फरक्का बैराज आधुनिक भारत का अभिशाप साबित हो रहा है: डॉ योगेंद्र

डॉ योगेन्द्र

फरक्का बराज 1975 में 156 करोड की लागत से बनाया गया। यह बराज भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की वैज्ञानिक भूल का परिणाम है। दामोदर घाटी परियोजना न बनी होती तो आज फरक्का बराज नहीं होता। दामोदर घाटी परियोजना को जवाहर लाल नेहरू ने आधुनिक भारत का मंदिर कहा था जो आधुनिक भारत का अभिशाप साबित हो रहा है। आजादी के बाद जब दामोदर घाटी परियोजना बनकर तैयार हुई तो जनता नहीं जानती थी कि इसके भयानक दुष्परिणाम होंगे।

दामोदर घाटी परियोजना

दामोदर नदी एक वेगवती नदी थी। उसका वेग दो काम सदियों से करता आ रहा था। एक,नदी में आने वाले गाद को बहाकर समुद्र में पहुंचता था। दूसरे, आश्विन और कार्तिक के महीने समुद्र में भाटा कम होता है और ज्वार अधिक होता है , इसकी वजह से नदी के मुहाने पर गाद जमा होता है, दामोदर नदी अपने वेग के माध्यम से उसे बहाकर समुद्र में पहुंचा देता था, लेकिन जब दामोदर और उसकी सहायक नदियों पर नौ छोटे- बडे बांध बांध दिये गये तो नदी की निकासी क्षमता घट गयी। बारिश के दिनों में बाढ जनता को सताने लगी।गाद जगह- जगह ढूह बनकर नदी के प्रवाह को खत्म करने लगा और नदी के मुहाने पर गाद जमा होने लगा। यह गाद कोई सामान्य गाद नहीं था। इसने कई तरह के भौगोलिक व्याकरण बिगाडे।

हुगली बंदरगाह पर खतरा

हुगली बंदरगाह पर खतरा मंडराने लगा।
गाद की वजह से उसकी गहराई घट गयी और जहाज का आना रूक गया। तत्कालीन बंगाल सरकार और कांग्रेसी केंद्र सरकार को चिंता हुई कि हुगली बंदरगाह का क्या होगा? चिंता होने के बावजूद उनके बारे में पुनर्विचार करने की इच्छा नहीं हुई जिसकी वजह से हुगली बंदरगाह पर संकट छा रहा था, बल्कि उसने एक नयी भूल कर दी। उसने निर्णय लिया कि गंगा पर एक बराज बनाया जाय। नेहरू मूलतया दिवा स्वप्न में जीने वाले शख्स थे। भारत की उनके पास जितनी भी पहचान हो, लेकिन उन्हें अगाध भरोसा पश्चिम जगत पर था। नतीजा हुआ कि अपनी पंचवर्षी य योजनाओं में उन्होंने पश्चिमी जगत की विकास दृष्टि अपनायी। दामोदर नदी घाटी परियोजना उसी का कुफल था। अमेरिका की टी वी सी यानी टेनेंसी वैली परियोजना की नकल पर दामोदर घाटी परियोजना का निर्माण हुआ । यहां तक कि टीवीसी के डायरेक्टर ईमार्गन को डी वी सी परियोजना में एक्सपर्ट के तौर पर रखा गया। उस वक्त भी भारत के महान इंजीनियर कपिल भट्टाचार्य ने इस पर चिंता प्रकट की थी। जब फरक्का बराज बनाने की बात चली, तब भी इस इंजीनियर ने विरोध प्रकट किया। कहा कि फरक्का बराज बनने से और कुछ हो या न हो, गंगा जरूरत बाह हो जायेगी। प्रति वर्ष गंगा में भयानक बाढ आयेगी और सैकडों एकड जमीन को काटती- डुबाती चलेगी। सबसे बडी बात कि फरक्का जिन लक्ष्यों के लिए बनाया जा रहा है ,वे लक्ष्य कभी भी पूरे नहीं होंगे।

