यात्रा वृतांत: पहाड़ों की रानी – माउंट आबू

भारती पाठक
उदयपुर में ट्रेनिंग के दौरान पड़ने वाला ये पहला रविवार था यानि पूरे दिन की छुट्टी और घूमने को सारा दिन हमारे पास । हमें उदयपुर आये 5 दिन हो चुके थे और इन 5 दिनों में बाकी राज्यों के टीचर्स से भी जान-पहचान हो गई थी, कुछ से मित्रता और कुछ से घनिष्टता भी हालाँकि अब भी सब अपने-अपने प्रदेश के साथियों के साथ ही ज्यादा सहज थे, जैसे हरियाणा से अनुज और अशोक जिन्हें सब जय और वीरू भी कहते थे, सुरेंदर पन्नू और अमरजीत पन्नू यानि चाचा भतीजा ( ये बहुत दिन बाद पता चला कौन चाचा और कौन भतीजा), छत्तीसगढ़ से रीमा और निशा मैडम की जोड़ी, महाराष्ट्र से संगीता और प्रतिभा मैडम । सबके अपनी-अपनी रुचि और रुझान के स्त्री-पुरुष मित्र और उन्हीं के साथ रविवार का दिन बिताने की अपनी-अपनी योजना ।
हम उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना के कुछ टीचर्स ने माउन्ट आबू जाने की योजना बनायी । उत्तर प्रदेश के ही हमारे साथी रमाशंकर पाण्डेय जी ने व्यवस्था की जिम्मेदारी सहर्ष अपने ऊपर ले ली तो हम जैसे आलसियों को पैसे देने के अलावा सभी जंजालों से मुक्ति थी कि कैसे जाना, क्या खाना और क्या करना । शनिवार रात में ही 16 सीट वाला टेम्पो ट्रेवलर तय हो गया जो सुबह 5 बजे हमें लेने हॉस्टल आने वाला था । ये भी तय हो गया कि कौन-कौन जाएगा । कोषाध्यक्ष पाण्डेय जी ने सबसे पैसे जमा करा लिए और तय हुआ कि जो भी खर्च होगा चाहे टिकट हो या खाना-पीना, सब वही व्यय करेंगे और सारा खर्च का हिसाब-किताब उन्हीं के पास रहेगा ।
सुबह सभी तैयार होकर जब बस में बैठे तो पता चला कि हरियाणा से कुछ साथी भी जाने को तैयार हो गए हैं, बस में जगह थी तो उन्हें भी बुला लिया गया । सभी लोगों ने अपनी-अपनी सीट ले ली । जब पाण्डेय जी सब व्यवस्था देखभाल कर बस में आये तो देखा सीटें फुल हो चुकी थीं । हुआ यों कि उस बस की आखिरी चार सीटें एक में जोड़ कर कुछ बेड जैसा बना हुआ था जिस पर आलथी-पालथी मार कर ही बैठ जा सकता था या आराम से लेटा भी जा सकता था । लेकिन लेटने या बैठने को कोई तैयार नहीं हो रहा था । पुरुषों का कहना था कि हमारे पैर लम्बे हैं तो महिलायें वहां बैठें और महिलायें अपनी जगह दृढ कि हम तो सीट पर ही बैठेंगे । अब दूसरी बस देखने का टाइम नहीं था तो साझा समाधान निकला कि जाते समय तो बारी-बारी से पुरुष बैठेंगे पीछे और वापसी में महिलायें ।
खैर हंसी-मजाक के बीच बस चल पड़ी । उदयपुर से माउन्ट आबू की दूरी लगभग 170 किलोमीटर है और इस लंबे रास्ते को बोल-बतिया कर काटना था ।
मुझे अपने देश की तमाम विशेषताओं में ये एक बेहद पसंद है कि अपने यहाँ कोई भी काम जो मिलजुल कर करना होता है उसे बिना गीत-संगीत के नहीं करते हैं । कूटना ( किसी को मारने वाला कूटना नहीं ), पीसना, पछोरना, ब्याह-शादी हो या खेती-किसानी सभी अवसरों के गीत हैं जिसे काम करते हुए लोग गाते गुनगुनाते हैं । मेलों या तीर्थ के लिए आते-जाते भी महिलाओं, पुरुषों को भजन और निर्गुण वगैरह गाते सुना जा सकता है जो सफ़र की एकरसता और थकान को भूलने में मदद करते हैं, साथ ही मनोरंजन भी होता है ।
