पुस्तक चर्चा: शिवानी का उपन्यास “कृष्णकली”

भारती पाठक

एक कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी हिंदी साहित्य जगत की ऐसी शख्सियत रही हैं जिनकी हिंदी, संस्कृत, गुजराती, बंगाली, उर्दू और अंग्रेजी भाषा पर एक समान पकड़ रही है । इनका जन्म 17 अक्टूबर 1923 में राजकोट, गुजरात में हुआ । इनका असली नाम गौरा पन्त था लेकिन ये ‘शिवानी’ के नाम से लेखन का कार्य करती थीं । इनका बचपन उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में बीता इसलिए स्वाभाविक था कि उसका प्रभाव उनकी रचनात्मकता में सब जगह है ।

शिवानी जी का परिवार अत्यंत शिक्षित, साहित्य, संगीत और संस्कृति में पारंगत था जिसका लाभ उन्हें बचपन से ही मिला । इनकी शिक्षा दीक्षा शन्तिनिकेतन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के सानिध्य में हुई थी । उसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक हुई । गुरुदेव का कहना था कि किसी भी लेखक को लेखन कार्य अपनी मातृभाषा में ही करना चाहिए इसलिए अन्य भाषाओ की जानकार होते हुए भी शिवानी जी ने हिंदी में लिखना शुरू किया । उनके अधिकतर उपन्यास और कहानियां नारी प्रधान ही रहे जिसमें स्त्री भावों की अद्भुत पकड़ परिलक्षित होती है । ऐसा माना जाता है कि कहानी विधा को पाठकों के बीच लोकप्रिय बनाने में उनका सर्वोपरि योगदान है । उनकी कहानियां और उपन्यास जब धारावाहिक के रूप में ‘धर्मयुग’ में छपते थे तो लोगों को वैसे ही बेसब्री से अगले अंक का इंतजार रहता था जैसे बाद में टी..वी. सीरियल रामायण और महाभारत का ।

साठ और सत्तर के दशक में इनकी लिखी कहानियाँ और उपन्यास आज भी हिंदी पाठकों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हैं । इनकी लिखी कृतियों में कृष्णकली, भैरवी, आमादेर शान्तिनिकेतन, विषकन्या, चौदह फेरे आदि प्रमुख हैं । शिवानी के बारे में यह आम मान्यता है कि इन्होंने अपने समय के यथार्थ से अधिक छेड़्छाड़ की कोशिश नहीं की, न उसे बदलने का कोई सक्रिय प्रयत्न । जैसा है, उसी में से अपने पात्रों का चुनाव किया और उन्हें इस तरह पेश किया कि वे लोगों के मन में अपने लिए गहरी समवेदना के साथ अपना स्थान बना लें । अपने समकालीन साहित्यकारों की तुलना में वह काफी सहज और सादगी भरी थीं जिसकी झलक उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखती है । 1979 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया । उनका लेखन कार्य जो बारह वर्ष की अवस्था से वो 2003 में उनकी मृत्यु तक निर्बाध रूप से चलता रहा ।

आज हम शिवानी जी के अत्यंत चर्चित उपन्यास कृष्णकली के बारे में जानेंगे । उपन्यास की मुख्य पात्र कली एक अद्भुत चरित्र है जो अपनी जन्मजात ग्लानि और कुंठा से अलग लौह संकल्पिनी है । वह एक कुष्ठरोगी माता पार्वती की पुत्री है जिसका पठान पिता उसकी माँ को गर्भवती कर कुष्ठ आश्रम से फरार हो जाता है । पार्वती जन्म लेते ही कली को मारने को कोशिश करती है लेकिन आश्रम की डॉक्टर रोजी की वजह से कली की जान बच जाती है जो उसे पन्ना को सौंप देती है जिसकी नवजात बेटी की मृत्यु जन्म के एक हफ्ते में ही हो चुकी है । पन्ना जो कि पेशे से कोठेवाली है कली को लेकर वापस कोठे पर आती है ।

लेखिका ने यहाँ कोठे पर रहने वाली स्त्रियों के जीवन और अपने व्यवसाय से अलग उनकी सहज स्त्री संवेदना और ममत्व का बड़ी कोमलता से वर्णन किया है । कैसे वे अपने खाली जीवन में नन्ही कली को पाकर स्वयं पुष्प सी खिल गयी हैं ।

