खंडहर (1984): मृणाल सेन निर्देशित एक बेहतरीन फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

मृणाल सेन ने बंगाली के साथ हिंदी भाषा में भी बेहतरीन फ़िल्में बनायीं हैं. उनकी ” भुवन शोम” फिल्म से हिंदी सिनेमा में सामानांतर सिनेमा का आगाज़ माना जाता है. उनके द्वारा शुरू की गयी परम्परा को श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी जैसे निर्देशक आगे लेकर चले. मृणाल सेन की फिल्म खँडहर (1984) बंगला कथाकार प्रेमेन्द्र मित्रा की कहानी Telenapota Abishkar पर आधारित है.
सुभाष (Naseeruddin Shah) पेशे से फोटोग्राफर है, वो अपने लैब में फोटोज डेवेलप कर रहा है, जिसमें एक खूबसूरत ग्रामीण युवती एक भव्य हवेली के खँडहर से झाँक रही है. फोटो देखते देखते सुभाष यादों में खो जाता है. कुछ दिन पहले ही उसके दोस्त दीपू (Pankaj Kapur) ने उसे और उनके दोस्त अनिल ( Annu Kapoor) को कलकत्ते से कुछ दूरी पर स्थित अपने गांव चलने का ऑफर दिया था, जिसे थोड़ी हिचक के बाद सुभाष ने स्वीकार कर लिया था. गांव में उनकी एक बड़ी हवेली थी,जो अब खँडहर में तब्दील हो चुकी है. वहां दीपू की पैतृक संपत्ति की देखभाल करने के लिए एक नौकर है और उसकी बेटी गौरी ( Sreela Majumdar) रहती है. उसी खँडहर के एक हिस्से में उसकी कजिन सिस्टर जामिनी ( Shabana Azmi) अपनी माँ ( Gita Sen) के साथ रहती है. माँ अब बीमार रहने लगी है, अक्सरहां बीमार रहती है, बिस्तर से लगी, आँखों से भी सूझता नहीं. कुछ साल पहले रिश्ते में एक युवक निरंजन ने जामिनी से विवाह का वायदा किया था, पर उसके बाद निरंजन शहर से लौटा नहीं और उसने दूसरी जगह शादी कर ली. जामिनी ये बात जानती है, पर माँ से छुपाये रखा उसने. माँ को अब भी उम्मीद है कि निरंजन शहर से लौटेगा और जामिनी को बियाह कर ले जाएगा.
एक दिन दीपू सुभाष को अपने साथ जामिनी और उसकी माँ से मिलाने ले जाता है. ग़लतफ़हमी में माँ सुभाष को निरंजन समझ लेती है और उससे बार बार जामिनी के साथ विवाह कर लेने को गुहार करने लगती है. इन क्षणों में विचलित होकर सुभाष हामी भर देता है. दीपू और जामिनी का ख्याल है कि माँ को सच्चाई से अवगत कराने पर कहीं उनकी मौत न हो जाए. इसलिए दोनों चुप रहते हैं.

जामिनी की जिंदगी कठिन है. शहर में दीदी और जीजा रहते हैं. हर महीने 150 रूपये भेज देते हैं और समय समय पर साड़ी कपडे. उसके सामने ऑप्शन सीमित हैं, माँ को छोड़ के वे शहर नहीं जा सकती. माँ के देहांत के बाद वो अपनी दीदी के पास चली जाए, दीदी उसकी शादी कर दे शायद या फिर शायद वो अविवाहित ही रह जाये. जामिनी कभी अपने मुंह से शिकायत नहीं करती. उसकी आँखें बोलती हैं. विपरीत परिस्थितियों में पलकर बेहद समझदार हो चली है जामिनी। पर समझदार जामिनी के मन में भी एक आशा की किरण पलने लगी है कि शायद सुभाष…

