यात्रा वृत्तांत: दक्कन का सिरमौर हैदराबाद

भारती पाठक

यह 2017 का साल था जब विभाग की ओर से ही एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए तेलंगाना जाना हुआ ।  तेलंगाना आंध्र प्रदेश राज्य से अलग होकर बना भारत का 29 वां राज्य है । तेलंगाना का अर्थ है ‘तेलुगु भाषियों की भूमि’ । यह जनसंख्या के हिसाब से भारत का बारहवां सबसे बड़ा राज्य है । हैदराबाद 10 वर्ष के लिए दोनों राज्यों ( आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ) की संयुक्त राजधानी है । यहाँ की राजभाषा तेलुगु और उर्दू है । हमें तेलंगाना के रंगा रेड्डी जिले में जाना था जो हैदराबाद से लगा हुआ है ।

हैदराबाद शहर को लेकर कितने ही किस्से हैं जिसमें सबसे मूल है भाग्यनगर । कहते हैं यह नाम हैदराबाद को बसाने वाले मुहम्मद कुतुब शाह ने स्थानीय तेलगु दरबारी नर्तकी भागमति के नाम पर रखा था । बाद में जब उसने इस्लाम कबूल कर लिया तो वह हैदर महल हो गया । बाद में हैदराबाद ।

हमारे शहर से तेलंगाना के लिए सीधी ट्रेन सेवा नहीं थी । आरक्षण पहले फैजाबाद से इलाहाबाद फिर वहां से सिकंदराबाद के लिए था जहाँ से आगे की यात्रा की जिम्मेदारी आयोजकों की थी । वैसे तो इलाहाबाद और अयोध्या दोनों विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हैं लेकिन दोनों को जोड़ने में बस के अलावा कुछ गिनी-चुनी ट्रेनों की ही सुविधा है, तो हमें समय से थोड़ा पहले या यूँ कहें ज्यादा पहले निकलना पड़ा । ट्रेन थी रात 8:45 की और हम एक दिन पहले ही इलाहाबाद स्टेशन पहुँच गए क्योंकि फैजाबाद से उस दिन ट्रेन की ऐसी सुविधा नही थी जो हमें सुबह चलने पर शाम तक इलाहाबाद स्टेशन छोड़ देती ।

रात प्लेटफार्म पर ही बितानी पड़ी चूंकि साथ में छात्र थे तो जिम्मेदारी भी थी वरना किसी मित्र या रिश्तेदार के यहाँ भी जाया जा सकता था । रात जैसे-तैसे बीती और ट्रेन आने पर सुकून मिला । ट्रेन में भी सारे आरक्षण कंफ़र्म नहीं थे तो किसी तरह छात्रों को जगह दिलाई और खुद भी जगह बना कर सोने की निरर्थक कोशिश की । सुबह हुई तो बैठने की जगह सबको मिल गयी थी । ट्रेन रात 9:30 पर सिकंदराबाद पहुंची तो वहां हमें लेने संस्थान की बस खड़ी थी । सिकंदराबाद से रंगारेड्डी 85 किलोमीटर है जहां पहुंचते-पहुंचते हमें रात के १२ बज गए ।

मेस में खाना ख़त्म हो चुका था और कोई रेस्तरां खुले होने की सम्भावना भी क्षीण थी कि भोजन किया जा सके । आयोजकों से बात की तो उन्होंने एक स्वंयसेवक को हमारे साथ कर दिया कि वो हमारी मदद करे । चलो ये तो अच्छा हुआ कि कोई मदद को मिला लेकिन अब समस्या ये कि उसे हिंदी या अंग्रेजी नहीं आती थी और हमें तेलुगु । किसी तरह टूटे-फूटे शब्दों और इशारों में उसे समझाया कि भूख लगी है भाई, हमें भी और बच्चों को भी तो वो हमें करीब 2 किलोमीटर पैदल चला कर एक रेस्तरां में ले गया जहाँ खाना था लेकिन ख़त्म होने के करीब ।

