पुस्तक चर्चा: देश विभाजन और स्त्री मन का मार्मिक चित्रण अमृता प्रीतम का उपन्यास “पिंजर”

भारती पाठक

आज जिस किताब पर हम बात करेंगे वो ऐसा उपन्यास है जिसकी कहानी खुद में भारत के विभाजन की व्यथा को समोये हुए है, जिसकी वेदना इतिहास में आज भी दर्ज है । किताब का नाम है ‘पिंजर’ जो एक छोटा सा उपन्यास है । यह पंजाबी की सबसे लोकप्रिय, सुप्रसिद्ध लेखिका और कवयित्री अमृता प्रीतम जी की बहुचर्चित किताब है । अमृता जी ऐसी लेखिका रही हैं जिन्होंने अपनी विशिष्ट शैली से भाषा की सीमाओं को तोडा है ।

उनकी रचनायें सभी वर्ग के पाठकों द्वारा पसंद की जाती रही हैं । कुल मिलाकर उन्होंने लगभग 100 किताबें लिखी हैं जिनके भाव और भाषा पाठकों के मन पर सीधा प्रभाव छोड़ते हैं । लेखिका का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं । इस बहुचर्चित उपन्यास का प्रकाशन आठ भाषाओँ में हो चुका है और इस पर एक फिल्म भी बनी जो लोगों द्वारा पसंद की गयी ।

अमृता जी को साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ के साथ-साथ भारत के दूसरे सबसे बड़े पुरस्कार पद्मविभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है । इसके अतिरिक्त, देश-विदेश में भी कई प्रतिष्ठित सम्मानों से उन्हें नवाज़ा गया है । एक बेहद संवेदनशील और साहसी लेखिका के रूप में चर्चित रहीं अमृता जी की किताबों की तरह उनका जीवन भी चर्चित रहा है ।

Amrita Pritam

अब आते है ‘पिंजर’ पर जो एक लड़की ‘पूरो’ की कहानी है जो गुजरात के एक गाँव छत्तोंआनी के शाहों के यहाँ की बेटी है जिससे छोटा एक भाई और तीन बहनें हैं । १४ साल की पूरो का ब्याह पास के गाँव रत्तोवाल के एक खाते-पीते परिवार में तय हैं । उन दिनों गुजरात में अदला-बदली के संबंध होते थे तो अवस्था छोटी होने पर भी पूरो के भाई की शादी उस लड़के की बहन से तय थी जिससे पूरो की शादी होने वालो थी ।

पूरो की माँ छठी बार गर्भ से है और इस बार पुत्र की कामना कर रही है जिसके होने के बाद पूरो का ब्याह निपटाने की तैयारी है । भाग्य से लड़का हो भी जाता है और पूरो के ब्याह की तारीख भी तय हो जाती है । उम्र की उस खूबसूरत दहलीज पर पूरो के मन में भी आने वाले कल और होने वाले जीवनसाथी की कल्पनाएँ हिलोरें लेती रहती हैं । अपनी ससुराल को जाने वाली सड़क से लगे खेतों पर कभी-कभी टहलते हुए वो कल्पना करती है कि काश उसके होने वाले पति की एक झलक देखने को मिल जाये ।

खेतों में काम करते एक दिन पूरो का सामना रशीद से हो जाता है जिसके खानदान की किसी लड़की को कभी शाहों के किसी लडके ने अगवा किया था । अपने खानदान के लोगों के उकसाने पर रशीद एक दिन पूरो को अगवा कर लेता है । पूरो के सारे सपने चूर चूर हो जाते हैं । पंद्रह दिन तक पूरो रशीद के घर ही बंद रहती है । रात के अँधेरे में वो एक बार भाग कर अपने घर भी आती है लेकिन समाज के डर से उसके माता पिता उसे अपनाने से इनकार कर देते हैं । बेबस पूरो आत्महत्या करना चाहती है लेकिन रशीद के आ जाने से वो भी नहीं कर पाती और उसके साथ लौटना पड़ता है । पूरो को लगता है कि इन पंद्रह दिनों ने उसके शरीर से सारा मांस उतार लिया है, अब वह निरा पिंजर है । उसकी न कोई आकृति है, न कोई सूरत, न मन, न मर्ज़ी ।

लेखिका ने पूरो के जरिये विभाजन के दौर में महिलाओं पर हुए अत्याचारों और उनके जीवन को दूसरों की शर्तों पर जीने, स्वंय को एक वस्तु से ज्यादा उपयोगी न समझे जाने की विवशता का वर्णन बड़ी ही संवेदनशीलता से किया है । पूरो चाह कर मर भी नहीं पाती और रशीद के साथ निकाह कर लेने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं बचता । समय के साथ पूरो एक बेटे की माँ बन जाती है और जैसे-तैसे जीवन से समझौता कर लेती है ।

