पुस्तक चर्चा/ Nightmarch: A Journey into India’s Naxal Heartlands

Balendushekhar Mangalmurty

अलपा शाह की बुक, Nightmarch: A Journey Into India’s Naxal Heartlands” पढ़ कर ख़त्म की. लगभग 325 पेज में फैली किताब को ख़त्म करने में चार दिन लग गए. क्योंकि किताब ने कई जगह सोचने के लिए कई सवाल खड़े किये, जिन पर मैं ठहर कर मैं सोचता रहा.
अलपा शाह लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में एंथ्रोपोलॉजी की एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. उनके दादा 1920 के दशक में केन्या चले गए थे, केन्या में ब्रिटिश रेलवे लाइन बिछा रहे थे. भारतीय अच्छी खासी संख्या में केन्या गए. उनमे अलपा शाह के दादाजी भी थे. फिर उनके पिता लन्दन चले आये. अलपा शाह ने एकेडेमिक्स को अपना करियर बनाया. किताब का नाम NightMarch इसलिए रखा गया क्योंकि अलपा शाह ने नक्सलियों के साथ बिहार के गया से झारखण्ड के लालगढ़ तक 250 किलोमीटर का मार्च किया, रात में. जंगल के रस्ते. चूँकि दिन में, पब्लिक ट्रांसपोर्ट मसलन बस या प्राइवेट व्हीकल से यात्रा करना खतरे से खाली नहीं था, नक्सली बहुत आसानी से सुरक्षा बलों के निशाने पर आ जाते.
 
अलपा शाह एक साल पहले से लालगढ़ में रह रही थीं और झारखण्ड के नक्सलियों का अध्ययन कर रही थीं. लालगढ़ को रेड कैपिटल नाम से पुकारा गया है इस किताब में. वहां रहते हुए अलपा शाह को टॉप नक्सल लीडर ज्ञानजी से इंटरव्यू करने का मौका मिला. ज्ञानजी तमाम नक्सली नेताओं की तरह एक सीनियर नक्सली लीडर का क्षद्म नाम था. ज्ञानजी पर बिहार और झारखण्ड की पुलिस ने इनाम की घोषणा कर रखी थी.
 
अलपा शाह ने अपने अध्ययन के लिए एंथ्रोपोलॉजी और सोशियोलॉजी में प्रचलित अध्ययन का तरीका, Participant Observation को चुना. इसके तहत जिस समुदाय का अध्ययन किया जाता है, उस समुदाय के बीच में लम्बे समय तक रहकर ( कम से कम एक साल) उनके तौर तरीकों का अध्ययन किया जाता है, इससे कई नए दृष्टिकोण का पता चलता है, पहले से चली आ रही भ्रांतियां दूर होती हैं या उनमे कमी बेशी आती है और अध्ययन जमीनी तौर पर जुड़ता है. पार्टिसिपेंट ऑब्जरवेशन की नींव डाली थी महान एंथ्रोपोलॉजिस्ट Malinowski ने. लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से इकोनॉमिक्स में पीएचडी करने वाले ऑस्ट्रिया के निवासी Malinowski को 1914 में एंथ्रोपोलॉजिस्ट Robert Ranulph Marett के साथ New Guinea जाने का मौका मिला, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध छिड़ जाने के चलते और चूँकि ऑस्ट्रिया ब्रिटैन के लिए दुश्मन देश था, तो Malinowski को इंग्लैंड लौटने की इजाजत नहीं मिली. पर ऑस्ट्रेलिया सरकार ने उन्हें अपने क्षेत्र में एथ्नोग्राफिक रिसर्च की आज्ञा और साथ ही फंड्स भी दे दिया. ऐसे में Malinowski मेलानेशिया में Trobriand Islands चले गए और वहां कई वर्षों तक रहकर उन्होंने स्थानीय संस्कृति का गहन अध्ययन किया। युद्ध के बाद लौटकर उन्होंने 1922 में एक किताब पब्लिश की, Argonauts of the Western Pacific, जिसने उन्हें यूरोप के लीडिंग एंथ्रोपोलॉजिस्ट के तौर पर स्थापित कर दिया. फिर उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में एंथ्रोपोलॉजी पढ़ाना शुरू कर दिया.
 
