पुस्तक चर्चा: Behold, I Shine: Narrative of Kashmir’s Women and Children by Freny Manecksha

Balendushekhar Mangalmurty 

कश्मीर से धारा 370 हटाए एक साल से ज्यादा हो रहा है, पर कश्मीर में क्या हो रहा है, देश की जनता अनभिज्ञ है. 80 के दशक में अफगानिस्तान से सोवियत फौजों के पराजित होकर पीछे हट जाने के बाद पाकिस्तान ने सऊदी के पैसों और अमेरिका के हथियारों से (हालाँकि हथियार रूसियों का AK 47 ही था. )और सऊदी बहाब सम्प्रदाय के उग्र इस्लामी विचारों से लैस मुजाहिदीनों को कश्मीर की ओर मोड़ दिया.

Freny Manecksha

इस्लामी जिहाद की भावना से लैस भारत को हिन्दू राष्ट्र मानने वाले इन अंतर्राष्ट्रीय मुजाहिदीनों ने घाटी में आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे स्थानीय कश्मीरियों के दल JKLP को हासिये पर जल्द ला दिया और फिर घाटी में चुन चुन कर कश्मीरी पंडितों को टारगेट करना शुरू किया. दहशत से कश्मीरी पंडितों के पलायन ने कश्मीर के डेमोग्राफी को एक तरफ चेंज किया तो दूसरी ओर अब तक कश्मीरियों के सेक्युलर संघर्ष को धार्मिक रंग दे दिया.

कश्मीर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के वोर्टेक्स में फंस गया. भारतीय सेना में मोर्चा संभाल लिया, स्टेट पुलिस के बस में फिर बात रह नहीं गयी. गोलियों का जवाब गोलियों से दिया जाने लगा. इस खुनी संघर्ष के बीच कश्मीर की अर्थव्यवस्था, शिक्षा, पर्यटन ताश के महल की तरह बिखरने लगे और लोग बेरोज़गार होने लगे. संगीनों के साये में जीते जीते कश्मीरी एक साधारण जीवन जीने को तरस गए.

अंतर्राष्ट्रीय, जेहादी चश्मे से इस संघर्ष को देखते देखते नज़र और चीजों की तरफ से हट सी गयी. एक तबके की ओर ध्यान कम ही गया- वो था कश्मीरी महिलाएं और बच्चे. महिलाएं और बच्चे जो किसी भी संघर्ष में सबसे पहले बलि पर चढ़ते हैं.

पत्रकार फ्रेनी मानेकशा ने इन्ही अनदेखी, अनसुनी आवाजों को अपनी किताब में डॉक्यूमेंट किया है. फ्रेनी मानेकशा कश्मीर गयीं और उन्होंने insurgency और इसके खिलाफ भारतीय सेना और अर्ध सैनिक बलों के द्वारा छेड़े गए मुहीम में फंसी कश्मीरी महिलाओं और बच्चों की दास्तान लिखी है. उन्हें आवाज देने की कोशिश की है. वे कहती हैं कि उनका ध्यान कश्मीर पर 2010 में गया, जब उनकी नज़र से एक शब्द बार बार गुजरा, Body count. दिलनाज बोगा जैसे कुछ पत्रकार मित्रों के सहयोग से वे कश्मीर घाटी पहुंची और उन्होंने कश्मीरी महिलाओं से बात की.

