एक रेलवे इंजीनियर जिन्होंने एक कवि के रूप में ख्याति कमाई

Rajendra Sharma

बिहार राज्य् के एक छोटे से कस्बानुमा-शहर जमालपुर के निम्न मध्यवर्गीय परिवार में 30 जून 1960 को जन्मे कवि राज्यवर्द्धन का जीवन नदिया के उस पानी की तरह रहा है जिसकी रवानगी को पहाड ,घाटी नही रोक नही पाती और अन्तत: अपनी रवानगी के बल पर पानी नदिया का ही कहलाता है । राज्यवर्द्धन चिकित्सक बनना चाहते थे परन्तु निम्न मध्यवर्गीय परिवारों की असुरक्षा की सोच जिसके चलते सपना बस इतना भर कि बेटा जल्दी से जल्दी बारोजगार हो जायें,बेटी के हाथ पीले हो जायें । इसी सोच ने पिता के दवाब मे सोलह साल की उम्र में 1976 में एक्ट अप्रेंटिसशिप के प्रतियोगिता में चयनित होकर आई एस सी की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर, जमालपुर रेल कारखाना में भर्ती होना पडा । पिता को लगता था कि 3 साल के प्रशिक्षण के बाद नौकरी मिल ही जाएगी। जमालपुर रेल कारखाना में ट्रेनिंग के शुरुआती दिनों में राज्यवर्द्धन अपने ख्वाब को टूटता देख ट्रेनिंग सेंटर के पीछे जाकर शुरू में खूब रोया करते परन्तु कितना रोते ,एक दिन पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए जीवन से समझौता कर लिया। 1979 में ट्रेनिंग ख़त्म करने के बाद 1980 में फीटर के पद पर नियुक्ति हो गयी। 1985 में असिस्टेंट ड्राफ्ट्समेन के रुप में सेलेक्ट हुए । चार साल बाद 1989 में चार्जमैन पद के लिए डिपार्टमेंटल सेलेक्शन हुआ। 2 साल मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई और ट्रेनिंग किया और अन्तोगत्वा चालीस साल रेलवे की नौकरी कर तीस जून 2020 को सीनियर सेक्शन इंजीनियर/यांत्रिक के पद से सेवानिवृत्त हुए है ।

राज्यवर्द्धन बताते है कि उन्हें मानसिक तौर पर गढने में पिता का साहित्य के प्रति लगाव और जमालपुर के माहौल की बडी भूमिका रही । जमालपुर के रेलवे कारखाना व स्पेशल क्लास रेलवे अपरेंटिस के प्रशिक्षण केंद्र में हिंदुस्तान के सभी प्रान्तों के लोग मिलते जिस कारण जमालपुर की संस्कृति बिहार के औसत कस्बों से कुछ हटकर रही और जमालपुर अपने आप में विविधता भरा एक छोटा-मोटा हिंदुस्तान दिखाई देता। यही कारण है कि आज भी जमालपुर में साक्षारता दर बिहार में ज्यादा है। पिता आजीविका के लिए रेलवे कारखाना में क्लर्क थे परन्तु गजब के साहित्य अनुरागी और साहित्य के अनुराग के कारण ही रेलवे के सांध्यकालीन सेंट्रल इंस्टिट्यूट के पुस्तकालय में पार्ट टाइम लाइब्रेरियन का काम सम्हालते । लाइब्रेरी जाने से पहले घर में अंग्रेजी,बांग्ला और हिंदी की पत्रिकाएँ एक घण्टे के लिए आती थी। यही से राज्यवर्द्धन का राब्ता उस दौर की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं धर्मयुग,साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका, दिनमान ,माधुरी, नंदन आदि से हुआ । बचपन से ही पढने का सिलसिला ऐसा शुरु हुआ कि मैट्रिक के बाद धीरे-धीरे गम्भीर साहित्य की ओर स्वतः रुझान बढ़ा।पिता जी लाइब्रेरियन थे। एक बार पिता की अनुमति प्राप्त कर लाइब्रेरी की हिंदी किताबों का कैटलॉग बनाया ताकि जानकारी हो सकें कि किन-किन लेखकों की कौन कौन सी किताबें उपलब्ध हैं।धर्मवीर भारती,अज्ञेय राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी,मोहन राकेश,कमलेश्वर,शिवानी ,यशपाल,भगवती चरण वर्मा एवं बांग्ला से हिंदी में अनुदित शरतचंद्र, शंकर, विमल मित्र, अशापूर्णदेवी आदि के उपन्यासों को राज्यवर्द्धन एक ही बैठक में पढ़ जाया करते। साहित्य की यह दीवानगी आज 60 बरस की उम्र में भी यथावत बनी हुई है । कवि राज्यवर्द्धन किसी दिन साहित्य न पढें ,यह संभव नही है।

