पुस्तक चर्चा/ Indian Railways: The Weaving of a National Tapestry by Bibek Debroy

Balendushekhar Mangalmurty

इंडियन रेलवे पर अकादमिक किताबों की भरमार है. एक बेहद रोचक विषय होने के अलावे और वजहें हम सहज तरीके से गिना सकते हैं. 150 सालों से भी लंबा इतिहास ( आखिर भारत में रेल शुरूआती दौर में ही आ गया था), भारत के इतिहास ( देश के एकीकरण में योगदान), राजनीति ( देश की आज़ादी में भूमिका), संस्कृति ( जाति के बंधनों को कमजोर करने में भूमिका) और अर्थव्यवस्था में योगदान तमाम वजहें हैं, जिनके चलते रेलवे ने भारतीयों के इमेजिनेशन को आंदोलित किया है. रेलवे एक आम भारतीय के जीवन का हिस्सा है, उसके रोजमर्रा के किस्सों में कहीं न कहीं रेल का जिक्र आता है, उसकी पसंदीदा ट्रेन, कोई यादगार रेल यात्रा का ख्याल. शायद ही कोई भारतीय होगा, जिसने अपने जीवन में कभी न कभी रेल यात्रा न की होगी और जो रेल की चाल, पटरियों पर खटर खटर, रेलवे पुलों पर ट्रेन और पटरियों की जुगलबंदी से उत्पन्न ध्वनि से मन्त्र मुग्ध नहीं हुआ होगा.

ऐसे में एक आम भारतीय रेल के बारे में सुनना, पढ़ना और जानना चाहता है. भारतीयों की इसी उत्सुकता को समझते हुए बिबेक देबरॉय ने संजय चड्ढा और विद्या कृष्णमूर्ति के साथ मिलकर भारतीय रेल पर एक किताब लिखी है. यह किताब पेंगुइन के 10 वॉल्यूम सीरीज Story of Indian Business का हिस्सा है, जिसके एडिटर गुरचरण दास हैं.
बिबेक देबरॉय कोई अकादमिक किताब लिखने का दावा नहीं करते हैं. और किताब का प्रयास है उन पाठकों को छूना, जिनके पास विषय की गहरी समझ नहीं है, और जो रेलवे को बिना किसी प्रीवियस बैकग्राउंड के समझ सकते हैं. किताब में रेलवे की शुरुआत से देश की आज़ादी तक की यात्रा का जिक्र है. ऐसे में किताब में कई रोचक कहानियों का जिक्र है, जो पाठकों को आनंदित करती है.

2014 में रेलवे मंत्रालय ने मेजर रेलवे प्रोजेक्ट्स के लिए संसाधन जुटाने और रेलवे मिनिस्ट्री और रेलवे बोर्ड को restructure करने के मैंडेट के साथ एक हाई powered कमिटी का गठन किया था, जिसके चेयरमैन थे, बिबेक देबरॉय। संजय चड्ढा इस कमिटी के सेक्रेटरी थे और विद्या कृष्णमूर्ति ने कमिटी के रिपोर्ट को ड्राफ्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. इन्ही तीनों ने मिलकर भारतीय रेल पर किताब लिखी.

भारत में जब रेल की पटरियां बिछाई जा रही थीं, तो कार्ल मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी, रेलवे भारत में आधुनिक उद्योगों की नींव डालेगा. मार्क्स की भविष्यवाणी अपने मूल रूप में तो फलीभूत नहीं हुई, पर रेलवे ने आने वाले दशकों में देश के भाग्य निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

16 अप्रैल 1853 को भारत में रेलवे के शुरुआत की आधिकारिक तिथि माना जाता है. इसीलिए 1953 में रेलवे के सौ साल पुरे होने के उपलक्ष्य में भारतीय डाक विभाग ने commemorative पोस्टेज स्टाम्प जारी किया था.

16 अप्रैल 1853 को 3:35 बजे दोपहर में 21 तोपों की सलामी के साथ तीन इंजन ( सुल्तान, सिंध और साहिब) से खींची जा रही ट्रेन 14 डिब्बों और 400 यात्रियों के साथ बोरी बन्दर स्टेशन से थाने स्टेशन के लिए निकली. बाद में तीनों इंजिनों का क्या हुआ, पता नहीं चला. ‘साहिब’ और ‘सुलतान’ मानो हवा में गायब हो गए, पर ‘सिंध’ कई सालों तक अस्तित्व में बना रहा. अंतिम बार सिंध को ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के बायकुला ऑफिस के बाहर प्लिंथ पर देखा गया. फिर वहां से सिंध को दिल्ली लाया गया. पर उसके बाद सिंध कहाँ गया, इसकी जानकारी नहीं है.
पहली कमर्शियल ट्रेन यात्रा के साक्षी बने सभी 400 यात्री वीआईपी थे, जिनमे बॉम्बे के गवर्नर लार्ड फ़ॉकलैंड की पत्नी लेडी फ़ॉकलैंड भी थी पर खुद गवर्नर लार्ड फ़ॉकलैंड इस ऐतिहासिक यात्रा में शरीक नहीं थे, चूँकि उनकी राय में रेलवे लाइन कोई बहुत शानदार आईडिया नहीं था.