अपनी किताब की शुरुआत वे कश्मीर के इतिहास की संक्षिप्त चर्चा से करती हैं. वे कश्मीर समस्या की शुरुआत 1947 में देश विभाजन से नहीं मानतीं, बल्कि 1846 से मानती हैं, जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अमृतसर की संधि के तहत डोगरा सिख सरदार गुलाब सिंह को 50 लाख रूपये में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख की रियासत सौंप दी. इस तरह मुस्लिम बहुसंख्यक कश्मीर में डोगरा शासकों का राज शुरू हुआ. लेकिन कश्मीर की अवाम की नज़र में महाराजा का शासन वैध नहीं था. रियासत में भूमि पर असमान नियंत्रण ( डोगरा शासकों और उनके समर्थकों के द्वारा), उनके तथाकथित इस्लाम विरोधी रुख से कश्मीरी अवाम खुद को हासिये पर महसूस करने लगी. ऐसे में 1931 में जुलाई- अगस्त में डोगरा शासकों के खिलाफ कश्मीरी जनता में उबाल शुरू हुआ और इस डोगरा विरोधी आंदोलन के नेता बनकर उभरे शेख अब्दुल्ला. 1946 में शेख अब्दुल्ला ने अमृतसर की संधि को खारिज करने और कश्मीरी अवाम को संप्रभु इकाई मानने की मांग को लेकर “कश्मीर छोडो आंदोलन” छेड़ दिया. 1947 के बसंत में पुंच्छ जागीर में डोगरा शासक के शोषक टैक्स सिस्टम के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बज उठा और 24 अक्टूबर 1947 को विद्रोहियों ने आज़ाद कश्मीर का एलान कर दिया.

देश के विभाजन के चलते भारत और पाकिस्तान के प्रतिद्वंद्वी दावों के बीच कश्मीर समस्या तब और उलझ गयी, जब अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले शुरू हो गए. उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त के अफरीदी कबीले के पठानों ने मुज़फ़्फ़राबाद और पूंछ पर कब्ज़ा कर लिया. महाराजा की सेना ताश के पत्ते की तरह बिखर गयी. नेहरू के मित्र शेख अब्दुल्ला ने नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर प्रतिरोध का झंडा बुलंद किया. कबायली बारामुला तक आ पहुंचे. उन्होंने मुख्यतः हिन्दुओ और सिखों का कत्लेआम किया और जो मुस्लिम विरोध कर रहे थे, उन पर भी कहर बनकर टूटे. बहुत बड़े पैमाने पर महिलाओं के साथ बलात्कार किया, सम्पत्ति लूटी। श्रीनगर बमुश्किल 56 किमी की दूरी पर था, लगा श्रीनगर का पतन अब बस कुछेक दिनों की बात है. ऐसे में राजा हरि सिंह ने भारत से मदद की गुहार लगायी. भारत सरकार ने बिना Instrument of Accession पर दस्तखत किये मदद से इंकार कर दिया. ऐसे में हड़बड़ी में दस्तावेज पर महाराजा ने दस्तखत किये और 27 अक्टूबर 1947 को सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन कश्मीर में उतार दी गयी.

Instrument of Accession की शर्तों के मुताबिक़ जैसे ही कश्मीर में शांति व्यवस्था बहाल होती, जनमत संग्रह ( Plebiscite) के जरिये राज्य के विलय के मसले पर अंतिम निर्णय ले लिया जाना था. भारतीय सेना ने बारामुला पर अपना कब्ज़ा कर लिया. कबायली फौजें पीछे हटने लगीं, पर UN में मसला जाने से युद्ध विराम की घोषणा हुई और लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल 1949 के जनवरी में अस्तित्व में आया. और कश्मीर दो भागों में बंट गया. पाकिस्तान के कब्ज़े वाला कश्मीर, जिसे आज़ाद कश्मीर का नाम दिया गया और भारत के हिस्से में आया कश्मीर. इस कृत्रिम विभाजन रेखा से कश्मीरी पशोपेश में पड़ गए. किसी का मकान इस हिस्से में था, तो खेत बगीचे दूसरे हिस्से में. परिवार इस तरफ तो दोस्त रिश्तेदार उस तरफ. लोग LOC को पार करके आया जाया करते थे. 1971 के युद्ध के बाद सीमा पार आवागमन पर कड़ी बंदिशे लगाई गयीं.