अलपा शाह का मानना है कि दुनिया के अन्य क्षेत्रों में एक्टिव organisations जैसे sandinistaa, मेक्सिको के Zapatistas, पेरू का शाइनिंग पाथ, फिलीपीन्स, कोलंबिया के संगठनों आदि के विपरीत नक्सलियों के बारे में दुनिया में बेहद कम जानकारी है. और नक्सलियों पर जो अध्ययन हैं, वे शार्पली डिवाइडेड हैं अपने ओपिनियन में, या तो एक्सप्लोइटेशन का एंगल है या फिर सरकारी एंगल है. अलपा शाह ये भी जानना चाह रही थीं कि जब दुनिया के अन्य देशों में उग्र वामपंथी आंदोलन ठन्डे पड़ गए हैं, तो फिर भारत में कैसे ये लम्बे समय से चले आ रहे हैं. इन तमाम सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश में अलपा शाह झारखण्ड आ गयीं और पार्टिसिपेंट ऑब्जरवेशन के माध्यम से अपना अध्ययन शुरू किया. वे अपनी किताब में साफ़ तौर पर स्पष्ट करती हैं, उनका अध्ययन किसी ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट की तरह नहीं है, ना ही वे स्टेट की रिप्रेजेन्टेटिव के तौर पर आयी हैं, वे बतौर एक researcher अध्ययन के लिए आयी हैं.
 
बिहार के गया जिले के जंगल में नक्सली स्टेट लेवल कॉनफेरेन्स के लिए जुटे थे. कांफ्रेंस के बाद सब पैदल झारखण्ड के लिए निकल पड़े. अलपा शाह भी साथ चलने को तैयार हो गयीं. सात रातों का सफर. Nightmarch. इस दौरान उन्होंने कई नक्सल कॉमरेड्स को करीब से देखा, समझा. कई का उन्होंने जिक्र किया है. मसलन प्रशांत जो युवा आदिवासी है, विकास एक और आदिवासी जो पलटन का कमांडर है, ज्ञानजी जो 70 वर्ष के हो चले हैं.
 
रात के मार्च का अपना रोमांच है, अपने खतरे हैं. विकास टीम को लीड कर रहा है. वो थोड़ा अलग किस्म का है. उसके पास बेहतरीन फोन है. कॉन्ट्रैक्टर्स से पैसे वसूलने का काम उसके हिस्से है. उसके बारे में जानकारी ये है कि उसने एक और शादी कर रखी है, जो पढ़ी लिखी है और उसे रांची में रखे हुए है. यहाँ वो मोटरसाइकिल से चलता है, पर रांची में लैंड रोवर है उसके पास.
 
मार्च करते हुए एक बार पूरा दल CRPF कैंप के बेहद करीब पहुँच जाता है. ये तीस लोग और कैंप में 3000 सैनिक. मन में आशंका होती है कि कहीं विकास ने जानबूझकर तो पुरे दल को खतरे में नहीं डाला. रूट में जहाँ जहाँ sympathisers के गांव मिलते हैं, वहां रुक कर भोजन करते हैं. हर घर से एक थाली, ताकि किसी एक परिवार पर आर्थिक दबाब न आये. जहाँ hostile लोगों का गांव होता है, वहां गांव के बाहर ही खुद से भोजन बनाते हैं. तुरंत गड्ढा खोदा, तीन तरफ से ईंट लगाया, और तुरत फुरत खिचड़ी बनाया. पानी पीने के लिए बालू में गड्ढा खोदा और पानी का इंतजाम कर लिया. मार्च के क्रम में एक साथी की हालत खराब हो जाती है, तो उसे ले जाने के लिए पेड़ की टहनियों से एक स्ट्रेचर बना लिया जाता है और फिर उसे चार साथी टांग पर ले चलते हैं पुरे रास्ते.
 
किताब में अन्य सीनियर लीडर्स की भी चर्चा है, परसाजी, मधुसूदन जी. सारे क्षद्म नाम हैं जो उनकी असल आइडेंटिटी को छुपाने के लिए दिए गए हैं.
 
किताब में जिक्र है किस तरह नेताओं ने झारखण्ड में पैंठ बनायी. वे आंध्र प्रदेश, दण्डकारण्य प्रदेश से आये. स्टेट का रेप्रेशन मैदानी इलाकों में बढ़ा, तो फिर ये हिल्स में शिफ्ट हो गए. लम्बे समय तक बिहार के मैदानी इलाकों में जमीन, दलित महिलाओं की अस्मिता, उचित मज़दूरी के मुद्दे पर खुनी संघर्ष चला था, सुरक्षा बलों के दमन चक्र और caste armies के साथ लम्बे संघर्ष के बाद अब battle का नया थिएटर पहाड़ी और जंगल के क्षेत्र बन गए हैं. नक्सली संघर्ष में सबसे अधिक संख्या में दलित और आदिवासी शामिल हैं और लीडरशिप उच्च जाति के लोगों के हाथ में है.
 
