माइग्रेशन, दास प्रथा और अंग्रेज़ों की नीति !!

Balendushekhar Mangalmurty

1739 में नादिर शाह ने जब दिल्ली को तबाह किया तो बड़ी संख्या में हिंदुस्तानी कारीगरों को ईरान ले गया, जिन्हे वहां Oxus नदी के किनारे 1100 नाव बनाने के काम में लगाया गया. इस दौर में युद्द के परे, अकाल और unjust टैक्स रेजीम के विरोध में भी माइग्रेट करते रहे. उदाहरण के लिए, 1636 में जुलाहे अपने उत्पाद के कम प्राइस, और अधिक टैक्स के विरोध में बड़ोदरा छोड़ कर सूरत जा बसे, हालाँकि उन्हें बाद में स्थानीय अधिकारीयों के द्वारा वापस लौटने के लिए मना लिया गया.दक्षिण भारत में भी जुलाहों के कई ग्रुप्स ने माइग्रेट किया, जिस पर इतिहासकार विजय रामास्वामी ने गहन अध्ययन किया है. इनके माइग्रेशन की कहानियां ओरल ट्रेडिशन के माध्यम से संभाल कर रखा गया है, जब सुराष्ट्र में विवाह के दौरान दूल्हा और दुल्हन पक्ष के बातचीत के तीर चलते हैं, तो इस दौरान इनके पूर्वजों के माइग्रेशन की कहानियां सुनी जा सकती हैं. इन ओरल ट्रडिशन्स को Boula कहा जाता है.

भारत में माइग्रेशन की कहानी का एक अनमोल हिस्सा हैं दास. दास प्रथा की प्राचीन परंपरा है भारत में. हालाँकि दास प्रथा जिसने इतिहासकारों का ध्यान सबसे अधिक खींचा है, वो है ट्रांस अटलांटिक स्लेव ट्रेड. 16 वी से 19 वी सदी के मध्य अनुमानतः 1 करोड़ 20 लाख दासों को अफ्रीका से अटलांटिक महासागर पार अमेरिका महाद्वीप जबरन ले जाया गया. नार्थ अमेरिका के विपरीत अधिकांश ब्राज़ील और Caribbean कन्ट्रीज गए. प्राचीन भारत में दास प्रथा थी और अर्थशास्त्र में दासों के बारे में विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं. अशोक के शासन काल में कलिंग युद्ध के बाद बड़ी संख्या में युद्धबंदियों को कृषि कार्य में लगाने के लिए कलिंग से लाया गया था. चोल साम्राज्य में युद्ध में औरतों को बंदी बनाकर दासी बना लिया जाता था और फिर उनसे मिलिट्री कैडर को बढ़ाने के काम में लगाया जाता था. दक्षिण भारत के मंदिरों में बड़ी संख्या में औरतों को देवदासी के रूप में रखा जाता था. 16 वी और 18 वी सदी के मध्य राजपूत शासक बड़ी संख्या में युद्ध में औरतों को पकड़ कर दासी और रखैल के रूप में रखते थे.

17वी सदी में बंगाल डेल्टा से काफी बड़ी संख्या में दास बनाये जाते थे. इस दौर में अराकान के सिर्फ दो छोटे सेंटर्स में 18,000 के करीब बंगाली दास, दासियाँ पाए गए थे. अराकान के शासकों ने पुर्तगालियों की भी मदद ली और दासों को बटाविया में डचों को भी बेचा.

तमाम उदाहरणों के बावजूद दिल्ली सल्तनत में दासों ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा अपने sheer scale के चलते. क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने स्लेव डायनेस्टी की नींव डाली थी. लगातार चल रहे युद्दों के चलते बड़ी संख्या में लोग दास बनाये जा रहे थे. भारत से बड़ी संख्या में दासों को सेंट्रल एशिया के बाज़ारों में बेचा गया, और उनके बदले घोड़े ख़रीदे गए. कहावत चल पड़ी थी, “हिंदुस्तान से दास और पार्थिया से घोड़े.”

उत्तर पश्चिम से भारत आने वाले पहाड़ी मार्गों को हिन्दुकुश कहा जाता था, हिन्दुओं का हत्यारा, क्योंकि इस मार्ग से हिंदुस्तान के लोगों को बतौर दास ले जाया जाता था तो मार्ग में भीषण ठण्ड में बड़ी संख्या में लोग मर जाते थे.