फरक्का बराज के लक्ष्य

सरकार बहुत तेज होती है। जनता को झांसा देने में उसका कोई जोडा नहीं है। सरकार परेशान थी कि हुगली बंदरगाह गाद की वजह से खत्म हो जायेगा । इस गाद को किसी तरह खत्म करना है , लेकिन सरकार ने कहा कि फरक्का बराज से सिंचाई होगी और बिजली बनेगी। जनता बहुत भोली होती है। वह सरकार के झांसे में आ गयी।कपिल भट्टाचार्य जैसे लोग जानते थे कि सरकार वस्तुत: क्या चाहती है। उन्होंने अपनी पुस्तिका विचिंता में लिखा कि सरकार फरक्का बराज के माध्यम से बंगाल की खाडी में नदियों के मुहाने पर जो गाद जमा हो रहा है, उसे हटाना चाहती है ,लेकिन यह काम संभव ही नहीं है, क्योंकि गंगा के पास उतना पानी ही नहीं है। गाद को हटाने के लिए 40 हजार क्यूसेक पानी चाहिए, लेकिन गंगा को बाढ के समय भी 28 हजार क्यूसेक पानी रहता है। फरक्का बराज अपने घोषित लक्ष्य को तो प्राप्त नहीं ही करेगा, उल्टे गंगा की गहराई घटेगी और उसकी पानी की निकासी क्षमता घट जायेगी। इसकी वजह होगी गाद जो फरक्का बराज के कारण पानी के बहाव के साथ समुद्र में नहीं जा पायेगा। कपिल भट्टाचार्य की बात नहीं सुनी गयी और उन्हें सरकार ने नौकरी से बर्खास्त कर दिया और पाकिस्तान का दलाल घोषित किया। कपिल भट्टाचार्य का जीवन नरक हो गया और उनका दुखद अंत 1980 में हुआ। एक मेधावी और देश भक्त इंजीनियर को सरकार ने एक तरह से मार डाला।

फरक्का बराज के दुष्परिणाम

फरक्का बराज के कारण गंगा अकल्पनीय दुख की शिकार हो गयी। गंगा का यह दुख गंगा के किनारे बसने वाले लोगों के घरों को सताने लगा है। हर वर्ष मुर्शिदाबाद से इलाहाबाद तक की आबादी बाढ की पीडा झेलती है। हजारों एकड उपजाऊ जमीन गंगा के पेट में समा रही है। फरक्का बराज ने जिस गाद को रोक रखा है, उसकी वजह गंगा की गहराई घट गयी है। गंगा की पानी निकासी क्षमता बेहद घट गयी है। भागलपुर के बाद गंगा को ध्यान से देखें तो उसकी धारा की गति मंथर हो गयी है। वैसे ऐसा भी नहीं है कि फरक्का बराज बनने के पूर्व गंगा में बाढ नहीं आती थी। बाढ आती थी, लेकिन जल्द ही खत्म हो जाती थी। महीनों तक जल जमाव नहीं रहता था। अब तो हालत यह है कि इस गाद के कारण कहलगांव को छोडकर सभी शहरों से गंगा दूर चली गयी है। भागलपुर के सिर्फ एक इलाके बरारी में गंगा सटती थी, अब वहां से भी वह दूर हट गयी है। ड्रोजर मशीन के सहारे किसी तरह से गाद हटाकर गंगा को बरारी तक खींचकर लाया जा रहा है। 3 फरवरी 2017 को भागलपुर शहर को पानी पिलानेवाली कंपनी पै न इंडिया ने मांग की है कि उसे तीन एकड जमीन उपलब्ध करवाया जाय जिसमें गंगा की गाद को रखा जायेगा, क्योंकि गाद की वजह से गंगा से पानी निकालने में मुश्किल हो रही है। यह मांग कितना बेवकूफाना है। गाद तो ऊपर से बहाव के साथ आ रही है। अगर गंगा से कुछ दूरी तक गाद हटा भी ली जाय तो क्या यह संभव है कि वहां कभी गाद न आये ? यह सब देखकर तो यह महसूस होता है कि आने वाले दिनों में शहरों में जल पिलाना भी मुश्किल होगा और जल संकट सचमुच एक बडा संकट होगा।

