यात्रा वृतांत: सरोवरों की नगरी और “पूरब के वेनिस” उदयपुर में इक्कीस दिन

भारती पाठक

भोर में ही ट्रेन उदयपुर जंक्शन पर पहुँच गई । साथी शिक्षक कृष्ण कुमार त्रिपाठी और मैंने थोड़ी देर रुक कर वहीँ ब्रश किया और रेलवे कैंटीन से ही लेकर चाय पी । स्टेशन से बाहर आये तो दिन निकल आया था । ऑटो रिक्शा, जीप वालों की भीड़ बाहर निकलते यात्रियों में  हमने ऑटो तय किया जो 100 रुपये में हमारे गंतव्य अम्बवगढ़, निकट स्वरूप सागर लेक जाने को तैयार हो गया । स्टेशन से दूरी तो 4 किलोमीटर ही थी लेकिन एक तो सुबह का समय, दूसरे ऑटोवाले का कहना था कि ये जगह थोड़ी ऊंचाई पर है, तीसरे हमें ज्यादा कुछ पता नहीं था तो उसकी बात मान ली और ऑटो में बैठ गए । जैसे जैसे आगे बढे समझ आने लगा कि इस शहर को झीलों का शहर क्यों कहते हैं । अलसाया सा शहर जैसे हमें अपनी ओर खींच रहा था ।  सुबह के समय भीड़भाड़ कम होने से 7-8 मिनट में ही हम “सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र” पहुँच गये ।

एक एक करके और लोग आना शुरू हुए और अगली सुबह तक महाराष्ट्र, हरियाणा, छत्तीसगढ़, हिमांचल प्रदेश, गुजरात, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तराखंड, और उत्तरप्रदेश के अन्य शिक्षक भी आ गए । मेरे कमरे में महाराष्ट्र से प्रतिभा और संगीता जी, तमिलनाडु से कंचना जी और उत्तर प्रदेश से मैं, विशालाक्षी, और प्रीति कौशिक थे । एक और कमरा जिसमें सम्पूर्ण शांति और रूबेला तमिलनाडु से तथा रीमा और निशा छत्तीसगढ़ से थीं । कुल मिलकर 56 लोग जिसमें 10 महिलायें और 46 पुरुष ।

यह सेवारत शिक्षकों का अनुस्थापन पाठ्यक्रम था जिसमें हमे 21 दिन एक साथ रह कर प्रशिक्षण लेना था । साथ ही भारतीय संस्कृति में अपने प्रदेश की उपस्थिति और योगदान का भी प्रदर्शन करना था । ये तो एक वजह ठहरी । दूसरी खास वजह थी घूमना जिसके लिए अधिकतर शिक्षक उत्सुक थे और झूठ क्या बोलना अपना भी पूरा इरादा था कि उदयपुर की ख़ास-ख़ास जगहों को तो देखना ही है ।

पहला दिन पंजीकरण और परिचय के साथ-साथ आने वाले दिनों में क्या क्या कार्यक्रम होंगे की रूपरेखा समझने में बीता । शाम 5 बजे मैंने अपनी ननद के बेटे संतोष को बुला लिया, जो सही समय पर मिलने आ गया । हम घूमने निकल पड़े ।

Swaroop Sagar lake Udaipur

संस्थान के ठीक सामने स्वरुप सागर झील थी जो हॉस्टल के कमरे से भी साफ़-साफ़ दिखती थी और करीब एक किलोमीटर की दूरी पर फ़तेह सागर झील । उस दिन हम फ़तेह सागर झील देखने गए । झील गोलाकार थी जिसके किनारे-किनारे सड़क बनी थी । एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ पार्क और रिहायशी मकान । पहाड़ों के बीच छिपता सूरज जैसे मंत्रमुग्ध कर रहा था । झील के साथ ही एक छोटा सा बाँध जैसा भी बना था जहाँ से तेज आवाज कर गुजरती झील के पानी की तेज फुहारें देखने वालों को भिगों भी रही थी । थोड़ी देर हम झील से लगे नेहरू उद्यान में भी गए ।

Fatehsagar Lake Udaipur

फतह सागर झील का पुनर्निर्माण महाराणा फतह सिंह द्वारा कराया गया था । यह पिछोला झील से जुडी हुई है और इसमें विकसित टापू पर नेहरू उद्यान बनाया गया है । यह झील उदयपुर के विशेष आकर्षणों में से एक है । यहाँ पर देश की पहली सौर वेधशाला स्थित है । इसका क्षेत्रफल 4 वर्ग किलोमीटर है और गहराई 1304 मीटर है जिसके जल प्रवाह को रोकने के लिए एक छोटा सा बाँध भी बनाया गया है । शहर के लोगो की भीड़ सुबह और शाम की सैर के समय प्रतिदिन यहाँ रहती है । जब तक उदयपुर में रहे, हर सुबह की सैर जरूर यहां होती थी ।