चिन्ताद्रीपेट, 1837
बोरी बन्दर से थाने के बीच चली ट्रेन हालाँकि भारत की पहली व्यवसायिक पैसेंजर ट्रेन थी, लेकिन ये देश में पहली ट्रेन नहीं थी. इससे पहले भी ट्रेन चलाने के प्रयास किये गए थे.
बिबेक देबरॉय बताते हैं कि भारत में पहली ट्रेन चलाने का प्रयास मद्रास प्रेसीडेंसी में चिन्ताद्रीपेट में किया गया. 1837 में. 1836 में गठित रेलवे कंपनी रेड हिल रेलरोड ( Red Hill Railroad-RHR) ने सड़क निर्माण के लिए ग्रेनाइट ढोने के लिए मद्रास शहर के उत्तर में स्थित रेड हिल्स से 3 मील लम्बी रेल लाइन बिछाया. हालाँकि योजना थी कि रेलवे के डिब्बों को बैलों, खच्चरों के द्वारा खींचा जाएगा, पर दो तीन भाप के इंजिनों का भी प्रयोग किया गया, जिनका निर्माण Madras Corps of Engineers ने किया था. इस निर्माण में कुल 50,000 का खर्चा आया था. 1845 में रेड हिल रेलवे कंपनी बंद हो गयी. देबरॉय बताते हैं इसकी वजह थी – कप्तान आर्थर थॉमस कॉटन ( 1803-1899) का बीमार पड़ जाना. कैप्टेन थॉमस का नाम आँध्रप्रदेश और तमिलनाडु ( वर्तमान के ) में इरीगेशन (Irrigation) और नेविगेशन कैनाल ( Navigation Canal) बिछाने से जुड़ा है. बीमार पड़ कर कैप्टेन थॉमस तस्मानिया चले गए. उनके जाने से रेल में रूचि भी घट गयी. ये कैप्टेन थॉमस ही थे जिन्होंने चिन्ताद्रीपेट रेल लाइन का सुझाव दिया था और इसका एस्टीमेट (estimate)बनाया था.
उन दिनों ईस्ट इंडिया कंपनी का Furlough Rule था- Sick Leave Rules. 1796 में बनाये गए इस Rule में पहले 1854 और फिर 1868 में उदारता लायी गयी. 1796 के इस रूल के तहत, ईस्ट ईस्ट इंडिया कंपनी का कोई अधिकारी भारत में दस साल की सर्विस के बाद घटे वेतन पर इंग्लैंड में 3 साल के furlough का हक़दार बन जाता था. लेकिन इंग्लैंड जाने से ये तीन साल उसकी सर्विस पीरियड से काट लिए जाते थे और भारत में जो पद पर रहता था, उससे भी हाथ धोना पड़ता था. लेकिन अगर अधिकारी ने न्यू साउथ वेल्स या केप ऑफ़ गुड होप के पूरब में किसी जगह पोस्टिंग ली, तो उस अधिकारी को ये नुकसान नहीं उठाने पड़ते थे. इसलिए बीमार पड़ने के बाद कैप्टेन थॉमस तस्मानिया चले गए और वहां उन्होंने इरीगेशन कैनाल ( irrigation canal ) पर काफी काम किया.
उन दिनों कैनाल वर्सेज रेलवे लाइन ( canal vs railways ) की बहस में कैप्टेन थॉमस का झुकाव कैनाल की ओर था. कैप्टेन थॉमस का नाम जुड़ा है डौलेस्वरम बराज के साथ. राजमुंद्री जिले में कॉटन म्यूजियम भी है. ये थॉमस ही थे जिन्होंने चिन्ताद्रीपेट रेलवे लाइन ( भले अस्थायी था) के बारे में सोचा और इसके अलावा, उन्होंने वल्लांझनगोर, अर्कोट, नेल्लोर, बंगलौर, बेलारी और पुणे से गुजरती हुए बॉम्बे और मद्रास को जोड़ने वाली लगभग 862 मील लम्बी रेल लाइन की परिकल्पना की.

1840 का दशक रेल को लेकर व्यापक बहस को समर्पित रहा.

तो इस तरह 1830 के दशक में भारत में रेल की शुरुआत हुई. 1840 का दशक रेल को लेकर व्यापक बहस को समर्पित रहा. 1840 के दशक में ही दो बड़ी रेल कंपनियों का गठन हुआ – 1845 में ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी ( EIRC ) और 1849 में ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे (GIPR). रेलवे को लेकर बहस कई मोर्चों पर हो रही थी, सरकारी रिपोर्ट्स, समाचार पत्रों में लेखों और सर्वे के जरिये. 1840 का दशक इंग्लैंड में रेलवे मैनिया ( Railway mania) का था, जब unregulated रेलवे कंपनियों में बेहिसाब इन्वेस्टमेंट हो रहे थे. लोहे के घोड़े से जुडी संभावनाओं को लेकर लोग पागल हुए जा रहे थे. इसका असर भारत पर भी पड़ रहा था. इंग्लैंड में चल रही बहस का असर बॉम्बे और कलकत्ता में भी हो रहा था. रेलवे के विकास के सबसे बड़े समर्थक थे रोलैंड मैकडोनाल्ड स्टीफेंसन (1808-1895) और लार्ड डलहौज़ी। स्टीवेंसन के दिमाग में बेहद महत्वकांक्षी परियोजना की खिचड़ी पक रही थी. वो कलकत्ता, पेकिंग और हांगकांग को रेल लाइन से जोड़ना चाहते थे.

1841 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी को सौपा गया उनका प्रपोजल “wild idea” कहकर खारिज कर दिया गया, तो स्टीवेंसन 1843 में कलकत्ता आ गए अपने आईडिया को मनवाने के लिए. 1844 में स्टीवेंसन ने “Englishman” अख़बार में भारत के लिए रेलवे की वकालत करते हुए एक लेख लिखा। इस लेख में छह मेन रेलवे लाइन की वकालत की:
1. कलकत्ता से मिर्ज़ापुर/ दिल्ली, कोयले की खदानों को कवर करते हुए. ये लाइन आगे बढ़ते हुए फ़िरोज़पुर तक चली जानी थी.
2. बॉम्बे से दूसरी लाइन, जो मिर्ज़ापुर में आकर मिल जानी थी.
3. तीसरी लाइन, बॉम्बे से हैदराबाद, जो कलकत्ता तक चली जानी थी.
4. चौथी लाइन, हैदराबाद से मद्रास
5. पांचवी लाइन, मद्रास से बंगलौर, मैसूर और कालीकट तक
6. छठी मुख्य लाइन, मद्रास से देश के सुदूर दक्षिण में अरकोट, तिरुचिरापल्ली और तिरुनेलवेली होते हुए.