पर सुभाष और जामिनी की दुनिया अलग है. शहर का सुभाष और गांव की रहने वाली जामिनी दोनों के जीवन मूल्य अलग हैं, सोचने का तरीका अलग है. सुभाष रमा रहता है सुबह से शाम तक खँडहर की तस्वीरें लेने में. यहाँ तक कि दोनों एक दूसरे के साथ सहज होकर बात नहीं कर पाते हैं. शब्दों की तलाश में संघर्ष करते दिखते हैं दोनों.
ज्यादा दिनों के लिए तीनो दोस्त नहीं आये थे, समय पंख लगाकर उड़ जाता है. रविवार को तीनों कलकत्ते के लिए निकलने की तैयारी कर रहे होते हैं. सामान बैलगाड़ी पर लादा जा रहा है, तभी अचानक सुभाष को मानो कुछ याद आता है. वो अपना कैमरा उठा कर खँडहर की ओर चल पड़ता है. वहां पहुँच कर देखता है, दीवार की ओट लेकर जामिनी खड़ी हैं, आँखों में नमी और दिल में उदासी. सुभाष को उसमे आर्ट की की सम्भावना दिखती है, वो झटपट जामिनी की कई तस्वीरें उतार लेता है. जामिनी की ऑंखें उदास हैं, पर सुभाष फोटो खींच कर सिर्फ एक थैंक यू कहकर चला जाता है. जो भी उम्मीद जगी थी, वो भरभरा कर गिर पड़ती है. खँडहर का हिस्सा बनकर रह जाती है जामिनी। अंदर जाने पर जब माँ उससे मेहमानों के बारे में पूछती है, तो अंदर का दर्द बाहर निकल पड़ता है. जामिनी बिफर पड़ती है, भगवान ने तुम्हारा सब कुछ तो ले लिया, अगर तुम्हे गूंगा भी बना दिया होता…
बिस्तर पर पड़ी माँ सन्न रह जाती है. जामिनी की भी तन्द्रा टूटती है, माँ तुम जानती हो मेरा मतलब ये नहीं था, मुझे माफ़ कर दो मां. मुझे समझने की कोशिश करो … मैं तुम्हे सच नहीं बताना चाहती थी. मैं तुम्हे झूठ बोलती आयी.

खँडहर में देर तक जामिनी का रुदन गूंजता रहता है.

फिल्म एक बार फिर से वर्तमान में लौट आती है. फोटो को डेवेलप करते सुभाष के पास.

एक यादगार फिल्म है, मृणाल सेन की ‘खंडहर’ (1984)

खंडहर (1984) फिल्म के लिए मृणाल सेन को बेस्ट डायरेक्शन का नेशनल अवार्ड और बेस्ट स्क्रीनप्ले का फिल्मफेयर अवार्ड मिला. शबाना आज़मी को बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवार्ड और मृण्मय चक्रबर्ती को बेस्ट एडिटिंग का नेशनल अवार्ड मिला. फिल्म को Cannes film festival में भी दिखाया गया. सिनेमेटोग्राफर सुभाष नंदी की भी तारीफ़ करनी चाहिए। सुभाष की खींची खँडहर और जामिनी की खूबसूरत तस्वीरों के पीछे सुभाष नंदी ही हैं.

अपने बेहतरीन फोटोग्राफी, एडिटिंग और मृणाल सेन के ब्रिलियंट डायरेक्शन के साथ साथ फिल्म याद की जाएगी बेहतरीन अदाकारी के लिए. पंकज कपूर एंड अन्नू कपूर ने अपने अभिनय की सहजता से दर्शकों का ध्यान खींचा है, नसीर पैशनेट फोटोग्राफर सुभाष की भूमिका में जमे हैं. सुभाष जो अपनी फोटोग्राफी के बारे में सोचता रहता है और जरुरत पड़ने पर जामिनी को अपनी फोटोग्राफी का सब्जेक्ट बनाने में हिचकता नहीं है, और जामिनी के आँखों की उदासी और उम्मीदों को दरकिनार करके महज एक थैंक यू चिपका कर चल देने वाले किरदार में जान डाल दी है. पर फिल्म में शबाना अभिनय में अपने साथी कलाकारों पर भारी पड़ी हैं. शबाना जामिनी की आत्मा में उतर गयी हैं. एक कर्तव्यपरायण लड़की, जो परिस्थितियों की हक़ीक़त से अवगत है, जो सुभाष के प्रति सॉफ्ट कार्नर डेवलप कर लेती है, पर जो मुंह से कुछ नहीं बोलती, जिसकी ऑंखें कुछ सवाल लेकर सुभाष के सामने बार बार खड़ी हो जाती हैं इस आस में कि शायद कुछ जवाब मिले. और अंत में जो टूट कर रह जाती है, खंडहर का हिस्सा बनकर जीना जिसकी नियति है, इन तमाम शेड्स को शबाना ने बखूबी जिया है. दर्शकों को जामिनी याद रह जाती है. खँडहर के एक कोने में आधी छुपी खड़ी, देखती खोयी खोयी नज़रों से.

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