मुबाहिसा खिलाफत ओ मुलूकियत और तस्वीर का दूसरा रुख

Mohammad Imran Bhati

इन दिनों सोशल मीडिया पर मौलाना मोदुदी की किताब खिलाफत ओ मलुकियत की हिमायत और मुखालफ्त में एक बहस चल रही है, इस बहस को देखने का एक तनाज्जुर और भी है और वो ये है कि इस वक़्त दुनिया में जो निजाम रायज है उस के लिए असल खतरा उस जगह से है जिस का जिक्र रैंड कॉर्पोरेशन (Rand Corporation) कॉर्पोरेशन की रिपोर्ट में किया गया था, उस रिपोर्ट में मुसलमानों को चार कैटेगरीज(Categories) में तक्सीम किया गया था, इन चार किस्म के मुसलमानों में से उन्होंने अपने लिए असल खतरा बुनियाद परस्तो(Fundamentalist) को करार दिया था इस के साथ उन्होंने एक और बड़े खतरे का भी जिक्र किया था कि अगर रिवायत पसंद (Traditionalists) बुनियाद परस्तो के साथ मिल गए तो ये हमारे लिए सब से बड़े खतरे की बात होगी , ये रिपोर्ट आज से करीबन बीस साल पहले की है, उस दौर में मशहूर बेन उल अक्वामी सहाफी फरीद जकारिया ने कहा था कि बीसवीं सदी के वूस्ता में आलम ए इस्लाम की जिन अहयाई तहरीको की तूती बोलती थी वो अब दम तोड़ चुकी है, इस एतबार से देखा जाए तो बुनियाद परस्ती का जो बड़ा खतरा था उसे टाला जा चुका था

अलबत्ता जो बात उस रिपोर्ट में नहीं कही गई थी लेकिन कमाल होशियारी से उस पर अमल किया गया था वो ये थी कि बुनियाद परस्ती को रिवायत के साथ तब्दील कर दिया जाए, चुनांचे हम देखते है कि यही काम ईरान और अफगानिस्तान में किया गया, दोनों जगहों पर रिवायत पसंदो की हकूमते मगरिबी सरमाया दाराना निजाम के लिए न सिर्फ कोई खतरा न बन सके बल्कि वहा की आवाम उन हुकूमतों के शिद्दत पसंदाना इकदामात से इस्लाम के हवाले से मजीद अंदेशों का शिकार हो कर इस्लामोफोबिया में मुब्तिला हो गए, इस से कब्ल मगरिब(west) अल साउद और अल शेख के जरिए एक तजुर्बा पहले ही कर चुका था, माजी करीब में शाम व इराक में ऐसे शिद्दत पसंद अनासिर की जद्दोजहद ने जो सुरत ए हाल पैदा की थी वो भी आम आदमी को इस्लाम से खोफजदा करने के हवाले से इस से कुछ ज्यादा मुख्तलिफ नहीं थे!

इस्लामी अहयाई तहरीको के गैर मुत्तालिक हो जाने या कर दिए जाने को जहन में रखते हुए देखे कि अब पीछे महज चंद शख्सियात ही रह गई है जिन की फ़िक्र और नजरियात में आलमी सरमाया दार अपने निजाम जद के लिए खतरा देखते है, वो चाहे मौलाना माउदुदी की शख्सियात हो या डॉक्टर इसरार अहमद रह० की, ये वो बुनियाद परस्त (जो इस्लाम के निजाम ए अदल ए इज्तमाई की बात करते है) शख्सियात है जिन की फिक्र इस क़दर मुअ’तासिर कुन है कि किसी भी वक़्त लोग इसे अपना सकते है , इस ऐतबार से आलमी इस्तेमाद को जरूरत इस अम्र की पड़ी की इन शख्सियात को मुत्नाजे बनाया जाए, ये जरूरत डॉक्टर इसरार अहमद रह० के हवाले से तंजीम ए इस्लामी के अमीर और उनकी मरकजी तरबियाती कमेटी ने बतरिक एहसान पूरी की है, और डॉक्टर इसरार अहमद को खुद उन की अपनी तंजीम में रूफका के सामने मुत्नाजे बना दिया गया है दूसरी शख्सियात मौलाना मोदुदी की है, उन को अब मुत्नाजे बनाया जा रहा है गोया कि उन की पूरी फिक्र को उन की एक किताब “खिलाफत ओ मुलुकीयत” में लपेट कर रख दिया गया है, इस बहस में दोनों एतराफ से जो अंदाज अख्तियार हो रहा है उस से नफरतें बढ़ने का शद्दीद अंदेशा है, इस जिमन में असल सोचने की बात ये है कि हमारे रिवायत पसंद तबके( जिस का ताल्लुक़ मदारिस से है) में भी बहुत से लोग ऐसे है जो सोचने समझने और गौर ओ फिक्र करने वाले है, बल्कि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के दोबारा इक्तेदार में आने की सूरत में मगरिब(western world) के लिए अगर कोई हकिकी खतरे का कोई इम्कान है तो वो सिर्फ इसी सूरत में हो सकेगा जब वो असर ए हाजिर के तकाजो के मुताबिक़ इस्लाम का मॉडल पेश कर सके, बाकी सऊदी अरब या ईरानी मॉडल से दुनिया को कोई डर नहीं है! हकीकत ये है कि अब वो वक़्त आ गया था जबकि मौलाना मोदुदी को गुजरे भी एक अरसा हो चुका था और अगर एक तरफ बाहमी रंजिश कुछ कुछ कम पड़ रही थी तो दूसरी तरफ वक़्त की जरूरत मजबूर भी कर रही थी कि इनकी फिक्र से इस्तेफादा किया जाए, यही वजह है कि रिवायत पसंद तबके में उन की सोच के ऐतबार से उन के लिए कुछ नरमी पैदा होना शुरू हो चुकी थी, जो लोग मौलाना मोदूदी की एक अर्से से मुखालिफत करते आए थे उन के दिल में भी कुछ नरमी पैदा हुई थी, अगरचे ऐसे लोग बहुत ज्यादा तादाद में नहीं है लेकिन बहरहाल रिवायती मजहबी तबके में माजी के मुकाबले में कुछ लोगो में ये मुस्सबत तब्दीली देखने को मिली है !

