यदि कोई पूछे सादगी किस चिड़िया का नाम है तो मैं बेशाख्ता कहूंगा उस चिड़िया का नाम भीष्म साहनी है!

Sumant Sharan

मैंने अपने कमरे की दीवार पर भीष्म जी की एक तस्वीर सजा रखी है। इस करोना समय में सोते जागते ऊंघते नजर बार बार तस्वीर पर टिक जाती है। टिक क्या जाती है उनकी सलोनी सूरत सीधे दिल में उतर आती है।

आप सोचो, दिन भर में कोई तस्वीर कई कई बार नज़र से टकराती रहे और उससे जुड़ी ढेर सारी यादें भी आपके ज़ेहन में कहीं जज्ब हो़ तो क्या हो! आपका एक ख़लिश सी खलबली में गिरफ्त हो जाना लाजिम तो है ही! और, तब तो और जब तस्वीर उस शख्स की हो जो अपने दौर का एक मक़बूल साहिबे अफसानानिगार हो; स्टेज और फ़िल्म में कुछ यादगार किरदार निभा चुका कलाकार हो।

इन दिनों मैं ठीक इसी दौर से गुज़र रहा हूं। बात उन दिनों की है जब मैं दिल्ली में निहायत फाकामस्ती के दौर से गुज़र रहा था। पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस (पीपीएच) के संपादकीय विभाग की नौकरी वहां के कुछ मठाधीश हाकिमों की बदमाशियों के चलते आजिज आकर छोड़ चुका था। कोई नौकरी हाथ में थी नहीं, सो फुर्सत ही फुर्सत थी। इस फुर्सत में वक्त काटने की सबसे मुफीद जगह थी मंडी हाउस का इलाका। मंडी हाउस देखें तो अपने नाम के अनुरूप एक भारी भरकम सांस्कृतिक/साहित्यिक/शैक्षिक मंडी ही तो है – एक साथ दूरदर्शन मुख्यालय, श्रीराम सेंटर, साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी, जेएनयू गेस्ट हाउस, त्रिवेणी कला संगम आदि जैसे धरोहर संस्थानों से अटी पड़ी।

मगर, हमारी बैठकी ज्यादातर साहित्य अकादमी की लायब्रेरी में हुआ करती थी। वहीं एक दिन दोपहरी में पीछे की सीट पर धंसे भीष्म जी दिख गये। पीपीएच में हमारी मुलाकात पहले ही हो चुकी थी। इसलिए, उन्हें देखने के बाद उनके पास जाते मुझे कोई हिचक नहीं हुई। उन्होंने मुझे देखा फिर बोले, ‘अभी थोड़ी देर बाद बाहर चाय पीने चलते हैं।’ मैं बाहर निकल कर पहले ही चाय की दुकान पर जम गया। वे भी तुरंत बाहर निकल आये। उन्हें मालूम था कि मैं पीपीएच छोड़ चुका हूं। चाय का आर्डर उन्होंने ही दिया। फिर मेरा हालचाल लिया। मेरे बताने पर कि अभी कोई नौकरी नहीं है और इन दिनों मैं अक्सर इस लायब्रेरी के भीतर या मंडी हाउस के इर्द गिर्द उठते बैठते समय बिताता हूं तो उन्हें हैरानी हुई। उन्होंने बताया कि लायब्रेरी तो उनका भी डेली आना होता है। तो फिर आज के पहले हमारी मुलाकात क्यों न हुई ? खैर, इसे संयोग मान कर हमने चाय पी। उन्होंने बिस्कुट के लिए पूछा तो मैने इंकार नहीं किया।

मालूम हुआ कि वह अपनी पत्नी शीला जी को लेने कॉलेज से कार से आते हैं। शीला साहनी लायब्रेरी से कुछ ही दूरी पर बाराखंबा रोड स्थित सोवियत दूतावास की सूचना एवं प्रकाशन विभाग की पत्रिका ‘बाल स्पुतनिक’ में कार्यरत हैं, यह मुझे पहले से पता था। परंतु, यह नहीं पता था कि भीष्म जी उन्हें छुट्टी के बाद लेने प्राय: रोज आते हैं। उन्होंने बताया कि वह अपना क्लास खत्म करके सीधे लायब्रेरी आ जाते हैं और शाम को शीला जी को साथ ले कर घर लौटते हैं।