राज्यवर्द्धन

निरन्तर पठन पाठन के फलस्वरुप स्वांभाविक रुप से राज्यवर्द्धन की सोचने समझने की वृत्ति विकसित हुई । 1975 में आपातकाल के दौरान जे पी का भाषण सुनने राज्यवर्द्धन मुंगेर जा पहुंचे थे । बिहार सरकार को बर्ख़ास्त करने के मांग को लेकर बी .डी.ओ आफिस वगैरह का घेराव के जुलूस में पन्द्रह बरस के राज्यवर्द्धन भी शामिल थे । नन्हा मुन्ना सा यह किशोर उस समय कॉलेज में छात्रों के बीच आंदोलन के साइक्लोस्टाइल पर्चे को छिपाकर बांटता ।बिहार सरकार को बर्खास्त करने की मांग को लेकर शाम को 7 बजे मौत का घण्टा बजाया करता ।
नियमित पठन पाठन से उपजी सोच समझ ने राज्यवर्द्धन को समानांतर सिनेमा के प्रति आकर्षित किया । 1975-80 समानांतर सिनेमा का दौर था। उस समय जमालपुर के रेलवे सिनेमा(नेशनल इंस्टिट्यूट) में राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय सम्मान से चर्चित सिनेमा को भी प्रदर्शित किया जाता था। श्याम बेनेगल की अंकुर,निशान्त मंथन,शिवेंद्र सिन्हा की ‘फिर भी’, अमृत लाल नाहटा का ‘किस्सा कुर्सी का’ ,मृगया,नक्सलाइट ,भुवन सोम जैसी कलात्मक पिल्में राज्यवर्द्धन को भाती थी। जवानी के दिनों में राज्यवर्द्धन रंगमंच के प्रति आकर्षित हुए।

जमालपुर में डॉ श्याम दिवाकर, डॉ नृपेंद्र वर्मा,शिवानंद भट्टाचार्य,चर्चित फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम की संगत ने राज्यवर्द्धन की अभिरुचि लेखन में जगाई । उस समय इस मित्र मंडली ने जमालपुर में ‘प्रगतिशील लेखक संघ ‘ की स्थापना की। इसी मित्र मंडली ने “विचार” नाम की एक लघु पत्रिका का प्रकाशन शुरु किया।जिसके संपादक मंडल में डॉ श्याम दिवाकर, डॉ नृपेंद्र वर्मा,शिवानंद भट्टाचार्य,चर्चित फ़िल्म समीक्षक विनोद अनुपम और राज्यवर्द्धन थे । जैसा कि लघु पत्रिकाओं के साथ सामान्य रुप से होता है, इस पत्रिका के 7-8 अंक ही निकल पाये और पत्रिका बन्द हो गयी लेकिन राज्यवर्द्धन के लिए “विचार” नाम की लघु पत्रिका के संपादक मंडल में होना मील का पत्थयर साबित हुआ । राज्यवर्द्धन नवभारत टाइम्स (पटना) में कला -संस्कृति संवाददाता बन गये । कला और संस्कृति के अलावा सामाजिक मुद्दों पर फीचर लिखते । इसी बीच धर्मयुग,वामा में छिटपुट रचनायें भी छपने लगी। कोलकाता से ‘जनसत्ता’ का प्रकाशन शुरू होने पर राज्यवर्द्धन ने 1995 से 2010 तक जनसत्ता में ‘कला-समीक्षा’ नाम से नियमित स्तम्भ लेखन किया। इसके अलावा प्रभात खबर(कोलकाता),दैनिक जागरण(कोलकाता) के लिऐ भी कुछ दिनों तक उन्होंने लेखन कार्य किया।

