यात्रा वृतांत: उत्तराखंड का कुमाऊं क्षेत्र – कौसानी, बागेश्वर, रानीखेत, नैतीताल, भीमताल, सातताल

भारती पाठक

इस बार के यात्रावृतांत में नेपाल और चीन से लगते कुमाऊ¡ क्षेत्र के बारे में चर्चा । अहले सुबह हमने जल्दी ही होटल छोड़ा और जीप से किरौला जी के साथ ही कौसानी के लिए निकले । कहना न होगा कि उन पहाड़ी रास्तों की सुन्दरता हमें बाँध देती है कि रास्ता कैसे बीत जाता है पता ही नही चलता । हमें भी अल्मोड़ा से कौसानी की 53 किलोमीटर की दूरी कब बीत गई तब पता चला जब हमारी जीप कौसानी पहुंचकर रुकी । यह छोटा सा चौराहा था और इतनी शांति थी वहां कि आश्चर्य हो रहा था कि क्या सचमुच हम इतने प्रसिद्ध पर्यटक स्थल पर आये हैं । कुछ चाय, फल की दुकानें और ढाबे के अलावा बस छोटी मोटी आवश्यता की चीजों की दुकानें और छोटी गाड़ियों के रुकने की जगह । वहां से तीन तरफ सड़कें जाती थी और एक रास्ता ऊपर की ओर, जहाँ से हमें लेकर किरौला जी जिस जगह गए वहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था अनाशक्ति आश्रम ।

कौसानी बागेश्वर जिले का एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है जो समुद्र तल से लगभग 1715 से 1890 मीटर की ऊंचाई पर पिंगनाथ नाम की छोटी सी पहाड़ी पर है । इसके चारों ओर प्राकृतिक सुन्दरता बिखरी पड़ी है । यहीं पर है प्रसिद्ध अनाशक्ति आश्रम जहां पर गांधी जी ने थोड़े दिन प्रवास किया था । मुख्य गेट पर पार्किंग की व्यवस्था थी और भीतर जाने पर एक ओर छोटी सी चाय की दुकान थी जहाँ हलके फुल्के स्नैक्स भी मिल रहे थे । वहां बहुत थोड़े खर्च में रुकने की व्यवस्था थी और भोजन का शुल्क भी नाममात्र को ही था । वहां हमें आराम से रुकने की जगह मिल गयी ।

बाहर निकलने पर मुख्य दो ही समस्याएं सामने आती हैं खाना और रात गुजारना, जिसकी अच्छी व्यवस्था हो जाये तो घूमने का मज़ा दोगुना हो जाता है । हमारी इन दोनों बातों का हल हो चुका था तो ध्यान आसपास के वातावरण पर गया । सामने दूर-दूर तक दिखतीं हिमालय पर्वत की बर्फ से लदी चोटियाँ और प्राकृतिक सुन्दरता से भरपूर कौसानी किसी को भी दीवाना बनाने के लिए काफी है ।

आश्रम में ही पोडियमनुमा जगह बनी थी जिस पर कई अंशों के चिन्ह भी बने थे जो बताते थे कि किस अंश पर कौन से पर्वत की चोटी है । मैंने भी चढ़कर देखा जिसमें हिमालय की मुख्य चोटियाँ चौखम्बा, त्रिशूल, नंदादेवी, नंदाकोट, पंचचुली आदि के नाम लिखे थे । यहाँ से हिमालय पर्वत की सबसे लम्बी 360 किलोमीटर की पर्वत श्रृंखला दिखती है ।

पहाड़ की ऊंचाई पर बने अनाशक्ति आश्रम की छत लाल रंग की और आकार ढलवा है जो बहुत सुन्दर लग रही थी । भवन के सामने गाँधी जी की आदमकद प्रतिमा थी और उसके पीछे भवन में एक प्रार्थना कक्ष, पुस्तकालय और एक ऑफिस । प्रार्थना कक्ष में गाँधी जी के जीवन से जुडी वस्तुएं, आलेख और सम्बंधित चित्र प्रदर्शित किये हुए थे । 1929 में जब गाँधी जी अपने भारत दौरे पर निकले थे तब थकान मिटाने कौसानी आये थे । यहाँ के सुरम्य वातावरण ने उनका मन मोह लिया था और वे १४ दिन यहाँ रुके थे । गाँधी जी की कृति अनाशक्ति योग के आधार पर ही इस आश्रम को अनाशक्ति आश्रम का नाम दिया गया ।