उन्होंने नक्सली आंदोलन में शामिल लोगों के सोशल बैकग्राउंड पर एक नज़र डाली है. जहाँ ज्ञानजी जैसे पुराने सीनियर लीडर्स 70 के दशक के नक्सल आंदोलन से निकल कर आये हैं, जिन्होंने यूनिवर्सिटी में अच्छी शिक्षा हासिल की है, और एक classless society का ड्रीम लिए आराम की जिंदगी को पीछे छोड़ आये हैं, परिवार से अपना नाता लगभग तोड़ डाला है और नक्सल परिवार को ही अपना परिवार बना लिया है. वहीँ विकास जैसे युवा आदिवासी युवक हैं, जिनका आंदोलन के ideological कमिटमेंट से वास्ता नहीं है. दलित युवक जुड़े हुए हैं आंदोलन से. उन्हें अपने जीवन में प्रतारणा का सामना करना पड़ा है और उन्होंने बदला लेने के लिए हथियार उठा लिया है. नक्सलियों के सोशल बैकग्राउंड का अध्ययन और उनका ideological commitment अच्छा अध्ययन बन पड़ा है.
 
नक्सली नेताओं में मधुसूदन जी एकमात्र दलित रहे जो सीनियर पोजीशन में गए. जब वे पकडे गए, तो उन्होंने जेल से झारखण्ड विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान किया, पर पार्टी का स्टैंड चुनाव के बहिष्कार का रहा है, तो लिहाजा मधुसूदन जी को पार्टी से निकाल दिया गया. और इसकी खबर स्थानीय अखबार प्रभात खबर को दे दी गयी.
 
तो यात्रा जारी है. थकान हो रही है. सोना कम है. खतरे मंडरा रहे हैं. खतरा सिर्फ CRPF की तरफ से नहीं है, बल्कि नक्सलियों के प्रतिद्वंद्वी गुटों से भी है. कई गुट उभर आये हैं, जो एरिया पर कण्ट्रोल के लिए आपस में खुनी संघर्ष में उलझते रहते हैं. इसके अलावा स्टेट के द्वारा समर्थित हथियार बंद दस्तों का भी खतरा है, ये दस्ते उनलोगों के हैं, जो कभी पहले नक्सली रहे थे, पर दल में वर्चस्व के मुद्दे पर विरोध होने पर किसी महत्वकांक्षी युवक के द्वारा अपने गांव जवार के साथियों के साथ अपना दल बना लिया. वे फिर कॉन्ट्रैक्टर्स से लेवी वसूलने लगते हैं और नक्सलियों के जान के दुश्मन हो जाते हैं. ऐसे में सीनियर नक्सली नेता ऐसे लोगों की हत्या के लिए स्क्वाड बनाते हैं, जिनका काम रहता है इन्हे एलिमिनेट कर देना. इस खुनी जंग में दोनों पक्षों को नुकसान होता है.
 
अल्पा शाह ने जिक्र किया है कि कैसे नक्सलियों ने दूसरे क्षेत्र से आकर झारखंड में अपना पैठ बनाया. उन्होंने आदिवासियों के साथ बराबरी का व्यवहार किया. उनके साथ जमीन पर बैठे, उनकी थाली में खाया, उनके मुद्दे उठाये. नक्सलियों ने सबसे पहले फारेस्ट गार्ड्स और कॉन्ट्रैक्टर्स को ठिकाने लगाया. केन्दु के पत्ते और अन्य फारेस्ट प्रोडक्ट्स के कलेक्शन से काफी रेवेनुए आता है, इसमें उन्होंने आदिवासी मज़दूरों की मज़दूरी बढ़ाई, स्टेट समर्थित कॉन्ट्रैक्टर्स की जगह अपने कॉन्ट्रैक्टर्स लगवाए. अपना हिस्सा तय किया. आदिवासी युवकों में जो पढ़े लिखे थे, जो कागज़ पर लिखा पढ़ी कर सकते हैं, उन्हें nurture किया, उन्हें ठेकेदारी दिलवाई. इसके अलावा आदिवासियों के स्वास्थ्य, शिक्षा पर ध्यान दिया. 2000 के बाद वर्ल्ड बैंक के फंड्स से भारत सरकार ने तेजी से स्कूल बिल्डिंग्स बनाने शुरू किये, पर स्कूल अक्सर मिलिट्री छावनी जैसे बनने लगे. दो मंजिला, ऊँची चहारदीवारी , जगह जगह दिवार में फायरिंग के लिए होल्स, छत पर वाच टावर. ऐसे में स्कूल नक्सलियों के निशाने पर आने लगे. इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट्स जैसे पुल, पुलिया, सड़क आदि को पूरा करने में उन्होंने रोड अटकाए. कई जगह ऐसा देखा गया कि पिच की सड़क ख़त्म हो गयी है, और अब आगे सिर्फ गिट्टी बिछी हुई है. लोग समझ जाते थे कि यहाँ से जंगल सरकार शुरू है. नक्सलियों को गिट्टी बिछी सड़क में फायदा है क्योंकि उसमें landmines बिछाना आसान है.
 