वहां से लौट कर वापस हॉस्टल आये तो खाने का समय हो चुका था । अभी सब अपने अपने साथियों के साथ ही दिख रहे थे तो क्या आश्चर्य अगर हम भी अपने जिले और प्रदेश के साथियों के ही साथ थे । रात बड़ी देर में नींद आयी तब भी 5 बजे सवेरे ही आँख खुल गयी ।  सभागार में कक्षाएं चलती जो सुबह 9 बजे सर्वधर्म प्रार्थना के साथ शुरू होती थीं ।

अगले दिन ननद का बेटा संतोष फिर लेने आया तो हम बाइक से ही दूध तलाई देखने गए । यह एक छोटी सी मीठे पानी की झील है । करीब 500 मीटर में फैली इस झील को एक पिकनिक स्पॉट की तरह विकसित किया गया है । यहाँ से सूर्यास्त का दृश्य बहुत खूबसूरत लगता है । ये महाराणा फतह सिंह के निवास स्थान शिव पैलेस और एक दूसरी बहुत प्रसिद्ध पिछोला झील के पास ही है । वहां से हम पिछोला झील देखने भी गए जिसका निर्माण राणा लाखा के काल में एक बंजारे छीतरमल ने कराया था । महाराणा उदयसिंह द्वितीय ने इस शहर की खोज के बाद इस झील का विस्तार कराया ।

Lake Pichola

इस झील की खासियत इसमें बने दो द्वीप हैं जिन पर सुन्दर महल बने हुए हैं । एक जग निवास जो अब लेक पैलेस होटल बन चुका है और दूसरा जग मन्दिर । दोनों ही राजस्थानी शिल्प-कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं । वहां नाव भी चल रही थी जिनसे जाकर इन्हें देखा जा सकता था । अँधेरा हो चला था इसलिए हमने नाव से न जाकर दूर से ही उसे देखा । उसके पास ही एक म्यूजिकल गार्डन भी बना था । बेहद खूबसूरत मौसम और हल्की बारिश में म्यूजिकल गार्डन में होना और भी सुकून भरा था ।

Machla Mangra Hill

सामने ही ‘माछला मंगरा’ नामक पहाड़ी है जहाँ पर एक मंदिर भी बना है । वहां तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं

karni mata temple udaipur

बल्कि रोप वे का ही साधन है । यह मंशा पूरण करणी माता का मंदिर है । कहते हैं कि यह मंदिर उदयपुर की शोभा है । चूंकि वहां तक कोई वाहन नहीं जाता तो वो जगह प्रदूषण से पूर्णतया मुक्त है । मंदिर की आभा दूर से ही महसूस हो रही थी । हम रात हो जाने के कारण वहां तक तो नहीं जा पाए लेकिन दूर से ही माता को प्रणाम कर आशीर्वाद लिया कि शायद कभी आना हो पाए ।

 

हॉस्टल लौटते रात के खाने का समय हो चला था । हम खुश थे कि एक अच्छी शाम बिताई । खाना खाकर कमरे में पहुंची तो सब जानने को उत्सुक थे कि कहाँ घूम कर आई हो । थोड़ी बहुत बातचीत के बाद कब नींद ने अपनी आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला । सुबह ठीक 5 बजे फिर नींद खुल गई । नहा-धोकर टहलने निकली और हिम्मत करके आज थोड़ा आगे तक गई तो देखा कुछ साथी टीचर्स भी वाक पर निकले थे, लेकिन उनसे अभी इतनी आत्मीयता नही थी कि कुछ बात हो सके ।

हम  “सहेलियों की बाड़ी” देखने गए । यह जगह फ़तेह सागर से करीब ही है । यह बहुत ही सुन्दर हरा-भरा उद्द्यान दुनिया के सबसे सुन्दर बगीचों में गिना जाता है और उदयपुर के मुख्य पर्यटन स्थलों में से है। प्रवेश करते ही सामने बीचों-बीच एक चौकोर आकृति में पक्का तालाब था जिसमें कमल के फूल खिले हुए थे । यहाँ पांच बड़े बड़े फौवारे अलग-अलग जगहों पर बने हैं जहाँ किसी भी मौसम में जाने पर ये फुहारें आपको तन-मन भिगो कर अपने आकर्षण में बाँध लेंगी जैसे उस पल हम बंधे-बंधे जाने कितनी देर वहां घूमते रहे । चार कोनों पर बने संगमरमर के कलात्मक हाथियों की सूंढ़ से निकलता फौवारा मन को रोमांचित कर रहा था ।

“सहेलियों की बाड़ी”