शाम हो चुकी थी तो बताया गया कि आश्रम के बड़े हॉल में 7 बजे प्रार्थना के लिए जाना है, हम भी पहुंचे तो वहां रुके अन्य लोग और पास के होटलों में रुके लोग भी उपस्थित थे । माहौल एकदम शांत जिसमें सबको अपनी इच्छा से भजन गाने की छूट थी । कई लोगों ने भजन और प्रार्थनाएं सुनायीं और हमने अच्छे श्रोता की तरह सुना । वहां से निकले तो खाने के लिए बुलावा आया ।

भोजन कक्ष सीढ़ियों से नीचे उतर कर था । एक बड़ा हालनुमा कमरा जिसमें बिना चप्पलों के ही प्रवेश की अनुमति थी । अन्दर जाने पर बायीं तरफ हाथ धोने के लिए नल थे और दाहिनी तरफ जमीन पर ही बैठने की व्यवस्था । भोजन बेहद सादा, हल्का और सुपाच्य । भोजन के बाद अपनी थाली उठाकर जूठे बर्तनों में रखने की जिम्मेदारी भी भोजन करने वाले की । खाना खाकर कमरे में आये तो थकान हो रही थी फिर कब नीद आई पता ही न चला ।

सुबह सूर्योदय के समय सूर्य की पहली किरण का पर्वतों पर पड़ने का नज़ारा अद्भुत था जो थोड़ी देर को हमें सपनों में ही ले गया । काफी देर तक हम टहलते रहे, तभी याद आया कि आज बच्चों की कार्यशाला में भाग लेने जाना है । 8 बजे किरौला जी भी आ गए तब तक हम नाश्ता करके तैयार थे । पैदल ही हम नीचे तक आये और पास ही स्थित हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पन्त जी के घर गए जो उनकी याद में अब एक संग्रहालय और पुस्तकालय में बदल दिया गया है । इसे सुमित्रानंदन पन्त वीथिका के नाम से जाना जाता है ।

वहां से पैदल ही उस सरकारी विद्यालय तक गए जहाँ बच्चों की कार्यशाला थी । बच्चों से मिलना और उनके साथ समय बिताना यादगार था । हमने कई तरह के खेल खेले और बच्चों के साथ कविता लेखन से जुडी बातों पर चर्चा की । बच्चे बहुत ही प्रतिभाशाली थे और मुझे लगता है सभी बच्चों में कोई न कोई प्रतिभा छिपी ही होती है जिसे निखारने वाला मिल जाये तो गुरु शिष्य दोनों के भाग्य । किरौला जी अच्छा कार्य कर रहे हैं । बच्चों ने अपनी कुमांउनी भाषा और हिंदी की भी कविताएँ हमें सुनाईं ।

12 बजे हम वहां से खाली हुए और कौसानी चौराहे तक आकर बस पकड़ी और बागेश्वर के लिए निकल पड़े ।

कौसानी से बागेश्वर की दूरी कुल 37 किलोमीटर है । रास्ता बेहद खूबसूरत है जिसमें पड़ते है चाय के बागान,गहरी घाटियाँ और बर्फ से लदे पहाड़ जो लगते हैं जैसे अभी हाथों से छुए जा सकते । करीब दो घंटे में बस ने हमें बागेश्वर बस अड्डे पर उतार दिया । यहाँ से हम बागनाथ मंदिर गए जो कि स्टैंड से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है । यह प्राचीन शिव मंदिर है । कहते हैं कि ऋषि मार्कंडेय जी ने यहीं शिवजी की पूजा की तो शिवजी ने उन्हें बाघ के रूप में दर्शन दिया, तभी से इस जगह का नाम बागेश्वर पड़ा ।

