वायरस हमला, निर्वात एवं अन्य कवितायेँ … कवियित्री विनीता परमार की कलम से

Vineeta Parmar

1.वायरस हमला
_____

मौसम के मिजाज जैसे
उपेक्षित खबरों के बीच
कुछ सेकेंड कम पड़ चुकी
पृथ्वी की चाल ने बढा दी
चंद्रमा और धरती की निकटता
जो आनेवाले
ज्वार – भाटे का पूर्वानुमान है ।

एवरेस्ट की तरह लोगों ने
अपनी एडियां ऊंची कर ली है
पागलखाने कम पड़ने लगे हैं ।

समय का पहिया अपनी
एक घूर्णन पूर्ण कर
दूसरे में प्रवेश करने ही वाला है
कवकों और जीवाणुओं के
हमले वायरसों के सामने
मंद पड़ चुके हैं ।

पश्चिम और पूरब के
हस्तांतरण समझौते के साथ
कम पड़ चुकी सफ़ेद रक्त कोशिकाओं को
संभालने की तेज कवायद
खत्म हो चुकी
प्रतिरोधक क्षमता में
रोज़ एक नई बीमारी के भय के बीच
बस हम खोज ले थोड़ी सी अपनी धरती
चुपचाप काट ले
आनेवाले वक्त को ।

2.। निर्वात ।।
जहां तुम थे
वहां है अब एक
भग्नावशेष ,
जो निर्वात की
नींव पर ठहरी थी ।
जहां बना मकान
बिन भूकंप ,बिन बाढ
जाने कब ढह गया
ये पता ही ना चला
फिर भी उन
अवशेषों पर आज भी
गुरुत्व बल महसूसती हूं ।

3.। गुणसूत्र ।।

सम का संतुलन, विषम के उद्वेलन
गणित के कमजोर विद्यार्थी
की पसंदीदा होती हैं
सम संख्याएं
आसान होता जोड़ना या घटाना
सबसे सरल होता
सम से सम का भाग लगाना ।

ये सृष्टि पटी हुई है
कमजोर छात्रों से जो
हमेशा
शून्य का हिसाब लगाती ।

गुणसूत्रों की समता दोष में
कहां बच पाती तुम शेष
नहीं बचना तुम्हारी नियति नहीं
तुम्हारा गुणधर्म है ।

4। नाभिक ।।

लहरें उठती हैं
गिरती हैं
छूती हैं किनारे को
लहरों की
अनवरत तपस्या
और केंद्र की चुप्पी ।

हताश ,पागल,बहका मन
भाग रहा किनारे – किनारे
नाभि से अलग – थलग हो
ढूढता फिरता पतवार को !

‘इलेक्ट्रान’ भी कहता है
प्रतिक्रिया तो बाहर का खेल है
नाभिक तो सिर्फ तमाशा देखता है ।

केन्द्रक टूटता है ,
तब विध्वंस होता है या निर्माण ।

5। रंग ।।
इस तिलस्मी संसार के
हर कण में नशा
ईथर के नशे में
डूबी प्रकाश की तरंगे
बंट जाती है
सात रंगो में
सात दिनो में
संगीत के सात सुरों में
और हमारी आंखे जीती हैं
बैंगनी ,नीले
आसमानी ,हरे
पीले , नारंगी और लाल
के भ्रम में ।

जो दिखता लाल या हरा
उस लाल या हरे
को सोख नहीं पाती
हमारी आंखे
जब हम देख रहे होते
रोशनदान से आते
एक कतरे को
तो सोचते हैं
देख रही हमारी आंखे ।

रोशनी में अदृश्य प्रकाश की तरंगे
अदृश्य दर्पण
बस हमारे दिमाग का
ट्रिक काला दृश्य ।

काला कोई रंग नहीं
बस सफ़ेद रंग ही रंगीन है ।

हां! कभी – कभी
ये लाल भी दिखता है
जिसकी आवृति
कम तरंगे उंची
जैसे मेरे मन की तरंगे
लाल की मरीचिका
में उलझी रहती है ।

6। निर्दय नियति ।।
____
खाली होने की शर्तों में
शामिल होता है भर जाना
कभी चटपटे अचार की बरनी
खाली होते ही भर जाती है
अदृश्य हवा के गुबार से ।

बार – बार धोने से नहीं
निकल पाती सरसों तेल की झांस
गंध में मिली होती है
कोल्हू के बैल के घंटियों की आवाज़
जो सिर्फ और सिर्फ
घूमना जानती हैं
उन्हें ,नहीं पता कोई परिणाम ।

इर्द – गिर्द खाली होते ही
भर जाती हैं बेहया और
गाजर घास की झाड़ियां
जो फिर – फिर उगती हैं
जैसे काली से होती सफ़ेद दाढ़ियां ।

भागना चाहती है
सफ़ेद बालों
नर्म से सख़्त होते नाखूनों से
निर्दय कुदरत की इच्छा मान
अवश शोर से भयभीत
अंदर ही अंदर मौन है ।

– विनीता


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