पुस्तक चर्चा: मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ” कसप”

भारती पाठक

कुछ सालों पहले एक साहित्यिक मित्र से नए नए हुए परिचय के दौरान मैंने पूछा कि कोई किताब बताइए पढ़ने के लिए तो उन्होंने मनोहर श्याम जोशी जी की ‘कसप’ का नाम लिया । बड़े प्रयासों के बाद ये किताब जब मुझे ऑनलाइन प्राप्त हुई और मिलते ही इसे पढ़ना शुरू किया तो समाप्त करके ही छोड़ पाई । वैसे तो सभी विषयों पर पढ़ना होता रहता है लेकिन प्रेम ऐसा विषय है जिसे पढ़ने का लोभ विरले ही संवरण कर पाते हैं और मैं निश्चित रूप से विरलों में नहीं हूँ । इस उपन्यास का बिना किसी आदर्श के अपने से जूझते मध्यम वर्ग के प्रेम पर आधारित कथ्य मुझे बेहद अच्छा लगा ।

मनोहर श्याम जोशी जी ने सम्प्रेषण के लगभग सभी माध्यमो में लेखन कार्य किया है । ऐसा कहा जाता है कि उनका आत्मसंशय और आलसीपन उन्हें रचनाएं पूरी करने और छपवाने में बाधक रहा । उनकी पहली कहानी तब छपी जब वे 18 वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति तब प्रकाशित हुई जब वे 47 वर्ष के होने को आये । जोशी जी हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ उपन्यासकार, गद्यकार, व्यंग्यकार, दूरदर्शन धारावाहिक लेखक, स्वतंत्र विचारक, फिल्म पटकथा लेखक, उच्चकोटि के सम्पादक, कुशल प्रवक्ता और स्तम्भ लेखक थे ।

आज हम जोशी जी के इसी उपन्यास ‘कसप’ की चर्चा करेंगे । कसप के नायक हैं देवी दत्त तिवारी यानी डी डी, जो एक साहित्यिक प्राणी हैं जिनको अपना नाम बहुत गैर रूमानी मालूम होता है । लेकिन उन्हें भरोसा है कि देवदास अगर इसी तरह के मामूली नाम से अमर प्रेमी का पद प्राप्त कर सकता है तो वे क्यों नही कर सकते । फिर भी वे स्वयं को डी डी कहना और कहलाना पसंद करते हैं । कलाकार हैं तो कलाकारों वाला अक्खडपन भी है उनमें । उम्र २१ वर्ष, परिवार के नाम पर दूर के कुछ रिश्तेदार हैं जिनमें से किसी ने एक दफ्तर में क्लर्क की नौकरी लगवा दी जिसे दो महीने में ही छोड़कर वे बम्बई भाग गए और अब एक व्यवसायिक निर्देशक के सहायक के तौर पर काम कर रहे हैं ।

इस बीच उनके कहानियों, एकांकी और कविताओं के संग्रह प्रकाशित हो चुके है । प्रेम के बारे में नायक ने पढ़ा सुना बहुत है लेकिन किया नहीं कभी । इसके लिए वे हल्फिया बयान भी देते हैं अलबत्ता तीन प्रसंग हैं उनके लेकिन वे कहने को थे और समय से अपनी अन्य गति को प्राप्त हो गए । नायक को विश्वास हो चला है कि उनके भाग्य में और कुछ हो लेकिन प्रेम के मामले में अभागे ही रहेंगे ।

नायिका बेबी यानि मैत्रेयी शास्त्री अल्मोड़ा में रहती है जो चार भाइयों की इकलौती बहन और पिता की लाडली है । अपने नाम के अनुरूप बेबी सचमुच बेबी है । खिलंदड, लड़कपन से भरपूर, न उसने प्रेम किया है न प्रेम के बारे में फुर्सत से सोचा ही है । उसे सत्रहँवा साल लगा है, ११ वीं में है और कभी कभी अलबत्ता सोचने लगी है कि उसे प्रेम के बारे में सोचना चाहिए । घर में उसे समझाया जाने लगा है कि अब वह बच्ची नहीं रही, उसे घर के स्त्रियोचित कामों में भी रूचि लेना चाहिए । लेकिन अपनी अकुशलता में वह घरेलू कामों का ऐसा भीषण प्रदर्शन करती है कि माता सिर पीट लेती हैं और बेटी जी खोल कर हंसती है ।