आज़ादी के बाद सत्ता में आयी शेख अब्दुल्ला की सरकार ने कई क्रांतिकारी सुधार किये जिसमे जमीन के आसमान वितरण पर प्रहार शामिल था. शेख अब्दुल्ला के “नया कश्मीर” मैनिफेस्टो से कश्मीरी अवाम का एक बड़ा तबका लाभान्वित हुआ. पर 1953 के अगस्त में शेख अब्दुल्ला सरकार को केंद्र सरकार ने भारतीय संघ से बाहर कश्मीर के अस्तित्व पर विचार करने के संदेह में बर्खास्त कर दिया. शेख अब्दुल्ला जेल भेज दिए गए और उनकी जगह बख्शी गुलाम मुहम्मद, जी एम सादिक़ आदि मुख्यमंत्री बने. केंद्र सरकार के इन पिट्ठुओं के शासनकाल में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुव्यवस्था ने कश्मीरियों का मोह भंग करना शुरू किया। 1975 में शेख अब्दुल्ला और इंदिरा गाँधी के बीच समझौते के बाद शेख अब्दुल्ला की सरकार में वापसी हुई. पर शेख अब्दुल्ला के तानाशाही रवैये और विरोध को कुचलने की नीति से जनता परेशां हो रही थी. 1978 में पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत विरोध की आवाज को कड़ाई से दबाया गया. पर असंतोष बढ़ता ही जा रहा था. 1987 के चुनाव में व्यापक धांधली ने कश्मीरियों में निराशा का संचार किया. कश्मीर की अवाम को 1986 में कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के सामानांतर गठित जमात ए इस्लामी के नेतृत्व में गठित दल मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (कश्मीर में जनमत संग्रह की पक्षधर ) से सफलता की उम्मीद थी. पर चुनाव के दौरान मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के सैकड़ों कार्यकर्ताओं को पीटा गया और पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत जेल में डाल दिया गया. चुनाव के परिणामों ने कश्मीरी अवाम के बड़े हिस्से में प्रजातान्त्रिक व्यवस्था के खिलाफ असंतोष पैदा कर दिया. हिंसक विद्रोह को अंतिम रास्ता मानते हुए सैकड़ों कश्मीरी युवा बॉर्डर पार करके पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में चले गए और वहां से हथियारों की ट्रेनिंग लेकर वापस लौटे. हालाँकि शुरू में इस विद्रोह का अगुआ JKLF बना और इसका नारा था, “कश्मीर बनेगा खुदमुख्तार” मतलब कश्मीर अपने भाग्य का फैसला खुद करेगा. लेकिन कश्मीर की आज़ादी की वकालत करने की वजह से पाकिस्तान ने JKLF की जगह हिज़बुल मुजाहिदीन को अपना समर्थन देना शुरू कर दिया. हिज़बुल मुजाहिदीन का नारा था, ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’. हिज़बुल मुजाहिदीन का कमांडर सईद मुहम्मद युसूफ शाह उर्फ़ सैयद सलाहुद्दीन एक समय अमीराकदल विधानसभा क्षेत्र से मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट का उम्मीदवार था. पाकिस्तान से फंड्स और हथियार की सप्लाई गँवा कर और एक तरफ हिज़बुल मुजाहिदीन के हाथों तो दूसरी तरफ भारतीय सेना के हाथों अपने कैडर के मिट जाने के भय से 1994 में JKLF ने हथियार बंद विद्रोह का रास्ता छोड़कर खुली राजनीति का रास्ता अख्तियार कर लिया और ओवरग्राउंड संगठन बन गया. इस बीच 80 के दशक में अफगानिस्तान से सोवियत फौजों के पराजित होकर पीछे हट जाने के बाद पाकिस्तान ने सऊदी के पैसों और अमेरिका के हथियारों से (हालाँकि हथियार रूसियों का AK 47 ही था. )और सऊदी बहाब सम्प्रदाय के उग्र इस्लामी विचारों से लैस मुजाहिदीनों को कश्मीर की ओर मोड़ दिया.

इस्लामी जिहाद की भावना से लैस भारत को हिन्दू राष्ट्र मानने वाले इन अंतर्राष्ट्रीय मुजाहिदीनों ने घाटी में आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे स्थानीय कश्मीरियों के दल JKLP को हासिये पर जल्द ला दिया और फिर घाटी में चुन चुन कर कश्मीरी पंडितों को टारगेट करना शुरू किया. दहशत से कश्मीरी पंडितों के पलायन ने कश्मीर के डेमोग्राफी को एक तरफ चेंज किया तो दूसरी ओर अब तक कश्मीरियों के सेक्युलर संघर्ष को धार्मिक रंग दे दिया.