इन रेलवे लाइनों के बिछाने के पीछे मुख्यतः सामरिक उद्देश्य और कच्चे मालों के निर्यात और तैयार मालो के आयत का उद्देश्य था.
1845 में ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी के गठन होने के बाद स्टीवेंसन इसके पहले एजेंट और चीफ इंजीनियर बनाये गए. स्टीवेंसन अपनी सोच में विशाल थे. उनके दिमाग में लंदन और कलकत्ता को जोड़ने वाली रेलवे लाइन का ख्याल पक रहा था, जिसमे दो ब्रेक होने थे, एक इंग्लिश चैनल पर और दुसरा Dardanelles पर. इंग्लिश चैनल पार करने के लिए और साथ ही फारस की खाड़ी के पोर्ट से बॉम्बे तक की यात्रा स्टीमर से करनी थी और फिर बॉम्बे से कलकत्ता ट्रेन से.

इसी दौर में एक थे कर्नल ग्रांट. बॉम्बे इंजीनियर्स के. उन्होंने इंग्लैंड और भारत में रेलवे बिछाने के काम में अंतर् बताते हुए बताया कि इंग्लैंड में जहाँ जमीन कम ऊंचाई निचाई वाली है, वहीँ भारत में इसके विपरीत ऊँचे पहाड़ हैं, गहरी नदियां हैं, घने जंगल हैं, और जानवरों के विशाल समूह हैं. ऐसे में उनका ख्याल था कि जमीन पर रेलवे लाइन बिछाना मुनासिब नहीं होगा और उन्होंने जमीन से कम से कम 8 फ़ीट ऊंचाई पर रेल चलाने का प्रस्ताव दिया.

इस दौर की बहस में रबीन्द्रनाथ टैगोर के दादा द्वारकानाथ टैगोर ( 1794- 1846) ने भी हिस्सा लिया.

इस दौर की बहस में रबीन्द्रनाथ टैगोर के दादा द्वारकानाथ टैगोर ( 1794- 1846) ने भी हिस्सा लिया. 1843 में उन्होंने ब्रिटिश पार्टनर के साथ मिलकर Carr, Tagore and Company नामक कंपनी बनायी। इस कंपनी के ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ नज़दीकी तिजारती ताल्लुकात थे. इंग्लैंड यात्रा के दौरान उन्होंने रेल को नज़दीक से देखा और उनकी इच्छा थी कि रेल को बंगाल में लाया जाए. ये द्वारकानाथ टैगोर के ही स्वामित्व वाला अखबार था, इंग्लिशमैन ( Englishman) जिसमे स्टीवेंसन रेलवे की वकालत करते हुए लेख लिखा करते थे. अपने व्यवसायिक हितों के चलते द्वारकानाथ टैगोर चाहते थे कि कोयले के खदानों को जोड़ने वाली रेलवे लाइन हो. उन्होंने एक तिहाई पूंजी जुटाने का भी आश्वासन दिया अगर कलकत्ते से रानीगंज के कोयले के खदानों को रेलवे से जोड़ दिया जाए.
द्वारकानाथ टैगोर के अलावा कई और महत्वपूर्ण भारतीय थे जो रेलवे में रूचि रखते थे, जैसे राम कोमल सेन ( 1795/1796 – 1844), मुट्टी लाल सील (1791 -1854 ) और राम गोपाल घोष ( 1815 -1868). और इन लोगों से रेलवे पर राय ली गयी थी.

उस समय बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी के अध्यक्ष थे विलियम थेऑबॉल्ड ( William Theobold)। उनके जरिये स्टीफेंसन ने द्वारकानाथ टैगोर से कुछ मुद्दों पर जवाब माँगा जैसे बर्धमान के कोयला खदानों से कितना कोयला ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है, इस ट्रांसपोर्ट पर कितना खर्चा पड़ेगा, कितना माल ट्रांजिट में खो जाएगा, रेल लाइन बिछा देने से और क्या असर होंगे? आदि आदि.
द्वारकानाथ टैगोर का मानना था कि कोयले के अलावे चावल, चीनी, लाख और थोड़ा नील का ट्रांसपोर्टेशन में भी बढ़ोत्तरी होगी. और 100 maunds पर 10 रूपये भाड़ा देने को कोयले की कम्पनियाँ तैयार हैं. वर्तमान में दामोदर नदी के जरिये लगभग 20 लाख maunds कोयले का ट्रांसपोर्टेशन हो रहा है और कोयला कम्पनियाँ 50 लाख maund कोयला उत्पादन में सक्षम हैं.
द्वारकानाथ टैगोर ने गिलमोर होमब्रे एंड कम्पनी (  Gilmore Hombray and Company) के साथ मिलकर 1843 में बंगाल कोल कंपनी बनायी थी.

रेलवे को लेकर एक राय ( consensus) तो थी पर रेलवे लाइन के मार्ग को लेकर एक राय नहीं थी. 1845 में द्वारकानाथ टैगोर ने ग्रेट वेस्टर्न रेलवे ऑफ़ बंगाल ( GWRB) बनाया। कलकत्ता से मिर्ज़ापुर तक रेलवे लाइन को लेकर लेकर GWRB और EIRC ( स्टीफेंसन इस कंपनी के चीफ इंजीनियर थे) के बीच एक राय नहीं थी. 1846 में द्वारकानाथ टैगोर के देहांत हो जाने के बाद GWRC का विलय EIRC में कर के ईस्ट इंडियन रेलवेज (EIR) कंपनी का गठन किया गया.