डी डी के दूर के रिश्तेदार के यहाँ विवाह समारोह में दोनों आमंत्रित है । लड़की का भाई बब्बन और डी डी की बचपन की दोस्ती है जिसके आग्रह पर वो विवाह में आया है । नायक नायिका पहली बार कैसे मिलते हैं इसका बड़ा रोचक प्रसंग उपन्यास में लेखक ने दिया है । वैसे तो उपन्यास में जितने भी कोमलता, प्रेम, आकर्षण के प्रसंग हैं उनका ऐसा निस्संग उत्तर-आधुनिक वर्णन जोशी जी करते हैं कि भाव की गरिमा हास्य-व्यंग्य में बदल जाती है और महान भाव-स्थितियां सड़क की पटरी पर आ जाती हैं ।
लेखक स्वयं संकोच में पड़ते हुए कहते है – “यदि प्रथम साक्षात की बेला में कथा नायक अस्थायी टट्टी में बैठा है तो मैं किसी भी साहित्यिक चमत्कार से उसे ताल पर तैरती किसी नाव में नहीं बैठा सकता ।”

नायक को चाय के लिए बुलाया जा रहा है और वो अस्थायी शौचालय से उठ खड़ा कुरता ठुड्डी में दबाये अपने पाजामे का नाड़ा बाँध रहा है, जब नायिका उसे देखती है और अपनी हंसी नहीं रोक पाती । नायक अपने सपनों की जीन सिमंस (हालीवुड की नायिका) नुमा नायिका को सामने देखकर भौचक्का खड़ा है और उसे उससे पहली नज़र का प्यार हो जाता है ।

दूसरी मुलाकात में नायिका उसके क्रुद्ध चहरे को देखकर कहती है ‘अब मुझे हँसाना मत । तब हंसाया तो सुबह सुबह डांट पड़वा दी गंदे !’
मुंह तोड़ जवाब की तलाश में नायक एक बेतुका जवाब देता है “आपकी वजह से मेरे मारगाँठ (गाँठ पर लगी गाँठ ) पड़ गयी गन्दी !” यही नहीं अपना कुरता उठाकर उस दोहरी गाँठ का दर्शन नायिका को ऐसे कराता है मानो इजारबंद नहीं उसकी आत्मा हो । नायिका को फिर हंसी का दौरा पड़ जाता है । यह मारगांठ बहुत प्रसंगों में, बहुत ही हास्यास्पद स्थितियों में नायक से जुड़कर उपन्यास में आती है ।

इसी तरह की कई मुलाकातों में दोनों एक दूसरे की ओर आकृष्ट हो जाते हैं । नायिका के परिवार में उसके पिता को छोड़ कर और कोई नायक को स्वीकार नहीं करता और उनके प्रेम को विराम लगा दिया जाता है । वजह वही है कि नायक आर्थिक रूप से नायिका के परिवार के आगे कहीं नहीं ठहरता ।

उपन्यास की कहानी भले सरल सहज लग रही हो लेकिन कहानी उससे कई गुना अधिक अनेक अप्रत्याशित मोड़ लिए और साहित्यिक सरस संवादों में बुनी हुई है जिसका आनंद इसे पढ़नेवाला बखूबी समझेगा ।
डी डी बब्बन के लाख समझाने पर भी बेबी को भूलने को तैयार नहीं । लेखक लिखते हैं कि “ प्यार के कैमरे में दो ही फोकस होते हैं – प्रिय का चेहरा, और वह न हो तो ऐसा कुछ जो अनंत दूरी पर स्थित हो ।”

उपन्यास की एक बड़ी खूबसूरत बात है इसके कुमाउंनी हिंदी के शब्द जो इसके सम्वादों में मिश्री सा घोलते हैं जैसे लाटा, चहा, भया, भयो, ठहरे, छ आदि जो कुमांऊनी जीवन का जीवन्त चित्र प्रस्तुत करते हैं । नायक हिम्मत करके नायिका के घर भी पहुंच जाता है और अपना प्रेम पत्र देता है जिसमें दो ही शब्द लिखे हैं – जिलेम्बू और मार गाँठ । जिलेम्बू की भी अपनी घटना है । जब बेबी के पूछने पर नायक ने इस फ्रांसीसी शब्द का अर्थ बताया था कि “मैं तुमसे प्यार करता हूँ” और ये भी कि ये गलत उच्चारण है, सही शब्द है ‘जामेंबू ।’

