यात्रा वृत्तांत: चलो पहाड़ों में/ उत्तराखंड का कुमाऊंक्षेत्र – अल्मोड़ा, जागेश्वर धाम

भारती पाठक

अल्मोड़ा की पहली बार की यात्रा की वजह बने उदय किरौला जी, जिनसे मेरी मुलाकात लखनऊ में एक लेखन कार्यशाला में सन 2001 या 2002 में हुई थी । अपने हंसमुख स्वभाव और सरलता के कारण वे हम सभी के बीच खासे लोकप्रिय थे । उन दिनों वे हाथ से लिखी ज्ञान विज्ञान बुलेटिन निकालते थे जो बच्चों का रुझान विज्ञान की ओर बढाने का उनका व्यक्तिगत प्रयास था।  गर्मी की छुट्टियों में हर साल वे बच्चों की लेखन कार्यशाला आयोजित करते थे.  2008 की गर्मी की छुट्टियों में सपरिवार घूमने और उस कार्यशाला में भाग लेने का भी प्रोग्राम बनाया।

लखनऊ से काठगोदाम तक थी बाघ एक्सप्रेस । इस ट्रेन से यात्रा करने वाले जरूर जानते होंगे इसके समय को लेकर यात्रियों को जो असुविधा होती है । इसका समय रात 12. 45 है यानि अगर आपका टिकट 6 तारीख का है तो ट्रेन आपको 5 की रात में ही पकडनी होगी ।

खैर सुबह जब हम काठगोदाम पहुंचे तो अल्मोड़ा के लिए कोई बस नहीं दिखी । पता चला कि बस स्टेशन वास्तव में हल्द्वानी में ही है जहाँ से अल्मोड़ा के लिए बसें आसानी से मिल जाती हैं । हालाँकि बसें इसी रास्ते से गुजरती हैं लेकिन तब बैठने की मनमाफिक जगह मिलने की कोई गारंटी नहीं होती । काठगोदाम से हल्द्वानी कुल 4-5 किलोमीटर है जहाँ के लिए सवारियां मिलती रहती हैं तो हमने भी ऑटो किया और हल्द्वानी पहुंचे जहाँ बस भी मिली और उसमें आरामदायक जगह के साथ ही शुरू हुई हमारी पहाड़ी यात्रा ।

काठगोदाम से अल्मोड़ा करीब 92 किलोमीटर की दूरी पर है । ये करीब 4 घंटे की यात्रा थी जिसमें हरे-भरे पेड़ों से ढके ऊंचे पहाड़ और गहरी खाइयां, साथ ही बलखाती सड़कें मन मोह रही थीं । बस सभी स्टॉप पर रुकती पूरे 5 घंटे में अल्मोड़ा पहुंची । गर्मियों में पहाड़ी पर्यटक स्थलों पर काफी भीड़ रहती है तो भी सौभाग्य से एक अच्छे होटल में कमरा मिल गया । दोपहर हो चली थी, नहा-धोकर सफ़र की थकन से कुछ फ्रेश होकर मैंने किरौला जी को फ़ोन किया और होटल का पता भी दिया ।

थोड़ी ही देर में वे हमसे मिलने आ गए और शिकायत करने लगे कि होटल में क्यों रुके जबकि उनका घर पास ही है । मैंने उन्हें बताया कि चूंकि हमारे साथ एक परिवार और है तथा असुविधा से बचने के लिए ऐसा किया तब वे मुश्किल से राजी हुए इस शर्त पर कि अगले दिन हम उनके घर ही भोजन करेंगे । शाम को हम उन्ही के साथ नंदा देवी मंदिर गए ।

कुमांऊ मंडल ही नहीं पूरे गढ़वाल और हिमालय के अन्य भागों में भी नन्दा देवी जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं जिनके मंदिर कई स्थानों पर हैं । नंदादेवी को नवदुर्गाओं में से एक बताया जाता है और इनके सम्मान में कई स्थानों पर बड़े मेलों का आयोजन भी किया जाता है । अल्मोड़ा नगर के मध्य में स्थित ऐतिहासिक नन्दादेवी मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्रमास की शुक्लपक्ष की अष्टमी को लगने वाले मेले की रौनक ही कुछ अलग होती है ।