बताते हैं कि इस बगीचे का निर्माण महाराणा संग्रामसिंह ने अपनी रानी के लिए करवाया था जिनके दहेज़ में उनकी 48 सहेलियां भी आयी थीं तो उनके घूमने-फिरने और आमोद-प्रमोद के लिए इसे बनाया गया तथा ‘सहेलियों की बाड़ी’ का नाम दिया गया । इसी में सामने एक भवन भी है जिसे ‘कलांगन’ नाम दिया गया है जिसमें तत्कालीन राजघराने से जुडी तस्वीरें इत्यादि संग्रहित करके रखी गयी हैं । भवन में कुछ झरोखे बने हैं । बताते हैं कि वहां से रानी ठीक सामने बैठे राणाजी को देखा करती थी ।

वहां से निकल कर हम सज्जनगढ़ का किला देखने गए जिसे मानसून पैलेस भी कहते हैं और ऐसा क्यों कहते हैं ये वहां जाकर आप स्वतः महसूस कर सकते हैं ।

 

सज्जनगढ़ का किला

यह शहर से करीब 8 किलोमीटर की दूर एक ऊँची पहाड़ी पर था जहाँ जाने के लिए व्यक्ति के साथ-साथ वाहन का प्रवेश-शुल्क लगता है । ये काफी ऊँचाई पर है और पहाड़ी पर चढ़ते हुए दोनों ओर घने जंगल है जिसमें वन्य जीव भी हैं । ये संरक्षित इलाका है लेकिन मन में थोड़ी झुरझुरी सी हो रही थी क्योंकि एक तो शाम का समय दूसरे दूर-दूर तक हमारी बाइक के अलावा कोई और सवारी दिख नहीं रही थी ।
थोड़ी देर में हम महल तक पहुँच गए । उदयपुर के मुकुट के नाम से प्रसिद्ध ये महलनुमा इमारत अरावली रेंज की बन्सदारा चोटी पर समुद्र से 944 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है । मेवाड़ राजवंश के महाराणा सज्जनसिंह ने 1884 में महल का निर्माण बरसात में बादलों को देखने के लिए करवाया था । यह सफ़ेद संगमरमर से बनी सुन्दर इमारत है जो कि उनकी असामयिक मृत्यु के बाद महाराणा फतहसिंह द्वारा पूरी कराई गयी ।

संस्थान में साथ रहते हमें चार दिन हो चुके थे।  कोर्स में कई तरह की कक्षाएं जैसे योग, संगीत, हेल्थ एजुकेशन, कत्थक नृत्य, भरतनाट्यम, इतिहास, कौशल विकास, के साथ-साथ राजस्थान में जल संरक्षण के पारंपरिक तरीके आदि होते थे जिनके विषय विशेषज्ञ भी कुछ उदयपुर से, कुछ देश के अन्य भागों से समय समय पर आते थे । अब कक्षाओं के बाद शाम होते-होते सब थक कर चूर हो जाते थे तो कहीं निकलना नहीं हो पाता था ।

डॉ देवेन्द्र सिंह चौहान की क्लास थी ‘राजस्थान में जल संरक्षण के पारंपरिक स्रोत’, बेहद रोचक क्लास ।

अगला शनिवार फील्ड ट्रिप का था जिसके लिए सुबह 8 बजे ही नाश्ता मिल गया और साढ़े आठ बजे हम हॉस्टल से निकल पड़े । जाना था जगदीश मंदिर जो हॉस्टल से कुछ 800 मीटर की दूरी पर था तो सभी पैदल ही निकले ।

जगदीश मंदिर

जगदीश मंदिर में काफी भीड़ थी । यह उदयपुर के मध्य में स्थित एक विशाल मंदिर है जो सन 1651 में बन कर तैयार हुआ । यह अपनी मारू–गुजराना स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण के कारण उदयपुर आने वाले पर्यटकों के बीच आकर्षण का प्रमुख केंद्र है । इसमें भगवान् विष्णु की मूर्ति स्थापित है । सीढियां चढ़ कर ऊपर पहुंचे तो सामने ही भक्त भजन गा रहे थे । हम सब भी थोड़ी देर उसका हिस्सा बने, फिर मंदिर को घूम कर देखा और अपने नोट्स तैयार किये ।