कश्मीर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स के वोर्टेक्स में फंस गया. भारतीय सेना ने मोर्चा संभाल लिया। गोलियों का जवाब गोलियों से दिया जाने लगा. कश्मीर में भारतीय सेना और अर्ध सैनिक बलों की उपस्थिति बढ़ती गयी. और औसत दस नागरिकों पर एक सैनिक का हो गया. दुनिया के किसी हिस्से के विपरीत कश्मीर में सैनिक- सिविल पापुलेशन के बीच का अनुपात सबसे अधिक बन गया है. फाइनली 2003 आते आते भारतीय सेना के relentless assault और बदलते geopolitical condition के चलते बॉर्डर के पार से आतंकियों के आने में कमी आयी. घाटी में दहशत की घटनाओं में कमी आयी.

2008 में घाटी में संघर्ष का स्वरुप बदला :

Stone pelting women in Kashmir valley

2008 में घाटी में संघर्ष ने unarmed mass civil disobedience का रूप लिया जब अमरनाथ श्राइन को 40 हेक्टेयर जमीन देने का फैसला किया गया. स्थानीय लोगों को लगा कि ये कश्मीर में गैर कश्मीरी लोगों को बसाने की केंद्र सरकार की कवायद है और राज्य के द्वारा डेमोग्राफिक चेंज लाने की कोशिश की जा रही है. 2009 में इस संघर्ष में और तेजी आयी जब शोपियां में नदी से दो लड़कियों के शव हासिल किये गए. लोगों का आरोप था कि सेना ने इन लड़कियों के साथ बलात्कार करके हत्या कर दी और लाश नदी में बहा दिया. 2010 के आते आते इस संघर्ष ने इंडियन स्टेट के खिलाफ stark defiance का रूप ले लिया. सैनिकों के सामने अपना शर्ट खोलकर सीना ताने युवाओं की तस्वीरें सामने आने लगीं. इसी दौर में कन्नी जंग ( पत्थर से जंग) शुरू हो गयी. अपने चेहरों को ढके युवा कश्मीरी बंकर, पुलिस पोस्ट, बख्तरबंद गाड़ियों को पत्थर से निशाना बनाने लगे. पत्थरबाज़ी को एंथ्रोपोलॉजिस्ट मुहम्मद जुनैद युद्धक रणनीति के रूप में देखते हैं और सिक्योरिटी फोर्सेज को इंडियन डोमिनेशन के सिंबल के रूप में. उनके अनुसार, पत्थरबाज़ी (stone pelting) शुद्ध राजनीतिक एक्ट है. अधिकांशतः पत्थरों से किसी को कोई नुक्सान नहीं पहुंचता. क्योंकि एक तो सैनिक पूरी तरफ बैटल गियर में रहते हैं , दूसरे पत्थरबाज सैनिकों से सुरक्षित दूरी बनाकर रहते हैं ताकि वे सैनिकों के द्वारा दौड़ाए जाने पर सुरक्षित जगहों पर भाग सकें। ऐसे में पत्थर फेंकने का उद्देश्य कश्मीर पर भारतीय कब्ज़े की प्रतीक भारतीय सेना को defiance दिखाना होता है.

इस विरोध को 2016 में एक बार फिर हवा लगी, जब हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी को उसके साथियों के साथ भारतीय सेना ने एक ऑपरेशन में मार गिराया. पहले के मुजाहिदीनों के विपरीत बुरहान वानी किसी क्षद्म नाम के पीछे नहीं छिपा. उसने सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया. फेसबुक पर लगातार वो अपने फोटोज और वीडियोज शेयर किया करता था. जिसे काफी बड़ी संख्या में कश्मीरी फॉलो किया करते थे. वरिष्ठ पत्रकार परवेज बुखारी की राय है कि अगर 2010 में आर्म्ड मिलिटेंसी की जगह मास प्रोटेस्ट ने ले लिया, तो 2016 में बुरहान वानी के आगमन से दोनों चीजों का स्ट्रेटेजिक मिक्स हुआ, आर्म्ड मिलिटेंसी और साथ ही, मास प्रोटेस्ट !! ऐसे में कई कश्मीरियों के मन में आज़ादी के ख्यालात फिर से पलने लगे. 8 जुलाई 2016 को त्राल क्षेत्र में स्थित बुरहान के गांव में बुरहान और उसके दो साथियों- सरताज अहमद शेख और परवेज़ के “शहीद” होने की खबर फ़ैल गयी. उसके फ्यूनरल प्रोसेशन में लगभग दो लाख लोगों ने हिस्सा लिया।
2016 के विद्रोह की खासियत ये थी कि न केवल युवा, बल्कि महिलाएं, किशोरियां और बच्चे, वृद्ध, डॉक्टर, वकील भी हिस्सा लेने लगे. धरने प्रदर्शन में हिस्सा लेने लगे और एक्स्ट्रा जुडिशल किलिंग के खिलाफ आवाज उठाने लगे.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अभी कश्मीर में 5 लाख से 7 लाख के बीच सैनिक और अर्ध सैनिक बल के जवान तैनात हैं. और मुजाहिदीनों की संख्या बमुश्किल 450 के आसपास है.