1848 से 1856 तक लार्ड डलहौज़ी भारत के गवर्नर जनरल रहे और रेलवे के विकास में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. जिस तरह स्टीवेंसन EIRC से जुड़े थे, उसी तरह ग्रेट इंडियन पेनिन्सुला रेलवे (GIPR) से जुड़े थे- जॉन चैपमैन (John Chapman; 1801-1854).

चूँकि शुरूआती वर्षों में GIPR और EIRC ही दो कंपनियां रेल लाइन बिछाने के काम में आगे थीं, ऐसे में पूरब से उत्तर और पश्चिम से उत्तर की ओर पटरी बिछाने पर ध्यान दिया गया और शेष भारत इग्नोर हो गया.
उन शुरूआती वर्षों में कुछ अन्य पहलुओं पर भी विचार किया गया जैसे जाति, धर्म सम्बन्धी आग्रहों ( biases) के चलते क्या भारतीय रेल यात्रा करेंगे? पर कुछ चीजों पर दृष्टिकोण स्पष्ट था. जैसे, रेल पटरियां प्राइवेट कंपनियां बिछाएँगी और इसके लिए जमीन सरकार अधिग्रहण करके इन कंपनियों को लीज पर देगी। लीज की अवधि पूरा होने के बाद जमीन पर सरकार का अधिकार होगा. पूंजी भारत में नहीं जुटाई जा सकती थी, पूंजी इंग्लैंड में जुटाना था. पोटेंशियल इन्वेस्टर्स को भारत में रेल पटरी बिछाने में नुकसान न हो, इसके लिए निवेश पर उन्हें guaranteed rate of interest ( जो अमूमन 5 फीसदी तय किया गया) सरकार की तरफ से दिया गया.

1853 का डलहौज़ी का minute काफी गौर करने वाला है, जिसमे वे कह रहे हैं कि रेल लाइन कलकत्ता से सतलज तक जाने के क्रम में हर मिलिट्री स्टेशन को, हर डिपो को जैसे- इलाहाबाद, आगरा, दिल्ली, फ़िरोज़पुर को फोर्ट विलियम के हथियार खाने से जोड़ता हुआ बिछे ताकि हम कम से कम समय में युद्ध सामग्री और सैनिक फ्रंटियर पर जुटा सकें. भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए त्वरित संचार व्यवस्था की भी जरुरत महसूस करते हुए लार्ड डलहौज़ी ने टेलीग्राफ और पोस्टल सर्विस की भी शुरुआत की.

कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स ने चार ट्रंक लाइन को स्वीकृत किया:
1. कलकत्ता- दिल्ली ट्रंक लाइन जो आगे बढ़कर लाहौर/ नार्थ वेस्ट फ्रंटियर तक चला जाएगा.
2. बॉम्बे- दिल्ली ( ये भी तय किया गया कि कलकत्ता-दिल्ली और बॉम्बे-दिल्ली ट्रंक लाइन कहीं मिलेंगे, कहाँ मिलेंगे ये तय नहीं हुआ उस वक़्त)
3. मद्रास- मालाबार ट्रंक लाइन.
4. बॉम्बे- बड़ोदा ट्रंक लाइन.
उस समय कलकत्ता-मद्रास को जोड़ने वाली ट्रंक लाइन के बारे में नहीं विचार किया गया. और न ही भारत के मध्य हिस्से को दक्षिण-पश्चिम हिस्से से जोड़ने के बारे में विचार किया गया. ऐसे में देश के कई हिस्सों को बाईपास कर दिया गया.

देश में पहली रेल लाइन बिछाने के लिए ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे और ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी के बीच प्रतिस्पर्धा छिड़ गयी. पर जिस जहाज में रेल इंजन इंग्लैंड से कलकत्ता के लिए भेजा गया, वो जहाज भटक कर ऑस्ट्रेलिया चला गया. वहां से फिर कलकत्ता के लिए निकला, जो 1854 में कलकत्ता पहुंचा. दुसरा जहाज समुद्र में डूब गया. इसके अलावा दूसरी दिक्कत थी, रेलवे लाइन को फ़्रांसिसी कण्ट्रोल वाले शहर चन्दरनगर से होकर गुजरना था, जिसमे क़ानूनी उलझनें आ रही थी. बाज़ी ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के हाथो लगी और पहली व्यवसायिक ट्रेन बोरी बंदर से थाणे के बीच चली. 15 अगस्त 1854 को EIRC की पहली पैसेंजर ट्रेन हावड़ा से हुगली तक 38 किमी के स्ट्रेच पर चली.

भारतीय रेलवे कहने को भारतीय रेल थी

भारतीय रेलवे कहने को तो भारतीय रेल थी, पर इसमें पूँजी पूरी तरह ब्रिटिश थी, इसके लिए इंजन, ब्रिज के लिए स्टील, रेल पटरियां, स्लीपर्स सब इंग्लैंड से आ रहे थे. 1853 से 1947 के बीच कुल 14400 इंजन इंग्लैंड से आयात किया गया और 3000 रेल इंजन अन्य देशों से. 1865 से 1941 के बीच देश में सिर्फ 700 इंजन बने. ऐसे में बात रेलवे वर्कशॉप की आ जाती है.

