दुनिया भर में अपने रेस्टोरेंट्स के लिए पहचान बनाने वाले उडुपी जिले से लोगों के माइग्रेशन की है रोचक दास्ताँ

Balendushekhar Mangalmurty

कर्णाटक के तटीय क्षेत्र में स्थित उडुपी दुनिया भर में अपने इडली, डोसा, सांभर, उत्पम जैसे दक्षिण भारतीय डिशेज पेश करने वाले उडुपी रेस्टोरेंट्स के लिए जाना जाता है. 1901 से 2011 के बीच उडुपी में sex ratio कभी भी 1090 स्त्री/ 1000 पुरुष से नीचे नहीं आया. इस क्षेत्र से बड़े पैमाने पर माइग्रेशन 19 वी सदी के अंतिम चरण में शुरू हुआ जब नीची जाति के होलेया मज़दूर कोडागु ( तब कुर्ग) के कॉफ़ी प्लांटेशन और मलनाड क्षेत्र की ओर कूच करने लगे. 20 वी सदी के शुरुआत के आते आते माइग्रेशन की गति बढ़ गयी और इसने समाज के हर वर्ग, जाति को प्रभावित करना शुरू किया. उडुपी में १३वी सदी में माधवाचार्य द्वारा स्थापित श्री कृष्णा टेम्पल है. ब्राह्मण इस क्षेत्र में आबादी का 10 फीसदी हैं, जो दक्षिण भारत के किसी भी क्षेत्र से ज्यादा है. इस क्षेत्र में टेम्पल कल्चर के चलते फेस्टिवल मनाये जाते थे, जहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती थी. जहाँ बड़े पैमाने पर भोजन दिया जाता था.

इसी बैकग्राउंड में मंदिर के एक पुजारी के बेटे, के कृष्णा राव ( वुडलैंड्स होटल के चेन के मालिक) ने फ़ूड सर्विस में बतौर अटैंडैंट अपना करियर शुरू किया. 1922 में पारिवारिक विवाद के बाद कृष्णा राव मद्रास चले गए जहाँ उन्होंने फ़ूड बिज़नेस में काम करना शुरू किया और कुछ ही सालों में अपना उडुपी श्री कृष्णा विलास शुरू किया. 1920 का दशक उडुपी के माइग्रेशन के इतिहास में वाटरशेड साबित हुआ. 1923 में आयी भीषण बाढ़ के चलते बहुत बड़ी संख्या में पुरुष शहरों की ओर माइग्रेट करने लगे. ऐसे में सस्ते दर पर भोजन उपलब्ध करवाने की जरुरत महसूस हुई. ऐसे में 1920 के दशक में कई बड़े उडुपी फ़ूड रेस्टोरेंट्स कर्णाटक के अलग अलग शहरों में उभर कर आये, जैसे, मैसूर में दसप्रकाश, और बंगलोर में उडुपी श्री कृष्णा भवन, मवाली टिफिन रूम्स आदि. इन उडुपी रेस्टोरेंट्स में प्यूर वेजीटेरियन फ़ूड सर्व किये जाते थे और उच्च और मध्य जाति के लोग काम करते थे और अलग अलग जातियों के लोगों के बैठने के लिए अलग अलग व्यवस्था थी. उडुपी से माइग्रेशन की खासियत थी बच्चों का माइग्रेशन. ये इन रेस्टोरेंट्स में बतौर क्लीनर काम करते थे. उडुपी रेस्टोरेंट के मालिकों के लिए भी ये काफी कॉस्ट सेविंग हुआ करता था- सिर्फ भोजन और रहने की व्यवस्था देनी होती थी. इनमे से कईयो ने आगे चलकर अपना उडुपी रेस्टोरेंट खोला.

उडुपी के लिए migrants के लिए मद्रास, मैसूर और बंगलौर महत्वपूर्ण डेस्टिनेशन के रूप में उभरे, पर इन सबसे ज्यादा बम्बई उनके केंद्र के रूप में उभरा. बम्बई में माटुंगा उडुपी के लोगों का गढ़ बनकर उभरा और यहाँ 1930 और 40 के दशक में Ramnayaks, कैफ़े मद्रास आदि के साथ कई उडुपी रेस्टोरेंट्स खुले. 1970 के दशक में लैंड रिफॉर्म्स के बाद उडुपी का डोमिनेंट किसान जाति, Bunts बड़ी संख्या में इन शहरों में आये और उन लोगों ने उडुपी रेस्टोरेंट चला रहे ब्राह्मणों से कमान संभाली. अक्सरहां वे पुराने ईरानी रेस्टोरेंट्स को टेक ओवर कर लेते थे. छोटे छोटे उडुपी रेस्टोरेंट्स में अक्सरहां एम्प्लॉयर्स के जाति, गांव के लोग काम करते थे, केवल बड़े शहरों में बड़े बड़े रेस्टोरेंट्स में अन्य जाति और धर्म के लोगों को काम करने का मौका मिला. 1950 और 1960 के दशक में कर्नाटक के तटीय इलाके से ही माइग्रेट करने वाले जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में चले लेबर मूवमेंट्स के चलते उडुपी रेस्टोरेंट्स में काम करने वाले मज़दूरों के वर्किंग कंडीशन में सुधार हुआ, उनके लिए रात्रि पाठशाला का इंतजाम हुआ. 20 सदी के अंत होते होते नार्थ इंडियन और चायनीज डिशेस के भी मेनू में शामिल होने से पारम्परिक दक्षिण भारतीय से जुड़ा शुद्धता का भाव कोम्प्रोमाईज़ हुआ. हालाँकि इस उत्तर भारतीय और चायनीज हमले के बाद भी अपेक्षाकृत छोटे शहरों के और यहाँ तक कि बंगलौर जैसे मेट्रोपोलिटन शहर के भी कुछ उडुपी रेस्टोरेंट्स में मेनू में Orthodoxy और गांव ज़वार के एम्प्लाइज मेन्टेन किये गए.

 

समय के साथ उडुपी रेस्टोरेंट्स के चेन भारत के बाहर भी स्थापित किये गए, पर मैक्डोनाल्ड्स की तर्ज पर फ्रैंचाइज़ी के रूप में नहीं, बल्कि माइग्रेशन और कम्युनिटी नेटवर्क के साथ. उडुपी से निकले लोग काफी बड़ी संख्या में वापस भी लौटते रहे हैं. उडुपी में इन लोगों के द्वारा भेजा गया रेमिटेंस का एक बड़ा हिस्सा टेम्पल ट्रस्ट्स में जाता है. इनके द्वारा भेजा गया पैसा और गल्फ कन्ट्रीज में मुस्लिम मीग्रेंट्स के द्वारा भेजा गया रेमिटेंस के चलते जाती और सांप्रदायिक आधार पर धन प्रदर्शन भी होते हैं, जिससे कई बार उडुपी में माहौल खराब हो जाता है. उडुपी कोई पिछड़ा इलाका रहा है. यहाँ रेमिटेंस से आर्थिक समृद्धि आयी है और यहाँ बंगलौर को छोड़ दें तो कर्णाटक के अन्य शहरों से ह्यूमन डेवलपमेंट इंडीकेटर्स पर बेहतर परफॉर्म कर रहा है.

Source: Chinmay Tumbe’s “India Moving: A History of Migration”


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