नायक बेबी के परिवार की उपेक्षा से बिना विचलित हुए उससे मिल कर और पत्र लिखने का वादा कर मुंबई लौटता है । उपन्यास में कुछ पत्रों का विवरण है जो डी डी ने बेबी को लिखे जिसमें उसके बम्बई के रोजमर्रा के जीवन से जुडी बातें होती हैं । डी डी के साहित्यिक भाषा से सराबोर प्रेमपत्र बेबी को ज्यादा समझ नहीं आते तो वह उन्हें अपने पिता से पढ़वाती है जो बहुत ही रूढिवादी कुमाउंनी ब्राह्मण होते हुए भी नायक की साहित्यिक भाषा और लेखन से बहुत प्रभावित होते हैं ।

बीच में डी डी फिर एक विवाह में अल्मोड़ा आता है जहाँ उसकी मुलाकात बेबी से होती है । बहुत सी और भी घटनाएँ घटती हैं जो उपन्यास की रोचकता को बनाये रखती हैं । लेकिन फिर कहानी में एक ऐसा मोड़ आता है कि डी डी की वजह से बेबी की तय की हुई शादी टूट जाती है और शहर भर को बेबी और डी डी के बारे में पता चल जाता है । बेबी के पिता परिवार की इज्जत बचाने के लिए अल्मोड़ा का घर बेच कर बिनसर के जंगलों में रहने और बेबी को लखनऊ भेज कर पढ़ाने का निर्णय लेते हैं ।

डी डी और बेबी की शादी के लिए भी शास्त्री जी सहमत हैं लेकिन विवाह का शुभ मुहूर्त नहीं निकल रहा और डी डी कैलिफोर्निया के सिने विभाग में छात्रवृत्ति मिलने से वहां जाना चाहता है जिसके लिए वो सीधे बेबी या शास्त्री जी को न कहकर दया दी के जरिये ये बात रखता है जो बेबी को डी डी के मन की चोरी और अपना तथा अपने माता पिता का अपमान लगता है ।
उसका अहम सोचता है कि ‘ यह मुसीबत मुसीबत क्या ! लाचारी किसे कहते हैं, बेबी ने कभी नहीं जाना । इजा बाबू (पिता) के सामने लाचार नहीं ठहरी वह, यह कौन नया पैदा हो रहा उसे ही नहीं, इजा बाबू को भी लाचार कर देने वाला ?’

फिर उपन्यास में ऐसा रोचक मोड़ आता है जो बहुत कुछ बदल देता है । बेबी जिसने खुद को डी डी की ब्याहता मान लिया था, खुद को बेबी से मैत्रेयी, विदुषी मैत्रेयी बनाने की राह पर अग्रसर होती है । इसके आगे की रोचक कथा जानने के लिए उपन्यास को पढ़ना एक अच्छा विकल्प है ।

‘कसप’ को समीक्षकों ने प्रेम कथा में “नदी के द्वीप” के बाद की सबसे बड़ी उपलब्ब्धि बताया है बस अन्तर इतना है कि ‘नदी के द्वीप (अज्ञेय) में तेवर बौद्धिक और उच्चवर्गीय हैं जबकि ‘कसप’ में कथा का ढांचा मध्यम वर्गीय यथार्थ की नींव पर खड़ा है । कुमाउंनी जीवन और वहां की बोलचाल की भाषा के प्रवाह में होने के कारण इसे रेणु के ‘मैला आंचल’ के बाद का आंचलिक उपन्यास भी कहा जा सकता है । इसमें गहरे भावों को भी बहुत ही हल्के-फुल्के तरीके से कह देने और उनकी तमाम गरिमा और रहस्य का विखंडन कर देने के कारण इसे हिंदी का उत्तर-आधुनिक उपन्यास भी माना जाता है ।

प्रेम इस किताब के अक्षर-अक्षर में रचा बसा है । किताब न सिर्फ डी डी और बेबी की प्रेम कथा है बल्कि इसमें कुमाऊंनी समाज, उनके रहन-सहन, भाषा-बोली की मिठास भी है । एक ख़ास बात कि जोशी जी की रचनाओं में स्त्री पात्र बेहद मजबूती से उभर कर आते हैं जो इसमें भी बेबी के रूप में है ।