इसके अलावा, माइनिंग प्रोजेक्ट्स में लगी कंपनियों पर लेवी लगाया गया. उनके डंपर्स जलाये गए, गाड़ियों को छतिग्रस्त किया गया. नक्सलियों के समर्थन में सिविल राइट्स ग्रुप्स, नाटक ग्रुप्स, महिला मोर्चा आदि मोर्चे निकालते रहे हैं, ओवरग्राउंड काम करते रहे हैं. अलपा शाह ने बताया कि नक्सलियों की रणनीति रही है कि बिग कम्पनीज को नुकसान न पहुचाओं, ताकि उनके संसाधन का श्रोत बाधित न हो. उदाहरण के तौर पर, उन्होंने बताया कि एस्सार कंपनी का 267 किमी का पाइपलाइन जिससे बैलाडीला के आयरन ओर माइंस से आयरन स्लरी विशाखापत्तनम ले जाया जाता है, और फिर वहां प्रोसेस करके आयरन के छोटे छोटे टुकड़ों में बदल कर गुजरात में स्थित एस्सार के स्टील प्लांट में भेजा जाता है, बेहद आसान टारगेट हो सकता था, पर उसे नहीं छेड़ा गया.
 
लम्बे समय से चल रहे वार के अपने नुकसान हैं. ज्ञानजी बातचीत के क्रम में बता रहे हैं, स्टेट के रेप्रेशन के चलते संघर्ष खुनी हो चला है. सारी शक्ति सैन्य रणनीति बनाने में खर्च हो जाती है, पूरा फोकस लड़ने में, हथियार जुटाने, हमला करने, बचने में लग जाता है, ऐसे में नक्सल साथियों के पोलिटिकल एजुकेशन का काम पूरी तरह बाधित हो चला है. स्टेट वायलेंस के खिलाफ काउंटर वायलेंस का दौर है. दूसरा रास्ता नहीं है. आदिवासी युवक और युवती हमेशा स्टेट के अत्याचार और जमीन के छीने जाने से नक्सलियों से जुड़ते हैं, ऐसी बात भी नहीं. ग्रीवांस थ्योरी को काफी उछाला गया है और स्वीकार्यता भी मिली है. पर तस्वीर का पूरा पहलु ये नहीं है. विकास, कोहली जैसे युवक कम उम्र में घर से भाग कर नक्सलियों के साथ जुड़ गए, वजह छोटी छोटी रही, कभी माँ बाप ने मारा, कभी किसी युवती को प्यार हो गया, कभी शादी जिससे करनी चाही, उससे होने में बाधा रही, आदि आदि. हर तरह के कारण रहे. कुछ भोजन का इशू भी रहा. नक्सली पैसे तो नहीं देते थे, पर भोजन मिलता था और इसके अलावा उन्हें मालूम था जब कभी जरुरत होगी, आर्थिक संकट आएगा, दल उंनका साथ देगा. इसलिए उन्होंने नक्सली दल को परिवार से बाहर एक और परिवार माना. जब चाहा, चले गए, जब चाहा, चले भी आये. कभी थक गए, तो बंगाल में ईंट भट्टे पर काम करने चले गए. परिवार के लोग मान गए तो फिर से परिवार में लौट आये. बोर होने लगे तो फिर नक्सलियों को ज्वाइन कर लिया. मतलब जीवन का अंग हो गया है. इस ideological commitment की कमी से ज्ञानजी परेशां दिखे. दलित साथियों में भी classles, casteless सोसाइटी के प्रति कमिटमेंट की कमी की बात करते हैं ज्ञानजी. वे उन्हें पढ़ने को प्रेरित करते हैं.
 