वर्ष 2010 तक राज्यवर्द्धन कविता के रसिक जरुर थे परन्तु कविताएं लिखते नही थे। यह अलग बात है कि कॉलेज के जमाने में छिटपुट कुछ कविता लिखी थी और पहली कविता दैनिक जागरण में छपी थी। 2010 में उन्होंने अनुभव किया कि अपनी बात बजरिये कविता कहेंगे । पचास साल की उम्र में कविता लेखन की ओर उन्मुंक्त हुए राज्यवर्द्धन की कविताएं देश भर की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं यथा कृतिओर, हंस, वर्तमान साहित्य,जनसत्ता(वार्षिकांक),प्रभात खबर(वार्षिकांक), शुक्रवार(वार्षिकांक) ,प्रभात वार्ता,अक्षर पर्व,नई धारा,समकालीन अभिव्यक्ति, दोआबा,हरिगंधा आदि में प्रकाशित हो चुकी है। उनका अभी तक कोई कविता संग्रह प्रकाशित नही हुआ है। उनका पहला कविता संग्रह ‘कबीर अब रात में नहीं रोता’ शीघ्र प्रकाशाधीन है । उम्मीद की जानी चाहिए 2020 के शेष छह माहों में ही राज्यवर्द्धन का पहला कविता संग्रह हमारे हाथों में होगा। राज्यवर्द्धन वर्ष 2013 में समकालीन 11 कवियों की कविताओं के संकलन “स्वर-एकादश” (बोधि प्रकाशन) का संपादन कर चुके है ।
राज्यवर्द्धन की कविताओे के बारे में युवा समीक्षक उमाशंकर सिंह परमार कहते है कि राज्यवर्द्धन की कविताएं समय के प्रति पाठक से सतर्कता की मांग करती हैं। युगीन घटनाओं व मूल्यों का गहन विश्लेषण करती इन कविताओं को बगैर निरपेक्ष हुए नहीं पढ़ा जा सकता है।

परमार आगे कहते है कि राज्यवर्द्धन समकालीन कविता में उस पीढ़ी के बेहद ज़रूरी कवि हैं जिसे हम तीसरी पीढ़ी कहते हैं। पहली पीढ़ी में सत्तर-अस्सी के दशक के कवि हैं, तो दूसरी पीढ़ी में नब्बे के दशक के कवि हैं। तीसरी पीढ़ी में वर्ष 2000 से रचनारत पीढ़ी है। राज्यवर्द्धन की कविताओं से मेरा पहला साक्षात्कार उनके द्वारा सम्पादित ‘स्वर एकादश’ से हुआ। यह संग्रह लोकधर्मी कवियों को लेकर वर्ष 2013 में प्रकाशित हुआ था। इसकी साज-सज्जा और कवि-चयन से राज्यवर्द्धन की रचनात्मक पक्षधरता, वैचारिकता व प्रतिबद्धता की जानकारी हो जाती है। इस कवि संचयन के बाद मैंने इस युवा कवि को पढ़ा जिसकी जीवन दृष्टि प्रगतिशील जीवन दृष्टि है। वह अपने आपको किसी एक फॉर्मूले में बांधते नहीं हैं। विषय के सन्दर्भ में पूर्णत: सामयिक हैं। न तो समय के पीछे चलते हैं, न समय से आगे निकलते हैं। समय के साथ चलते हैं। समय की ज़रूरतों और अपेक्षाओं के अनुरूप वह जीवन के पक्ष में अपने विषय और तेवर दोनों बदल लेते हैं। यह लचीलापन ‘फॉर्मूलाबद्ध’ कविताओं के इस दौर में खोजना बेहद कठिन है। उनकी कविताएं लोक की आत्मीयता, सांस्कृतिक संरचनाओं, सामाजिक-आर्थिक अन्तर्विरोधों के सन्दर्भ में एक सचेष्ट नागरिक का पक्षकार बनते हैं और मोहभंग की तमाम प्रवृत्तियां उनकी प्रारम्भिक कविताओं में दिखती हैं।राज्यवर्द्धन की दूसरी विशेषता है कि वह कविता की शक्ल में चित्र प्रस्तुत करते हैं। पाठक जितना इन कविताओं को सुनकर आत्मसात करता है, उतना ही साधारीकरण वह इन कविताओं में अन्तर्ग्रथित बिम्बों की रूपमय आकृति के साकार विन्यास से करता है। यहां कविता हमें न केवल सोचने को बाध्य करती है, वरन् संवेदनाओं के आगोश मे समेटने की भी कोशिश करती है। वह तमाम जटिलताओं से खुद मुठभेड़ करती है और पाठक को संघर्ष में उतरने के लिए आमंत्रित करती है। विशुद्ध बयान के रूप में लिखी गयी ये कविताएं एक सूक्ष्म अन्डरटोन के साथ लयात्मक संगति का आभास देती हैं। उनकी फिर मिलेंगे, एकान्त के गीत कविता में इस प्रगीतात्मक सघनता का प्रतिरोधी शिल्प देखा जा सकता है जिसमें कवि अपने आप पर किसी नैतिक, आध्यात्मिक व स्थापित मान्यताओं का नियन्त्रण स्वीकार नहीं करता। वह अपनी अनुभूति और संवेदना-चालित तर्कों से नितान्त सहज, नैसर्गिक व तात्कालिक अभिव्यक्ति करता है। यही कारण है कि राज्यवर्द्धन अपनी पीढ़ी के सबसे अलग एवं अकेले कवि हैं जो सबसे ज्यादा नैसर्गिक व तात्कालिक यथार्थ से मुठभेड़ करते हैं।