मुझे लगता है कि अन्त्याक्षरी को भी लोक-संस्कृति का दर्जा मिल जाना चाहिए क्योंकि शायद ही किसी समूह का लम्बा सफ़र इसके बिना पूरा होता हो । तो हमारी बस में भी कुछ उत्साही शिक्षक थे जिन्होंने अन्त्याक्षरी खेलना शुरू किया जो करीब 7 बजे बंद हुआ, जब हम नाश्ता करने रास्ते में एक ढाबे पर रुके । वहां से चले तो माउन्ट आबू पहुँच कर ही रुके । राजस्थान में अरावली की पर्वतमालाएं गर्मी में सुकून भरे पल देने वाली हैं । ये आश्चर्य से क्या कम कि मरुस्थल में भी हरियाली का तोहफा राजस्थान को देकर प्रकृति ने सिद्ध किया कि वो किसी के साथ अन्याय नहीं करती ।
माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र पहाडी शहर है जो राजस्थान-गुजरात सीमा पर अरावली की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच स्थित है । इसकी ऊंचाई 5650 फीट है और सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर है । राजस्थान के रेगिस्तान में यह नखलिस्तान की तरह है जहां नदियां, झरने, झील और हरे जंगल है । पुराणों में माउंट आबू का नाम अर्बुदांचल बताया गया है जहां ऋषि वशिष्ठ विश्वामित्र से मतभेद होने के बाद रहने चले आए थे । एक कथा के अनुसार उन्होंने माउंट आबू की चोटी पर महायज्ञ कर राजपूतों के चार प्रमुख अग्निवंशी राजपूतों को उत्पन्न किया था । एक दूसरी कहानी अर्बुद सांप से भी जुड़ी है ।
ऐसी न जाने कितनी कहानियां यहां की प्रत्येक जगह से जुड़ी हैं ।
वहां तक जाने के लिए वायु, रेल और सड़क मार्ग तीनों के विकल्प उपलब्ध है । माउन्ट आबू से नजदीकी हवाई अड्डा उदयपुर है जहाँ से फिर बस या अन्य किसी साधन से वहां पहुंचा जा सकता है । रेल से नजदीकी स्टेशन आबू रोड शहर है जहाँ से माउन्ट आबू 15 किलोमीटर है । सड़क मार्ग से जाने के लिए कई प्रमुख शहरों से बसें उपलब्ध हैं जिनका किराया बस में सुविधा के अनुसार होता है । हम भी सड़क मार्ग द्वारा जा रहे थे और देख कर अच्छा लगा कि सड़क बहुत ही अच्छी स्थिति में थी ।
ठीक साढे आठ बजे हमारी बस माउन्ट आबू पहुँच गई । बस को स्टैंड पर खड़ी करके ड्राईवर ने हमें आगे पैदल जाने का रास्ता बता दिया । कुछ भीड़-भाड़ वाली और एक चौराहे जैसी जगह जहाँ खाने-पीने और कुछ जरूरी चीजों की दुकानें भी थी । चारों तरफ ऊँची-नीची पहाड़ियाँ और ताड़ के पेड़ों से हरियाली ही हरियाली जो आँखों और मन दोनों को सुकून दे रही थी । हमारा समूह बड़ा था, साथ चलने में समय ज्यादा लगता, तो सभी छोटे समूहों में बंट गए और समय निश्चित कर लिया कि थोड़ी देर बाद यहीं सबको मिलना है ।
आगे जाने पर सामने खूबसूरत झील दिखी जिसे “नक्की झील” कहते है जो माउन्ट आबू के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से है । झील को बड़ी खूबसूरती से विकसित किया गया है जिसमें नौका विहार की भी सुविधा है । पानी में ताड़ के पेड़ों और पहाड़ों की परछाईं उसकी सुन्दरता को और बढ़ा रही थी । इस झील के बनने की भी कहानी है कि वहां के राजा की शर्त थी कि जो भी एक रात में वहां झील खोद देगा वह अपनी पुत्री का विवाह उससे कर देंगे । रसिया बालम नाम के मजदूर ने अपने नाखूनों से झील को खोदा और राजकुमारी से विवाह किया । नाखूनों से खोद कर बनाने के कारण इस झील का नाम ‘नक्की झील’ पड़ा ।