फरक्का बराज का तल

फरक्का बराज का तल कंक्रीट का बना है। इसी तल पर फरक्का का फाटक टिकता है। पहले इस तल में समुद्र से आनेवाली मछलियों के लिए फिश लैडर दिया गया था, लेकिन वे सब फिश लैडर गाद से भर गये और मछलियों का आना-जाना रूक गया। दरअस ल मछलियों की हरेक प्रजाति का एक स्वभाव होता है। मसलन हिलसा प्रजाति की मछलियां। इस मछली का स्वभाव है कि वह सामान्य तौर से खारे जल में रहती है ,लेकिन प्रजनन काल में उसे मीठा जल चाहिए। हिलसा प्रजनन काल में खारे जल से निकलकर इलाहाबाद तक के मीठे जल में अंडे देते जाती थी, मगर फरक्का बराज के इस कंक्रीट तल और गाद की वजह से हिलसा का प्रजनन बाधित हुआ। नतीजा हुआ कि गंगा की प्यारी मछली खत्म हो गयी । झींगा का भी यही हाल है। तीसरी बात यह हुई कि गंगा में तीन सौ तरह के शैवाल हैं। ये शैवाल मछलियों के भोजन के काम में आते हैं।शैवाल गंगा के वेड पर रहता था।अब उस पर गाद जमने की वजह से धीरे-धीरे वह समाप्त हो रहा है। यानी गंगा का फुड चेन टूट रहा है। गंगा के जलजीवों प र इसका भयानक असर पड रहा है।जो बचे शैवाल हैं ,वे प्रदूषण के कारण हरित शैवाल में तब्दील हो रहे हैं जो जल – जीवों के भोजन के काम में नहीं आते और जहरी ले हो जाते हैं।

सत्ता की अवैज्ञानिक समझ और उसका अहंकार

भारत की सत्ता लोगों के द्वारा चुनी जाती है। चुनाव के बाद यह सत्ता स्वयं भू हो जाती है। सत्ता में बैठे लोग खुद को सभी ज्ञानों से ऊपर समझते हैं। वे बिना सर्वागींण मूल्याकंन किये विकास की रूप रेखा बनाते हैं। विकास की इस रूप रेखा में कई तरह के निहित स्वार्थ सक्रिय रहते हैं। उन स्वार्थों को पूरा करने के क्रम में तथाकथित विकास विनाश में तब्दील हो जाता है। आजादी के बाद दामोदर घाटी परियोजना बना, लेकिन हमने परियोजना बनाते समय दामोदर नदी और उसके सहायकन दियों के स्वभाव का अध्ययन नहीं किया।न ही उसका भौगोलिक अध्ययन किया , न उसका सामाजिक- सांस्कृतिक अध्ययन। हम प्रकृति की उपज हैं और जब प्रकृति के साथ छेड छाड कर ते हैं तो इसका असर मनुष्य सहित तमाम जीवों पर पडता है। हम मनुष्य को केंद्र में रखकर विकास की कल्पना करते हैं। जीवों ,पेडों आदि का ख्याल रखना नहीं चाहते। मनुष्य के मन में नियंता होने का भाव है। प्रकृति ने अगर मनुष्य को विशेष गुण सौंपा है तो उस पर विशेष जिम्मेवारी भी है। लेकिन वह सिर्फ भोग में मशगूल है और प्रकृति रक्षा की महान जिम्मेवारी से अपने को मुक्त कर लिया है। दामोदर घाटी परियोजना बनाने के कुछ वर्षों बाद ही उसे पता चल गया था कि एक वैज्ञानिक भूल हो चुकी है ,लेकिन वह इसे कैसे स्वीकारता? इससे उसकी हेठी नहीं होती? भूल स्वीकार करने में उसका अहंकार आडे आता था। इसलिए उसने दूसरी भूल करना स्वीकार किया, लेकिन अपनी भूल स्वीकार कर दामोदर घाटी परियोजना पर पुन र्विचार नहीं किया।


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