इस मंदिर का निर्माण महाराणा जगतसिंह ने कराया था । यह उदयपुर का सबसे पुराना मंदिर है जिसमें भगवान् विष्णु की चार हाथ वाली मूर्ति काले पत्थर की बनी है । ऊंचाई 125 फीट है और 50 कलात्मक खम्भों पर मंदिर टिका है । द्वारपाल के रूप में सीढ़ियों के पास दो हाथियों की मूर्ति है । मंदिर की उत्कृष्ट कलाकारी और शिल्प दर्शनीय है ।
मंदिर से निकल कर हम दाहिनी ओर आगे बढ़े तो सामने किसी महल के द्वार सा दृश्य नज़र आया । लेकिन उससे पहले ही समाज सेवियों ने एक काउंटर लगा रखा था और कोई पेय पदार्थ सभी यात्रियों को पीने को दे रहे थे । कुछ काढ़े जैसा, हमने भी ले लिया बाकियों के साथ और उसका एक घूँट लेने के बाद निश्चित रूप से कह सकती हूँ कि मुर्दा भी पी ले तो उठ कर खड़ा हो जाये और भागने लगे । इतना कसैला स्वाद जो जीवन भर याद रहेगा ।

पास ही स्थित सिटी पैलेस पहुंचे जो कि उदयपुर आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है । यह परिसर 400 वर्षों में बने भवनों एक समूह है जो पिछोला झील से लगा हुआ है । इसके द्वारों को पोल कहते हैं जिनमें त्रिपोलिया पोल काफी प्रसिद्ध है जो सबसे बड़ा द्वार है और महल के आँगन की ओर जाता है । परिसर काफी बड़ा था और हमें उसके बारे में बताने के लिए एक गाइड को भी बुलाया गया था जिसने हमें पूरा महल जानकारी देते हुए घुमाया ।

सिटी पैलेस

इस महल का सबसे बड़ा प्रांगण अमर विलास महल है जो असल में वर्गाकार आकृति में बना एक ऊँचा बगीचा है, बड़े बड़े वृक्ष हैं ये अपने आप में आश्चर्य है । सिटी पैलेस में संग्रहालय भी है जिसमें महाराणा प्रताप से जुड़ी काफी चीजें संग्रह करके रखी गयी हैं । इसके अलावा भीम विलास गैलरी है जिसमें लघु चित्रों का संग्रह है । इसी महल में दिलखुश महल है जो भारत के सबसे खूबसूरत महलों में से एक है ।
महल के फतह प्रकाश महल को एक होटल के रूप में विकसित किया गया है । इसमें जो क्रिस्टल की बनी वस्तुएं हैं उनका कभी उपयोग ही नहीं किया गया क्योंकि इनको मंगाने का आदेश करने के बाद ही महाराणा की मृत्यु हो गयी थी और तब से ये वस्तुएं ज्यों की त्यों रखी हैं । यहाँ घूमते हुए दोपहर हो गयी । एक तो थकन और दूसरे भूख भी लग आई थी । कहा गया था कि यहाँ से सभी को हॉस्टल पहुँचना है तो एक एक कर सभी लौटने लगे । आते समय जितना जोश था जाते हुए सब ठंडा था और थकान से चूर सभी को हॉस्टल पहुँचने की जल्दी थी । वैसे भी लंच के तुरंत बाद हमे दूसरे फील्ड ट्रिप के लिए निकलना था।

दो बजे हम बस में सवार होकर सबसे पहले सहेलियों की बाड़ी गए जहाँ दो दिन पहले ही मैं घूम चुकी थी, लेकिन इस बार दोस्तों के साथ और भी अच्छा लगा । वहां हम करीब आधा घंटा थे । बाहर आये तो कुछ क्राफ्ट वाले पेपर मेसी से बना ऊँट और घोडा बेच रहे थे और एक महिला हैण्ड क्राफ्ट से बने थैले । हमने भी कुछ सामान दोस्तों के लिए खरीदा ।
वहां से हम भारतीय लोक कला मंडल पहुंचे जो कि लोक कलाओं की एक सक्रिय सांस्कृतिक संस्था है । इसकी स्थापना 22 फरवरी 1952 में की गयी जिसका उद्देश्य परम्परागत कला रूपों का संरक्षण और संवर्धन था । वहां हमने भिन्न-भिन्न प्रकार की कठपुतलियाँ और उनका नृत्य भी देखा । सचमुच उदयपुर ऐसी कलाओं का बेजोड़ स्थल है ।

अगला पड़ाव था शिल्पग्राम जो कि अरावली की पहाड़ियों के मध्य एक जीवंत संग्रहालय जैसा है । एक लम्बे चौड़े परिसर में गाँव जैसा वातावरण विकसित करके इसे बनाया गया है । इसमें राजस्थान की सात झोपडियां बनाई गयी हैं । दो में बुनकर आवास है जिनका प्रतिरूप राजस्थान के रेगिस्तान में स्थित रामा और सम से लिया गया है । कुम्भकार की झोपड़ी का आकार उदयपुर से 70 किलोमीटर दूर ढोल गाँव से तथा अन्य झोपड़ियां दक्षिण राजस्थान की भील सहरिया आदिवासियों की हैं जो मूलतः कृषक हैं ।