परमार यह भी कहते हैं कि राज्यवर्द्धन की कविताएं समय के प्रति पाठक से सतर्कता की मांग करती हैं। युगीन घटनाओं व मूल्यों का गहन विश्लेषण करती इन कविताओं को बगैर निरपेक्ष हुए नहीं पढ़ा जा सकता है। यहां काव्यभाषा, गति, लय, विशिष्ट भंगिमा एवं उसकी स्थिति का अनुशीलन करने के लिए युग एवं कवि का दायित्वबोध समझने की ज़रूरत महसूस होती है। ये कविताएं पाठक को निरन्तर जागरूक एवं सतर्क रखने की कोशिश करती हैं। यही इनकी रचनात्मकता है। यहां जीवन स्थितियों में बदरंग पक्ष के पीछे कौन-कौन सी शक्तियां सक्रिय हैं उनकी पहचान व उनकी वस्तुस्थिति, वर्गचरित्र तथा उसके ऐतिहासिक विकासक्रम, परिवर्तन-परिवर्धन सबकी गहरी शिनाख्त की गयी है। यह शिनाख्त इतिहासबोध और युगबोध से अपरिचित कवि नहीं कर सकता है। यहां जो भी है वह ऐतिहासिक सम्भावनाओं और तर्कों की परिधि से आबद्ध है। यही कारण है कि राज्यवर्द्धन की कविताएं समय की सटीक आलोचना प्रतिरोध की नैसर्गिक भाषा में करती है ।
यहां प्रस्तुत है कवि राज्यवर्द्धन की सात कविताएं