कश्मीर की तस्वीर बेहद जटिल है:

मानेकशा कह रही हैं कि कश्मीर की तस्वीर बेहद जटिल है, एक वजह तो भारत पाकिस्तान की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में फंस जाने के कारण है. “कश्मीर में विद्रोह” शेष भारत में देश की अखंडता के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है, ऐसे में शेष भारत से इस विद्रोह के लिए कोई सहानुभूति नहीं है. दूसरे, कश्मीर में विद्रोह में इख्वानियों ने भी जटिलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है. इख़्वानी आत्मसमर्पण किये मिलिटेंट्स हैं, जिन्हे भारतीय सेना ने मुजाहिदीनों के खिलाफ इस्तेमाल किया. इन इख्वानियों ने बेहद क्रूर और हिंसक तरीकों से स्थानीय लोगों से इनफार्मेशन निकाले. शुरू में इन्होने हथियार और धन का इस्तेमाल मिलिटेंट्स से लड़ने में किया पर आगे चलकर इन्होने अपनी ताकत और सेना के द्वारा दिए गए ब्लेंक सपोर्ट को अपने व्यक्तिगत मामले निपटाने में किया. 1998 में जब इख्वानियों से समर्थन ले लिया गया, तो फिर ये लोग और इनके परिवार मुजाहिदीनों के निशाने पर आ गए और खुनी खेल का एक नया दौर शुरू हो गया.

कश्मीर में AFSPA ( Armed forces special powers Act, 1990) ने भी परेशानियां कम नहीं की हैं, उलटे बढ़ाई हैं. मानवाधिकार के तमाम मामलों- बिना वारंट के लोगों को गिरफ्तार करना, निहत्थे नागरिकों पर गोलियां बरसाना, चाहे वो इरादतन हत्या का मामला ही क्यों न हो, घर में raid मारना या उन सम्पत्तियों को नष्ट कर देना जिनपर मिलिटेंट्स के द्वारा इस्तेमाल किये जाने की आशंका हो, किसी भी मामले में बिना केंद्र सरकार की अनुमति के कार्यवाही नहीं की जा सकती.

कश्मीर के व्यापक सैन्यकरण ने कश्मीर में जटिलताएं बढ़ा दी हैं.

मानेकशां कहती हैं कश्मीर के व्यापक सैन्यकरण ने कश्मीर में जटिलताएं बढ़ा दी हैं. और महिलाओं और बच्चियों के सामने समस्याएं पैदा कर दी हैं.
कश्मीर में फैले लगभग 600 सिक्योरिटी फोर्सेज के कैंप ने लगभग 3.5 लाख एकड़ जमीन घेर रखी है. ऐसे में कश्मीरियों के पास उपलब्ध ट्रेडिशनल स्पेसेस- बादाम बाड़ी, करवा, अल्पाइन लैंड, खेत, यारबल ( वाशिंग घाट ) आदि के जगह सिकुड़ गए हैं. हिंसा के बीच सहमे बच्चे और महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल पा रही हैं. अक्सरहां झड़प के चलते खिड़की तक बंद रखे जाते हैं. घरों में रौशनी नहीं आती. झड़प के बाद घरों ने आंसू गैस के गोलों की जानलेवा गंध फ़ैल जाती है, खांसते खांसते बुरा हाल हो जाता है. अक्सरहां कर्फ्यू लग जाने के चलते इमरजेंसी मेडिकल फैसिलिटी ले पाना मुश्किल हो जाता है. कई बार सैनिक बगल से गुजरती लड़कियों की फ्रिस्किंग कर देते हैं, कुछ गाने गा देते हैं, गाहे बगाहे घरों में घुस आते हैं चेकिंग के नाम पर. जिसका उनके मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. जिन महिलाओं पर मुजाहिदीनों को आश्रय देने का शक होता है, पुलिस और सुरक्षा बल उसे उठा कर ले जाते हैं, उन्हें शारीरिक हिंसा, बलात्कार से गुजरना पड़ता है.

