भारत की आध्यात्मिक विरासत की झलक हरमन हेस का उपन्यास “सिद्धार्थ”

Naveen Sharma

कई लोग दुनिया को पूरब और पश्चिम में बांट कर देखते हैं यह विभाजन कुछ हद तक सही भी है। खासकर औद्योगिक और आर्थिक विकास के मामले में यह फर्क लंबे समय तक नजर भी आया था। अब धीरे- धीरे ये फर्क तो कम होता जा रहा है, लेकिन एक महत्वपूर्ण फर्क जो ईस्ट और वेस्ट में है वो है अध्यात्मिकता का है, धर्म का है, मानव की आंतरिक खोज का है। इस दिशा में पूरब या सीधे कहें तो एशिया महाद्वीप के निवासियों का अवदान अतुलनीय है। कुछ बेमिसाल शख़्सियतों के नाम आपको ध्यान दिलाता हूं।
पहले भारत से ही शुरू करें तो शिव और उनकी अनुपम देन 108 ध्यान विधियां, कृष्ण और उनकी गीता। वेद और उपनिषद, महावीर सहित जैन धर्म के तीर्थंकर, गौतमबुद्ध, अष्टावक्र, पतंजलि, सांख्य सहित अन्य दर्शन और रामानंद, नानक, कबीर, मीरा व तुकाराम जैसे भक्ति संतों की लंबी श्रृंखला । इसी तरह यरूशलम के ईसा और मक्का के पैगंबर मोहम्मद तथा झेन गुरु। इस तरह देखा जाए तो दुनिया के सभी बड़े धर्मों का उद्गम एशिया से ही हुआ है। इसलिए इस महादेश में आध्यात्मिकता व धर्मों की अनमोल विरासत विकसित हुई है।
वहीं पश्चिमी की दौड़ आर्थिक विकास , राजनीतिक क्रांतियों, वैज्ञानिक खोजों, पुनर्जागरण के दौरान कलाओं के विकास व साम्राज्यवादी विस्तार की तरफ अधिक रही है। इस वजह से पश्चिम के बुद्धिजीवी आध्यात्मिक खोज की दिशा में यात्रा के लिए पूरब का रूख करते हैं। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक हरमन हेस का प्रसिद्ध उपन्यास सिद्धार्थ भी इसी की एक कड़ी है जो गौतमबुद्ध के समय को आधार बनाकर लिखा गया है।