मंदिर का परिसर बड़ा था बीचोँ-बीच में मंदिर और कुछ घने पेड़ उसकी अलौकिकता को और बढ़ा रहे थे । देवी की मूर्ति शिव मंदिर के देवालय में स्थित है । लोग वहां घंटियाँ चढाते हैं और मेरी बेटी ने एक घंटी उठा ली वहां से, लाख कहने पर भी देने से इनकार कर दिया । पुजारी जी ने हंसते हुए कहा कि ये तो स्वयं देवी हैं लेने दीजिये इन्हें जब बड़ी होकर कुछ बन जाएँ तो लाकर वापस कर दीजियेगा । तो देवी का आशीर्वाद मान कर घंटी ले आये हम, जो घर में अब भी है । उम्मीद है शायद इसी बहाने फिर वहां जाना हो । शाम होने लगी थी तो हम बाज़ार को देखते हुए पैदल ही होटल के लिए निकले ।

रास्ते में अल्मोड़ा के बाजार की चहल-पहल देखते हुए अल्मोड़ा के बारे में तमाम जानकारियां और इस शहर के महत्व की गाथाएं मन में घूम गईं । यहां का बाजार शायद पहाड़ों में सबसे समृद्ध , बड़ा और रंगारंग बाजार है जिसमें सबके काम की सब चीजें मिलती हैं । कुमाउनी के अधिकांश लोकगीत और प्रेमगीत अल्मोड़ा बाजार को लेकर ही हैं जिन्हें तमाम टैक्सियों और बसों में सुना जा सकता है ।

अल्मोड़ा कुमाऊं क्षेत्र का मुख्य शहर ही नहीं उसकी सांस्कृतिक राजधानी भी है । इसका वर्णन महाभारत तक में मिलता है । जहां नैनीताल शिमला जैसे हिल स्टेशन अंग्रेजों ने बसाए वहीं अल्मोड़ा काफी पहले से आबाद और मशहूर था । स्वामी विवेकानंद यहां तीन बार आए, रवींद्रनाथ टैगोर भी पास के रामगढ़ में घर लेने से पहले यहां कुछ दिन रहे । भारत के गृहमंत्री और उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोबिंद वल्लभ पंत भी यहीं से थे । पं. उदयशंकर ने अपना नृत्य विद्यालय 1930 में अल्मोड़ा में ही स्थापित किया था जिससे पं. रवि शंकर, अलाउद्दीन खान, अली अकबर खान, अन्नपूर्णा देवी, गुरु दत्त, जोहरा सहगल जैसे ख्यातनामा लोग संबंधित रहे ।

हिंदी के लेखकों में से शिवानी, मनोहर श्याम जोशी, गीतकार गायक प्रसून जोशी, सितारवादक मोहन उप्रेती भी अल्मोड़ा से ही हैं ।

अगले दिन सुबह ही किरौला जी हमें लेने आ गए तो पैदल ही हम उनके घर चल पड़े जो उनके अनुसार बहुत करीब था, जबकि ऊँची नीची सड़कों और ऊपर चढ़ती गलियों में हमें रास्ता लम्बा लग रहा था । जिस घर में वे रहते थे वहां अपने स्कूल के दिनों में सुमित्रानंदन पन्त जी भी रहा करते थे, ये बात बताते हुए उनके चहरे की चमक देखे ही बनती थी । सच है पन्त जी जैसे महान कवि उस घर में कुछ समय रहे थे और मैं वहां खड़ी थी ये सोचकर ही मुझे इतनी ख़ुशी हो रही थी तो जो वहां रह रहा उसका आनंदित होना स्वाभाविक था ।

उनके परिवार की आत्मीयता मन को छू गई, सभी बहुत सहजता से मिले । वही से भोजन के बाद एक कार रिज़र्व कर हम जागेश्वर धाम देखने निकले । हालांकि सवारी भी मिल जाती है लेकिन अगर आप समूह में हैं तो ये ज्यादा सुविधाजनक होता है कि गाड़ी रिज़र्व करके जाएँ जिससे देर सवेर होने पर कोई समस्या न हो ।

जागेश्वर धाम अल्मोड़ा से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ राजमार्ग पर स्थित है, जहां नंदिनी और सुरभि नदियों का मिलन होता है । यह शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों में 8 वां ज्योतिर्लिंग है । बताते हैं कि स्वयं शिव जी ने यहाँ तप किया था जिसके बाद सप्त्ऋषि यहाँ आये । जागेश्वर पहुँचने में हमें करीब दो घंटे लगे ।