(1) आठवाँ घोड़ा
~~~~~~~~~~~

सूरज का कोई भी घोड़ा
लोक के पक्ष में नहीं है

सातवाँ घोड़ा भी नहीं

घोड़साल के घोड़े
जुते हैं रथ में
निकाल दी गई है
जिनकी रीढ़ की हड्डियाँ
भूल चुके हैं-
हिनहिनाना
रथ में जुते घोड़े

अपंग सारथी
हाँक रहे हैं-घोड़ों को
मद में
बिना देखे
कि कौन जा रहे हैं-
कुचले
रथ के पहिये तले

अंगूठे के कद के
सहस्त्रों बौने दरबारी
लगे हैं-
सूरज के यशोगान में

देव संत गन्धर्व अप्सरा
यक्ष नाग और राक्षस भी
रत हैं-
चाटुकार्य में
-गन्धर्व गा रहे हैं
-अप्सराएँ नृत्य कर रही हैं
-निशाचर बनकर अनुचर
चलते हैं/ रथ के पीछे -पीछे
-नाग सजाते हैं रथ को
-यक्ष करते हैं रक्षा और
-संतों के हाथ जुड़े हैं स्तुति में

हिम ताप वर्षा
ऋतुओं के कालचक्र पर
नियंत्रण है -सारथी का

सृष्टि के सारे संसाधनों पर कब्जा है-
सूर्य रथ में लगे लोंगों का

वे ही हैं –
“वीर भोग्या वसुंधरा”

सप्ताह के सातों दिन
सातों घोड़ो के नाम है
जो बनकर इंद्रधनुष
लुभाते हैं-
धरती के लोगों को

स्वर्ग का राजमार्ग है-
यह इंद्रधनुष
लेकिन यह राजपथ
नहीं हैं सुलभ
सबों के लिए

वंचित जन
सदियों से भोग रहे हैं
रौरव नरक
पर नहीं करते हैं प्रतिरोध
क्योंकि धर्मशास्त्रों में बतया गया है-
“ये सब तुम्हारे पूर्वजन्मों का फल है ! ”

प्रतीक्षा में हैं-लोग
सैकड़ों वर्षों से
कल्कि अवतार के अवतरित होने की
जो अधर्म का नाश कर
दिलायेगा मुक्ति

षड्यंत्र है यह-
सूर्य रथ में जुटे लोगों का
ऐसा दिन धरती पर
कभी नहीं आयेगा

अवतार की प्रतीक्षा में
तुम भोगते रहोगे-नरक
और वे लूटते रहेंगे
स्वर्ग का आनंद

यदि धरती पर उतारना चाहते हो स्वर्ग
तो बनना होगा तुम्हें-
सूरज का आठवाँ घोडा!

क्योंकि
सूरज का कोई भी घोड़ा
लोक के पक्ष में नही हैं
सातवाँ घोड़ा भी नहीं!
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(2) प्रेमपत्र
~~~~~~~

दुनिया की सबसे उत्कृष्ट रचना है-
प्रेमपत्र !
धरती पर सबसे ज्यादा जीवंत रचना है-
प्रेम पत्र !

जब कोई प्रेम-पत्र रचता है
जब कोई प्रेम-पत्र पढ़ता है
लिखते -पढ़ते वक्त
तन-मन में
अदृश्य
परमाणु महाविस्फोट सा
बहुत कुछ घटित होता है

कान सुर्ख हो जाते हैं
पर्श्व में राग बसंत बजने लगता है
मन पक्षियों की तरह मुक्त हो
धीमी-धीमी उड़ान भरने लगता है

कभी-कभी तो आंखें सजल हो जाती हैं
कबीर का पाणि भींग जाता है

प्रेम पत्र बचा रहेगा
तो प्रेम भी बचा रहेगा
प्रेम बचा रहेगा तो
दुनिया भी बची रहेगी

दुनिया की नज़र से बचाकर
बचा रखे हैं मैंने
प्रेम -पत्र

प्रेम -पत्र दुनिया की सर्वोत्तम धरोहर है
जो चिर युवा बनाये रखता है

क्या आपके पास भी कोई प्रेम पत्र है
—————————————-

(3) वसंत में तुम जब आओगी
~~~~~~~~~~~~~~~~~

एक चेहरा रख आया था
पार्क की बेंच पर
सोचा था-
वसंत में तुम जब आओगी
तो जी भर बतियाएंगे

चिड़ियों से कहेंगे-
संगीत सुनाने को
एवज में उसे
कोदो के कुछ दाने दे देंगे

फूलों से कहेंगें-
खिलने को
ताकि खुशबू की मादकता में
सराबोर हो हम नाच सके
बदले में गोबर के जैविक खाद को
बिखेर देंगे उनकी जड़ों में

सूरज को कहेंगे-
स्फटिक सा चमके
ताकि गुनगुने मौसम का
हम ले सके जी भर आनन्द
बदले में देंगे उसे
अंजुरी भर- भर अरघ

महुआ से कहेंगें-
टपकने को
धरती पर टपके
अमृत फल चखेंगे
बदले में उसे
पीने को देंगे
उनके ही फलों से बने आसव को
ताकि मादकता को
और बिखेर सके

माघ के चाँद से कहेंगें
चांदनी बरसाने को
ताकि तुम्हारे जूड़ेे को
रात रानी के फूलों से सजा सकूँ
बदले में भर देंगें
चाँद के दामन को भी सितारे से

जनता हूँ-
तुम जब वसन्त में आओगी
तो इंद्रधनुष उतर आयेगा धरती पर
तुम्हारी गोद में
मेरा सिर होगा
तब स्वर्ग के लिए
कोई क्यों मरेगा!
—————————–

(4) समानता
~~~~~~~~