एक ही किचन में शाकाहारी और मांसाहारी भोजन दोनों देखकर हमारी हिम्मत ने तो जवाब दे दिया लेकिन बच्चों ने खाना खाया तो मैंने भी फलों का जूस पी ही लिया । वैसे भी भूखे पेट रात बिताना मुश्किल था । वापस फिर 2 किलोमीटर चलकर आना पड़ा और आने पर पता चला कि सभी कमरे भर चुके हैं तथा जम्मू और कश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश और केरल की टीमों के रुकने की व्यवस्था हैदराबाद में किसी सरकारी विद्यालय में की गयी है जहाँ हमें सुबह जाना है । रात हमें एक बहुत बड़े हाल में उक्त प्रदेशों के खिलाड़ियों के साथ बितानी थी ।

सुबह कुछ औपचारिकताओं के बाद हमें दिलसुकनगर के सरकारी स्कूल में पहुंचा दिया गया जो आयोजन स्थल से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर था । दिलसुकनगर हैदराबाद के सबसे बड़े वाणिज्यिक और आवासीय केन्द्रों में से एक है । यहाँ व्यवस्था उतनी अच्छी तो नहीं थी लेकिन जगह अच्छी थी, आसपास रिहायसी इलाका और मिलनसार लोग । वैसे भी शक्ल-सूरत से मैं भी दक्षिण भारतीय ही लगती थी तो कभी कुछ लेने बाज़ार जाती तो दुकानदार तेलुगु में ही बात शुरू कर देते ( ये बात और कि फिर अंग्रेजी पर आ जाते लेकिन हिंदी नहीं बोलते थे जल्दी ) और एक विशेष सहानुभूति भी रखते थे ।

अगले दो दिन व्यस्तता भरे रहे जब तक लड़कियों की प्रतियोगिताएं रहीं । सुबह बस हमें आयोजन स्थल तक ले जाती, फिर रात का खाना खाकर उस दिन की आखिरी प्रतियोगिता हो जाने पर हम वापस लौटते । खाने में मांसाहारियों के लिए कई वैरायटी उपलब्ध होती थीं और शाकाहारियों के लिए डोसा इडली वोंडा, रसम आदि चावल के बने पकवान । रोटी बस एक दिन मिली क्योंकि वहां लोगों को पसंद नहीं आने पर बनना बंद हो गई । हाँ हम हैदराबाद में ही थे तो हैदराबादी बिरयानी भी चखी ( वेज )।

तीसरे दिन थोडा समय मिला तो सोचा घूम लिया जाए । वहीं के एक कर्मचारी ने बताया कि 3 किलोमीटर की दूरी पर ही रामोजी फिल्मसिटी है जो देखने लायक है, तो हमने सबसे पहले वहीँ जाने का कार्यक्रम बनाया । गेट के सामने से ही ऑटो मिल गया जिसने करीब 10 मिनट में हमें रामोजी फिल्मसिटी के मुख्य द्वार पर उतार दिया ।

गेट काफी बड़ा था जिसके दाहिनी तरफ बड़े बड़े अक्षरों में रामोजी लिखा था । भीतर जाने पर एक तरफ टिकट काउंटर बने थे । टिकट लिया जो उस समय 1000 रूपये प्रति व्यक्ति था । इस समय शायद कुछ बढ़ गया हो । टिकट लेकर हमें एक तरफ रुकने को कहा गया जहाँ थोड़ी देर में एक बस आकर रुकी जिस पर बैठने का निर्देश मिलने पर हम उस पर सवार हो गए । कहाँ तो सोचा था कि पहुँच गए रामोजी लेकिन बस में बैठने पर पता चला कि वो तो अभी तीन किलोमीटर आगे है । बस चल पड़ी जो डीटीसी बसों जैसी थी पारदर्शी जिससे बाहर का नज़ारा चारों तरफ से देखा जा सके ।

रास्ता ऊँची-नीची पहाड़ियों वाला और सुन्दर था । रामोजी 2000 एकड़ में बना हुआ विश्व का सबसे बड़ा फिल्म स्टूडियो काम्प्लेक्स है । फिल्मों और धारावाहिकों के छोटे बड़े, प्राकृतिक और कृत्रिम सेट यहाँ बने हुए हैं जहाँ वर्षभर शूटिंग होती रहती है । बस ने जहाँ ले जाकर उतारा हमें वो यूरेका पॉइंट था जो इसके भीतरी भाग का प्रवेश और अंत स्थल है । यहाँ कार्निवाल जैसा माहौल रहता है और अगर आप सुबह 9 बजे वहां पहुँच जाएँ तो भव्य स्वागत भी होता है । कई तरह की दुकानें भी थीं जहाँ खाने पीने की वस्तुएं उपलब्ध थी ।

थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अनेक दर्शनीय स्थान हैं । जहाँ कुछ तो पैदल और कुछ के लिए बस की भी सुविधा है जिसका किराया उसी टिकट में जुड़ा होता है । थोडा आगे जाने पर वाइल्ड वेस्ट की थीम पर एक काऊबॉय स्ट्रीट बनी थी जिसमें स्टंट शो होते हैं । उसके आगे जाने पर फ़िल्मी दुनिया के शो का बड़ा हॉल था वो भी हमने देखा जिसमें फिल्मों में फैंटेसी दृश्यों को कैसे शूट करते उसका बड़ा मनोरंजक शो दिखाया गया । उसी के ठीक सामने एक और हाल था जिसमे शोले फिल्म की शूटिंग उस जमाने में कैसे हुई ये दिखाया गया ।

मज़े की बात ये कि उसमें बसंती और बीरू के किरदार निभाने के लिए दर्शकों में से ही किसी को बुलाया गया । बाकायदा मेक अप आर्टिस्ट ने उनका मेक अप किया और बसंती के घोड़ा दौडाने का सीन शूट हुआ । घोड़ों के दौड़ाने की आवाज वहीं रखे छोटी छोटी गिट्टियों पर कटोरी से मार कर निकाली जा रही थी और ये काम भी दर्शकों को ही बुलाकर कराया जा रहा था । शो बहुत मजेदार लगा और ये भी पता चला कि फिल्म बनाने में कितने लोगों की मेहनत होती है ।

वहां से निकल कर हम फिर बस में बैठे जिसमें एक गाइड भी थे जिन्होंने हमें फिल्मों की शूटिंग के लिए बने बड़े-बड़े सेट, फूलों से भरे मैदान और कुछ जानी-मानी फिल्मों की चल रही शूटिंग को दूर से दिखाया । फिर हमें जहाँ उतारा वहां एक भागवतम हाल था जहाँ पौराणिक धारावाहिकों की शूटिंग का सेट बना था । एक प्रिंसेस स्ट्रीट भी थी जिसके भवन मॉडर्न शैली में बने हुए थे । वहीं की दुकान से कुछ यादगार चीजें भी खरीदीं हमने । रेन डांस फ्लोर पर डांस का लुत्फ़ डांस न आने की वजह से ले तो नहीं पाए लेकिन पोज देकर फोटो जरूर ली । वहां और भी बहुत कुछ था जैसे झरने, गुफा और पहाड़ जो किसी स्वप्न लोक में होने जैसी प्रतीति करा रहे थे ।

घूमते-घूमते कब शाम हो चली पता ही नहीं चला और अभी कई हिस्से देखना बाकी रह गए थे । फिर भी समय को देखते हुए हमने बस पकड़ी और यूरेका पर आये जहाँ डांडिया हो रहा था । डांडिया तो हम क्या करते बस थोडा उछल-कूद किया, फिर दूसरी बस से वापस मुख्य द्वार तक आये, फिर वहां से संस्थान । वास्तव में रामोजी फ़िल्मी दुनिया के दीवानों के लिए ही नहीं घूमने के शौकीनों के लिए स्वर्ग से कम नहीं । वापस आकर हमने खाना खाया फिर संस्थान की बस हमें वापस दिलसुकनगर ले गयी ।

अगली सुबह उठ कर व्यायाम के लिए बाहर आये तो देखा आस-पास की छोटी-छोटी बच्चियां हाथों में टोकरी लिए स्कूल में लगे फूलों के पौधों से फूल तोड़ रही थीं । हमारे पूछने पर बताया कि आज बतुकम्मा त्यौहार का आखिरी दिन है । यह तेलंगाना राज्य में महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला एक क्षेत्रीय पर्व है । पूरे तेलंगाना क्षेत्र में यह पर्व शालिवाहन संवत के अमावस्या तिथि से शुरू होकर नौ दिनों तक मनाया जाता है । फूलों से सात परतों में गोपुरम मंदिर की आकृति बनायी जाती है । तेलुगु में बतुकम्मा का अर्थ होता है ‘देवी माँ जिन्दा हैं ।”

जिस स्कूल में हम रुके थे उसके चौकीदार का घर बगल में ही था जिन्होंने मोहल्ले के और लोगों के साथ आकर शाम को हमें भी उस त्यौहार में शामिल होने का आग्रह किया ।