“देखते ही देखते पन्ना की गोदी की अमूल्य गठरी हाथो ही हाथों में उछलने लगी । घर पहुंचते ही बड़ी दी का क्रोध, स्वयं ही पहाड़ी कुहरे सा विलीन हो गया ।”

वहीँ जब पन्ना कली की शिक्षा दीक्षा के लिए उसे मिशनरी स्कूल में भरती कराने का निर्णय लेती है तो कली से अलग होने की वेदना से उनका क्रोध देखने लायक होता है ।

“पन्ना गाड़ी का समय हो गया है, अब चलो, “ रोजी ने कहा तो पन्ना ने अपने को वाणी के बाहु -पाश से छुड़ा लिया । एक बार उसने बड़ी दी की ओर बड़ी आशा से देखा कि क्या पता बड़ी बहन स्नेहपूर्ण आश्वासन देकर कह उठे, जाने दे पन्ना, पता नहीं गुस्से में तुझसे क्या क्या बुरा भला कह गयी, न हो तो कली को रोजी के साथ भेज दे, तू मत जा ।”

पर मानिक की आंखों में अभी भी चिंगारियां छूट रही थीं ।”

कली का रंग सांवला लेकिन नैन नक्श बहुत तीखे हैं और सहज ही सबके आकर्षण का केंद्र हो जाती है । उसे अपने खूबसूरत होने का अहसास है । पढने लिखने से ज्यादा उसका मन सजने सँवरने में और बुरी आदतों में है । स्कूल में चोरी करना और दूसरों की बातें छिपकर सुनना उसका प्रिय शगल है । वह अपने पिता के बारे में जानने के लिए पन्ना से भी बहस करती रहती है । एक दिन कली की उद्दंडता से परेशान पन्ना एक बड़े मंत्री पद पर पहुँच चुके अपने प्रेमी से कली के बारे में बात कर रही होती है तो कली छिपकर अपने जन्म की सारी कहानी जान जाती है । वो घर छोड़ कर चली जाती है और पन्ना अपने किसी परिचित के साथ पोंडिचेरी ।

अपनी खूबसूरती के बल पर कली पहले तो नौरीन के स्मगलिंग के कारोबार से जुड़ती है लेकिन फिर मॉडलिंग करने लगती है । उसकी सुन्दरता से रीझ कर नौरीन कहती है कि “सोने में मढ़कर रखने लायक हैं ये कलाइयां और चेहरा ! यही तुम्हारा अस्त्र हैं कली ।”

क्यों आंटी ? अनजान बनकर कली ने पूछा ।

“क्यों ? इसलिए मेरी बच्ची कि किसी का खून भी कर दोगी, तब भी अदालत तुम्हे छोड़ देगी – ऐसा निर्दोष चेहरा, ऐसी निष्पाप आँखे और देसी उस्तरे की धार सी तेज अंगुलियाँ ।”

कली ने गर्व से दर्पण को चुनौती दी । वह जानती है कि उसके सौन्दर्य वाण से बच पाना किसी के लिए आसान नहीं ।

कलकत्ता में एक किराए के घर में रहते उसकी आत्मीयता उस परिवार की मालकिन से हो जाती है जो उसे अपनी बेटी समान मानने लगती है लेकिन कली किसी से जुड़ने से पहले अपनी विवशता समझती है कि उसके अभिशप्त जन्म का इतिहास जानकार क्या कोई सहज ही उसे बेटी बना सकता है । यही दुविधा और कष्ट उसे उपन्यास के नायक से जुड़ने से रोकता है ।

उस परिवार के आई ए एस पुत्र प्रवीर (जो इस उपन्यास का नायक है) के रूखे स्वभाव से आहत कली उसी पर आसक्त हो जाती है । प्रवीर और कली की पहले भी एक बार मुलाकात हो चुकी थी जब कली किसी से बचने के लिए उसके पास सहायता मांगने आयी थी । प्रवीर कली को बचा तो लेता है लेकिन फिर उस व्यक्ति से कली की चोरी करने वाली सच्चाई जानकार उसे पसंद नहीं करता, जो यत्र तत्र उसके व्यवहार में दिख भी जाता है । उसके परिवार में उसके दोनों बहनोई कली के सौंदर्य से बुरी तरह आसक्त हैं क्योंकि उसकी उपस्थिति सारे परिवेश को मोहाच्छन्न कर देती है ।