झील के चारों तरफ रुकने के लिए होटल और धर्मशालाएं और बाज़ार हैं जहाँ आपके बजट में कमरे मिल जाते हैं । इसके अलावा धर्मशालाएं भी हैं जो और भी कम कीमत पर रुकने की सुविधा प्रदान करती हैं । घूमने के लिए यहाँ मोटर साइकिल भी किराए पर मिल जाती है लेकिन लेने से पहले उसे ठीक से चेक जरूर कर लें । यहाँ के पर्यटन व्यवसाय का मुख्य केंद्र ये झील ही है । यहाँ एक गांधी घाट भी है जहाँ पर महात्मा गांधी की अस्थियों का विसर्जन किया गया था । वहीं राजस्थानी पोशाकों में फोटोग्राफी भी हो रही थी जहाँ हमारे कई साथियों ने फोटो खिंचवाए ।
करीब घंटे भर का समय हमने वहां बिताया और यादगार तस्वीरें ली । समय से सब इकठ्ठा हो गए । बस वाले ने बताया कि झील के किनारे से चलते हुए आइये मैं ॐ शांति भवन के पास खड़ा हूँ । हमें लगा आस-पास ही कोई जगह होगी लेकिन जब झील के किनारे-किनारे पैदल ही चलते हुए आगे बढ़े तो रास्ता ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।
करीब एक किलोमीटर चलने के बाद जो जगह सामने थी वो एक बड़ा सा भवन था जिसमें सामने ही लॉन में घास को ही कलात्मक ढंग से काट कर “ॐ शांति भवन” लिखा था । भीतर प्रवेश करने पर पता चला कि इसे ही ब्रह्मकुमारी के नाम से जाना जाता है । अपनी एक परिचित से सुना था मैंने जो इसकी अनुयायी हैं और ध्यान आदि की कक्षाओं के लिए हर वर्ष यहाँ आती हैं । थोड़ा आगे जाने पर हमसे हमारे आने का प्रयोजन पूछा गया तो हमने बताया कि घूमने आये हैं और ये जगह देखना चाहते हैं । एक अनुयायी या साधक जो भी कहें, आये और हमें एक हाल में ले गए जो इतना बड़ा था कि १००० लोग एक साथ बैठ सकते थे ।
उस अनुयायी ने हमें इस सम्प्रदाय के बारे में विस्तार से बताया कि कैसे हमें जीवन को आध्यात्म से जोड़ने की आवश्यकता है और दुनिया में जीवन जीने की सही राह क्या है । उस समय तो सबने ध्यान से सुना लेकिन कोई भी जुड़ने को फिलहाल तैयार नहीं दिखा, आगे कौन जाने । वहां से निकले तो एक ओर पुस्तकों का काउंटर लगा था जहां बहुत ही सस्ती दरों पर इस सम्प्रदाय और जीवन में अच्छे आचरण से जुडी किताबें बिक्री के लिए उपलब्ध थीं जो हम कुछ लोगों ने ख़रीदीं । बाहर निकले तो बस वाला खड़ा था ।
अगला पड़ाव था अर्बुजा देवी मंदिर जो कि माउन्ट आबू से 3 किलोमीटर की दूरी पर है । इस मंदिर की स्थापना करीब 5000 साल पहले की बतायी जाती है । यह देवी दुर्गा का मंदिर प्रमुख शाक्त पीठों में से एक है । बस रुकी तो नज़र सीढ़ियों पर पड़ी जो कहीं ख़त्म होती नज़र नहीं आ रही थीं । मै तो पूरी तैयारी से टोपी, चश्मा, पानी की बोतल यानि अपना नैप सैक लेकर सफ़र पर निकली थी जिसे सब चिढ़ाते थे कि बेताल तुम्हारे कंधे पर हमेशा रहता है । लेकिन उस दिन उस बेताल का महत्त्व सबको समझ आया जब ४०० सीढियां चढ़नी पड़ीं ।
मंदिर में दर्शन के लिए प्रवेश भी आसान नहीं था । प्राकृतिक गुफा में बने मंदिर में ज्यादा छेड़छाड़ न करके जैसे का तैसा रहने दिया गया है तो मंदिर के भीतर घुटने के बल लेट कर ही प्रवेश कर सकते हैं । कहते हैं कालांतर में अर्बुदा नामक सर्प ने ही यहाँ स्थित खाई को पाटने के लिए पर्वत यहाँ लाकर रखा तभी इस पर्वत का नाम आबू पर्वत और इस मंदिर का नाम अर्बुदा देवी मंदिर पड़ा । इतनी ऊंचाई पर भी पानी की समुचित व्यवस्था दिखी जहां एक झरनेनुमा जगह से पीने का पानी आ रहा था ।
