यात्रा वृतांत: 2018 में हमलोग उडुपी घूमने निकले/ रजनी मुखर्जी की कलम से

Rajni Mukherji

दक्षिण भारत की यात्रा पहले कभी की नही थी। जुलाई 2018 में उडुपि जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।मैं मेरे पति और बेटा तीनो साथ थे।दिल्ली के निज़ामुद्दीन से हमने सुबह 10.55 पर राजधानी से अपनी यात्रा आरंभ की। रेल यात्रा तो आरामदायक और सुखद होती ही है खासकर जब परिवार साथ हो।रात कब हो गई पता ही नही चला।सुबह नींद खुली तो बाहर का नज़ारा ही गज़ब था ।हम उकसी और भोके स्टेशन के बीच के साढ़े छह किलोमीटर लंबे सुरंग को पार कर रहे थे ।

लगभग 7 बज रहे होंगे।थोड़ी देर के लिए तो घबराहट सी हुई लेकिन फिर सबकुछ सामान्य हो गया क्योंकि थोड़ी थोड़ी देर में हमने कई टनल पार किये।कोंकण रेलवे में कुल 92 टनल है।हम 9 बजे के आसपास रत्नागिरी पहूँच गए।गोआ जानेवाले लोग मडगांव में उतरे।वहां से टैक्सी द्वारा गोआ जाया जा सकता है।वेस्टर्न घाट की खूबसूरती को शब्दों में बयान करना लगभग असंभव सा है। इतनी हरियाली ,छोटे छोटे घर,नारियल के पेड़ ! केवल तस्वीरों में देखा था मैंने! काश ! काश मैं चित्रकार होती!

ट्रैन जब काली नदी पर बने पुल से गुजर रही थी तो बस जेहन में यही ख़याल बार बार आ रहा था हमारे इंजीनियर और तमाम मजदूर धन्यवाद के पात्र है जिन्होंने इस दुर्गम जगह को भी यातायात के लिए सुलभ बना दिया।

कोंकण रेल

पटरी के किनारे चट्टानों पर लोहे के तार की जाली लगी हुई थी ताकि भूअसखलन के समय चट्टान का टुकड़ा पटरी पर न आ गिरे।5 बजे शाम में हम उडुपि पहुँचे।

उडुपी रेलवे स्टेशन

उडुपि बहुत छोटा सा स्टेशन है।केवल दो प्लेटफार्म है।यहां रेणुकूट की तरह प्लेटफार्म ऊंचाई पर है।नीचे जाकर हमने टैक्सी ली और 4 किलोमीटर दूर मणिपाल कॉलेज के सामने पहले से ही ऑन लाइन बुक किये गए होटल”अश्लेष”में पहुँचे।वहां एक महिला कर्मचारी थी।नाम “मुखर्जी”देखते ही वो टूटे फूटे बंगला में बात करने लगी।सच कहें तो एकदम VIP ट्रीटमेंट मिला।

दूसरे दिन सुबह हमने उडुपि के प्रसिद्ध कृष्ण मंदिर जाने का प्रोग्राम बनाया।होटल वाले के माध्यम से हमने टैक्सी बुक की। बातो बात में ड्राइवर ने बताया उडुपि की भाषा “तुलु” है और तुलु भाषा मे उडुपि का नाम “ओडिपु”है।यह क्षेत्र भगवान परशुराम के नाम से भी जाना जाता है।

कृष्णा मंदिर, उडुपी

उडुपि पहाड़ी जगह है इसलिए राँची की सड़कों से एहसास हो रहा था खासकर जब हम बिरसा चौक से जग्गनाथपुर जाते है।कृष्ण मंदिर जब हम पहुँचे तो प्रवेश द्वार की भब्यता और खूबसूरती बेजोड़ लगी।हम सौभाग्यशाली थे उस दिन मंदिर में बिल्कुल भीड़ नहीं थी इसलिए हमें लाइन में खड़े नही रहना पड़ा।प्रवेशद्वार से अंदर आते ही दाहिनी तरफ तालाब है।जिसमे पुजारी नहा रहे थे।तालाब से सटा हुआ कृष्णमन्दिर है।प्रांगण में द्वैत मठ है जहाँ भक्तों के ठहरने की व्यवस्था है।हम दाई ओर तालाब से सटे मंदिर में प्रवेश कर गए।भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन खिड़की से करने का प्रावधान है।उनके दसों अवतार की मूर्तियां है जो खिड़कियों के 9 खंडों के अंदर विराजमान हैं।काले पत्थर से प्रतिमाये बनी हुई है।भगवान श्रीकृष्ण को ढेर सारे सोने के आभूषणों से सजाया गया था। भगवान को झरोखे के माध्यम से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।बस ये बात मन मे जरूर आयी ईश्वर को सोने के आभूषणों की क्या आवश्यकता?

मंदिर के प्रांगण में कई और मंदिर भी है।पुराने मंदिर काठ से बने हुए है।”बाबा” यानि हमारे इष्टदेव महादेव का मंदिर चंद्रमौलीश्वर मंदिर ..इसकी शोभा !अहा! मूँछो वाले महादेव !
मन गदगद हो गया।माँ को वीडियो कॉल करके यहां के मंदिरों का दर्शन भी करवाया।

सभी मंदिरों की तरह यहां भी भगवान की प्रतिमाएं,मूर्तियां ओ अन्य सामान मंदिर के प्रांगण में बने दुकानों में बिक रहे थे।मैंने भी थोड़ी खरीददारी की। वापस लौटते हुए हमने मां महिषसूरमर्दिनी मंदिर के भी दर्शन किये।
शाम को लौटने के बाद हमने होटल के नीचे हिस्से में बने होटल Guzzlers Inn में खाना खाया।यहां चावल बहुत सस्ता और बेहद उम्दा किस्म का था।खाना जब आर्डर किया तो वेटर ने वाइन के लिए भी पूछा ।मैं आश्चर्यचकित थी!

दूसरे दिन हमने अरब सागर घूमने का मन बनाया था लेकिन मौसम खराब होने की वजह से जा न सके। शाम में हम आसपास के मॉल में थोड़ी बहुत खरीददारी की।
अरे!ये क्या?मेरे पतिदेव का चेहरा खिल उठा इतनी दूर यहां..?
“प्रयागराज पानी पूरी वाला”!उससे जाकर बात की तो पता चला वो “मेजा”का है।हमारे इलाहाबाद से 40किलोमीटर दूर है।खैर,हमने गोलगप्पे भी खाए।

 

शाम में मैंने होटल की कर्मचारी”शर्मिष्ठा”सी थोड़ी बातचीत की।उसने बताया उनके पूर्वज यहां आकर बस गए है।बंगाल से मजदूर उडुपि आकर धान की खेतो में मजदूरी करते हैं।
दूसरे दिन हमारी ट्रेन थी।हम निकल पड़े अपने घर की ओर उडुपि से ढेर सारी खुशियाँ बटोरकर!


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