Herman Hess

सिद्धार्थ ब्राह्मण युवक है उसका मित्र है गोविंद। सिद्धार्थ अपने पिता से अनुमति लेकर श्रमण या कहें सन्यासी हो जाता है। ये दोनों दोस्त कुछ वर्षों तक श्रमणों के साथ रहने के बाद गौतमबुद्ध से मिलने श्रावस्ती जाते हैं। गोविंद बुद्ध का प्रवचन सुन कर अभिभूत होकर तुरंत उनका अनुयायी बन जाता है लेकिन सिद्धार्थ को अनुयायी होना नहीं जंचता। वो खुद जीवन का रहस्य या कहें मोक्ष या निर्वाण को खुद खोजना और महसूस करना चाहता है जैसे गौतमबुद्ध ने स्वयं खोजा था।
सिद्धार्थ गौतम से कहता है महाबोधि कल मुझे आपके अद्भुत उपदेश को सुनने का आनंद प्राप्त हुआ लेकिन मैं नए सिरे से अपनी तीर्थ यात्रा शुरू कर रहा हूं। जैसी तुम्हारी इच्छा तथागत ने विनम्र भाव से कहा। तथागत बोले मान्यताओं का कोई अर्थ नहीं होता वह सुंदर हो सकती हैं या कुरूप बुद्धिमता से भरी या मूर्खतापूर्ण कोई भी हो उसे अपनाया ठुकरा सकता है लेकिन जो उपदेश तुमने सुने हैं वह मेरा मत नहीं है और उसका उद्देश्य यह नहीं है कि संसार की व्याख्या उन लोगों के लिए की जाए जो ज्ञान के प्यासे हैं उसका उद्देश्य काफी अलग है। उसका लक्ष्य दुखों से मुक्ति है जिसकी शिक्षा गौतम देता है और कुछ नहीं।
सिद्धार्थ कहता है महाबोधि मेरा विचार है कि कोई उपदेशों से मुक्ति या मोक्ष नहीं पाता। आप किसी को भी शब्दों और उपदेशों के माध्यम से यह नहीं बता सकते जो बौद्ध की घड़ी में आपके साथ घटित हुआ। प्रबुद्ध गौतम के उपदेश बहुत कुछ सिखाते हैं समुचित जीवन कैसे जिए, बुराई से कैसे बचें लेकिन एक बात है जो इस स्पष्ट मूल्यवान शिक्षा में शामिल नहीं है उसमें यह रहस्य भी नहीं है जो प्रबुद्ध गौतम ने स्वयं अनुभव किया। सैकड़ों हजारों में से केवल उन्हीं ने।
जब मैंने आपके प्रवचन सुने तो मैंने सोचा और अनुभव किया यही कारण है कि मैं अपनी राह पर जा रहा हूं किसी दूसरे और बेहतर सिद्धांत को खोजने के लिए नहीं क्योंकि मैं जानता हूं कोई है ही नहीं बल्कि सभी सिद्धांतों और सभी गुरुओं को छोड़कर अपने लक्ष्य तक अकेले पहुंचने या बढ़ने के लिए।
तथागत ने धीरे-धीरे कहा तुम अपने लक्ष्य तक पहुंचो यही कामना है, लेकिन यह बताओ मुझे क्या तुमने भिक्षू के मेरे समुदाय को देखा है। सिद्धार्थ बोला, महाबोधि अगर मैं आप के अनुयायियों में से होता तो मुझे डर है कि ऐसा सिर्फ सतह पर होता मैं खुद को धोखा देता कि मैं शांति से हूं और मैंने मोक्ष प्राप्त कर लिया जबकि वास्तव में मेरा सब लगातार जीता रहता और बढ़ता रहता क्योंकि वह आपकी शिक्षा में और आपके लिए और संघ के लिए मेरी निष्ठा और प्रेम में ढल गया होता। तथागत बोले तुम्हें चतुराई से बातें करना आता है लेकिन मित्र बहुत अधिक चतुराई से सावधान रहना।
वहां से सिद्धार्थ कई वर्षों तक एक नाविक के पास रहता है उसके शिष्य के रूप काफी कुछ सीखता है। वह नाविक नदी को किसी सजीव गुरु की तरह मानकर उससे कई बातें सीखता है। धीरे-धीरे सिद्धार्थ भी नदी को जानने समझने लगता है।
फिर सिद्धार्थ सांसारिक जीवन का अनुभव लेने के लिए एक नगर में जाता है और एक गणिका कमला से मित्रता कर काफी कुछ सीखता है। कमला उसे एक व्यापारी के पास भेजती है। वह व्यापारी के साथ कई वर्षों तक साझेदार की तरह व्यापार करता है। इस दौरान शुरू में वह व्यापार और अन्य क्रियाकलापों को एकदम निर्विकार भाव से करता है। लेकिन धीरे-धीरे वह भी इसमें इनवाल्व होकर व्यापारी की तरह ही बन जाता है। उसके पास काफी पैसा आ जाता व सुविधाओं का इंतजाम हो जाता है लेकिन वह वैसे ही गुस्सा होना, परेशान होने लगता है और लोगों से व्यवहार भी बदल जाता है। फिर एक दिन अचानक सब छोड़ छाड़ कर फिर से नाविक बन जाता है।
सिद्धार्थ को कमला से एक बेटा होता है जिसे कमला इत्तेफाक से अपने मरने के समय सिद्धार्थ के पास छोड़ जाती है। अब सिद्धार्थ के ठहरे हुए जीवन में फिर से खलबली मच जाती है। बेटे को पिता का रहन-सहन नहीं नहीं जंचता है तो वो वहां से भाग जाता है। पुत्र मोह में सिद्धार्थ उसे ढूंढ़ने निकलता है और आखिरकार उसे अपनी मां के घर लौटा हुआ देख वापस चला आता है।