दिन में लड़कों की प्रतियोगिताएं ही थीं तो समय था कि कहीं घूमा जा सके । वहीँ से ऑटो रिज़र्व किया जो हमें हैदराबाद की कुछ प्रसिद्ध जगहों पर घुमा लाये और वापस लाकर स्कूल तक छोड़ दे । तो सबसे पहले हम निकले देखने गोलकोंडा का किला ।

दिलसुकनगर से गोलकोंडा का किला करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर था । ऑटो हमें जिन रास्तों से लेकर जा रहा था ऐसा लगा जैसे किसी पुराने मोहल्ले की सड़क हो । संकरी गलियां, नवाबी शैली के बने छोटे छोटे घरों के बीच से होते हम किले तक पहुंचे ।

तेलंगाना राज्य हैदराबाद के निजाम के समय में भारतीय उपमहाद्वीप में संस्कृति के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा तो ऐसा बहुत कुछ है इस राज्य में जो पर्यटन में रुचि रखने वालों को सम्मोहित करने की क्षमता रखता है ।

किले के भीतर जाने के लिए 5 रुपये का टिकट लेना पड़ा जबकि विदेशी पर्यटकों के लिए ये शुल्क 100 रुपये है । यह किला सुबह 9 से शाम 5 बजे तक खुला रहता है । यह संरक्षित किला हैदराबाद के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से है । कहते हैं कि कभी कोहिनूर का हीरा भी यहीं संग्रहित करके रखा गया था । यह किला ग्रेनाइट की पहाड़ी पर स्थित है । बाहर से देखने पर तो प्रतीत होता कि अब किला नहीं बस खँडहर मात्र बचा हो लेकिन भीतर जाने पर लगता मानो किसी कारीगर ने पहाड़ों को काट कर किले का रूप दे दिया हो ।

अभिलेखों में इसका निर्माण वारंगल के शासकों ने 13वीं सदी में किये जाने के संकेत मिलते हैं । कहते हैं कि इस किले का निर्माण वाणिज्यिक उद्देश्यों और हीरे जवाहरातों के संरक्षण के लिए किया गया था तो उसकी सुरक्षा के भी पुख्ता इंतज़ाम यहाँ दिख रहे थे जो जगह-जगह दीवारों में तोप की नली के आकार की संरचना बनी थी । आगे जाने पर भीतर ही बड़ा सा उद्यान भी दिखा जहाँ बैठ कर आराम किया जा सके ।

इस किले का एक रहस्य है ध्वनि विज्ञान का नज़ारा । इसके प्रवेश द्वार की अंदरूनी छत षट्कोण के आकर की बनी है और यदि इसके ठीक नीचे खड़े होकर ताली बजाएं या कुछ बोले तो उसकी आवाज ४०० मीटर ऊपर सबसे आखिरी भवन तक सुनाई देती है । वर्तमान में इसे तालियों का मंडप कहते हैं । पूछने पर पता चला कि इसे बनाने का उद्देश्य था कि कोई सूचना नीचे से ऊपर भवन तक बिना ज्यादा समय लिए पहुंचाई जा सके । किले में और भी भवन हैं जैसे शाही किला, दरबार हाल और बरदारी मस्जिद आदि ।

आगे चलने पर सीढियां थीं जो ऊपर तक जा रही थीं । दोपहर हो चली थी और गर्मी में ऊपर चढना आसान नहीं था, फिर भी उत्सुकता में चढते चले गए । ऊपर पहुंचते-पहुंचते हालत खराब थी लेकिन जब सबसे ऊपर वाली छत पर पहुंचकर नीचे का नज़ारा देखा तो मन खुश हो गया । ठंडी हवा से थोड़ी ही देर में सारी थकन दूर हो चली थी । ऊपर से दूर-दूर तक सारा शहर दिख रहा था । थोड़ी देर हम मंत्रमुग्ध से वहीं बैठे अपने देश की समृद्ध वास्तुकला पर विचार करते रहे और लोगों को रोमांचित और रोमांस करते हुए भी देखते रहे कि कैसे नव-विवाहित जोड़े और नव-विवाहित होने की आस लगाये जोड़े तरह-तरह के एंगल से तस्वीरों में उतारकर दिन को यादगार बनाने में लगे थे । हमारा दिन तो खैर ऐसी अद्भुत जगह जाने से यादगार रहा ही ।