ऊपर से देखने में बेबी भले ही अल्हड़ लगती है हर बात को मजाक में लेती हुई, पर उसके चरित्र की मजबूती उभरकर सामने आती है जब वह डी डी से विवाह की ठान लेती है । जहां उपन्यास का नायक ढुलमुल, अस्थिर चित्त और लक्ष्यभ्रष्ट लगता है, वहीं बेबी के चरित्र की दृढता और आंतरिक शक्ति निर्णय के क्षणों में देखने लायक है ।

उसका विवाह किसी और के साथ तय हो चुका है पर उसने ठान लिया कि वह शादी करेगी तो डी डी से ही और दे दिया नायक को जनेऊ और मान लिया पति गणानाथ के सामने । सारे रूढिग्रस्त समाज से भिड़ गई अकेले और सारी बिरादरी से नहीं डरी । जब नायक डर रहा तो उसने कहा उससे कि तूने शादी मुझसे करनी या मेरे घर वालों से । मुझसे करनी थी तो मैं कह रही हो गई मेरी शादी तुझसे । मेरी शादी के मामले में मुझसे ज्यादा कहने वाला और कौन हुआ ? इस अडिगता और साहस के सामने नायक एकदम डरा हुआ, ढुलमुल, अमेरिका के एक वजीफे के आफर पर फिसलने वाला दिखाया गया है ।

चरित्रों की जटिलता देखनी हो तो बेबी के पिता और बेबी को देखिए । उपन्यास में वह प्रसंग बहुत ही मार्मिक है जहां डी डी बेबी को पत्र लिखता है, पर वह इतना गूढ़ होता है कि वो पत्र अपने पिता को दे देती है कि पढ़कर बताएं कि लिखा क्या है ! और जब उसके पिता उसे नायक के पत्र समझाते हैं, तो नायिका जवाब में लिखती है, ‘तू बहुत पढ़ा लिखा है ! तेरी बुद्धि बड़ी है ! मैं मूरख हूँ ! अब मैं सोच रही होसियार बनूँ करके । तेरा पत्र समझ सकूँ करके । मुसकिल ही हुआ पर कोसीस करनी ठहरी । मैंने बाबू से कहा है मुझे पढ़ाओ ।….हम कुछ करना चाहें, तो कर ही सकने वाले हुए, नहीं ? वैसे अभी हुई मैं पूरी भ्यास (फूहड़) । किसी भी बात का सीप (शऊर) नहीं हुआ । सूई में धागा भी नहीं डाल सकने वाली हुई । लेकिन बनूँगी । मन में ठान लेने की बात हुई । ठान लूँ करके सोच रही ।

नायक के ढुलमुल पन ने उसे ठेस पहुंचाई, उसके पिता के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई, समाज में उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई, तो उसने तय कर लिया कि अब वह पढ़ेगी ही ।

यही उपन्यास का क्लाईमैक्स है । आगे की कथा सस्पेंस में है । सब कुछ बदल गया है, लोग बदल गए हैं, उनकी जिंदगी का सारा आनंद सूख गया है और जीवन ने उन्हें ग्रस लिया है । बरसों बाद डी डी हालीवुड के लिए फिल्म की शूटिंग करने इस इलाके में आया है कि अचानक संयोग से ही उसकी भेंट बेबी, यानी मैत्रेयी, यानी मैत्रेयी मिश्रा, जो बड़े अधिकारी की पत्नी है, से गैस्ट हाउस में बेबी की हमशक्ल लड़की के माध्यम से होती है । और इस भेंट में पूरा अतीत, वर्तमान और भविष्य कैसे जिया जाता है, यह तो पढ़ने पर ही मालूम होगा । यह भाग भावों के चरमोत्कर्ष का साक्षात्कार है जिसमें जोशी जी की कलम ने अभिव्यक्ति की सारी हदें पार कर दी हैं ।

यह यात्रा आपको खुद करनी है क्योंकि वह सारा वर्णन पाठक से डूबकर अवगाहन की मांग करता है । मैं आपको हिमालय पर्वत के इस शिखर तक ले आई हूं, अब आप इसके भाव-सौंदर्य का स्वयं अनुभव करें और अपार दुख, निराशा, स्मृतिसुख के आनंद में डूबें उतराएं …..तो बाकी की कहानी पढ़कर जानें उसका अंत । और ‘कसप’ का अर्थ ?… अर्थ है कुमाउंनी में …क्या जाने ।


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