15 वी सदी के मध्य से लेकर 17 वी सदी के मध्य अरबों ने इथियोपिया से हब्शी दासों को खरीदना शुरू किया, उन्हें दक्कन में सैन्य जरूरतों के लिए बेचा और कई बार भारतीय कपड़ों के लिए. इस दौर में सबसे प्रसिद्द हब्शी दास रहा, मलिक अम्बर, जिसने न सिर्फ अपनी आज़ादी हासिल की बल्कि अपने योग्यता के बल पर अहमदनगर के निज़ामशाही वंश का प्रधानमंत्री भी बना. मुगलों के खिलाफ गुरिल्ला रणनीति जो उसने अपनायी, उसने आगे चलकर शिवाजी को भी प्रेरित किया।

इसके अलावा जंजीरा के सिद्दी भी अबीसीनिया के गुलाम थे, जिन्होंने मराठों के उत्थान के काल में जजीरा बनाया और पुर्तगालियों के नाक में दम किये रखा. आज वे हज़ारों की संख्या में कर्णाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में बसे हुए हैं.

मुग़लों के पतन के बाद जब अंग्रेज़ों ने सत्ता संभाली, तो उन्होंने बंजारा जातियों को सेटल करने का प्रयास किया, इससे उनपर निगरानी रखने में आसानी होती, और दूसरे, लैंड रिवेन्यू बेस बढ़ाने का भी प्रयास था. जिन बंजारा जातियों ने इसका प्रतिरोध किया, उन्हें “क्रिमिनल ट्राइब” की लिस्ट में शामिल किया गया. दक्षिण भारत में हैदराबाद की लंबाडा समुदाय ( जो उत्तर भारत के बंजारों की तरह ही थे) पर इसी तरह से निगरानी की गयी और उन्हें अपने पारम्परिक काम से हटाने का प्रयास किया गया. वे कृषि मज़दूरों और फिर बोंडेड लेबर में बदल गए. तेलंगाना आंदोलन में आगे चलकर उन्होंने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया.

अंग्रेज़ों की कुछ नीतियां जहाँ एक ओर मोबिलिटी को प्रभावित कर रही थी, वहीँ दूसरी ओर उनकी कुछ नीतियां मोबिलिटी को बढ़ावा भी दे रही थीं. उदहारण के लिए बारूद के उत्पादन, नील की खेती और अफीम के व्यापार के चलते गंगा में माल की आवाजाही में काफी बढ़ोत्तरी की. 1830 के दशक में गंगा नदी में लगभग 3,50,000 नाविक थे, जो पहले कभी नहीं थे. भारतीय कपडा उद्योग के नष्ट होने से पूर्वी उत्तर प्रदेश से कारीगर बड़ी संख्या में बॉम्बे, भिवंडी, मालेगांव जैसे केंद्रों की ओर गए. देश के प्रशासनिक एकीकरण के चलते देश में एक जगह से दूसरी जगह मूव करने में आसानी हो रही थी. अब पोर्ट सिटीज में फैक्ट्रीज, असम के चाय के बागान, पूर्वी भारत के खान भारतीय मज़दूरों को बुला रहे थे. और इस मूवमेंट में मदद कर रहा था रेल.

घोड़ों, बैलगाड़ियों की जगह हॉर्स पावर वाले रेल इंजन के आ जाने से मूवमेंट में अभूतपूर्व तेजी आयी. रेल और भाप से चलने वाले जहाजों के चलते माल के ट्रांसपोर्ट कॉस्ट में 90 फीसदी तक कमी आयी, वहीँ रेल से 400 मील तक का सफर तय करने लगे, रेल से एक सदी पहले जहाँ इतने समय में 20 मील का सफर तय होता था. 19वी सदी के अंत में वैश्वीकरण के बढ़ते कदम और अकालों की लम्बी शृंखला के चलते भारत में भी आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय माइग्रेशन में काफी गति आयी. 1843 से 1937 के बीच 3 करोड़ लोग भारत से बाहर गए, मुख्यतः बर्मा, मलेशिया और श्रीलंका. जिनमे से २ करोड़ 40 लाख वापस लौटे. 1901 की जनगणना में पता चला कि कुल आबादी का दो फीसदी हिस्सा एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त की तरफ माइग्रेट किया.

आज़ादी के बाद नेचुरल डिजास्टर, युद्ध, दंगे, डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स आदि के चलते अब तक लगभग 4 करोड़ भारतीय डिस्प्लेस हुए हैं. जबकि भारत में तिब्बत, श्रीलंका, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमार आदि देशों से लगभग 10 लाख लोग बतौर शरणार्थी शरण लिए हुए हैं.


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.