इसी के साथ अन्य छोटी-मोटी घटनाओं के बीच प्रवीर की शादी शहर के जाने-माने रईस की बेटी से हो जाती है तो कली निराश हो कर शहर छोड़ कर चली जाती है । ट्रेन में उसकी मुलाक़ात उसकी माँ की सखी वाणी से होती है और किसी भी पहचान से बचने को कली एक छोटे से स्टेशन पर उतर जाती है ।

नियति को कुछ और ही मंजूर होता है और फिर वो जिस ट्रेन में बैठती है वो उसे वापस कलकत्ता ले जाती है जहाँ उसके परिचित रेलवे के अधिकारी उसे रोक लेते हैं । उनके घर रहते हुए कली को बुखार रहने लगता है । वहीँ उसे कैंसर होने का पता चलता है । ऐसे में उसे इलाहाबाद उसकी खास सहेली विवियन के घर सहारा मिलता है जिसकी आंटी कली को बहुत प्रेम करती हैं ।

इधर प्रवीर भारत में अपनी नयी नियुक्ति के लिए निकलता है तब नौरीन उसे कली की चिट्ठी देती है जिसमें कली ने अपने बारे में लिखा है और अपना इलाहबाद का पता लिख कर उससे मिलने की इच्छा जाहिर की है । कली से मोहासक्त प्रवीर ड्यूटी पर न जाकर कली से मिलने पहुँच जाता है । वहां कली की मां पन्ना भी है जिसे कली ने बुला लिया है । कैंसर ग्रस्त कली की जीर्ण काया अब भी अपनी पूरी जिजीविषा के साथ प्रवीर का स्वागत करती है । दो दिन के साथ में वह जैसे अपना पूरा जीवन उसके साथ जी लेती है और उसके जाने से पहले ही नींद की गोलियां खाकर अपना जीवन समाप्त कर लेती है।

उपन्यास प्रवीर द्वारा कली के लिए संगम में प्रार्थना के साथ ख़त्म होता है । कली जिसके श्याम वर्ण के कारण कृष्णकली कहा गया अपनी इच्छाओं और शर्तो पर जीने वाली ऐसी लड़की है जो अपनी इच्छा से जीवन और मृत्यु का वरण करती है ।

शिवानी जी के लेखन में जो उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का अद्भुत मेल दिखता है वो मुझे विशेष रूप से सम्मोहित करता है । इस उपन्यास के कई पात्रों को उन्होंने वास्तविक जीवन से उठाकर अपने विचारों के अनुरूप गढ़ा है जैसे पन्ना का चरित्र ओरछा की मुनीर जान के व्यक्तित्व की छायाप्रति । उनका ये मानना था कि अगर किसी कहानी या उपन्यास के पात्रों के पाठकों को मात्र संवेदना या सहानुभूति ही होती है तो लेखनी की उपलब्धि को पूर्ण उपलब्धि नही मान सकते । सार्थकता तब है जब पाठक किसी पात्र से एकत्व स्थापित कर लेता है, जब उसका दुःख, उसका अपमान उसकी अपनी वेदना बन जाये । जैसे कली के नींद की गोलियां खाने और चिरनिद्रा में लीन होने को पाठकों ने महसूस किया और अन्य पात्रों के साथ उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की ।

उपन्यास का अंत मुझे विचलित करता है क्योंकि कली, जिसके जन्म में उसका दोष नहीं और जिसने एक तरह से अपने माता-पिता के कर्मो का दंड भोगा भले ही अपनी दुस्साहसपूर्ण रवैये से लेकिन उसे जिस प्रेम और विश्वास की तलाश थी वो मिलना चाहिए था । लेकिन चूंकि ये लेखिका की अपनी कृति और कृष्णकली उनकी मानस संतान है तो उसे अपनी इच्छानुरूप ढालने का उन्हें पूर्ण अधिकार है, हाँ ये अवश्य कि लेखिका के इस उपन्यास को हिंदी के पाठकों का जैसा आदर सम्मान और प्रेम मिला वह दुर्लभ है । उपन्यास की भाष बेहद सहज और सरल है । निःसंदेह यह एक बहुत ही गहरा प्रभाव छोड़ने वाला पठनीय उपन्यास है ।


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