मेरे साथ हरियाणा के अनुज सर थे जिनसे मैंने पहली बार बात की और थोड़े संकोच से कहा कि एक बोतल पानी भर कर ले आयें । हालाँकि घर से निकलने में हम सब यही सोचते हैं कि पैसे रहेंगे तो सब कुछ मिल जायेगा, काफी हद तक सही भी है लेकिन कभी-कभी पैसे रहने पर भी खाना-पानी नहीं मिल पाता । तो मैं बिस्कुट और पानी की बोतल जरूर साथ रखती हूँ, ये कई बार विपरीत परिस्थितियों में बड़ा सहायक होता है ।
विशालाक्षी जो कि वाराणसी से थी और मेरे साथ अच्छी दोस्ती हो चुकी थी, तब तक आ गयी और हम तीनों साथ ही नीचे आये । सबका इंतज़ार होने लगा क्योंकि सबकी सीढियां चढने और उतरने की अपनी-अपनी क्षमता है, तो देर-सवेर एक एक कर सब नीचे आये । अब बस हमें दिलवाड़ा मंदिर लेकर गयी । यह जैन धर्म के अनुयायियों का बहुत प्रसिद्ध और पवित्र मंदिर है जो वास्तव में 5 मंदिरों का समूह है । बाहर से मंदिर देख कर मन में निराशा हुई कि ये तो बड़ा सामान्य सा मंदिर है । थकान से एक बार इच्छा हुई कि बाहर से देख तो लिया अब क्या भीतर जाएँ, लेकिन विशालाक्षी ने आग्रह किया और भीतर गयी तो उसकी सुन्दरता देख कर दंग रह गयी । मंदिर बाहर से जितना साधारण है, भीतर से वास्तुकला का उतना ही उत्कृष्ट नमूना । संगमरमर की ऐसी अद्भुत, जटिल नक्काशीदार बनावट कि नज़र हटाना मुश्किल । इस मंदिर का निर्माण ११ वीं और १३ वीं शताब्दी के मध्य वास्तुपाल तेजपाल द्वारा किया गया था । इसकी छतों, दीवारों, मेहराबों और स्तंभों की नक्काशी देखकर हैरानी हो रही थी । ऐसा कहते हैं कि मंदिर निर्माण करने वाले कारीगरों का भुगतान उनके सामने एकत्र संगमरमर की धूल के हिसाब से होता था इसलिए कारीगर और परिष्कृत डिजाइन तैयार करते थे । इस मंदिर में आदिनाथ की प्रतिमा की आँखें असली हीरे की बनी हैं और गले में बहुमूल्य रत्नों का हार है ।
वहां घूमते-घूमते दोपहर हो गयी । भूख भी लग आयी थी । पता चला कि पास ही जैन भोजनालय है जहाँ शुद्ध सात्विक भोजन मिलता है । वहां गए तो हमारी संख्या के हिसाब से भोजन में अधिक टाइम लगा, वैसे भी वहां काफी भीड़ थी और हमारी बारी आने में समय लगना ही था । लेकिन भोजन बहुत ही साफ़-सुथरा और ताज़ा था । यह एक बड़े कमरे जैसी जगह थी जिसके एक कोने में रसोई थी, खिलाने वाले आग्रह करके भोजन परोस रहे थे । खाना खाकर जब तक सब बस में बैठे दिन के डेढ़ बज चुके थे ।
माउन्ट आबू में कुछ और घूमने की जगहें भी हैं जिनमें सनसेट पॉइंट, गुरु शिखर, अचलगढ़ का किला आदि जगहें हैं जो थोड़ी-थोड़ी दूरी पर हैं । वैसे तो पूरा माउन्ट आबू ही सुन्दरता में अद्वितीय है इसलिए एक दिन में सब कुछ घूमना असंभव था । हम वापसी के लिए चल पड़े । जब वो मोड़ आने वाला था जहाँ से एक रास्ता उदयपुर को और दूसरा कुम्भलगढ़ को जाता है । तब अचानक योजना बनी कि क्यों न कुम्भलगढ़ भी घूम लिया जाये ।
नेट पर सर्च किया तो वहां प्रवेश के लिए 5 बजे तक ही टिकट मिलता था । देर काफी हो चुकी थी लेकिन फिर सोचा गया रिस्क लेने में क्या हर्ज ।