इस तनाज्जुर में देखे तो अब जो ये बहस उठायी गई है और जिन लोगो की तरफ से उठाई गई है इस के नतीजे में दूरियां बढ़ेगी, इस जिम्न में ज्यादा एहतियात उन लोगो को करनी पड़ेगी जो मौलाना मोदुदी के हमदर्द है और उन के भी खवाह है और उन की फिक्र से इत्तेफाक रखते है आप मौलाना माउदुदी रह ० का दिफा जरूर करे लेकिन अपने अल्फ़ाज़ और अंदाज में दाईयाना आहंग जरूर रखें !

۔रही बात हज़रत अमीर मुआव्विया रजी० अन्हू के दिफा की तो उन कि दिफा में वो लोग भी है जो दिल व जान से उन का दिफा कर रहे है और बाज ऐसे लोग भी है जिन्हें असल में मौलाना मौदुदी के फिक्र से कुड्ड है वो अपने उस कुड्ड का इजहार मौलाना मोदुदी पर हज़रत अमीर मुआव्विया रजी० अन्हू के हवाले से तनकीद का दिफा कर के कर रहे है इनमें खास तौर पर वो लोग शामिल है जो खरूज के जबरदस्त मुखालिफ है और इस खारजीयत और तकफीरीयत से ताबीर करते है उन लोगो को इस बहस में अपनी खार निकालने का खूब मौका मिल रहा है ये लोग पहले भी मौलाना मोदुदी और डॉक्टर इसरार अहमद की मुखालिफत करते रहे है और अब इस मौके पर वो लोग मुलुकियत को स्पोर्ट् करने मैदान में निकल आए है और इस मामले में वो तारीख को मस्ख करने और तोड़ मरोड़ कर पेश करने में भी कोई बाक महसूस नहीं करते वो डॉक्टर इसरार अहमद रह ० की तरफ भी बहुत सी झूठी बातें मंसूब करते रहे है मिसाल के तौर पर डॉक्टर इसरार साहब के बारे ये झूठ बोल जाते है कि इन्होंने मस्लाह ए इरतिका Evolution theory
पर अपने मौकफ से रूजू कर लिया था और इसी तरह कुछ नीम पुख्ता दानिशवर ये दावे भी करते नजर आते है कि अगर इन्हे डॉक्टर इसरार साहब से किसी तवील नशीस्त का मौका मयस्सर आता तो वो उन से अपने वहदत उल वजूद वाले मौकफ से भी रूजू करवा लेते, मजीद ये की इन लोगो ने डॉक्टर साहब के नाम पर वहदत उल वजूद की बिल्कुल अपनी ही कोई नई तशरीह भी कर डाली जिस का डॉक्टर इसरार साहब के नुक्ता ए नजर से कोई ताल्लुक ही नहीं था, इस तरह ये लोग मौलाना मोदुदी की भी पुराने दुश्मन है जिन्हें इस बहस में अपने दिल के फफोले फोड़ने का मौका मिल रहा है, ये जिस मकतब ए फिक्र की नुमाइंदगी कर रहे है इसकी अच्छी खासी तादाद एक बिरादर इस्लामी मुल्क की लॉबी के तौर पर यहां बरू ए कार आती है, ये बिरादर इस्लामिक मुल्क वहीं है जिस ने कभी मौलाना मोदुदी रह ० और प्रोफेसर खुर्शीद अहमद साहब को अपने एक कौमी अवॉर्ड से भी नवाजा था मगर चंद साल पहले इसने मौलाना की अहम किताबो पर पाबंदी लगा दी है, इस मुल्क के मगरिबी एजेंडे के लिए खिदमात देखनी हो तो इमरान नजीर हुसैन की पी एच डी के मकाले का उर्दू तर्जुमा “इस्तांबुल से रबात तक” का मुत्तआला किफायत करेगा, ऐसे किरदार के हामिल मुल्क की लॉबी के तौर जाने जाने वाले अफ़राद को मगरिब की वसी’अ तर एजेंडे के तनाज्जुर में देखने की जरूरत है!

लिहाजा मौलाना मोदुदी की फिक्र के हामलीन लोगो को चाहिए कि वो इस मस’अले को हिक्मत के साथ हैंडल करे ताकि रिवायत पसंद तबके में मौलाना मोदूदी के जो हमदर्द लोग मौजूद है उन को ऐसी बाते गिरां न गुजरे और इस के नतीजे में वोह लोग इस फिक्र से दूर न जाए और अगर इस फिक्र के हवाले से इन से कोई मदद मिल सकती हो तो फिर वो भी न मिले !

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं.


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