नक्सल आंदोलन के अंदरूनी टेंशन्स की ओर भी इशारा करती हैं अलपा शाह. पुराने ठेकेदारों की जगह नए ठेकेदारों का उद्भव, उनका प्रश्रय, फिर उनके द्वारा कई बार नक्सली नेताओं को धोखा दे देना, विकास जैसे महत्वकांक्षी नक्सली युवा, जिनके जिम्मे लेवी वसूलने का काम सौंपा जाता है, वे कई बार बेहद महत्वकांक्षी होकर अपने लिए पैसे बनाने लगते हैं और समय आने पर दल को छोड़कर अपना दल खड़ा कर लेते हैं. और नक्सलियों के तौर तरीकों से परिचित, खुद नक्सलियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं.
 
अलपा शाह तारीफ करती हैं ज्ञानजी जैसे कमिटेड लीडर्स की, जो परिवार छोड़कर, भौतिक सुख सुविधा छोड़कर classless society का यूटोपिया लिए पूरा जीवन लगा देते हैं, जो जानते हैं इस जीवन या नेक्स्ट जनरेशन के जीवन में भी ये सपना पूरा नहीं होने वाला है, जिनके लिए थोड़ी सी चूक का मतलब है कॉर्पोरेट वर्ल्ड समर्थित स्टेट की पुलिस के हाथों भीषण टार्चर, पर वे अपना सपना छोड़ने को तैयार नहीं. दूसरी तरफ, वे गौर करती हैं कि नक्सलियों को वीमेन लिबरेशन, आदिवासी महिलाओं के विवाह, शराब पीने ( हड़िया, महुआ की शराब, जो आदिवासियों के जीवन का अभिन्न अंग है) आदि विषयों पर अपने विचार नहीं थोपने चाहिए. उन्हें pre existing आइडियाज को छोड़कर आदिवासी समाज का गहन अध्ययन करना होगा. उन्होंने इसके लिए कई उदाहरण भी दिए हैं.
 
उन्होंने नक्सलियों के सामने चुनौतियों का जिक्र किया है. जिस स्टेट एपरेटस से लेवि वसूलते हैं, वही निरंतर संपर्क में आकर वे लोभ में पड़ जाते हैं और डिफेक्शन से आंदोलन को कमजोर करते हैं. उन्होंने डोमिनेंट कल्चर के जवाब में काउंटर कल्चर के पोषण की बात कही, जो आदिवासियों के जीवन मूल्यों के जरिये हो सकता है, पर नक्सलियों ने अनजाने में इन मूल्यों को कमजोर किया है. एकल विवाह, शराब पीने से रोकने के लिए उनके हड़िया को तोड़ फोड़ कर गलत सन्देश देना आदि और फिर आदिवासियों का बढ़ता हिन्दुत्वीकरण. सबसे बढ़कर स्टेट का रेलेंटलेस वायलेंस. अलपा शाह चिंता व्यक्त करती हैं क्या काउंटर वायलेंस से पोषित आंदोलन कहीं अपने मूल उद्देश्यों से भटक तो नहीं रहा. सवाल कठिन हैं, जवाब आसान नहीं.
 
लन्दन में रहते हुए अलपा शाह ने लालगढ़ के लोगों ( जिनके साथ वे रहीं) से सम्पर्क बनाये रखा. इन्ही से उन्हें खबर मिली कि प्रशांत और उसके कई साथी पुलिस एनकाउंटर में मारे गए. शायद किसी ने भितरघात किया, किसी ने शायद भोजन में बेहोशी की दवा मिला दी, पुलिस का इनफॉर्मर बन गया. विकास बेस्ट गन्स को लेकर डिफेक्ट कर गया और अपने साथियों के साथ एक अलग दल बना लिया, नक्सलियों ने एक टीम उसके एलिमिनेशन के लिए बनायी. फाइनली एक दिन वो पकड़ा गया और फिर उसका न्याय कर दिया गया. फायरिंग स्क्वाड ! ज्ञान जी एक दिन अपनी पत्नी से मिलने शहर के एक मकान में आये, किसी ने मुखबिरी कर दी, और वे पकडे गए. पुलिस उनका एनकाउंटर न कर दे, इसके लिए उनकी पत्नी ने तुरंत मीडिया में समाचार फैला दिया. उन पर चालीस केस दर्ज हैं और उन्हें या तो उम्र कैद या मौत की सजा दी जायेगी.
 
अच्छी किताब है और स्टीरियोटाइप को चैलेंज करती है. कई लेयर्स हैं, चुनौतियाँ कई तरह की हैं, उन पर रौशनी डालती है किताब. एक साहसिक प्रयास है. अल्पा शाह की किताब नयी बहसों को जन्म देती है.
Romanticise करने और villainise करने के बीच जो मिडिल ग्राउंड है, उस पर रौशनी डालती है Nightmarch !!

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