जमालपुर रेलवे वर्कशॉप:
बिबेक देबरॉय कहते हैं, जमालपुर रेलवे वर्कशॉप का जिक्र किये बगैर भारतीय रेलवे की कहानी अधूरी रहेगी. जमालपुर रेलवे वर्कशॉप की स्थापना 1860 में हुई थी. EIRC ने यहाँ 1862 में पहला वर्कशॉप स्थापित किया. सवाल ये है कि इस महत्वपूर्ण इस्टैब्लिशमेंट के लिए जमालपुर को क्यों चुना गया? इस दिलचस्प सवाल का जवाब बिबेक देबरॉय देते हैं, जमालपुर के बगल में स्थित मुंगेर वर्षों से नहीं, सदियों से गन के उत्पादन के लिए जाना माना रहा था. दूसरा कारण ये थे, कि हावड़ा से दिल्ली जाने वाली रेल लाइन जमालपुर/मुंगेर से होकर गुजरेगी. लेकिन मेन लाइन ( ग्रैंड कॉर्ड) गया/मुगलसराय के रास्ते बन गया. और पूरा साहिबगंज लूप नेग्लेक्टेड हो गया. मुंगेर/जमालपुर इसी साहिबगंज लूप पर था. इनके अलावा, एक रोचक कारण बताते हैं बिबेक देबरॉय. रेलवे वर्कशॉप के अधिकांश कर्मी अँगरेज़ थे. हावड़ा वर्कशॉप में काम के बजाय वे बिलियर्ड्स, होटल, रेस्त्रां, बॉलरूम में डांस ज्यादा पसंद करते थे. ऐसे में काम का नुकसान देखते हुए वर्कशॉप हावड़ा से 450 किमी दूर जमालपुर शिफ्ट कर दिया गया.

शुरू में इंजन को उसके नंबर से जाना जाता था, लेकिन आगे चलकर इंजन के नाम रखे जाने लगे. मुख्यतः ब्रिटिश वाइसराय, उनकी पत्नी, सीनियर ब्रिटिश ऑफिसर्स आदि के नाम पर. 1862 में बना जमालपुर लोकोमोटिव वर्कशॉप में 1899 में पहला भाप का इंजिन बना- Lady Curzon. 1932 में सेवा से रिटायर कर दिया गया. अब अता पता नहीं. उन दिनों इंजिन बनाने में 33000 का खर्चा लगता था. जो तस्वीर आपके साथ शेयर कर रहा हूँ, वो भारत में बना ( actually assembled) पहला steam engine है, जो 1895 में अजमेर वर्कशॉप में बनाया गया. अजमेर वर्कशॉप बनाया था, राजपुताना मालवा रेलवे ने.

एकमात्र उदाहरण मिलता है जब एक भारतीय के नाम पर एक इंजन का नामकरण किया गया: यह 1862 में फ्रेंच कंपनी, Anjubault के द्वारा बनाया गया था. इसका नाम Ramgotty Mukherjee के नाम पर रखा गया. Ramgotty Mukherjee नलहट्टी-अजीमगंज लाइट रेलवे के अंतिम जनरल मैनेजर थे.

अपनी किताब में बिबेक देबरॉय रोचक तथ्य रह रहकर प्रस्तुत करते रहते हैं, जो हमें अचरज में डालता है और दूसरी ओर किताब को बोझिल नहीं होने देता. उदाहरण के लिए, वे बताते हैं,अंतिम भाप इंजन देश में 1970 में बना, “अंतिम सितारा”. वे अफ़सोस और हैरानी जाहिर करते हुए बताते हैं, 1970 में बनने के बाद भी कोई नहीं जानता, ‘अंतिम सितारा’ कहाँ है !

1857 का विद्रोह ( स्वतंत्रता संग्राम) रेल के इतिहास में वाटरशेड साबित हुआ:

1857 के विद्रोह ने अंग्रेज़ों को भौंचक ( caught off guard) कर दिया। काफी आलोचना हुई कि अगर रेलवे प्रोजेक्ट्स अपने समय पर पूरे हो जाते, तो ब्रिटिश साम्राज्य को इतना नुकसान नहीं उठाना पड़ता. बहुत शार्ट नोटिस पर सेना और जरुरी साजो सामान को एक जगह से दूसरे जगह पहुंचा दिया जाता. विद्रोह से अंग्रेज़ों ने कई सबक सीखे. अब रेलवे कॉलोनीज, सिविल लाइन बनाये गए, और अंग्रेज़ों को इन सिविल लाइन्स में रखा गया. रेलवे में निचले स्तरों पर एंग्लो इंडियंस की बड़ी संख्या में भर्ती की गयी. रेलवे स्टेशनों की बड़े तौर पर किलेबंदी की गयी ( इस तरह से उनका निर्माण किया गया), ताकि भविष्य में अगर इस तरह सैन्य विद्रोह का सामना करना पड़े, तो ब्रिटिश जान माल की सुरक्षा की जा सके. इसके अलावा, रेलवे अर्थशास्त्री और रेलवे टाइम्स के एडिटर Hyde Clarke ने मैदानी इलाकों से दूर हिल्स में – दार्जीलिंग, शिमला जैसी जगहों में English towns विकसित करने का आईडिया दिया. इन हिल स्टेशंस से भारत पर अँगरेज़ शासन करें- ये आईडिया था. ऐसे में ट्रंक लाइन्स में ब्रांच लाइन्स जोड़ने का आईडिया आया. और फिर हिल रेल- दार्जिलिंग, कालका शिमला, नीलगिरि रेलवे आदि का अस्तित्व आया.

