गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो (1963): पहली भोजपुरी फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो भोजपुरी भाषा में बनी पहली फिल्म है. इस फिल्म को 22 फरबरी 1963 को पटना के वीणा सिनेमा में रिलीज़ किया गया. इससे पहले फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग राजेंद्र प्रसाद के लिए पटना के सदाकत आश्रम में रखी गयी. फिल्म का मुहूर्त शॉट पटना के शहीद स्मारक पर लिया गया था. इसके बाद फिल्म का अधिकांश हिस्सा मनेर और बनारस में फिल्माया गया. फिल्म बनने के पीछे कहानी ये है कि नज़ीर हुसैन जब राजेंद्र प्रसाद से एक समारोह में अचानक से मिले तो राजेंद्र प्रसाद ने नज़ीर हुसैन से कहा, आप भोजपुरी में फिल्म क्यों नहीं बनाते, तब नज़ीर हुसैन ने अपनी तैयार स्क्रिप्ट, जो वे पहले विमल रॉय के पास लेकर गए थे, जिनके साथ उन्होंने देवदास फिल्म में काम किया था, बिश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी को दिखाई. बिश्वनाथ प्रसाद आरा के बिजनेसमैन थे और उनकी धनबाद और गिरिडीह में सिनेमा हॉल भी थे, बिश्वनाथ प्रसाद फिल्म के स्क्रिप्ट से बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने फिल्म को डेढ़ लाख रूपये का फाइनेंस कर दिया. हालाँकि बाद में फिल्म का बजट बढ़कर पांच लाख रूपये हो गया. फिर फिल्म के निर्देशन के लिए बनारस के कुंदन कुमार को शामिल किया गया. कुंदन कुमार 1960 में गीता बाली और अभी भट्टाचार्य को लेकर बड़े घर की बहु फिल्म बना चुके थे.
फिल्म में असीम कुमार, कुमकुम, रामायण तिवारी, नज़ीर हुसैन, लीला मिश्रा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. फिल्म में कुमकुम की सहेली के तौर पर छोटी सी भूमिका कुमारी पद्मा ने भी निभायी, जिन्होंने आगे चलकर पद्मा खन्ना के नाम से सुजीत कुमार और राकेश पांडेय जैसे शीर्ष अभिनेताओं के साथ कई भोजपुरी फिल्मों में लीड भूमिका निभाई.

फिल्म की कहानी:

बेचन सिंह ( रामायण तिवारी) गांव का रसूख वाला इंसान है. बाबू साहब है. ( भोजपुर में बाबू साहब राजपूतों को कहा जाता है). बटाई पर जमीन दिया करता है, पर जब से सरकार ने कानून बनाया है कि जो जमीन को जोतेगा, जमीन उसी की होगी, तो वो बटाईदारों बेदखल करने में लग गया है. वो गांव में लोगों को सूद पर पैसा दिया करता है और एन केन प्रकारेण किसानों की जमीन हड़पने में लगा रहता है. उसका बेटा श्याम ( असीम कुमार) शहर से एम ए करके आया है. बेचन सिंह की इच्छा है कि बेटा दरोगा बने, ताकि गांव में उसकी धाक जमे. पर बेटा खेती करना चाहता है. हरियाणा, पंजाब में हरित क्रांति खेती की तस्वीर बदल रही है, नए जमाने का श्याम भी नए तरीके से खेती करना चाहता है. यह बात उसके पिता को नागवार गुजरती है. श्याम गांव आकर सुमित्रा ( कुमकुम) से मिलता है. दोनों बचपन के साथी हैं. श्याम के पिता उसकी शादी 15,000 रूपये दहेज़ लेकर कहीं और करना करना चाहते हैं. सुमित्रा के पिता लखन सिंह ( नज़ीर हुसैन) गरीब हैं, हालाँकि बेचन सिंह के स्वजातीय हैं. पर बेचन सिंह को ये रिश्ता मंजूर नहीं. गांव में सुमित्रा और श्याम के रिश्ते को लेकर सुमित्रा के चरित्र पर कीचड़ उछाला जाता है. हर तरफ से हारकर लखन सिंह अपनी बेटी सुमित्रा का विवाह एक उम्रदराज धनी व्यक्ति से कर देते हैं. पर सुमित्रा विधवा बन जाती है. पति के देहांत के बाद उसे ससुराल से भी निकलना पड़ता है. गंगा में आत्महत्या के इरादे से वो कूद जाती है, पर उसे बचा लिया जाता है. वो अपने आप को बनारस में कोठे पर पाती है. विषम परिस्थितियों में घिरी सुमित्रा ने नाचना शुरू कर दिया है. काफी भागदौड़ के बाद उसकी भेंट अनायास श्याम और अपने पिता से होती है. श्याम अपने पिता के तानों से परेशां होकर शहर चला आया है. और सुमित्रा के पिता भी अपनी ख़राब माली हालत लिए शहर आ गए हैं. उधर बेचन सिंह अपने बेटे को ढूंढते ढूंढते बनारस आ जाते हैं. परिस्थितियां इन सबका मिलन करवाती है. श्याम और सुमित्रा का मिलन होता है. और इस तरह फिल्म का सुखद अंत होता है.