बस वाले ने पहले तो ना-नुकुर किया, फिर मान गया और जाने कौन-कौन से शार्ट कट रास्तों से हमे कुम्भलगढ़ ले चला । रास्ते को देखकर मन ही मन सोच रही थी मानो कुम्भलगढ़ न जाकर चम्बल की घाटी में जा रहे हों । देर काफी हो चुकी थी और गेट तक पहुंचते-पहुंचते घडी ने 5 बजा ही दिए । बस ठीक से रुकी भी नहीं कि पाण्डेय जी टिकट लेने के लिए कूद पड़े । टिकट खिड़की वाले कर्मचारी ने पाण्डेय जी को ये स्टंट करते जरूर देख लिया था तभी उसने कृपा करके खिड़की बंद नहीं की । किस्मत से हमें एंट्री टिकट मिल गया और वहां चलने वाले लाइट और साउंड शो का भी ।
कुम्भलगढ़ किले का निर्माण राणा कुम्भा ने 15वीं शताब्दी में कराया था जो कि राजसमंद जिले में पड़ता है । यह किला महान शासक महाराणा प्रताप की जन्मभूमि भी है । किले का भव्य द्वार खुद अपनी गाथा कह रहा था । भीतर जाने पर एक रास्ता चौड़ी सीढ़ियों से होकर ऊपर किले में और दूसरा दाहिनी ओर जहाँ कुछ चाय नाश्ते की दुकानें थीं । बातों-बातों में पता लगा कि किले की चारदीवारी ग्रेट वाल ऑफ़ चाइना के बाद विश्व में दूसरी सबसे बड़ी यानि ३६ किलोमीटर लम्बी और 15 फीट चौड़ी है । किले को बनाने में 15 साल लगे थे ।
इसके बनने की भी कथा है । बताते हैं कि जब महाराणा कुम्भा ने इसका निर्माण शुरू कराया तो तमाम अड़चनें आती गयीं और इसका निर्माण रुक गया तो उन्होंने एक संत से इसकी वजह पूछी । संत ने बताया कि यदि कोई अपनी इच्छा से खुद की बलि दे तो ये अड़चनें दूर होंगी । अब ये बड़ा दुष्कर कि अपनी इच्छा से कौन बलि दे । तब उस संत ने कहा कि वह स्वयं बलि देने को तैयार है लेकिन वह चलते-चलते जहाँ रुकेगा वहीं उसे मार दिया जाय और वहीं मंदिर का निर्माण कराया जाय । वह संत पूरे 36 किलोमीटर तक चल कर रुका और वहीँ उसका सिर धड से अलग कर दिया गया । उसका सिर जहाँ गिरा वहीं मुख्यद्वार गणेश पोल का निर्माण हुआ । खैर कथा जो भी हो, हम तो रोमांचित थे ये जानकर कि ये वही किला है जहाँ पर पन्ना धाय ने राजकुमार उदय सिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र की बलि दे दी थी ।
ऊपर चढ़ कर किले की प्राचीर से नीचे का नज़ारा देखना अद्भुत लगा । दूर दूर तक दिखती किले की दीवारें, सैकड़ों की संख्या में जगह-जगह बने मंदिर । सचमुच गर्व करने लायक है अपने देश के गौरवशाली इतिहास । घूमते हुए काफी देर हो गयी थी और 6:45 से पहले ही हमने अपनी जगह ले ली । यह शो खुले आसमान के नीचे छोटे से गार्डन जैसी जगह पर हो रहा था जहाँ सामने के पेड़-पौधों और दीवारों का इस शो को दिखाने में बहुत ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया । उसमें किले के और राणा वंश के वीरतापूर्ण गौरवशाली इतिहास का ध्वनि और प्रकाश के माध्यम से बड़ा ही सुन्दर चित्रण दिखाया गया । इतना रोचक कि शो कब शुरू हुआ और कब ख़त्म पता तब चला जब तालियों की गडगडाहट से माहौल गूँज उठा ।
शो ख़त्म होते ही हमें वापसी की याद आई । 7:30 बज चुके थे और हमें उदयपुर लौटना था । जल्दी-जल्दी सबने अपनी सीट ले ली । मैंने इस बार पीछे की सीट ली जिससे आराम से पैर फैला कर बैठ सकूँ, साथ में निशा मैम भी कंपनी देने आईं । हमने एक अच्छा दिन साथ में बिताया, सभी खुश थे लेकिन समय से हॉस्टल पहुँचने की चिंता भी हो रही थी । अभी भी कुम्भलगढ़ 85 किलोमीटर था जिसमें 2 घंटे लगने थे और रास्ते में खाना भी खाना था तो चल पड़ी हमारी बस दिनभर के खट्टे-मीठे अनुभवों को साथ लिए अपने सफ़र पर ।

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