1858 में GIPR ने खंडाला-पुणे रेलवे लाइन को चालु किया. भोरघाट और थालघाट से होते हुए रेलवे लाइन बनाने के बाद GIPR ने सह्याद्रि को क्रॉस कर लिया। दक्षिण में 1852 में मद्रास रेलवे कंपनी का गठन किया गया. भारत में रेल का सञ्चालन के लिए कई कम्पनियाँ अस्तित्व में थीं. कुछ उदाहरण:
असम रेलवे एंड ट्रेडिंग कंपनी (1881)
बंगाल एंड नॉर्थ वेस्टर्न रेलवे कंपनी ( 1882)
बॉम्बे, बड़ोदा एंड सेंट्रल इंडिया रेलवे कंपनी (1857),
ईस्ट इंडियन रेलवे कंपनी (1845)
ईस्ट बंगाल रेलवे कंपनी (1855)
ग्रेट इंडियन पेनिन्सुला रेलवे कंपनी (1849),
मद्रास रेलवे कंपनी (1852)
अवध रेलवे कंपनी (1856)
सिंध (Scinde) रेलवे कंपनी (1855)
साउथ इंडियन रेलवे कंपनी (1857) इत्यादि.

सिंधु घाटी सभ्यता की ईंटों का इस्तेमाल करांची-लाहौर रेल लाइन के दो सेक्शन में सपोर्ट के लिए किया गया.

शुरू में करांची एक मछुआरा गांव था. सिंध के कमिश्नर हेनरी एडवर्ड फ्रेयर ( Henry Edward Frere) ने लार्ड डलहौज़ी से करांची को एक पोर्ट के रूप में विकसित करने और करांची से कोटरी तक रेल लाइन बिछाने की अनुमति मांगी. 1850 के दशक में जॉन ब्रंटन और विलियम ब्रंटन ने कराची- लाहौर के बीच रेल लाइन बिछाना शुरू किया और ट्रैक के लिए Ballast की जरूरत पड़ी. इसके लिए उन्हें दो उजड़े शहरों-ब्राह्मणाबाद और हड़प्पा में ईंटे मिली. सिंधु घाटी सभ्यता की ईंटों का इस्तेमाल करांची-लाहौर रेल लाइन के दो सेक्शन में सपोर्ट के लिए किया गया.

1862 में ब्रांच लाइन्स और फीडर लाइन्स बनाने के लिए इंडियन ब्रांच रेलवे कंपनी की स्थापना की गयी. कंपनी को गारंटी देने के बजाय 20 साल की सब्सिडी दी गयी. दरअसल guaranteed rate of interest से सरकार को नुकसान होने लगा था. चूँकि रेल कंपनियों को नुकसान नहीं उठाना था, तो रेलवे कंस्ट्रक्शन पर पैसे बचाने के बचाने ( economize) के बारे में सोचा नहीं गया. थोड़ा सा भी फाल्ट अगर पाया गया, तो फिर से कंस्ट्रक्शन किया गया. कई uneconomic रुट्स बिछाए गए, जिन्हे अंत में सरकार द्वारा अधिग्रहण किया गया. इस सम्बन्ध में एक रोचक उदहारण लेखक देते हैं.
1902 में लार्ड कर्ज़न लुमडिंग पहुंचे. नए बने हुए रेल लाइन के इंस्पेक्शन के लिए. उन्होंने कंपनी के एजेंट मिस्टर वुड्स से पूछा, अब जब रेल लाइन बिछ चुका है, तो इस रूट में आप कितना ट्रैफिक की उम्मीद करते हैं.
मिस्टर वुड्स का जवाब था, nothing, sir !
फिर आपने ये लाइन क्यों बिछाई?
मुझे नहीं पता सर. भारत सरकार ने बिछाने का आदेश दिया. इसलिए.
ऐसे में कंस्ट्रक्शन कॉस्ट के हाई होने से और प्रॉफिट नहीं होने से सरकार को काफी नुकसान उठाना पड़ा. ऐसे में सरकार ने अपना तौर तरीका बदलना शुरू किया.
सरकार कई बार खुद रेल लाइन बिछाने के काम में लगी, कई बार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मोड में काम किया. 1905 में रेलवे बोर्ड का गठन हुआ. 1924 से सरकार ने रेलवे का परिचालन अपने हाथों में लेना शुरू किया. ऑकवर्थ समिति के सुझाव पर रेलवे का बजट अलग कर दिया गया. इतना विशाल संगठन था ( empire under empire) कि उसे कंस्ट्रक्शन, ऑपरेशन, सैलरी आदि में दिक्कत न हो, इसके लिए उसके लिए अलग से बजट का प्रावधान किया गया.

प्लेटफार्म टिकट की शुरुआत:

रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों के सगे सम्बन्धियों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए सरकार ने प्लेटफार्म टिकट की शुरुआत की. Scinde(Sind) Punjab &Delhi Railways पहली रेलवे कम्पनी थी, जिसने प्लेटफॉर्म टिकट जारी किया. लाहौर स्टेशन पर.

बिबेक देबरॉय लिखते हैं कि तमाम प्रयासों के बावजूद रेलवे नेटवर्क का विस्तार देश के आर्थिक विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिहाज से धीमा था. 1869 में रेलवे नेटवर्क की लम्बाई जो 4265 मील थी, वो 1879 में बढ़कर सिर्फ 6128 मील हुई.
1876 -78 के अकाल में कुल मिलाकर ५५ लाख लोगों की मौत हुई. 1880 में स्थापित अकाल आयोग ने रेलवे के विस्तार की धीमी गति के लिए रेलवे कंपनियों की खिंचाई की. 1896 -97 के अकाल में भी काफी लोगों की मौत हुई. इस समय तक ये बात स्थापित हो गयी कि पब्लिक वर्क्स के अंतर्गत रेलवे लाइन के विस्तार से भुखमरी से लड़ने में मदद मिलेगी.