नीचे आते-आते दोपहर ढल रही थी तो एक गिलास नीबू पानी पीकर गला तर किया और अगले पड़ाव की ओर चल पड़े जो था वहां का प्रसिद्ध बिरला मंदिर । ऑटो वाले ने जहाँ उतारा मंदिर वहां से थोड़ी उंचाई पर था और रास्ता थोड़ा संकरी गली से होकर जाता था । हम पैदल ही उसे देखने चल पड़े ।

बिरला मंदिर ‘नौबत’ नामक पहाड़ पर बना एक मन्दिर है जिसका एरिया 53000 स्क्वायर मीटर है । इसके निर्माण में १० साल लगे थे जो कि बिरला फाउंडेशन द्वारा किया गया । मंदिर में द्रविडियन, राजस्थानी और उत्कल वास्तुकला का मिश्रित रूप देखने को मिलता है । मंदिर से काफी पहले ही जूते चप्पलें उतार कर हम ऊपर चले जहाँ काफी भीड़ थी लेकिन कोई शोर नहीं था, यहाँ तक कि मंदिर में कोई घंटी तक नहीं थी । पता चला कि इस मंदिर का उद्देश्य ध्यान और साधना है इसलिए यहाँ बोलना मना है । वहां फोटो लेना भी मना था तो दर्शन करके हम नीचे आये और प्रसाद में मिला हलवा खाकर पानी पिया ।

अच्छा एक बात है कि जाने क्यों प्रसाद के नाम पर मिली हुई चीजें बड़ी स्वादिष्ट लगती हैं । शायद कम मात्रा में मिलती हैं इसलिए । जो भी वजह हो या हो सकता है ऐसा मेरा ही अनुभव हो लेकिन भंडारे की पूरी सब्जी और हलवे का स्वाद तो …..। खैर वहां से लौट कर गलियों में मोतियों के आभूषण की दुकान से कुछ कंगन और इअरिंग्स खरीदे जो आज भी उतने ही सुन्दर हैं जितने जब खरीदे थे तब थे ।

ऑटो वाला इंतज़ार कर रहा था और हमारे बैठने पर जैसे ही उसने ऑटो स्टार्ट किया एक बावला सा लड़का आकर ऑटो ड्राइवर के बगल में बैठ गया । दोनों में जाने क्या गुपचुप बात हुई कि दोनों ने गाने में जुगलबंदी शुरू कर दी । दोनों कोई तेलुगु गाना पूरे जोर-शोर से गा रहे थे और हम भौचक्के से उन्हें देख रहे थे । नहीं रहा गया तो ऑटो रुकवाया और उन अनचाहे मेहमान को उतारने को कहा तो ऑटो वाला बोला कि परिचित है अगले चौराहे पर उतर जायेगा । इतना कहकर वह झूम-झूम कर ऑटो चलाने लगा और दोनों फिर अपनी संगीत की दुनिया में चले गए । हम भी अपनी हंसी रोक न पाए । जब तक उसका चौराहा नहीं आया हमारा हँसते हँसते बुरा हाल था ।

थोड़ी देर में हम हुसैन सागर पहुँच गए । यह एक मानव निर्मित झील है । जैसे मुंबई में मरीन ड्राइव ठीक वैसे ही हैदराबाद में हुसैन सागर । यह झील सिकंदराबाद और हैदराबाद को अलग करती है । इसका निर्माण इब्राहीम कुली क़ुतुब शाह के दामाद हुसैन शाह ने कराया था । उन्ही के नाम पर इसका नाम हुसैन सागर रखा गया । इसका विशेष आकर्षण है झील के बीचों-बीच लगी भगवान् बुद्ध की 350 टन की एक ही पत्थर से बनी प्रतिमा। बताते हैं कि जब उस प्रतिमा को झील में लगाने के लिए नाव से ले जाया जा रहा था तो नाव पलट गयी । पूरे दो साल वो प्रतिमा उसी तरह झील में पड़ी रही, फिर उसे निकाल कर स्थापित किया गया ।