शिल्पग्राम

यहाँ भ्रमण करने का शुल्क 50 रूपये है । इसमें आगे जाने पर बैठने की व्यवस्था सीढ़ियों के आकार की संरचना पर की गयी थी । सामने छोटा सा मंच जैसा था जिसमें लोक नृत्यों का रंगारंग कार्यक्रम हुआ जिसने हमारा मन जीत लिया कि हमारे कुछ साथी नृत्य किये बिना नहीं रह सके । उन लोक कलाकारों के साथ फोटो भी खिंचवाया सबने और इस बार मुझे संकोच नहीं हुआ, न ही किसी प्रकार का अहम ।
वहां से बाहर आते हुए ऊँट की सवारी का लालच नहीं छोड़ पाए हम दोनों यानि विशु और मैं । ऊँट पर बैठे तो हम थे लेकिन देखने से लगा कि मज़ा सभी को आ रहा था । शाम हो चली थी तो वहां से हम वापस हॉस्टल आ गए । चूंकि अगला दिन रविवार था यानि छुट्टी और चित्तौडगढ जाने का हमारा कार्यक्रम पहले ही बन चुका था और सहयात्री भी वहीं थे जो पहले साथ ही कुम्भलगढ़ जा चुके थे ।

अगली सुबह हम फिर 5 बजे ही चित्तौडगढ जाने के लिए निकल पड़े । एक टेम्पो ट्रवेलर बुक किया था। सुबह 6 बजे हम निकले तो पहला पड़ाव करीब 90 किलोमीटर के बाद सांवरिया जी मंदिर पर रुका । नाश्ते का समय हो रहा था तो भूख लग आई थी लेकिन पहले मंदिर दर्शन करने का मन हुआ । यह मंदिर कृष्ण धाम के रूप में बहुत प्रसिद्ध है । काफी लम्बे-चौड़े परिसर में स्थापित इस मंदिर पर लोगों की बहुत श्रद्धा है। यहाँ के रंगोत्सव की तुलना बरसाने और वृन्दावन से की जाती है । मंदिर अपनी सुंदर नक्काशी और वास्तुकला के लिए भी पर्यटकों में खासा लोकप्रिय है ।

वहीँ नाश्ता करके हमारी बस चित्तौड़ गढ़ के लिए चल पड़ी जो वहां से अब भी 40 किलोमीटर था । करीब एक घंटे में हम चित्तौड़ गढ़ पहुँच गए । यह बात किसी परिचय की मोहताज नहीं कि चित्तौडगढ महाराणा प्रताप का राज्य था और मेवाड़ की राजधानी थी । किले में प्रवेश के लिए एक बड़े प्रवेशद्वार से गुजरना पड़ा जो कि ऊँची पहाड़ी पर था । ये कितनी विकसित कला का उदाहरण है कि ऐसे दुर्गम स्थानों पर भी हमारे देश में ऐसे-ऐसे किलों और महलों का निर्माण उस समय किया गया जब आज जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं थी । निःसंदेह चित्तौडगढ भी उनमें से एक है ।

Fort Of Chittor

यह दुर्ग करीब 3 मील लम्बा और आधा मील चौड़ा है । किले के भीतर उतनी ऊँचाई पर बने ताल को देख कर हम तो अचंभित ही रह गए कि यह कैसा चमत्कार । कहते हैं कि महाभारत काल में महाबली भीम ने अमरत्व के रहस्य को समझाने के लिए इस स्थान का भ्रमण किया किन्तु अधीर होकर अपना पैर जमीन पर इतने जोर से पटका कि वहां से जल धारा निकल पड़ी जिसे यहाँ भीमताल कहा जाता है ।
किले के भीतर भी हमने सूर्यकुंड, विजय स्तम्भ, कीर्तिस्तंभ, कुम्भास्वामी मंदिर, महादेव देवालय और सबसे प्रमुख मीराबाई का मंदिर देखा । ये वही स्थान है जहाँ मीराबाई कृष्ण भक्ति में लीन रहती थी । इसके अलावा यह किला गवाह है रानी पद्मिनी के साथ महिलाओं और बच्चों के जौहर का जिसके अंश आप अब भी किले में देख और महसूस कर सकते हैं ।

किले के पास ही कुछ दुकानें भी थीं जहाँ क्राफ्ट कपड़े और स्थानीय शैली की ज्वेलरी बिक रही थी । कुछ लोगों ने थोड़े सामान लिए भी । दोपहर हो चली थी और भूख भी लग आई थी । वहां से निकल कर एक जगह सबने भोजन किया और वापसी की ओर चल पड़े । रास्ते में सभी एक दूसरे से घुल मिल गए । मैंने आगे वाली सीट ली जिससे अपनी पसंद के गाने मोबाइल से बस के स्पीकर से कनेक्ट करके बजा सकूँ । सभी बारी बारी अपनी पसंद के गाने बजाने की फरमाइश कर रहे थे तभी मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया । आपसी सद्भाव को बनाए रखने के लिए मैंने उसे गुप्त ही रखा ।
रात होने से पहले ही हम हॉस्टल पहुँच गए ।