देवदार यानि देवताओं के वृक्ष और बांझ से घिरे इस मंदिर स्थल को देखकर कोई मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता । करीब 2100 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला मंदिर परिसर देवदार के घने पेड़ों से घिरा है जो इसके वातावरण को शीतलता देते हैं । मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर सामने दिखता है छोटे बड़े कुल 125 मंदिरों का समूह । जिसमें 108 मंदिर शिवजी के, बाकी अन्य देवी देवताओं के हैं । पूरे जागेश्वर में कुल 250 के लगभग मन्दिर हैं जिसमें 125 यहीं है । मंदिर का निर्माण आठवीं शताब्दी में गुप्त, कत्युरी और चन्द्र वंश के राजाओं ने कराया था । कई लोग इनके निर्माण में आदि शंकराचार्य का हाथ बताते हैं ।

बहुत सारी कहानियां भी इनके पीछे प्रचलित हैं । लोगों का मानना है कि मैदानों से, खासकर गुजरात और राजस्थान से यहां शैव शाखा के लोग आकर बस गए । इसके लिए वे गुजराती और कुमाउंनी में बहुत सी समानताओं के उदाहरण देते हैं ।

सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि जागेश्वर मंदिरों के समूह जैसे समूह भारत में और कई जगह पर भी मिलते हैं । उदाहरण के लिए उड़ीसा के भुवनेश्वर के पास लिंगराज मंदिर समूह या मध्य प्रदेश में चंबल में बटेश्वर मंदिर समूह इनसे बिल्कुल मिलते हैं । उड़ीसा के सूर्य मंदिर की शैली भी इनसे मिलती-जुलती है ।

जागेश्वर के मंदिरों में जिन मंदिरों को राज्य की तरफ से संरक्षित घोषित किया गया है उनमें महामृत्युंजय, दंडेश्वर, जागेश्वर, कुबेर, नंदादेवी या नौदुर्गा, नवग्रह, सूर्य मंदिर आदि प्रमुख हैं । यहाँ का मुख्य मंदिर महामृत्यंजय मंदिर है जिसकी शिवलिंग पर त्रिनेत्र बने हुए हैं और इसकी पूजा अर्धनारीश्वर के रूप में होती है । मंदिर परिसर में ही देवदार का एक वृक्ष है जिसका तना जड़ से एक और ऊपर जाकर दो भागों में बंट जाता है और प्रतीत होता जैसे दो पेड़ हों । लोग इसे भी अर्धनारीश्वर का स्वरुप मानते हैं और इस पर श्रद्धा रखते हैं । मंदिर के मुख्य द्वार पर नंदी और भृंगी की प्रतिमाएं हैं जिन्होंने दक्ष प्रजापति के हवन को भंग किया था क्योंकि उसमें भगवान् शिव को नहीं बुलाया गया था ।

एक अन्य मुख्य मंदिर पुष्टिदेवी (पार्वती जी) का है जिनकी महिषासुर मर्दिनी के रूप में पूजा होती है । यह एक जाग्रत मंदिर है इसी कारण इसे जागेश्वर धाम कहते हैं । वर्ष के ३६४ दिन यहाँ तीनों पहर पूजा अर्चना होती है, बस शिवरात्रि के दिन चार पहर । मंदिर के शांत वातावरण में हम कुछ देर रुके, फिर बाहर आये तो पास ही संग्रहालय भी था उसे देखने गए जिसमें अन्य मंदिरों की मूर्तियों तथा पुरानी संग्रहणीय चीजों को संभाल कर रखा गया है ।

कुछेक बड़े मंदिरों को छोड़कर बाकी मंदिर शायद पूजा के लिए नहीं हैं क्योंकि उनमें पुजारी तक के बैठने का स्थान नहीं है । वे केवल समूह में प्रतीकात्मक महत्व के हैं ।

कस्बे में सावन के महीने में (जुलाई-अगस्त) को जागेश्वर श्रावण उत्सव मनाया जाता है तथा शिवरात्रि के दिन भी मेला जुटता है । हिमालय के अन्य स्थानों पर भी जागेश्वर नाम से अनेक मंदिर हैं जिससे यह साफ होता है कि यह मंदिरों की शैली या प्रकार हैं ।

वहां से लौटते हुए हमें शाम हो गयी थी तो होटल आकर आराम किया । अगले दिन किरौला जी के साथ ही कौसानी जाने का कार्यक्रम पहले ही बन चुका था और किसी नयी जगह पर स्थानीय परिचित होने पर हमें कोई विशेष चिंता भी नहीं थी कि कैसे अगली यात्रा पर जाना, तो हम निश्चिंतता से सो गए ।

 


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