वहीं कई वर्षों बाद मुलाकात होने पर सिद्धार्थ अपने मित्र गोविंद से एक पत्थर उठाकर कहता है यह अभी पत्थर और काल की इसी अवधि में यह शायद मिट्टी हो जाएगा और मिट्टी से यह पौधा पशु या मनुष्य बन जाएगा पहले मैंने यह कहा होता कि यह पत्थर सिर्फ एक पत्थर है उसका कोई मूल्य नहीं है यह माया के संसार से जुड़ा है लेकिन शायद परिवर्तन के चक्कर में जो कि यह मनुष्य और आत्मा भी बन सकता है इसलिए इसका भी महत्व है। मैंने ऐसा ही सोचा होता लेकिन अब मैं सोचता हूं यह पत्थर पत्थर है यह पशु ईश्वर और बुद्धि भी है। मैं इसलिए इसकी कदर नहीं करता क्योंकि यह एक चीज था और कुछ और चीज बन जाएगा बल्कि इसलिए कि यह अरसा पहले से हर चीज रहा है और हमेशा हर चीज है। मैं इसे पसंद करता हूं क्योंकि आज और अभी यह मुझे पत्थर लगता है।
सिद्धार्थ #sidharth कहता है मैं विचारों को भी बहुत महत्व नहीं देता मैं चीजों को ज्यादा महत्व देता हूं मिसाल के लिए इस घाट पर एक आदमी था जो मेरा पूर्वर्ती और गुरु था उसका ध्यान गया कि नदी का स्वर उससे बातें करता था वह उससे सीखता उसने उसे शिक्षित किया और सिखाया नदी उसे ईश्वर जैसी लगती थी। बहुत वर्षों तक उसे यह नहीं पता था कि हवा का झोंका हर बादल, हर पक्षी हरभरा उतना ही दैवी है और जानता है और पवन यदि किसी कुशलता से सिखा सकते हैं लेकिन जब यह पुण्य आत्मा वनों की ओर चला गया उसे सब कुछ मालूम था उसे तुमसे और मुझसे ज्यादा मालूम था बिना गुरु के बिना ग्रंथों के केवल इसलिए कि वह आदमी नदी में विश्वास करता था।
सिद्धार्थ ने कहा दुनिया में प्रेम ही सबसे महत्वपूर्ण होता है। हो सकता है महान विचारकों के लिए दुनिया को परखना उसकी व्याख्या और तिरस्कार करना ही महत्वपूर्ण है लेकिन मेरे ख्याल से दुनिया को प्रेम करना ही महत्वपूर्ण है। उसका तिरस्कार करना नहीं हमारे लिए एक दूसरे से नफरत करना नहीं बल्कि दुनिया के प्रति और खुद के प्रति और सभी जीवो के प्रति प्रेम सराहना और आदर का भाव रखने योग्य होना।
गोविंद ने कहा लेकिन यही है जिसे तथागत ने माया कहा था उन्होंने भलाई सहनशीलता व धीरज का उपदेश दिया था लेकिन प्रेम का नहीं उन्होंने निश्चित किया था कि हम अलौकिक प्रेम से खुद को ना बांधे।
इस तरह से हम देखें तो सिद्धार्थ के माध्यम से हरमन हेस ने भारत की आध्यात्मिक उपलब्धियों या कहें सिद्धांतों का सार पेश करने की अच्छी कोशिश की है। इसमें पुनर्जन्म, प्रकृति के महत्व व उसके रहस्य व किसी का अनुगामी बनने के बजाय खुद के प्रयास से निर्वाण या जीवन के रहस्यों को जानने की कोशिश की महत्ता बताई गई हैं।
किताब की खासियतों में इसका कथानक सहज और सरल होना सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। अध्यात्म जैसे गंभीर विषय पर जिस पर मोटी – मोटी किताबें लिखी जाती हैं उसको एक रोचक और काफी हद तक विश्वसनीय लगने वाली कहानी के रूप में पेश करना भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। पश्चिमी देशों के लिए इस तरह के विषय में किसी महत्वपूर्ण लेखक द्वारा लिखे गए उपन्यासों में सिद्धार्थ शायद अपनी तरह का अनूठा उपन्यास है। एक और बात किताब की साइज और सीधे-सादे ढंग से कहानी कहने के शिल्प ने पाब्लो काइलो के उपन्यास अलकेमिस्ट की याद दिला दी। आपके पास समय हो और आप किताब को पढ़ते हुए उसके साथ बहने के लिए तैयार हों जैसे एक कुशल तैराक नदी के बहाव में खुद को बहने देता है तो आप इसका आनंद ले सकते हैं।
मैंने किताब के बड़े अंश जानबूझकर दिए हैं ताकि जो किताब ना भी पढ़े तो उसकी खास बातों को उसी रूप में जाने जैसा लेखक ने लिखा है। खैर हिंदी में तो लगता है किताब दो छलनी से छन कर आई होगी पहले जर्मन से अंग्रेजी फिर हिंदी में। नीलाभ को अच्छी किताब का बढ़िया अनुवाद के लिए धन्यवाद।
हरमन के माता-पिता ने जर्मन के बेथल मिशन के लिए भारत में काम किया था। 2 जुलाई 1877 को जर्मनी में जन्मे हरमन का पहला काव्य संग्रह 1896 में प्रकाशित हुआ था। इनके अन्य उपन्यासों में स्टैप्नवुल्फ और द ग्लास बीड गेम शामिल हैं। इनकी किताबों का अंग्रेजी में अनुवाद होने के बाद पूरी दुनिया में ये काफी लोकप्रिय हुईं और इन्हें 1946 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया।


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