रेणु, रामविलास शर्मा और शिवमूर्ति !

प्रियंकर पालीवाल

हिंदी के लेखकों में शिवमूर्ति अनन्य हैं. वे अलग और अनन्य इसलिए भी हैं क्योंकि मेरे जानते वे उन विरल लेखकों में हैं जिनके जीवन में दलित चेतना वाले लेखकों में सामान्यतः पायी जाने वाली आत्मदया और कड़वाहट नहीं प्रदर्शित होती है. कारण इसके जो भी हों.

शिवमूर्ति

पर रेणु पर केंद्रित वक्तव्य में रामविलास शर्मा पर शिवमूर्ति की टिप्पणी अर्धसत्य और सुनी सुनाई सूचनाओं पर आधारित एक अपुष्ट और अतिरेकी टिप्पणी है. वे अगर अपने को संस्मरण तक ही सीमित रखते तो बेहतर होता. रामविलास शर्मा अगर ‘सुपारी किलर’ होते तो कोई भी उनसे अच्छे भुगतान पर साहित्यिक हत्याएं करवा लेता . पर ऐसा था नहीं. रामविलास शर्मा के निर्णयों पर संदेह का अधिकार हमें है पर उनकी नीयत पर नहीं. वैसे ही जैसे एक आलोचक के रूप में श्री शिवमूर्ति के अध्यवसाय पर संदेह का अधिकार मुझे है, पर उनके शानदार कथा-साहित्य और उनकी बुनियादी भलमनसाहत पर संदेह का अधिकार नहीं है.

मुक्तिबोध और रेणु के साहित्य की रामविलास जी की आलोचना निस्संदेह अपर्याप्त और संदिग्ध है. ‘नई कविता और अस्तित्ववाद’ सम्भवत: उनका सबसे कमजोर आलोचनात्मक उपक्रम है. पर उनकी आलोचना निजी राग-द्वेष पर ही आधारित हो ऐसा नहीं था. पार्टी और प्रगतिशीलता के प्रभाव या दबाव में भले हो .

रामविलास जी ने काम की उन्मुक्तता आदि पराये विचारों के चर्वित-चर्वण और चस्पाकरण को लेकर यशपाल के ‘साड़ी-जम्फरवाद’ की कठोर आलोचना ज़रूर की पर यशपाल को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलने में रामविलास जी की संस्तुति शामिल थी. यह तथ्य और संदर्भ भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.

रांगेय राघव की आलोचना का आधार बना उनका पुनरुत्थानवादी तमिल आयंगर ब्राह्मण गौरव और द्रविड़ रक्त गौरव जो उनके परिवार के 300 साल उत्तर भारत के ग्रामीण इलाके में रहने के बावजूद उनमें स्पंदित होता था . वैसे यह स्पंदन अगर आज के दलितवादी देखते तो क्या प्रतिक्रिया देते ?

तब भी रांगेय राघव के साहित्य के बारे में रामविलास जी की आलोचना अपनी सीमा के बाहर चली गई थी. रांगेय राघव का साहित्यिक योगदान निस्संदेह उनके इन विश्वासों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है. पर राजेंद्र यादव के संदिग्ध-संकेतों को पूर्ण-सच बनाकर जो चेले-चपाटे रांगेय राघव की मृत्यु का उत्तरदायी रामविलास जी को ठहराते हैं उनके लिए रांगेय राघव का मृत्यु-प्रमाणपत्र पर्याप्त होगा. रांगेय राघव की मृत्यु कैंसर की असाध्य बीमारी से हुई थी. और साहित्यिक आलोचना से किसी को कैंसर हो जाने का लक्षण-वर्णन किसी मेडिकल जर्नल में नहीं मिलता.

अब इस मूल प्रश्न पर विचार करना उचित होगा कि मैला आंचल जैसे श्रेष्ठ उपन्यास की रामविलास जी द्वारा आलोचना के क्या कारण रहे होंगे ? रामविलास जी किन आधारों या आशंकाओं के तहत मैला आंचल की, बल्कि ज्यादा सही यह कहना होगा कि आंचलिक उपन्यास-परम्परा की, आलोचना करते हैं ?

दरअसल पश्चिम में ‘रीजनल नॉवेल’, जिसे हिंदी में आंचलिक उपन्यास कहा गया, प्रकृतवाद से प्रभावित था जो उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यूरोप में एक प्रभावी विचारधारा थी. प्रकृतवाद नग्न-यथार्थ की पक्षधरता का डार्विनवादी आधार पर खड़ा दृष्टिकोण था जो अपने ऊपर कोई नैतिक दबाव स्वीकार नहीं करता था. इस अतियथार्थवादी से दिखाई देते प्रकृतवादी साहित्य में एक किस्म का नियतिवादी समर्पण और निराशावाद का प्रगतिविरोधी कुहासा छाया हुआ था. कहीं-कहीं तो यह आदमी को लगभग पशु-स्तर पर उतार दे रहा था. चूंकि रीजनल नॉवेल प्रकृतवाद और रूमान के संयोग से रचा जा रहा ऐसा साहित्य था जो ‘एब्सोल्यूट डिटर्मिनिज़्म’ क़ो मूल्य के रूप में स्थापित करता था, यही प्रगतिवादियों के विरोध का मुख्य कारण था.

फ्रांसीसी उपन्यासकार एमिल ज़ोला साहित्य में इस प्रकृतवाद के पुरस्कर्ता थे. उनके उपन्यास L’ssommoir (1877), Nana (1880), और Germinal (1885) इस नई प्रयोगवादी विधा के अंतर्गत आने वाले उपन्यास थे. बल्कि 1880 में प्रकृतवादी उपन्यासों को वैचारिक आधार और औचित्य प्रदान करते हुए एमिल ज़ोला एक निबंध ‘द एक्सपेरीमेंटल नॉवेल’ भी लिख चुके थे. अमेरिका में फ्रैंक नोरिस McTeague (1899) और The Octopus (1901) जैसे उपन्यास लिख चुके थे . वहां यह विधा थियोडोर ड्राइज़र जैसे उपन्यासकारों में अपने उत्कर्ष पर पहुंची.