रेलवे की शुरुआत होने के बाद कम लोगों के यात्रा करने की आशंका निर्मूल साबित हुई. ट्रैफिक काफी तेजी से बढ़ा. 1882 में आंकड़ें बताते हैं कि १. ३९ प्रतिशत पैसेंजर ने फर्स्ट क्लास में, १. ७४ प्रतिशत पैसेंजर ने सेकंड क्लास में और 97 प्रतिशत पैसेंजर ने थर्ड क्लास में यात्रा किया. माल ढुलाई में मुख्यतया कपास, चमड़ा, चाय, नमक, खाद्य तेल, गेहूं, गुड़, चीनी, तम्बाकू आदि प्रमुख तौर पर शामिल थे.

इंडियन रेलवे कांफ्रेंस, 1871

1871 में पहला इंडियन रेलवे कांफ्रेंस बुलाया गया. इसमें तय हुआ कि रेल में पूलमैन कैरिज ( Pullman Carriage) का इस्तेमाल किया जाए ताकि यात्रियों को यात्रा के दौरान ज्यादा आराम मिले. हालाँकि थर्ड क्लास की सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया गया.

बिबेक देबरॉय रेलवे में समय के साथ अन्य सुधारों का भी जिक्र करते हैं. जैसे शुरूआती दौर में बॉम्बे टाइम, कलकत्ता टाइम, मद्रास टाइम का इस्तेमाल अलग अलग क्षेत्र की रेलवे कंपनियां करती थीं, 1905 में रेलवे में इंडियन स्टैण्डर्ड टाइम लागू किया गया.
बिबेक देबरॉय बताते हैं कि शुरूआती दौर में ट्रेनों में लाइट की व्यवस्था नहीं होती थी. रात होते ही ट्रेन के डिब्बे अँधेरे में डूब जाते थे. 1897 में एक्सपेरिमेंट के तौर पर लाइटनिंग की व्यस्था की गयी. 1902 में सबसे पहले जोधपुर रेलवे ने फर्स्ट क्लास में रौशनी की व्यवस्था की. सेकंड और थर्ड क्लास में रौशनी बाद में आयी.
1870 में सबसे पहले ईस्ट इंडिया रेलवे कंपनी ने ट्रेन पर पोस्ट ऑफिस की व्यवस्था की और 1907 तक बाकायदा आरएमएस ( Railway Mail Service-RMS) अस्तित्व में आ गया था. मेल ट्रेन की शुरुआत हुई. गरीब भारतीय यात्री मिक्स्ड ट्रेनों में यात्रा करते थे. मिक्स्ड ट्रेनों में मालगाड़ी के डिब्बे और लोअर क्लास के डिब्बे लगे होते थे. जहाँ मिक्स्ड ट्रेनों की औसत स्पीड 16 -18 किमी/घंटे हुआ करती थी, वहीँ मेल/ एक्सप्रेस ट्रेनों की चाल औसतन 20 -25 किमी/घंटे हुआ करती थी. मिक्स्ड ट्रेनों के हॉल्ट बहुत ज्यादा हुआ करते थे, और गति धीमी. इसके चलते यात्रियों को कई दिन ट्रेन में बिताने पड़ते थे.

कुछ खास ट्रेनों का जिक्र जरूरी है:

बिबेक देबरॉय ने अपनी किताब में कुछ महत्वपूर्ण ट्रेनों का जिक्र किया है जैसे, आज़ादी से पहले सबसे लम्बी दूरी तय करने वाली ट्रेन थी, मंगलोर-पेशावर ट्रेन। 1930 में समय 104 घंटे.

बॉम्बे-पुणे के बीच शुरू की गयी ‘डेक्कन क्वीन” एकमात्र ट्रेन है, जिसका बर्थडे मनाया जाता है. 1 जून 1930 को शुरू की गयी ये ट्रेन पहले सप्ताह में एक बार चलती थी, फिर 1940 के दशक में इसे डेली चलाया जाने लगा. डेक्कन क्वीन पहली ट्रेन थी, जिसमें लेडीज ओनली कम्पार्टमेंट लगा था. और साथ ही ये पहली ट्रेन थी जिसके सारे डिब्बे आपस में जुड़े थे. एक डिब्बे से अंतिम डिब्बे तक जा सकते थे (vestibule running throughout its length). इतना ही ये उन चंद ट्रेनों में थी, जिसमे स्टीम इंजन का इस्तेमाल नहीं हुआ था. इलेक्ट्रिक और डीजल. जिस समय डेक्कन क्वीन शुरू की गयी, उस समय बॉम्बे पुणे के बीच की दूरी तय करने में पूना मेल 6 घंटे लेती थी, डेक्कन क्वीन ने इस दूरी को सिर्फ 2 घंटे 45 मिनट में तय करना शुरू किया.

भारतीय रेल के इतिहास में एक ख़ास ट्रेन- Deccan Queen !!

माथेरन हिल रेलवे में सिर्फ एक टनल है और इसका नाम है, One Kiss tunnel. नाम के पीछे वजह ये है कि ये एक छोटा टनल है और इसमें इतना ही समय मिलता है कि आप अपने पार्टनर को एक छोटा सा किस कर सकें.

Fairy Queen-सबसे पुराना स्टीम इंजन। गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड्स में दर्ज. 1997 में इसे दुरुस्त करके दो दिन के ट्रिप पर दिल्ली से अलवर ले जाया गया था. बाद में, पार्ट्स की चोरी हो जाने के चलते इसे सेवा से हटा लिया गया. फिलहाल Fairy Queen रेवाड़ी के लोको शेड में खड़ी है.

असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी जी एक सेलिब्रिटी हो गए थे

असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी जी एक सेलिब्रिटी हो गए थे, भले वे माने न माने. इसका एक मजेदार असर देखने को मिला असहयोग आंदोलन के दौरान. 1921 में उन्हें असम जाना था,जहाँ जोरहट में असहयोग आंदोलन की एक सभा को सम्बोधित करना था. वे जोरहट प्रोविंशियल रेलवेज के एक स्पेशल ट्रेन में थे, जो आगे चलकर असम बंगाल रेलवे की ट्रेन से जोड़ देता उन्हें डिब्रूगढ़ तक ले जाता. मध्य रात्रि में स्पेशल ट्रेन ने उसी पटरी पर चल रही एक मालगाड़ी में धक्का मार दिया. धक्का लगने से जिस कोच में गाँधी जी बैठे थे, वो बाकी डिब्बों से कट गया. ट्रेन उस डिब्बे को वहीँ छोड़कर आगे चल निकली. काफी आगे ट्रेन जब चली गयी, तो पाया गया कि गांधीजी पीछे ही छूट गए हैं. घबराए गार्ड और इंजन ड्राइवर ट्रेन को वापस लेकर आये और जब उन्होंने पाया कि गांधी जी सुरक्षित हैं, तो उन्होंने राहत की सांस ली. गांधी जी सरलता से हँसे कि उन्होंने तो ट्रेन के वापस आने की उम्मीद ही नहीं की थी !!
गाँधी जी ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में रेल का शानदार इस्तेमाल किया.

भारतीय रेल के इतिहास में एक बेहद रोचक चिट्ठी का जिक्र है.

भारतीय रेल के इतिहास में एक बेहद रोचक चिट्ठी का जिक्र है. कहा जाता है कि इस चिट्ठी के बाद ट्रेनों में  थर्ड क्लास में ( फर्स्ट और सेकंड क्लास में टॉयलेट्स की व्यवस्था पहले हो गयी थी ) टॉयलेट की शुरुआत हुई. चिट्ठी 1909 में ओखिल चंद्र सेन ने लिखी थी अपनी टूटी फूटी अंग्रेजी में, साहिबगंज के डिविजनल सुपरिन्टेन्डेन्ट को.

“Dear Sir, I am arrive by passenger train Ahmedpur station and my belly is too much swelling with jackfruit. I am therefore went to privy. Just I doing the nuisance that guard making whistle blow for train to go off and I am running with LOTAH in one hand & DHOTI in the next when I am fall over & expose all my shocking to men & female women on platform. I am got leaved Ahmedpur station. This too much bad, if passenger go to make dung that dam guard not wait train minutes for him. I am therefore pray your honour to make big fine on that guard for public sake. Otherwise I am making big report to papers.”

ब्रिटिश भारत के अलावा देशी रियासतों में भी रेलवे का विस्तार हुआ.

ब्रिटिश भारत के अलावा देशी रियासतों में भी रेलवे का विस्तार हुआ. अंग्रेज़ों ने देसी रियासतों को अपने पैसे से रेलवे की शुरुआत करने को प्रोत्साहित किया. देसी रियासतों में बरोदा( modern name Vadodara) पहला रियासत था जहाँ रेलवे की शुरुआत हुई. एक वजह ये भी थी कि गायकवाड़ ने दभोई शहर का व्यवसायिक महत्त्व समझा। उनकी समझ में ये बात आयी कि बेहतर ट्रांस्पोर्टेशन से दभोई और आसपास के क्षेत्र को फायदा होगा. शुरआत में दभोई से 20 मील दूर तक मियागाम करजाम तक नैरो गेज लाइन डाली गयी और इस पर बैल ट्रेनों को खींचते थे. जब स्टीम इंजन लाया गया, तो पूरा रेल लाइन इसे हैंडल नहीं कर सका. ऐसे में रेल की पटरियों को फिर से बिछाया गया. 1862 में इसका नाम गायकवाड़ दभोई रेलवे था, जो 1873 में गायकवाड़ बरोदा रेलवे हो गया और अंततः गायकवाड़ बरोदा स्टेट रेलवे कहलाया.

A H Wheeler & Higginbotham’s

बिबेक देबरॉय ने रेलवे स्टेशनों पर बुक्स ऑन व्हील्स, व्हीलर्स की स्थापना का दिलचस्प जिक्र किया है. इसके अलावा ट्रेनों में चोरी, डकैती, मर्डर के मामलों, भारतीयों के साथ racial discrimination आदि का भी जिक्र लेखक ने किया है.

लेखक ने इस बात पर जोर दिया है कि तमाम विकास के बाद भी जापान और अन्य देशों की तरह रेल भारत के आर्थिक विकास में अपना योगदान नहीं दे सकी . इसकी वजह रही रेल पटरियों का कम घनत्व. उदाहरण के लिए, 1937 में जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका में रेलवे घनत्व 80 मील/हज़ार वर्ग मील था, और जर्मनी में 253 मील/ हज़ार वर्ग मील था, वहीँ भारत में रेलवे घनत्व महज 26 मील रेल/ हज़ार वर्ग मील था.
बिबेक देबरॉय की किताब अकादमिक नहीं है, बल्कि रेल के इतिहास को रोचक तथ्यों के साथ रोचक अंदाज़ में पाठकों के सामने पेश करना, जिसमे उन्होंने सफलता प्राप्त की है. किताब को पढ़ते हुए एक बुद्धिमान पाठक रिफरेन्स के तौर पर गहन अध्ययन के लिए कुछ अन्य किताबों को पढ़ने के लिए प्रेरित होता है. और ये इस किताब की खासियत है, रेलवे के इतिहास में पाठकों की रूचि को बढ़ाती है. जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ, एक आम भारतीय का रेल से लगाव कई कारणों से चला आया है.


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