भोजपुर क्षेत्र से बहुत बड़ी संख्या में बिहारी मज़दूर कलकत्ता के जूट मिल पहुंचे

Balendushekhar Mangalmurty

सारण का नाम आते ही माइग्रेशन की तस्वीर उभरती है. दरअसल पुरे भारत में माइग्रेशन जिस तरह सारण से जुड़ा हुआ है, किसी और क्षेत्र से नहीं. तुम्बे कहते हैं कि इस क्षेत्र से माइग्रेशन की परम्परा 15 वी सदी से ही देखी जा सकती है. इतिहासकार डर्क कोल्फ ने अपने अध्ययन में ये दिखाने का प्रयास किया है कि कई सदियों से सारण का क्षेत्र Peasant-Soldiers के रिक्रूटमेंट का क्षेत्र रहा है, जो शेरशाह, मुग़ल सेना, अंग्रेज़ों और साथ ही आसपास के स्थानीय जमींदारों, छोटे राजाओं की सेनाओं में भर्ती होते रहे हैं. यह संभव है कि 19वी सदी के मध्य भूमि कर की ऊँची दर, नील की खेती के परिणामस्वरूप उपजी परेशानियां आदि के चलते किसानों ने सारण से बाहर संभावनाओं को तलाशना शुरू किया. इसमें मॉरिशस और Caribbean देशों में माइग्रेशन से भी बल मिला हो. जो भी हो, 19 वी सदी के अंत तक माइग्रेशन की दर ऊँची हो चली थी, और सारण की लगभग 15 फीसदी आबादी पूरब की ओर माइग्रेट कर चुकी थी. 1901 तक आते आते सारण का sex ratio 1200 महिला/ 1000 पुरुष हो चला था. उत्तर में दार्जिलिंग से लेकर दक्षिण में कलकत्ता तक मिल्स, फैक्ट्रीज, डॉक, कोल् माइंस, रोड, रेलवे आदि क्षेत्रों में रोजगार के अवसर खुल रहे थे और जो मज़दूरी मिल रही थी, वो सारण में मिलने वाली मज़दूरी से तीन से पांच गुना अधिक थी. माइग्रेशन का पीक टाइम था नवम्बर से मई तक का समय., जब खेती में अवसर नहीं होते थे. जब उत्तर बिहार रेलवे लाइन से कलकत्ता से जुड़ गया, तो यात्रा का समय घट कर कुछ दिनों का हो गया.

सारण से माइग्रेशन का असर सभी जातियों पर पड़ा- ब्राह्मण, राजपूत, अहीर, कोइरी, कुर्मी, चमार और साथ ही मुस्लिम समुदाय पर भी. हालाँकि रोजगार में जातीय तौर पर अंतर था. जहाँ उच्च जातियों के लोग सर्विस सेक्टर में भरे हुए थे, वहीँ नीची जातियों के लोग कृषक मज़दूर के रूप में काम कर रहे थे. बंगाल के जूट मिल में सारण के लोग भरे हुए थे. उदाहरण के लिए, तीताघूर जुट मिल में 1902 में एक तिहाई सारण के बुनकर थे, जो बढ़ते बढ़ते 1991 में तीन चौथाई हो गए. इस माइग्रेशन में महिलाओं का हिस्सा कम था. घर संभालना, बड़े बूढ़ों की देखभाल करना, ट्रेड यूनियन में पुरुषों का वर्चस्व आदि ऐसे कारक थे. ऐसे में यहाँ के साहित्य में, लोक गीतों में माइग्रेशन और इससे उपजा दर्द, विरह, रेमिटेंस, आदि बहुत प्रमुखता से उभर कर आया. पूरब को ऐसे क्षेत्र के रूप में देखा गया, जो इनके पुरुषों को भरमा देगा. बंगाल की औरतों का जादू उनके पुरुषों को भरमा लेगा- बंगलनिया सुन्नरी !

हालाँकि 21 वी सदी में भी सारण से कलकत्ता की ओर माइग्रेशन जारी है,लेकिन बंगाल के आर्थिक पतन, कलकत्ता के आर्थिक महत्व में कमी आने ( देश विभाजन के बाद से), इस क्षेत्र के लोग देश के अन्य भागों में जाने लगे. हरियाणा, पंजाब में हरित क्रांति, दिल्ली में लघु उद्योगों का जाल, कंस्ट्रक्शन सेक्टर, पश्चिम भारत का आर्थिक उत्थान और फाइनली गल्फ कन्ट्रीज.

रत्नागिरी और उडुपी के विपरीत सारण देश के सबसे पिछड़े इलाकों में रहा. तम्बू कहते हैं, हालाँकि इस क्षेत्र में पैसा तो आया, लेकिन भ्रस्ट प्रशासन और भूमि जोतों पर असमान नियंत्रण के चलते गरीबी पर जोरदार चोट नहीं पड़ सकी.

Source: Chinmay Tumbe’s ” India Moving: A History of Migration”


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