दो संस्थाओं ने भारत में माइग्रेशन की तस्वीर बदल कर रख दी : एक रेलवे और एक…

Balendushekhar Mangalmurty

रेलवे और इसके साथ एक और संस्था, मनी आर्डर ने भारत में माइग्रेशन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. 1840 के दशक में जब प्राइवेट ब्रिटिश कंपनियां रेलवे लाइन बिछाने के लिए टेंडर लेने की मारा मारी कर रही थीं, उस समय ये आम राय थी कि भारतीय गरीब हैं, विशाल भौगोलिक क्षेत्र में दूर दूर छितरे हुए हैं, ऐसे में रेवेन्यू का मुख्य जरिया माल ढुलाई हो सकता है, न कि पैसेंजर ट्रैफिक. लेकिन 1853 में बॉम्बे से पुणे तक पहली ट्रेन चलने से लेकर पहले सौ साल तक पैसेंजर ट्रैफिक से अर्निंग माल ढुलाई से होने वाली अर्निंग से ज्यादा या बराबर रही. एनुअल पैसेंजर ट्रैफिक काफी तेजी से बढ़ा. जहाँ यह 1865 में 1.30 करोड़ था, वहीँ 1905 में बढ़कर 25 करोड़ हो गया और 1946 में 1 अरब से अधिक. 90 फीसदी से अधिक यात्री थर्ड क्लास में यात्रा करते थे, जिसमे यात्रा की स्थिति बहुत horrible थी. हर यात्री के हिस्से केवल 17 इंच का स्पेस उपलब्ध था. इन बोगियों में २०वी सदी के शुरुआत में आकर टॉयलेट की व्यवस्था हुई. कई दशकों तक तो पीक ट्रैफिक सीजन में यात्रियों को जानवरों से भरे डिब्बों में ठूंस दिया जाता था. ब्रिटेन में इस पर रोक लग चुकी थी, पर इंडिया में उसके बाद भी कई सालों तक ऐसा चलता रहा. 20 वी सदी की शुरुआत में ट्रेन में overcrowding और इससे उपजी परेशानियों से अधिकारीयों को आगाह करने के लिए चेन पुलिंग की व्यवस्था की गयी.

पर तमाम दिक्कतों के बावजूद रेलवे स्पीड लेकर आया. अब डेस्टिनेशन तक का सफर महीनों में नहीं, दिनों में तय होने लगा. रेलवे से सिर्फ मूवमेंट नहीं हो रहा था, बल्कि रेलवे माइग्रेंट लेबर के लिए काम का बहुत बड़ा सोर्स था. 1853 और 1900 के बीच दक्षिण एशिया में लगभग 80 लाख मज़दूर रेलवे लाइन बिछाने में लगाए गए. एक सिंगल प्रोजेक्ट, 1850 के दशक में भोरघाट में रेलवे लाइन के निर्माण प्रोजेक्ट ( बॉम्बे को दक्कन से जोड़ने के लिए) में कुल 42,000 मज़दूर लगाए गए, जिसमे किसी भी सिंगल डे 6000 बैल, पत्थर तोड़ने के लिए 3000 मज़दूर और 1000 गाड़ियां लगी होती थीं. रेलवे ने देश में एकता की भावना पैदा की. आंबेडकर ने कहा कि जाति प्रथा की छुआछूत के प्रैक्टिसेज केवल रेल यात्रा और विदेश यात्रा के समय ही कुछ देर के लिए भुलाई जाती हैं.

लेकिन इसके बावजूद माइग्रेंट के लाइफ में रेलवे सबसे महत्वपूर्ण संस्था नहीं थी, ये संस्था थी पोस्ट ऑफिस. 1854 में भारतीय डाक सेवा की स्थापना होने के बाद इसने माइग्रेंट के जीवन में तेजी से घर कर गया. जीवन का हिस्सा बन गया. लेटर और टेलीग्राम उतने इम्पोर्टेन्ट नहीं थे, जितना कि 1880 में शुरू हुआ मनी आर्डर सिस्टम. मनी आर्डर ने माइग्रेंट और उनके परिवार के जीवन में करिश्माई परिवर्तन लेकर आया. एक बेहद सस्ता, भरोसेमंद साधन जिसके जरिये दूर प्रदेश में अपने परिवार वालों के पास घर चलाने के लिए पैसे भेजे जा सकते थे. इसका प्रयोग देश के अंदर और बाहर तेजी से होने लगा. लेकिन इसने शुरूआती वर्षों में पोस्टल डिपार्टमेंट के सामने रोचक परेशानी खड़ी कर दी. चूँकि तात्कालिक परिवेश में महिलाएं घर से बाहर नहीं निकलती थीं और घूँघट भी करती थीं, ऐसे में डाक विभाग के सामने पैसे देने में परेशानी आने लगी. तो 1884 में कैश के होम डिलीवरी की व्यवस्था की गयी. 20 वी सदी के शुरूआती वर्षों में पूर्वी उत्तरप्रदेश के गांवों में डाकिया की हैसियत बस एक पुलिसवाले से ही कम थी. वो कैश देने के बदले कमाई करने लगा. मनी आर्डर का फॉर्म भरने के लिए प्रोफेशनल writers का ग्रुप उभरा. 1896 से डाक विभाग पैसे डिलीवर कर देने के acknowledgement के तौर पर अंगूठा का छाप लेने लगा. डाक विभाग के इन नए नए प्रयासों ने ग्लोबल मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा और न्यू यॉर्क टाइम्स जैसे नामचीन अखबार ने इस पर आर्टिकल छापे.

1900 और 1960 के दशक के बीच मनी आर्डर कुल जीडीपी का 2 से 3 प्रतिशत हुआ करता था. मनी आर्डर भेजने के लिए मिलों और कारखानों के मज़दूर काम से छुट्टी लेने लगे. इससे काम कुछ इस कदर बाधित होने लगा कि Bombay Mill Owners Association ने डाक विभाग के अधिकारीयों से कह कर मिल के अहाते से ही मनी आर्डर ले जाने की व्यवस्था करवाई. 1880 से 2010 के बीच भारत के पोस्ट ऑफिसेस ने 7 अरब पोस्टल मनी आर्डर जारी किया। शब्द ” मनी आर्डर” इतना प्रचलित हो गया कि migrants के जिन इलाकों में मनी आर्डर भेजा जाता था, उन्हें मनी आर्डर इकॉनमी के नाम से ही जाना जाने लगा. मनी आर्डर के चलते माइग्रेंट अपने घर परिवार से लम्बे अरसे तक दूर रहने में सक्षम होने लगे.

20 वी सदी के अंत तक आते आते मनी आर्डर की जगह बैंक ट्रांसफर और प्राइवेट मनी ट्रांसफर ने ले ली.
Source: Chinmay Tumbe’s “India Moving: A History of Migration”


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