अगले दिन माइम की क्लास थी जिसमें कम्युनिकेशन स्किल डेवेलप करने की विधियां बताई गयीं ।  क्लास ख़त्म होने के बाद शाम को पहली बार बस लेडीज के घूमने का प्रोग्राम बना । असली वजह थी कि हम सब को पार्लर जाना था तो पैदल ही हम बाज़ार की तरफ गए । पता चला पास ही बागोर की हवेली भी है जहाँ लोक कलाओं से सम्बंधित कार्यक्रमों का सजीव प्रदर्शन होता है । यह हवेली पिछोला झील के पास ही है तो जब तक हवेली खुलने का समय हुआ थोड़ी देर हम झील के पास टहलते रहे और सेल्फी ली । कोने में एक जूस की दुकान थी जहाँ सबने जूस पिया ।

बागोर की हवेली उदयपुर

बागोर की हवेली का निर्माण मेवाड़ राज दरबार के मुख्यमंत्री अमीर चाँद बादवा ने कराया था हालांकि इसे लेकर कुछ मतभेद भी हैं लेकिन जो भी हो ये एक पुराना भवन है जिसमे 100 कमरे हैं । इसे अब संग्रहालय में बदल दिया गया है जहाँ आधुनिक और पुरानी कलात्मक वस्तुएं रखी हुई हैं जिसे देखने का शुल्क 60 रुपये प्रति व्यक्ति और 30 रूपये बच्चों के लिए है । शाम को यहाँ धरोहर डांस शो का आयोजन होता है जिसकी टिकट उस दिन हमने ली थी । इस शो के टिकट का दाम 90 रुपये था । सीढियां चढ़ कर ऊपर गये तो बड़ा सुन्दर दृश्य था बैठने की व्यवस्था सीढ़ीनुमा सीटों पर गद्दे बिछा कर की गयी थी । इसके अलावा कुर्सियां और कुछ पक्के बेंच थे जिनपर भी बैठा जा सकता था । हमने सबसे आगे जगह ली तो देखा हमारे कई साथी पहले से वहां बैठे थे ।

थोड़ी देर बाद कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें कठपुतली नृत्य, कालबेलिया नृत्य, जादू के खेल के अलावा छोटी सी नाटिका और सबसे आकर्षक था घूमर नृत्य । सभी मुग्ध थे अपने देश की अनूठी संस्कृति और रंग-बिरंगी सभ्यता पर । कार्यक्रम 8 बजे ख़त्म हुआ तो पैदल ही हम सब हॉस्टल की ओर लौट चले ।

 

शनिवार को संस्थान की ओर से हमारा दूसरा फील्ड ट्रिप था। साढ़े आठ बजे हम हल्दीघाटी के लिए निकले । सबसे पहले हम एकलिंगी मंदिर गए जो कि 18 किलोमीटर आगे जाने पर था ।

एकलिंगी मंदिर

यह दो पहाड़ियों के बीच स्थित बेहद खूबसूरत मंदिर है जो मुख्य पर्यटन स्थल भी है । वैसे तो जगह का नाम कैलाशपुरी है लेकिन इस भव्य एकलिंगी मंदिर के कारण इस जगह का नाम एकलिंगी जी ही हो गया है । एकलिंगी जी मेवाड़ राज्य के महाराणाओं के आराध्य देव रहे हैं और वे किसी भी युद्ध में जाने से पहले इनकी पूजा करके ही निकलते थे । यहाँ तक कि कई ऐतिहासिक महत्व के प्रण भी महाराणाओं ने इन्ही एकलिंगी जी को साक्षी मान कर किये, ऐसा इतिहास में वर्णित है ।

भीतर जाकर देखा तो हम चकित रह गए क्योंकि परिसर में कुल एक नहीं बल्कि 108 छोटे बड़े मंदिर थे । मुख्य मंदिर में भगवान् शिव (एकलिंगी जी ) की चार सिरों वाली 50फीट की मूर्ति स्थापित थी जो चारों दिशाओं में देखती और विष्णु, सूर्य, ब्रह्मा तथा रूद्र का प्रतिनिधित्व करती है । कहते हैं कि इसका निर्माण बाप्पा रावल ने 8 वीं सदी में कराया था ।