रॉक ऑफ़ जिब्राल्टर पर स्थापित यह 18 फीट ऊंची प्रतिमा पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख कारण है और इसी को देखने हम भी गए थे । सड़क झील से काफी उंचाई पर थी और किनारे-किनारे मजबूत रेलिंग लगी हुई थी । शाम को घूमने वालों का तांता लगा था । हमने भी उस खूबसूरत नज़ारे को अपनी आँखों और कैमरे में कैद किया । थोड़ी देर घूमते रहे, चुरमुरा खाया और कुछ देर बाद वापस हो लिए । समय कम था तो चारमीनार अगले दिन के लिए छोड़ दिया ।

वापसी में एक जगह नारियल पानी भी पिया और ड्राइवर से आग्रह करके गाना भी सुना । लौटे तो रात हो चुकी थी और बतुकम्मा त्यौहार में जाने का कई बार बुलावा आ चुका था । जल्दी से हाथ मुंह धोया और त्योहार मनाने चले गए जो कि स्कूल के बगल में ही था । बेहद सुन्दर साड़ियों और पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलायें और बच्चियां बेहद प्यारी लग रही थीं । सबके हाथ में फूलों की डालियां थीं जिसे मैदान के बीचों-बीच रख कर किसी गाने की धुन पर सभी ताली बजा कर नाच रही थीं । गाने के बोल भले समझ नहीं आ रहे थे लेकिन उसमें छिपी उनकी पवित्र भावनाएं हमारे दिलों को छू रही थी । हमारे बच्चों ने भी उनके नृत्य को करने की कोशिश की और मज़े किये । काफी रात हो चली थी तो हम प्रसाद लेकर स्कूल में वापस आ गए ।

अगले दिन समापन सत्र था तो दिनभर मौका नहीं मिला कि कहीं जाया जा सके । लेकिन उसके अगले दिन हमारे पास पूरा समय था क्योंकि ट्रेन उसके भी अगले दिन सुबह की थी तो एक पूरा दिन था जिसमें हमें चार मीनार देखना और मित्रों तथा परिजनों के लिए कुछ उपहार भी लेने थे ।

जिस दिन फ्री थे उस दिन सुबह से बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी । बड़ी मुश्किल से १२ बजे बरसात रुकी तो हम चार मीनार देखने निकले जो वहां से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर था । चार मीनार किसी परिचय का मोहताज तो नहीं फिर भी कम में लिख ही दूँ कि हैदराबाद गए और चारमीनार नहीं देखा तो क्या देखा । इसे मोहम्मद कुली क़ुतुब शाह ने 1591 में बनवाया था ।

नाम से ही जाहिर है चार मीनारें यानि चार टॉवर । यह भारत की सबसे खूबसूरत इमारतों में से एक है । चारमीनार की शोभा रात में देखते ही बनती है जब ये बिजली की रोशनी से जगमगाता है । ये जगह बहुत बड़े मैदान जैसी है जिसके बीचों-बीच में चारमीनार स्थित है जिसमें ऊपर जाने के लिए सीढियां बनी हैं । जिसके चारो तरफ दुकाने हैं जिनमें मोतियों के काम की दुकानें विश्व प्रसिद्ध हैं । हमने घूम कर सारा बाज़ार देखा, कुछ चीजें खरीदीं । मीनार के अन्दर सीढियां बनी हैं जिससे ऊपर चढ़ कर भी नीचे का नज़ारा देखा जा सकता है । मौसम ख़राब होता देख हम जल्दी ही वहां से वापस हो लिए ।

जब हम वापस दिलसुकनगर बाज़ार पहुंचे तो शाम हो चुकी थी और उस दिन वहां भी स्थानीय साप्ताहिक बाज़ार था जिसमें काफी भीड़ दिखी । लेकिन हम ज्यादा देर वहां भी नहीं रुके क्योंकि चौकीदार ने बताया था कि बीते वर्षों में वहां बम ब्लास्ट हुआ था तो थोडा सतर्क रहें और भीड़ से बचें । हालांकि दुर्घटनाएं बता कर नहीं होती फिर भी घर से इतनी दूर और ज़िम्मेदारी के साथ रहते हम खतरा मोल नहीं ले सकते थे तो वापस स्कूल आ गए क्योंकि सुबह 5 बजे ही हमें स्टेशन के लिए निकलना था, सामान भी पैक करना था और बाकी तैयारी भी करनी थी ।

अगले दिन हम समय से वापसी के लिए निकल पड़े अगले साल फिर कहीं नयी जगह जाने और मिलने की उम्मीद लिए हुए ।


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