में रहने वाली महिलाओं में पढ़ी लिखी महिला है और उसके अंदर वैधव्य को लेकर उग्रता भी है. वह रोज घाट पर अन्य विधवाओं के साथ पंडित सदानंद का धर्म पाठ सुनती है. एक रोज पंडित सदानंद के पूछने पर कि वो मोक्ष के कितने करीब पहुंची, शकुंतला कहती है, “मोक्ष का मतलब अगर वैराग्य है तो नहीं.”
चुहिया की दोस्ती कल्याणी से हो जाती है. दोनों साथ में वक़्त गुजारने लगते हैं. कल्याणी के साथ चुहिया अपना दुःख दर्द कुछ देर के लिए भूल जाती है. एक दिन घाट से लौटते समय कल्याणी की मुलाक़ात नारायण से हो जाती है. नारायण गाँधी के आदर्शों से प्रभावित एक ब्राह्मण युवक है. उसका दोस्त है रबिन्द्र, जो अपनी शराब और संगीत में डूबा रहता है. उसे अंग्रेज़ों का शासन प्रिय है और उसे नारायण के आदर्शों पर अचम्भा सा महसूस होता रहता है. नारायण कल्याणी को भूल नहीं पाता है और उसने विधवा पुनर्विवाह के लिए भारतीय धर्म सुधारकों के विचार और ब्रिटिश शासन के क़ानूनी प्रयासों के बारे में पढ़ रखा है. उसने तय कर लिया है कि वह कल्याणी से ही विवाह करेगा और कल्याणी को साथ लेकर नौकरी के लिए कलकत्ते चला जाएगा. फिल्म में आज़ादी के आंदोलन का जिक्र किरदारों के डायलाग, खासकर मधुमती और गुलाबी के बीच, और नारायण और रबिन्द्र के बीच के संवादों के माध्यम से किया गया है. कल्याणी की माँ ( वहीदा रहमान) नारायण की शादी की बात से परेशां हो जाती है, परम्पराओं पर चोट के नाम पर ! पर नारायण को अपने पिता का समर्थन है. लेकिन इससे पहले कि दोनों की शादी हो, एक दिन अचानक गलती से चुहिया के मुंह से नारायण और कल्याणी के प्रेम की बात मधुमती के सामने निकल जाती है. मधुमती आश्रम के प्रमुख आर्थिक श्रोत के बंद हो जाने के और परम्पराओं के ढ़हने के दोहरे भय से कल्याणी के बाल काट देती है और उसे कमरे में बंद कर देती है.
पर शकुंतला उसे कमरे में निकाल देती है और फिर नारायण उसे अपने साथ अपने घर ले जाने के लिए चल पड़ता है. नाव जब बंगले के करीब पहुँचती है तो कल्याणी दुःख मिश्रित अचम्भे में पड़ जाती है, नारायण के पिता उसके ग्राहकों में से एक हैं. वो नाव वापस लौटा लेने को कहती है. नारायण उसके इस व्यवहार को समझ नहीं पाता. वो अपने पिता से इस बारे में सवाल करता है, हक़ीक़त जानकर वो अपने पिता के ढकोसले के प्रति घृणा से भर जाता है. वो लौट कर आश्रम पहुँचता है. पर कल्याणी ने रात में गंगा में डूब कर आत्महत्या कर ली है.

कल्याणी की मौत के बाद आश्रम संचालिका मधुमती ने धोखे से चुहिया को एक सेठ के बंगले पर भेज दिया. जब तक शकुंतला को खबर लगती है, काफी देर हो चुकी होती है. चुहिया दर्द से बेहाल, ट्रॉमेटिक अवस्था में उसे मिलती है. वो रात भर चुहिया के साथ घाट पर गुजारती है. घाट पर सुबह सुबह घोषणा होती है कि ट्रेन से गांधी जी आने वाले हैं, कुछ देर प्लेटफार्म पर रुकेंगे. वो चुहिया को लेकर स्टेशन की ओर निकल पड़ती है. स्टेशन पर गाँधी जी के दर्शनार्थियों का हुजूम उमड़ा पड़ा है. कुछ देर के संवाद के बाद गाँधी जी को लेकर ट्रेन चलने लगती है. शकुंतला की मानो तंद्रा टूटती है. वो चुहिया को वैधव्य की आड़ में वैश्यवृति की नारकीय ज़िन्दगी से निकालने के लिए उसे गांधी जी के आश्रम में भेजने का फैसला कर लेती है. तभी उसे ट्रेन में नारायण दिखता है, जिसने पिता का साथ छोड़कर गाँधी जी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने की ठान ली है. शकुंतला चुहिया को नारायण के हवाले कर देती है. ट्रेन चल पड़ती है, प्लेटफार्म पर खड़ी रह जाती है, शकुंतला. आँखों में आंसू लिए, पर दिल में सुकून !

फिल्म इस मुकाम पर खत्म हो जाती है.
मीरा नायर इस फिल्म को शुरुआत में शबाना आज़मी, नंदिता दास और अक्षय कुमार के साथ बनाना चाहती थी, पर फिल्म में अंततः आये जॉन अब्राहम, लीजा रे, सीमा विश्वास। ए आर रहमान के संगीत और सुखविंदर के गीतों से सज्जित फिल्म बनारस के विधवाओं की दयनीय स्थिति दिखाने में सफल होती है. हालाँकि फिल्म का अभिनय पक्ष कमजोर है और जॉन अब्राहम अपनी भूमिका के साथ न्याय करते नहीं दिखते, पर कुल मिलाकर एक अच्छी फिल्म बन पड़ी है. इस फिल्म को भारत से ज्यादा पश्चिमी देशों में प्रशंसा मिली. फिल्म में कुछ भी असाधारण नहीं है, और कहानी एक ढर्रे पर चलती है, जिसकी भारतीय दर्शकों को पूरी समझ है, पर भारत में exotic की तलाश में व्यग्र पश्चिमी देशों के दर्शकों और समीक्षकों ने इस फिल्म की तारीफ़ की. इसी exotic element की तलाश की व्यग्रता की एडवर्ड सईद ने अपनी किताब Orientalism में तीखी आलोचना की है.
फिल्म एक बार देखी जा सकती है.


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