उन्होंने मुझे सलाह दी कि जब तक कोई नौकरी नहीं है तो सोवियत सूचना विभाग से कुछ अनुवाद का काम करूं। उन्होंने इस बाबत शीला जी से भी मेरी मदद करने को कह दिया। हालांकि, मैं पहले से ही वहां से कुछ अन्य लोगों की मदद से अनुवाद का काम लाने लगा था। फिर भी, शीला जी से मिला। वह उतनी ही सौम्य और सरल निकलीं। मुझे लगा, इस मामले में भीष्म जी और शीला जी दोनों एक दूसरे के मुकाबले ‘नहले पे दहला’ हैं! हमारी लायब्रेरी में नियमित रूप से मुलाकात होती रही। उनका एक तकिया कलाम था जिसे वह प्राय: हर बार मिलने पर दुहराने से चूकते नहीं थे – ‘मिल बैठ कर कभी बात करेंगे।’

नौकरी तो नहीं, मैं कुछ दिनों बाद ट्रेड यूनियन में काम करने की खातिर गुड़गांव और फरीदाबाद चला गया। इसकी खबर जब भीष्म जी को सुनायी तो उन्होंने अति आत्मीयता भरी मुस्कान के साथ कहा, “अच्छा है, नौजवान लेखकों को मजदूर आंदोलन में भी काम करना चाहिए।”

आज जब लॉकडाउन के समय में खुद को घर में कैद और देश भर में लाखों मजदूरों के सड़कों पर भयावह पलायन की सच्चाई के बीच दीवार पर टंगी भीष्म जी की तस्वीर को देखता हूं तो अनायास एक ऐसी खलिश में घिर जाता हूं जिसकी न तो कोई ओर न कोई छोर दिखायी देती मालूम पड़ती है!

संक्षिप्त परिचय:
रावलपिंडी पाकिस्तान में जन्मे भीष्म साहनी (8 अगस्त 1915- 11 जुलाई 2003) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख स्तंभों में से थे। 1937 में लाहौर गवर्नमेन्ट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में एम ए करने के बाद साहनी ने 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हासिल की। भारत पाकिस्तान विभाजन के पूर्व अवैतनिक शिक्षक होने के साथ-साथ ये व्यापार भी करते थे। विभाजन के बाद उन्होंने भारत आकर समाचारपत्रों में लिखने का काम किया। बाद में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जा मिले। इसके पश्चात अंबाला और अमृतसर में भी अध्यापक रहने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में साहित्य के प्रोफेसर बने। 1957 से 1963 तक मास्को में विदेशी भाषा प्रकाशन गृह (फॉरेन लॅग्वेजेस पब्लिकेशन हाउस) में अनुवादक के काम में कार्यरत रहे। यहां उन्होंने करीब दो दर्जन रूसी किताबें जैसे टालस्टॉय आस्ट्रोवस्की इत्यादि लेखकों की किताबों का हिंदी में रूपांतर किया। 1965 से 1967 तक दो सालों में उन्होंने नयी कहानियां नामक पात्रिका का सम्पादन किया। वे प्रगतिशील लेखक संघ और अफ्रो-एशियायी लेखक संघ (एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन) से भी जुड़े रहे।1993 से 1997 तक वे साहित्य अकादमी के कार्यकारी समीति के सदस्य रहे।

वामपंथी विचारधारा के भीष्म साहनी को हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद की परंपरा का अग्रणी लेखक माना जाता है। वे मानवीय मूल्यों के जबरदस्त पैरोकार रहे। आपाधापी और उठापटक के युग में भीष्म साहनी का व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था। उन्हें उनके लेखन के लिए तो स्मरण किया ही जाएगा लेकिन अपनी सहृदयता के लिए वे चिरस्मरणीय रहेंगे। भीष्म साहनी हिन्दी फ़िल्मों के जाने माने अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई थे। उन्हें 1975 में तमस के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1975 में शिरोमणि लेखक अवार्ड (पंजाब सरकार), 1980 में एफ्रो एशियन राइटर्स असोसिएशन का लोटस अवार्ड, 1983 में सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड तथा 1998 में भारत सरकार के पद्मभूषण अलंकरण से विभूषित किया गया। उनके उपन्यास तमस पर 1986 में एक फिल्म का निर्माण भी किया गया था।


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