वहीँ एक चाय की दुकान पर सबने चाय पी और बस में बैठे । थोड़ा आगे जाने पर बस जहाँ रुकी वो जगह हमारे टूर प्लान में नहीं थी लेकिन रास्ते में था इसलिए हमें देखने दिया गया । यह सहस्त्रबाहू मंदिर था जो शायद अपभ्रंष होकर सास बहु मंदिर के नाम से भी जाना जाता है । यह मन्दिर उदयपुर से करीब 22 किलोमीटर दूर नागदा नामक गाँव में है । इस भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर को देखने देश विदेश से पर्यटक आते हैं । यह स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र भी है । मुझे मंदिर के पीछे का दृश्य बहुत अच्छा लगा जहाँ खम्भों से तीन द्वार बने थे और उसके पीछे छोटी सी झील भी थी । मंदिर की नक्काशी बेहद सुन्दर और कलात्मक थी । यहाँ कुछ और भी छोटे-छोटे मंदिर थे ।

अब सोचने की बात इसे सास बहू मंदिर क्यों कहते हैं । तो कहानी ये पता चली कि कच्छवाह वंश के राजा महिपाल ने अपनी विष्णुभक्त रानी के लिए ये मंदिर बनवाया कि वह शांतिपूर्वक अपने इष्ट की पूजा करे । फिर जब राजकुमार का विवाह हुआ तो उसकी पत्नी शिव की उपासक थी इसलिए उसके लिए बगल में शिव मंदिर का निर्माण हुआ तो सास बहू दोनों के मंदिर आसपास होने से सकल रूप में इसे सास बहू या सहस्त्रबाहू मंदिर कहा जाने लगा ।

चेतक स्मारक

वहां से चलकर बस चेतक स्मारक पर रुकी । जो हल्दी घाटी के पास ही है, जिसकी दूरी उदयपुर से 40 किलोमीटर है । यह एक छोटे पार्क जैसी जगह थी जहाँ पर महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की समाधि बनायी गयी है । युद्ध में चेतक राणा प्रताप को लेकर भाग रहा था और मुग़ल सैनिक पीछा कर रहे थे तब पास स्थित 26 फीट चौड़े नाले को चेतक ने एक छलांग में पार कर उनकी जान बचाई लेकिन खुद घायल होकर वहीँ गिर पड़ा और अपने प्राण त्याग दिए । उसी स्थान पर चबूतरा बना कर उसकी समाधि बना दी गयी जो एक प्रमुख पर्यटन स्थल है ।

हल्दीघाटी

रास्ते में दो किलोमीटर की दूरी में फैले संकरी पहाड़ी दर्रों का हल्दी जैसा पीला रंग देखकर हम चकित रह गए, शायद इसी कारण इस मैदान को हल्दीघाटी का मैदान कहते हैं । वैसे ये भी अपने आप में आश्चर्य है कि इन हल्दी घाटी की पहाड़ियों के 2 किलोमीटर के क्षेत्र के अलावा बाकी पहाड़ियां सामान्य प्राकृतिक रंग की हैं ।
वहां से चले तो थोड़ी दूर पर ही एक संग्रहालय था जिसे पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया गया था । बाहर छोटी मोटी चाय नाश्ते, कुछ क्राफ्ट के सामानों की दुकानों के अलावा ऊंट वाले भी खड़े थे जो ५० रूपये में एक-दो चक्कर घुमा रहे थे । अन्दर परिसर काफी बड़ा था जिसमें ऑडियो विजुअल साधनों से महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी के इतिहास के बारे में बताया जा रहा था । कुछ मूर्तियाँ वगैरह भी थीं जो ध्वनि और प्रकाश के संयोजन से प्रभावी लग रही थीं और वास्तविकता का आभास दे रही थीं ।
यहाँ सब अलग अलग होकर पूरा परिसर देखते रहे जिनमें कुछ दुकाने भी थीं जिनसे खरीदारी भी की जा सकती थी । बाहर आये तो दाहिनी ओर बने टी स्टाल पर सबने चाय नाश्ता किया । वापस बस में बैठे और चल पड़े राजसमन्द ।

उदयपुर से राजसमन्द झील की दूरी करीब 60 किलोमीटर है जो कि 88 वर्ग किलोमीटर में फैली भारत की दूसरी सबसे बड़ी मानव निर्मित झील है । इसका निर्माण महाराणा राजसिंह ने 1662 में गोमती नदी पर बाँध बनवाकर कराया था । इसके बनाने का पहला उद्देश्य तो अकाल से जूझ रहे मेवाड़ के लोगों को रोजगार देना था यानि यह मेवाड़ का पहला अकाल राहत कार्य था । सन 1989 से 2005 के दौर में यह झील पूरी तरह से सूख गयी थी, फिर सामाजिक चेतना से सबने मिलकर गोमती नदी की सफायी और उसके सहायक नालों को खोलने का काम जोर-शोर से किया ।
बारह वर्षों से सूखी गोमती नदी 2006 में फिर से बहने लगी । झील में थोड़ा पानी आया । फिर काम जारी रहा और 2017 में जब हम वहां थे ये वह साल था जब 44 वर्षों में पहली बार ये झील पूरी तरह लबालब भरी थी ।