जो भी हो, यहाँ की सुन्दरता सचमुच देवलोक का आभास देती है तो संभवतः हुआ ही हो ऐसा । बाद में चन्द्र शासक लक्ष्मी चन्द्र ने इस मंदिर का निर्माण कराया जो कि वास्तुकला की दृष्टि से अद्वितीय है । बागेश्वर में सरयू और गोमती का संगम है । यहीं से होकर पिंडारी ग्लेशियर का ट्रैकिंग रास्ता भी जाता है । हिमालय इतना करीब दिखता हैं मानो हाथ बढाकर छुआ जा सके । एक रोचक बात देखी हमने कि एक पत्थर पड़ा था वहां, कहते हैं कोई उठा नहीं पाता लेकिन ७ लोग अगर अपनी कानी ( छोटी ) उंगली से मिलकर उसे उठायें तो आसानी से उठ जाता है । हालांकि हमने प्रयास नहीं किया लेकिन काफी लोगों को प्रयास करते देखकर बड़ा मज़ा आया ।

अधिक देर होने पर वापसी के लिए सवारी मिलने में समस्या होती यह सोच कर हम बाज़ार तक पैदल आये और भाग्य से हमें सही समय पर बस भी मिल गयी तो वहां से वापसी की हमने । शाम होते होते हम आश्रम पहुँच गए थे । काफी व्यस्तता रही दिनभर तो प्रार्थना में थोड़ी देर ही बैठे, फिर खाना खाया और गहरी नींद ।

अगली सुबह हमें रानीखेत होते हुए नैनीताल जाना था तो सुबह ही आश्रम का बिल चुकाया जो हमारी इच्छा पर था (क्योंकि तब आश्रम में किराया माँगा नहीं जाता था) । जल्दी से कार रिज़र्व की और निकल पड़े ।

कौसानी से रानीखेत करीब 59 किलोमीटर की दूरी पर है, रास्ता खूबसूरत पहाड़ी । देवदार और बलूत के पेड़ों से घिरा रानीखेत बहुत रमणीक पहाड़ी शहर और सेना की छावनी भी है । करीब ढाई घंटे में हम रानीखेत पहुँच गए । यहीं है चौबटिया जिसका रास्ता बेहद खूबसूरत घने जंगल के बीच से जाता है । चौबटिया में प्रदेश सरकार का फलों का उद्द्यान है जो देखने लायक है यहाँ फलों से बनी जैम जेली अचार आदि का विक्रय केंद्र और एक छोटा सा रेस्टोरेंट भी है ।

रानीखेत के गोल्फ मैदान में जब फोटो खींचने के लिए मोबाइल निकालने लगी तो होश उड़ गए । मेरा हाल का ही खरीदा मोबाइल मेरे पास नहीं था । आश्रम में फ़ोन किया । लेकिन मोबाइल नहीं मिला । उसके खोने से ज्यादा तकलीफ थी उसमें लिए गए वीडियो और फोटो, जो मेरी बेटी की बचपन की यादें थे । खैर अब कुछ नहीं हो सकता था लेकिन मन जरूर थोड़ा बुझ गया था । तो यात्रा में अपनी चीजों का ध्यान रखना जरूरी है क्योंकि इससे यात्रा के मूड पर फर्क पड़ता है । उसके बाद हमने सेना का संग्रहालय देखा और एक मंदिर, फिर नैनीताल के लिए निकल पड़े ।

रानीखेत से नैनीताल भी करीब 58 किलोमीटर की दूरी पर है तो जल्दी ही निकलना पड़ा । उत्तराखंड में कुमाऊ क्षेत्र में नैनीताल जिले का विशेष महत्त्व है । यह देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है । पहले इस अंचल में 60 ताल थे जो अब धीरे धीरे कम हो गए हैं फिर भी यहाँ सबसे अधिक ताल हैं । इसे भारत का झीलों का इलाका कहते हैं । पहाड़ों से घिरी नैनी झील से लगा यह शहर जिधर से देखा जाये बेहद खूबसूरत है ।

यहाँ चारों ओर खूबसूरती बिखरी पड़ी है । एक तो यहाँ का ठंडा मौसम और दूसरे खूबसूरत झीलें, दोनों मिलकर पर्यटकों का मन मोह लेती हैं । एक जरूरी बात, कि अगर गर्मियों में वहां जा रहे तो होटल में बुकिंग पहले से जरूर करा लें तभी सुविधा रहेगी और आपका बजट भी गड़बड़ नहीं होगा क्योंकि अचानक पहुँचने पर एक तो अच्छे होटल में जगह मिलती नहीं और दूसरे जो जगहें अच्छी नहीं उनका भी किराया दोगुना ।

