लागे नहीं छूटे राम (1963): सुपरहिट भोजपुरी फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

1963 में गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो फिल्म से भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री की शुरुआत हुई. गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो फिल्म को अपने सुमधुर गीत संगीत, साफ़ सुथरी पटकथा, अच्छे अभिनय, सामाजिक सन्देश के चलते अपार सफलता मिली. इस फिल्म के बाद, इसी साल एक और भोजपुरी फिल्म आयी, जिसने फिर से सफलता का इतिहास रचा. फिल्म “लागी नहीं छूटे राम” के निर्माता आर डी तिवारी थे और निर्देशक कुंदन कुमार थे. कुंदन कुमार ” गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो” फिल्म के भी निर्देशक थे. फिल्म में एक बार फिर से पुराने स्टारकास्ट को दोहराया गया. लीड रोल में असीम कुमार और कुमकुम थे, जबकि महत्वपूर्ण चरित्र भूमिकाओं में नज़ीर हुसैन, रामायण तिवारी, लीला मिश्रा, अनवर हुसैन आदि थे. असीम कुमार बंगाली अभिनेता थे, उन्हें भोजपुरी फिल्मों का दिलीप कुमार भी कहा जाता था. आगे चलकर असीम कुमार ने कुछ हिंदी फिल्मों जैसे लव कुश ( 1967), पैसा या प्यार (1969), ललन फ़क़ीर ( 1987) आदि में भूमिकाएं की और असिस्टेंट डायरेक्टर भी रहे. वहीँ कुमकुम बिहार के शेखपुरा ज़िले के हुसैनाबाद की छोटी सी रियासत के नबाब की बेटी थीं और उनका नाम ज़ैबुन्निसा था. उन्होंने लगभग 115 फिल्मों में काम किया और हिंदी फिल्मों में खासकर किशोर कुमार के साथ कई फिल्मों में उनकी हिट जोड़ी रही. उन्होंने फिल्मों में 1954 से 1973 तक काम किया। फिर सज्जाद अकबर खान से विवाह के बाद फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी.

फिल्म की कहानी:
फिल्म की कहानी विश्वनाथ पांडेय ने लिखी. जबकि स्क्रीनप्ले और डायलाग नज़ीर हुसैन ने लिखा. फिल्म के गीत मज़रूह सुल्तानपुरी ने लिखे और संगीत चित्रगुप्त ने दिया.

ट्रेन बिहटा स्टेशन पर आकर रूकती है. और उससे चंदा नामक एक नौटकी वाली और उसका चाचा उतरते हैं. उन्हें नज़दीक के मेले में जाना है. जहाँ उन्हें सूरज नामक एक मस्तमौला बांका जवान अपने तांगे में ले जाता है. नौटंकी में चंदा का नाच देखने और उससे बात करने के लिए सूरज आया करता है. दोनों के बीच नज़दीकी बढ़ने लगती है. पर चंदा पर जमींदार साहब का भी दिल आ गया है. वे उसे हासिल करने को मचल उठते हैं. रूपये पैसे के लालच में उसका चचा भी उसे ज़मींदार साहब के पास भेजने के लिए तैयार हो जाता है. पर चंदा तैयार नहीं. ऐसे में जमींदार के लठैत चंदा को रात में उसके घर से जबरदस्ती उठा ले जाते हैं. ऐन मौके पर सूरज उसे बचाता है. सूरज उसे अपने खलिहान में शरण देता है. वो राखी बंधवाने के लिए घर पर आता है. इस बीच उसके पिता, जो गांव में पंडित हैं, अच्छे खासे खाते पीते परिवार के हैं और जो लोगों को सूद पर पैसे भी देते हैं, को सारी बात पता चलती है. वे अपने नौकर सुक्खी उर्फ़ सुक्खीराम ( नज़ीर हुसैन) को खलिहान से चंदा को भगाने के लिए भेजते हैं. खलिहान पर कहा सुनी के दौरान बात खुलती है कि चंदा कोई और नहीं, बल्कि मेले में 12 साल पहले बिछड़ गयी बेटी रूपा है. सुक्खी रूपा को अपने घर ले आता है. पंडित जी को जब पता चलता है कि आग अब घर के द्वारे तक पहुँच गयी है, तो वो सुक्खी को बेटी के साथ गांव छोड़कर चले जाने का आदेश देते हैं. रूपा उर्फ़ चंदा अपने पिता को कष्ट में नहीं देख सकती, इसलिए एक रात वो चुपके से ट्रेन पकड़ कर बनारस निकल जाती है. बनारस में वो भरण पोषण के लिए एक नौटंकी कम्पनी में काम करने लगती है. उसकी तलाश में पीछे पीछे सूरज भी बनारस चला आता है. बनारस में सूरज चंदा से मिलता है. पर चंदा के थिएटर के साथी उसे मारपीट कर भगा देते हैं. जब चंदा से सूरज के साथ रिश्ते की हक़ीक़त उन्हें पता चलती है, तो वे मिलकर सूरज की तलाश में निकलते हैं. रास्ते में चंदा के मोटर के नीचे पंडित जी आ जाते हैं, जो बनारस अपने बेटे की तलाश में आये थे. अस्पताल में उनकी काफी सेवा करती है चंदा. जब पंडित जी आँखों पर से पट्टी हटवा कर अस्पताल से फारिग होकर चंदा से मिलने उसके घर जाते हैं, तो उसे देखकर आग बबूला हो जाते हैं. चंदा का मुंहबोला भाई पंडित जी को दुत्कारता है कि जब तक आँखों पर पट्टी बंधी थी, तब तक ये देवी लगती थी, आँखों से पट्टी उतर गयी तो ये ख़राब नज़र आने लगी. वाह !

चंदा को बनारस में अपने पिता सुक्खी के बीमार होने की खबर मिलती है. वो तुरंत गांव आ जाती है. सूरज भी गांव लौट आता है. और अपने प्रेम का इज़हार करता है. चंदा से ना सुनकर वो जहर खाकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है. उसकी जान बच जाती है, पंडितजी को एहसास हो जाता है कि उसके बेटे की ज़िन्दगी रूपा के साथ ही कटे तो दोनों को सुख मिलेगा. वे इस प्रेम सम्बन्ध को स्वीकार कर लेते हैं.

इस तरह फिल्म का सुखद अंत होता है और अंतर्जातीय विवाह का सन्देश देती है,जो तत्कालीन भोजपुरी समाज के लिए एक बड़ा सन्देश है.

फिल्म की चर्चा इसके गीत संगीत के चर्चा के बिना अधूरी है:

फिल्म में मज़रूह सुल्तानपुरी और चित्रगुप्त की जुगलबंदी ने यादगार संगीत दिया. हर गीत अपने आप में मुकम्मल है. तलत महमूद और लता मंगेशकर की आवाज में फिल्म का टाइटल सांग ” जा जा रे सुगना जा रे” प्रेमी युगल के विरह के दर्द को बखूबी उभारता है. एक रोमांटिक नंबर है दोनों की आवाज में ” लाल लाल होठवा से चुए रसवा” बेहद खूबसूरत रोमांटिक गीत है. वहीँ सुमन कल्याणपुर की आवाज में ” सखी सहेली के पिया बनवारी हो, हमरा के बलमा गवार” बेहद खूबसूरत गीत है. आज भी ये गीत अपनी मिठास के लिए याद किये जाते हैं.

फिल्म को एक बार जरूर देखा जाना चाहिए. फिल्म में बनारस, बिहटा आदि को देखकर मन एक अजीब से सुकून से भर जाता है.


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