जन्म लेने दिया
अपने अंदर
एक स्त्री को
और बन गया सखी
अपनी प्रिया का

करने लगी है अब
वह साझा –
हर्ष विषाद
उपलब्धियाँ कमजोरियाँ
यहाँ तक कि छोटी- छोटी बातें
रसोई से सेज तक की

अपने हाथों से बनाकर
सुबह की चाय
भर देता हूँ उसे ओर खुद भी
प्यार की असमाप्त ऊर्जा से
ओर जुट जाते हैं हम
सुबह – सुबह
घर की कामों में /जल्दी –जल्दी

वह चढ़ा देती है –
चूल्हे पर कड़ाही
मैं ड़ाल देता हूँ
उसमें तेल
वह ड़ाल देती है –
पांचफोरन और मेरे पसंद की सब्जियाँ
मैं ड़ाल देता हूँ –
थोड़ी – सी हल्दी
जीवन को रंगने के लिए
थोड़ा -सा नमक
जीवन में स्वाद घोलने के लिए
और सीझने देता हूँ
सब्जी को
प्यार की मद्धिम आंच

इसी तरह मिलजुलकर
बना लेते हैं हम
दाल,चावल,रोटियाँ

और निकल पड़ते हैं
अपने-अपने कामों पर

उसने भी जन्म लेने दिया है-
एक पुरुष अपने अंदर।
———————-

(5) सिसकियाँ
~~~~~~~~~
सुन रहा हूँ
सिसकियाँ
हजार प्रकाश वर्ष दूर
अतीत की उन गलियों से
जिस पथ
वसन्त में दो कदम
हम संग-संग चले थे

इस प्रदूषित समय में
रात-दिन कोलाहल में
अपने आकाशगंगा के
सैंकड़ों क्षुद्र ग्रहों से
नित्य टकराता हूँ

रोज खुद भी
धीरे -धीरे
रेडियोएक्टिव पदार्थ सा
न्यून होते जा रहा हूँ

ओ प्रिये!
आधी रात को जब भी सुनता हूँ
सिसकियाँ
मैं देव पुरुष होने को
बेचैन हो जाता हूँ।
———————————-

(6) कबीर अब रात में नहीं रोता
~~~~~~~~~~~~~~~~~

रचा जा रहा है
अधूरा सच

फैलाया जा रहा है-
स्वप्निल आकाश में
झुटपुटे शाम के वक्त
सुबह की लालिमा होने का भ्रम
कि सूरज तो बस उगने ही वाला है

छोड़ो अब ..
कौन जाए अलख जगाने

अंधकार में
सुखी हैं सब
मिट गया है
सत्य असत्य
रूप अरूप का भेद

विवेक भी अब जागृत नहीं होता
रहता है
जान बूझकर मौन

कबीर रात में
अब दुखी नहीं होता
दुनिया के बारे में सोचकर

सोता रहता है
रात के अंधकार में
अलसाया
सूरज उगने की प्रतीक्षा में।
——————————

(7) बुद्ध से संवाद
~~~~~~~~~~

तुमने कहा था-
दुनिया में दुःख हैं
दुःख के कारण हैं
और उन दु:खों का निदान भी है

लेकिन
जीवन संघर्षों से जाना कि
हर दुःख का निदान संभव नहीं है

समझाया मन को
जिस दूःख का निदान
अपने वश में नहीं
उसके लिए काहे को दुःखी होना

सच कहूँ
तथागत!
ज्योंहि मन में यह विचार आया
तिरोहित हो गया सारा दुःख
कपूर की तरह त्योंहि

…और मिल गई
दुःखों से मुक्ति
हमेशा हमेशा के लिए
क्योंकि जान गया था-
जीवन का परम सत्य!

तुमने सही कहा था
तथागत
अप्प दीपो भवः
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