आजकल की भोजपुरी फिल्मों के विपरीत गंगा मैय्या तोहे पियरी चढ़इबो के बेहद साफ़ सुथरी, पारिवारिक और भाव प्रधान फिल्म है.

फिल्म ने रिलीज़ होने के बाद हर तरफ व्यावसायिक सफलता के झंडे गाड़ दिए. इस फ‍िल्‍म का क्रेज इतना था क‍ि टिकट के लिए थिएटर के बाहर बैलगाड़‍ियों की लंबी लाइनें लगती थीं और लोग परिवार के साथ फ‍िल्‍म देखने आते थे. यही नहीं, जिसे पहले द‍िन टिकट नहीं मिलती थी, वो थिएटर के बाहर ही रात बिताकर अगले द‍िन वापस लौटता था.

फिल्म की चर्चा इसके मधुर गीत संगीत की चर्चा के बिना अधूरी रहेगी.

फिल्म की चर्चा इसके मधुर गीत संगीत की चर्चा के बिना अधूरी रहेगी. आज भी इस फिल्म के गीत सुने जा सकते हैं. फिल्म में गीत शैलेन्द्र ने लिखा, जबकि संगीत चित्रगुप्त ने दिया था. चित्रगुप्त बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में एक स्थापित संगीतकार थे और आगे चलकर उन्होंने कई भोजपुरी फिल्मों में उच्च कोटि का संगीत दिया.
फिल्म का टाइटल सांग, हे गंगा मैय्या तोहे पियरी चढ़इबो लता मंगेशकर और उषा मंगेशकर ने गाया, जो बेहद मक़बूल हुआ. घर घर में ये गीत सुना गया. मोहम्मद रफ़ी का गाया सैड सांग, सोनवा के पिंजड़ा में बंद भइल राम चिड़ई के जियवा उदास” बेहद सुन्दर बन पड़ा. लता मंगेशकर की आवाज में “काहे बंसुरिया बजाये” गाना बहुत मधुर है. इसके अन्य गाने भी बेहद कर्णप्रिय हैं. इस फिल्म के संगीत ने जो सफलता हासिल की, वो फिर किसी और भोजपुरी फिल्म में नहीं दोहराई जा सकी.

कलकत्ता के आनंद बाज़ार पत्रिका भवन में 27 अप्रैल 1965 को आयोजित पहले भोजपुरी फिल्म अवार्ड में इस फिल्म ने कई अवार्ड बटोरे. मसलन, बेस्ट फिल्म, बेस्ट एक्ट्रेस ( कुमकुम), बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर ( नज़ीर हुसैन), बेस्ट लिरिक्स (शैलेन्द्र), बेस्ट स्टोरी ( नज़ीर हुसैन) और बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवार्ड ( मुहम्मद रफ़ी- सोनवा के पिंजड़ा में)


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