महिलाएं के रोल बदल रहे हैं:

महिलाएं के रोल में बदलाव देखने को मिल रहे हैं. कई हाफ विडो (Half Widow) हो गयी हैं. हाफ विडो- ऐसी महिलाएं, जिनके पति पूछ ताछ ( Interrogation) के नाम पर उठा लिए जाते हैं और फिर जो घर नहीं लौटते. महिलाएं इन्तजार में बैठी रहती हैं, शायद वे आएं. पिता के बिना जीवन जीने से बच्चों को दिक्कत हो रही है. मनोवैज्ञानिक परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं. महिलाओं को परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित करने में दिक्कत आ रही है. ससुराल वाले कई बार उन्हें रखना नहीं चाहते. परिवार से कमाने वाले के गायब हो जाने की वजह से उनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है. वे घरों से बाहर निकल रही हैं, अपने बेटों, पतियों के Disappearance के बारे में जानकारी जुटाने के लिए. कभी पुलिस थाने, तो कभी सेना के चेक पोस्ट, तो कभी कोर्ट में हाज़िरी लगा रही हैं. ऐसे में जहाँ एक तरफ महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है, वहीँ दूसरी तरफ वे vulnerable भी हो रही हैं. जिन महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, उन्हें समाज में भी बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है, लोग उन्हें नीची नज़रों से देख रहे हैं. महिलाएं जब जानकारी के लिए बार बार पुलिस थाने जाय कार्त्ति हैं, तो कई बार मिलिटेंट्स उन पर पुलिस का मुखबिर होने का शक करते हैं और वे भी महिलाओं के साथ शारीरिक हिंसा, बलात्कार को अंजाम देते हैं.
ऐसे में रोजगार के सिकुड़े मौकों, बढ़ती आर्थिक परेशानियों के बीच कश्मीर में जीवन ठप सा होता जा रहा है. सेना कश्मीरियों का विश्वास जीतने के लिए स्कूल चला रही है, कई तरफ के रिलीफ ऑपरेशन में हिस्सा लेती है, बाढ़ में लोगों की मदद करती है, पर आम कश्मीरी सोचता है कि रोजगार ध्वस्त करने में भी सेना का हाथ है और कई अध्ययनों ने कश्मीर की इकोलॉजी को fragile बनाने में सेना और इसके व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर को दोष दिया है.

कश्मीर में महिलाओं ने Forced disappearance के केस को लड़ने के लिए संगठन बनाये हैं. व्यापक सैन्यकरण ने कश्मीर के समाज को व्यापक रूप में प्रभावित किया है. पंजाब और कश्मीर में मिलिटेंसी के अंतर का सबसे बड़ा पॉइंट, एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी के अनुसार, महिलाओं की भागेदारी रही है. 1990 में बख्तावर बहनजी ने अपनी कुछ साथियों के साथ मिलकर “मुस्लिम ख्वातीन मरकज़” की स्थापना की थी, जिसकी महिलाओं ने मिलिटेंट्स की हर संभव तरीके से मदद की. इनफार्मेशन कूरियर, भोजन, दवा, आश्रय हर मोर्चे पर महिलाओं ने हिस्सा लिया. Forced disappearance के केसेस को लेकर मोर्चा निकालना, पुलिस, सेना पर फब्तियां कसना. वहीँ आसिया अंद्राबी ने “दुख्तरान ए मिल्लत” नामक संस्था बनायी, जिसकी सदस्यों ने हथियार भी उठाया.