अंग्रेज़ी और अमेरिकी साहित्य के अध्येता रामविलास जी रीजनल नॉवेल की इस परम्परा से न केवल भली भांति परिचित थे बल्कि ब्लैक लिटरेचर पर (रिचर्ड राइट, राल्फ एलिसन और जेम्स बाल्डविन जैसे उपन्यासकारों पर) और रेणु जैसे ही खरे और चर्चित अमेरिकी आंचलिक उपन्यासकार (रीजनल नॉविलिस्ट) जॉन स्टाइनबैक (1902 – 1968) पर अपने छात्रों से शोध करवा रहे थे. स्टाइनबैक को 1962 में नोबेल पुरस्कार मिल ही चुका था.

 

सो यह कहने भर से काम नहीं चलेगा कि इस नई विधा के बारे में “ऊ जानते ही नहीं थे” या “उनके पास टूलै नहीं थे”. सच यह है कि हिंदी साहित्य के अपने समकालीनों में वे इस विधा के बारे में शायद सबसे ज्यादा जानते थे . इसीलिए इसके खतरों से वाकिफ थे . (इस खतरे के लक्षण कहीं-कहीं रेणु के रिपोर्ताजों में बाढ़ की भीषण भयावहता के बीच गुदगुदाने वाले ‘लिरिकल वर्णन’ (?) में और रेणु के साहित्य में स्त्रियों के प्रति पुरुषों के लम्पट दृष्टिकोण में, खासकर बंगाली स्त्रियों के प्रति बिहारी पुरुष की लोभी और लम्पट दृष्टि में और बंगाली स्त्रियों को ‘ईज़ी वर्च्यू वाली’ स्त्री समझने वाले दृष्टिकोण में देखे जा सकते हैं.)

इधर प्रयोगवादी कवि अज्ञेय और पूर्व प्रगतिशील उपन्यासकार निर्मल वर्मा ने शायद अपनी रेणु-प्रशंसा के अतिरेक से हिंदी आलोचना के प्रगतिवादी खेमे को ‘अनसेटल’ कर दिया था जिसका फल रेणु की अनअपेक्षित और अनुचित आलोचना के रूप में दिखाई देता है. और यह असर रामविलास जी और नामवर जी से लेकर विश्वनाथ त्रिपाठी तक सभी प्रगतिशील आलोचकों की आलोचना में दिखाई देता है. अलबत्ता नामवर जी ने इस अरुचि या आलोचना को वाचिक तक ही सीमित रखा. लिखने की जहमत नहीं उठाई.

जॉन स्टाइनबैक की ही तरह रेणु में कहीं-कहीं प्रकृतवादी लक्षणों के बावजूद प्रकृतवाद का पूरमपूर प्रभाव नहीं दिखाई देता. नग्न-यथार्थ और नियतिवाद और अस्तित्व-रक्षा के लिए संघर्ष के वर्णन के बावजूद नैतिक दृष्टि की वह निरपेक्षता या नैतिकता का अभाव और निराशा का वैसा स्वर जो प्रकृतवाद का मुख्य लक्षण है, रेणु में कहीं दिखाई नहीं देता .

बल्कि अपने चुने हुए इलाके के आम आदमी के दु:ख-सुख और परिवेश का एक नव-स्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण के बुनियादी सपने से गुंथा वह लिरिकल वर्णन, गरीबी और ज़हालत के कीटाणुओं से ग्रस्त देश का वह अभावग्रस्त व मलिन लेकिन संभावनाशील इलाका अपने समस्त अंतर्विरोधों के साथ हमें खदबदाता दिखाई पड़ता है. बोली-बानी-रूप-रस-गंध से महमह करता जीवंत किंतु हमारे भ्रष्ट आचरण से मैला आंचल हम सबके सामने मूर्तिमान हो जाता है . अलबत्ता उम्मीद की एक किरण के साथ !

इसमें कोई दोराय नहीं कि ‘मैला आंचल हिंदी’ कथा-साहित्य की उपलब्धि है और विश्व के सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में गिने जाने योग्य है . रामविलास जी कुछ भी कहें इस उपन्यास को प्रेमचंद की परम्परा के उत्कर्ष के रूप में ही देखा जाना चाहिए . रामविलास जी बड़े आलोचक हैं पर मुक्तिबोध और रेणु को समझने में उनसे हुई गलती से हिंदी का पाठक परिचित है . हिंदी का औसत पाठक इन लेखकों के सम्बंध में रामविलास जी की राय को उचित ‘इनडिफरेंस’ या ‘कंटेम्प्ट’ के साथ देखता है और कोई असर नहीं लेता.

 

 

पता नहीं वे कैसे आलोचक होंगे जो रामविलास जी की आलोचना पढ़ने के बाद सालों तक रेणु को पढ़ने का साहस नहीं जुटा पाए. मेरे जैसे सामान्य पाठक ने रेणु को सबसे पहले 16-17 की किशोर उम्र में राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे में अपने स्कूली सिलेबस में शामिल लघु उपन्यास ‘जुलूस’ के माध्यम से जाना और समझा था और उसके बाद रेणु के मेरे इस एप्रीशिएशन के बीच अवरोध बनने की हैसियत हिंदी के किसी आलोचक की नहीं रही. यही रेणु की ताकत है और यही एक उपन्यासकार के रूप में सामान्य पाठकों के बीच उनका महत्व !


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