राजसमन्द झील

हम रोमांचित थे कि हम उस ऐतिहासिक वर्ष के साक्षी हैं । झील के किनारे ही बहुत बड़ा सा पार्क था जिसमें बैठ कर हमने एक किस्सागो से कहानी सुनी । राजस्थान में ऐसे किस्सा सुनाने वाले लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर दिखे जो बस 20-30 रूपये में उस खास स्थान के बारे में काफी कुछ बता सकते हैं । वैसे तो आजकल गूगल बाबा भी काफी जानकारी दे देते हैं लेकिन प्रत्यक्ष का मज़ा अलग ही होता है । झील की खूबसूरती देखते ही बन रही थी । पार्क में ही सबने खाना खाया और थोड़ा घूमने के बाद बस में बैठने के लिए बुलाया जाने लगा ।
अगला दिन रविवार था जो हमारे प्रशिक्षण के बीच पड़ने वाला आखिरी छुट्टी का दिन था और इसमें हमने गोरमघाट जाने की योजना बनाई थी ।
बाकी के दिनों में काफी व्यस्तता रही । कुछ प्रोजेक्ट बनाना, कुछ क्राफ्ट का काम, और उत्तर प्रदेश का प्रेजेंटेशन भी जो बहुत ही धमाकेदार रहा । हमें अपने प्रदेश की वेशभूषा में रहना था तो साड़ी छत्तीसगढ़ की निशा जी से ली और हल्के जेवर महाराष्ट्र की प्रतिभा दीदी से, हाँ चूड़ियां हाथी पोल से जाकर ले आई थी । क्षेत्रीय नृत्य के लिए विशु ने बहुत अभ्यास कराया था लेकिन मैं मन ही मन प्रार्थना करती रही कि नाचने से बच जाऊं । ये भाग्य ही था कि समय की कमी को देखते हुए हमें आखिरी क्षणों में अपने डांस वाला हिस्सा निकालना पड़ा और मेरी जान में जान आयी ।

आखिरी दिन अब तक सीखे गए कौशलों के प्रदर्शन का दिन था, फिर विदा । लेकिन अभी एक मंदिर देखना बाकी रह गया था । विशु ने कहा कि चलिए सुबह 5 बजे निकलते हैं और 9 बजे तक वापस आ जायेंगे । आज याद कर रही हूँ तो अपनी हिम्मत पर यकीन नहीं हो रहा कि बिना किसी को बताये हम दोनों सुबह ठीक 5 बजे तैयार होकर नाथद्वारा जाने के लिए निकले जो उदयपुर से 48 किलोमीटर की दूरी पर है । बस कहाँ से मिलती ये पता कर लिया था ।

हॉस्टल से निकलते ही हमें ऑटो मिल गया जिसने बस स्टैंड छोड़ा और तुरंत बस भी मिल गयी जिसने 7 बजे हमें नाथद्वारा पहुंचा दिया । पता चला कि दर्शन के लिए मंदिर थोड़े-थोड़े समय ही खुलता है फिर बंद, ऐसा आठ पालियों में होता है ।

Nathdwara temple Udaipur

श्रीनाथ जी के इस मंदिर में भगवान् श्रीकृष्ण की 7 वर्ष के बालक रूप की पूजा होती है और ये वैष्णव सम्प्रदाय के केन्द्रीय पीठासीन देव हैं । श्रीनाथ जी को मुख्य रूप से भक्ति योग के अनुयायियों द्वारा पूजा जाता है । श्रीनाथ जी की लोकप्रियता के कारण नाथद्वारा शहर को श्रीनाथ जी के नाम से जाना जाता है । हिन्दू धर्म के इस अनुपम उत्कृष्ट मंदिर का निर्माण भी महाराणा राजसिंह द्वारा कराया गया था । यहाँ जाने पर समय का विशेष ध्यान रखें क्योंकि यहाँ दर्शन का समय निश्चित है ।
दर्शन करके हम जल्दी से बाहर आये। सौभाग्य से बस भी मिल गयी।

समापन समारोह हो गया और अब एक-एक कर लोग अपने-अपने शहरों की ओर रवाना भी होने लगे थे । कईयों की शाम की ही फ्लाइट थी और कुछ की अगले दिन । हमारी ट्रेन अगले दिन सुबह थी ।

उदयपुर कुछ कारणों से मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा जैसे पहली बार शादी के बाद घर से इतनी दूर अकेले रहना, बेफिक्री से घूमना, खुद में आत्मविश्वास हुआ और सबसे बड़ी बात वहीँ जाकर मेरी खुद से मुलाकात हुई ।


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