समाज radicalise हुआ है:

समाज radicalise हुआ है. लगातार बढ़ती संख्या में महिलाएं अपने ड्रेस में चेंज लेकर आयी हैं. वे बुरखा पहनने लगीं. अपनी पहचान बतौर कश्मीरी मुस्लिम महिला के रूप में स्थापित करने के लिए. कई महिलाओं ने मानेकशां से बात करते हुए बताया, उन्होंने ऐसा विरोध स्वरुप किया है, उन्होंने चेहरा ढंका है न कि दिमाग. महिलाएं दो स्तर पर लड़ रही हैं, एक तो पुरुषवादी सोच के खिलाफ, जो उन्हें रहने, खाने, बोलने, उठने बैठने, पहनने के मामले में दिशानिर्देश देकर उनके जीवन पर नियंत्रण करना चाहता है, दूसरे अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए. कई महिलाओं ने कहा कि बुरखा के चलते वे बाहर पा रही हैं, और इस लिहाज़ से आर्थिक स्वावलंबन की ओर वे बढ़ रही हैं. पर इसके बावजूद , मानेकशां के अनुसार, आज़ादी के संघर्ष में महिलाओं की वृहद् भागेदारी से उनके लिए राजनीतिक स्पेस नहीं बन पाया है.
मानेकशां बता रही हैं कि ऐसा नहीं है सेक्सुअल वायलेंस का शिकार सिर्फ महिलाएं हुई हों, जेल में बंद पुरुषों को भी इसका शिकार होना पड़ा है.पूछताछ के दौरान उनके सेक्सुअल ऑर्गन्स को डैमेज कर दिया गया है, कई ऐसे मामले सामने आये हैं.

कश्मीरी समाज एक रूढ़िवादी समाज है. लम्बे दौर के संघर्ष के बाद अब रेप विक्टिम्स पर बात हो रही है. पब्लिक फोरम पर बातें होने लगी हैं क्यों न रेप विक्टिम्स को भी शहीद का दर्जा दिया जाए.

मानेकशां ने काफी महिलाओं से बात की और उनके किस्से, उनके संघर्ष, वॉर जोन में फंस गयी उनकी जिंदगी और उसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव को डॉक्यूमेंट किया है. बच्चों की प्रभावित हो गयी पढ़ाई, कइयों का स्कूल छूट जाना और फिर उनका जीविकोपार्जन में लग जाना- तमाम पहलुओं पर मानेकशां ने जानकारी जुटाई है.

हालाँकि मानेकशां निराश हैं, भारत पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य जद्दोजहद में फंसे कश्मीर के लिए उन्हें कोई आशा की किरण नज़र नहीं आती, और महिलाएं इसकी बड़ी कीमत चुकाती नज़र आती हैं. तमाम एमनेस्टी इंटरनॅशनल के रिपोर्ट्स के बावजूद कश्मीर में मानवाधिकार की स्थिति में उन्हें सुधार नज़र नहीं आता. उन्हें इस बात की भी चिंता है कि मेनलैंड इंडिया कश्मीरियों के संघर्ष को लेकर hostile है. रेप को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किये जाने को लेकर उन्होंने चिंता व्यक्त की है.

एक अच्छी किताब है Frany मानेकशॉ की. इसे पढ़ी जानी चाहिए. जिस बड़े पैमाने पर कश्मीरियों ने भारत को लेकर विरक्ति या इससे बढ़कर हॉस्टिलिटी पैदा हो गयी है, इसे एड्रेस करने के लिए बहुतेरे जख्मों पर मरहम लगाने की जरुरत होगी, सिविल सोसाइटी को आगे आना होगा. सेना और अर्ध सैनिक बलों का इस्तेमाल बहुत जुडीशियसली ( judiciously) करना होगा. किताब पढ़ने से समस्या की विकरालता का पता चलता है, ऐसी किताबों को पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि तभी हम सही समाधान पर विचार कर सकते हैं. साउथ एशिया के geopolitics में फंसे कश्मीर को, कश्मीरियों ( जो भारत के नागरिक हैं) को हम यूँ ही उनके भाग्य पर नहीं छोड़ सकते.


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