समय बीतता है, उसी बीच भारत के बंटवारे की बात होने लगती है और हिन्दू-मुस्लिम दंगो की शुरुआत हो जाती है जिसकी हल्की ही सही लेकिन वीभत्स झलक दिखाने की कोशिश भी लेखिका ने की है । पूरो के गाँव में सभी हिन्दू अपनी जान बचाकर एक बड़ी हवेली में बंद हो जाते हैं । वहां भी लोग आग लगा देते हैं जिसमें कई लोग जल कर मर जाते हैं । हिन्दू मुसलमान लड़कियों और मुसलमान हिन्दू लड़कियों को उठा ले जाने लगे ।
पूरो यह सब देख सुन कर विक्षिप्त सी हो जाती है ।

उसके मन में कई तरह के प्रश्न उठते हैं पर वह उनका उत्तर सोच नहीं पाती है । पता नहीं चलता कि इस धरती पर, जो कि मनुष्य के लहू से लथपथ हो गई थी, पहले की तरह गेंहू की सुनहरी बालियाँ उत्पन्न होंगी या नहीं…….इस धरती पर, जिसके खेतों में मुर्दे पड़े सड़ रहे हैं, अब भी पहले की तरह मकई के भुट्टों में से सुगंध निकलेगी या नहीं ……क्या ये स्त्रियाँ इन पुरुषों के लिए अब भी संतान पैदा करेंगी…?

काफिले के काफिले सरहद पार जाने को निकल पड़े हैं और ऐसा ही एक काफिला पूरो के पिता के गाँव रत्तोवाल से चला है जो अँधेरा होने की वजह से पूरो के गाँव पहुंचते-पहुँचते वहीँ रुक गया है । पूरो के व्याकुल चित्त में ख़याल आता है कि हो न हो उसका रामचंद्र ( जिससे कभी पूरो का ब्याह होने वाला था ) भी उसमें जरूर होगा । उसे एक आखिरी बार देखने की इच्छा में पूरो काफिले तक पहुँच जाती है जहाँ वो रामचंद्र को देख भी लेती है । कहानी में दोनों की एक छोटी पर बहुत भावुक सी मुलाकात का भी जिक्र है जब पूरो को पता चलता है कि उसकी जगह उसकी छोटी बहन का ब्याह रामचंद्र से कर दिया गया और रामचन्द्र की बहन लाजो का ब्याह पूरो के भाई से । लेकिन उसी काफिले से लाजो जाने कब और कैसे गायब हो गई यह जान कर पूरो का दिल चीत्कार कर उठता है ।

घर लौट कर पूरो ये बात रशीद को बता कर लाजो को ढूँढने में मदद के लिए हाथ जोड़ती है । रशीद जो पूरो से सचमुच प्रेम करने लगा था, जी-जान से लाजो को ढूँढने में लग जाता है और किसी के घर लाजो के होने की भनक मिलती है । बड़े जतन करके और तमाम खतरे उठाकर रशीद और पूरो लाजो को अपने साथ ले जाते हैं और लम्बे इंतज़ार के बाद रामचंद्र लाजो को लेने आता है । साथ में पूरो का भाई भी जो अपनी बहन यानि पूरो से पहली बार मिलता है । वो चाहता है कि पूरो भी हिन्दुस्तान वापस चली चले लेकिन पूरो रशीद के साथ ही रुक जाती है ।

उपन्यास यहीं ख़त्म होता है और तमाम सवाल छोड़ जाता है कि पूरो या लाजो जैसी तमाम लड़कियों ने जो दर्द भोगा और सपनों के टूटने का दंश सहा उसका ज़िम्मेदार कौन है ? स्त्रियाँ ही सबसे आसान शिकार क्यों होती रही हैं ऐसे दंगों में और सब कुछ को जानते समझते हुए भी समाज उन्हें अपनाने से क्यों हिचकता है ? मुझे उपन्यास का अंत कुछ कसक भरा लगा मानो मैं कुछ और अपेक्षा कर रही थी लेकिन फिर लगा उससे बेहतर शायद कुछ और नहीं हो सकता था ।

उपन्यास में और भी छोटी मोटी बारीकियां हैं संवादों ओर मनोभावों की, जिनका आनंद पढ़ कर ही लिया जा सकता है । उपन्यास चूंकि पंजाबी का अनुवाद है जिसकी भाषा सरल और सुग्राह्य है । नए पढ़ने वालों की दृष्टि से एक ऐसी किताब जो रुचिकर और उनके पठन पाठन की रूचि को बढ़ाने में सहायक होगी । इस किताब पर फिल्म भी बन चुकी है जिसमें उर्मिला मातोंडकर ने पूरो की भूमिका निभाई । फिल्म काफी चर्चित भी रही हालांकि फिल्म में थोड़े बहुत अतिरित संवाद जोड़े गए हैं लेकिन कुल मिलकर फिल्म अच्छी बन पड़ी है ।

अमृता प्रीतम ने बंटवारे का वो समय देखा और नज़दीक से महसूस किया है तभी स्त्री मन को इतने अच्छे से टटोलकर ऐसी कृति का निर्माण कर सकीं और लिखा कि “कोई लड़की हिन्दू हो या मुसलमान, अपने ठिकाने पर पहुंचती है, समझो उसी के साथ मेरी आत्मा भी ठिकाने पहुँच गई ……।”


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