होटल पहुंचे जो नैनी झील के करीब ही था (अधिकतर होटल झील के पास ही हैं ) तो शाम हो चली थी । थोड़ी देर आराम किया फिर फ्रेश हो कर घूमने निकले । नैनीताल तीन ओर से ऊंचे पहाड़ों और घने पेड़ों की छाया में समुद्र तल से 1938 मीटर की ऊंचाई पर बसा है । इसकी खोज एक अंग्रेज चीनी व्यापारी ने की थी और फिर अंग्रेजों ने इसे गर्मियों में अपना आरामगाह बनाया ।

झील का पानी बेहद साफ़ और हरे रंग का था जिसमें तीन ओर से पेड़ों की परछाई साफ़ दिखती है । झील में रंग-बिरंगी नावें भी चलती हैं जो झील के उस पार स्थित नैना देवी मंदिर तक जाती हैं और वापस लाती हैं । नैनीताल को 64 शक्तिपीठों में से भी माना जाता है । कहते हैं माता सती की आँखें यहाँ गिरी थीं जिसके चलते यहाँ उनकी पूजा नैना देवी के नाम से होती है ।

नैनीताल में ताल के दोनों ओर सड़कें हैं जहाँ रिक्शे भी चलते हैं और पैदल भी जाया जा सकता है । रिक्शे के लिए टिकट लाइन में लग कर मिल रही थी और बारी की प्रतीक्षा भी करनी पड़ती । ताल का ऊँचा भाग मल्लीताल और निचला भाग तल्लीताल कहलाता है । झील के किनारे की जगह को माल रोड कहते हैं जहाँ बहुत सारे होटल ट्रेवल एजेंसी, दुकानें और रेस्टोरेन्ट आदि हैं । यह आकर्षक रोड तल्लीताल और मल्लीताल को जोड़ता भी है ।

हम गए तो रिक्शे से लेकिन वापस पैदल ही घूमते हुए खाना खाकर लौटे । होटल में जाकर आराम किया । अगले दिन हम स्नो व्यू पॉइंट और टिफ़िन टॉप देखने गए जो नैनीताल से ढाई किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । यहाँ जाने के दो तरीके हैं । एक तो रोप वे, दूसरा कोई गाडी करके और थोड़ी दूर खच्चर या पैदल । यहाँ से मौसम साफ़ रहने पर हिमालय की चोटियां देखी जा सकती हैं ।

वहां से वापस आकर हम मल्लीताल में तिब्ब्तियों का भोटिया बाज़ार गए, दोस्तों को उपहार देने के लिए के लिए कुछ छोटी मोटी चीजें खरीदीं, फिर खाना खाकर ही होटल वापस आये । अगले दिन शाम को हमारी ट्रेन थी । सुबह होटल छोड़ना भी था तो रात में ही पैकिंग कर ली थी ।

सुबह एक टैक्सी रिज़र्व की जो हमें नैनीताल के कुछ और पर्यटन स्थलों को घुमाती हुई काठगोदाम छोड़ दे । हम भीम ताल होते हुए सात ताल झील देखने गए जो कि नैनीताल से २३ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । यह सात झीलों का एक बेहद खूबसूरत स्थान है जहाँ नौका विहार की भी सुविधा है । यह सरकार की तरफ से विशेष सैलानी क्षेत्र घोषित है । ताल के किनारे बैठने की भी खूबसूरत जगह है जहाँ सुन्दर फूल और लताएँ लगायी गयी हैं जिससे ताल की सुन्दरता और बढ़ गयी है । हमने भी ताल में बोटिंग का लुत्फ़ उठाया ।

एक साथ सात झीलों का अलौकिक रूप यहीं देखा जा सकता है । ये झीलें हैं – नल दमयंती ताल, गरुण ताल, राम ताल, लक्ष्मण ताल, सीता ताल, पूर्ण ताल और सूखा ताल । इन तालों के साथ बहुत सारी पौराणिक कथाएं भी जुडी हैं जैसे राम सीता और लक्ष्मण के यहाँ रहने की, पांडवों के रुकने की, आदि ।

इतना कुछ देखते काफी समय हो चला था और हमारे स्टेशन पहुँचने का समय भी हो रहा था । वैसे भी घुमक्कड़ों को यात्राएँ संतुष्ट नहीं करती वरन नया कुछ खोजने को उकसाती हैं और हर बार लगता है कुछ रह गया तो शेष फिर कभी सोच कर हम वापसी की ओर हो लिए ।


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