यात्रा-वृत्तांत: बगीचों और महलों का शहर – मैसूर

भारती पाठक

गर्मी की छुट्टियों में बंगलुरु जाने की कई वजहें थी । एक तो  वहां का मौसम जिसकी तारीफ़ वहां रहने और घूम कर आये लोगों से बराबर सुनती आ रही थी । इन सबके अलावा वहां जाने से पहले जो कुछ बंगलुरु और उसके आस-पास के बारे में पढ़ा-सुना वो ये कि बंगलुरु शहर में ही न केवल कई दिलचस्प दर्शनीय स्थल बल्कि साप्ताहिक छुट्टी में आस-पास के हिल स्टेशनों पर भी जाने के कई अच्छे विकल्प मौजूद हैं । सड़क और रेल परिवहन भी यहाँ बहुत उन्नत स्थिति में है जिससे यात्रा का मजा दोगुना हो जाता है । अगर छोटी यात्रा की दृष्टि से देखें तो बंगलुरु से मैसूर जाना बेहतरीन मौका था हमारे लिए । एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के रूप में समृद्ध शहर को जानने का, जो आज भी जीवंत संस्कृति और समान रूप से शानदार धार्मिक मंदिरों व आध्यात्मिकता की एक साथ झलक प्रस्तुत करता है ।

Bangalore Mysore highway

बंगलुरु से मैसूर की दूरी 150 किलोमीटर की है जिसे 3 घंटे में पूरा किया जा सकता है जिसकी एक बड़ी वजह हैं अच्छी सड़कें । अगर आप मैसूर के खास ख़ास जगहों को एक दिन में देखना चाहते हैं तो जरूरी है कि बंगलुरु से सुबह जल्दी निकलें । जाने के बस और रेल दोनों साधन उपलब्ध हैं लेकिन अगर समूह में जा रहे हों तो कोई छोटी बस या कार रिज़र्व करके जाना अधिक सुविधाजनक होगा ।
हमने एक 16 सीटर टेम्पो ट्रेवलर बुक की और सुबह 6 बजे घर से निकल पड़े । बंगलुरु से मैसूर की यह सड़क बेहद साफ-सुथरी और सुन्दर है जिसमें सहज ही आपको कर्नाटक की संस्कृति और जीवंतता के दर्शन हो जाएंगे । सुबह के 7 बजे ड्राइवर ने बस एक रेस्टोरेंट पर रोका जो सड़क से लगी हुई, काफी बड़ी और साफ़ सुथरी जगह थी । यह ‘बिदादी’ नाम की जगह थी जो कि कर्नाटक के ही रामनगर जिले का हिस्सा है ।

अमूमन बंगलुरु से मैसूर जाने वाले पर्यटकों के नाश्ते खाने की यह लगभग निश्चित जगह है, जहाँ आमतौर पर बस या कार वाले रुक कर जलपान करते हैं । हमने वहीं नाश्ता किया और उस दिन मुझे पता चला कि खिचड़ी यानि पोंगल भी इतना स्वादिष्ट हो सकता है । ये भी कि पोंगल नाश्ते में भी खाया जाता है । वहां एक और चीज ने हमारा ध्यान खींचा जो देखने में इडली जैसी ही थी लेकिन आकार में काफी बड़ी थी, स्वाद भी इडली जैसा ही था । वेटर ने बताया इसे “थट्टी इडली” कहते हैं जिसके बनाने का तरीका इडली से मिलता-जुलता है बस आकार में उससे बड़ा और स्वाद के तो क्या कहने ।

नाश्ता करके बस में बैठे तो 8:30 बजे श्रीरंगपट्टनम पहुंचकर ही रुके । बेंगलुरु से ये जगह 120 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । यह कर्नाटक के ही मांड्या जिले में स्थित एक नगर है जहाँ से मैसूर की दूरी कुल 19 किलोमीटर रह जाती है । कावेरी नदी इस तरह इसके चारों ओर छाई है कि यह लगभग एक टापू जैसा बना दिखता है । यह शहर अपना नाम श्रीरंगनाथ स्वामी मंदिर के नाम से लेता है । इसी कारण श्रीरंगपट्टनम दक्षिण भारत का एक प्रमुख वैष्णव तीर्थ स्थल माना जाता है । कहते हैं यहाँ कावेरी, काबिनी और हेमावती नदी का संगम भी है । श्रीरंगपट्टनम के साथ टीपू सुलतान का भी नाम जुड़ा हुआ है जिन्होंने इसे अपनी राजधानी बनाया था और इसी दुर्ग में एक विश्वासपात्र के विश्वासघात के कारण वीरगति को प्राप्त हुए थे ।

Sriranganath Temple

श्रीरंगनाथ जी को विष्णु का अवतार माना गया है । मंदिर से थोडा पहले ही पर्किंग में बस खड़ी कर हम सभी मंदिर के भीतर गए । अत्यंत विशाल और वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना यह मंदिर स्वयं अपने वैभव का गुणगान करता प्रतीत होता है । इस मंदिर का निर्माण गंग वंश ने नौंवीं शताब्दी में किया था । ढाँचे को मजबूती देने में लगभग 30 साल का समय लगा । मंदिर की निर्माण कला होयसल राजवंश और विजयनगर साम्राज्य की हिन्दू मंदिर स्थापत्य कला का मिश्रण है । बड़े-बड़े पत्थरों को तराश कर बनायी गयी मूर्तियाँ और जानवरों की आकृतियाँ मानो जीवंत होने को आतुर हों । मंदिर का कई मंजिला द्वार अत्यंत आकर्षक था । करीब एक घंटे का समय लगा इसे घूम कर देखने में क्योंकि भीतर मंदिर काफी बड़ा और भव्य है ।
बाहर कुछ दुकानें भी थीं जो आम तौर पर मंदिरों के आसपास होती हैं । गर्मी के कारण प्यास लग आई थी तो सोचा गन्ने का रस ही पी लेते हैं और यकीन कीजिये वैसा मीठा और स्वादिष्ट गन्ने का रस मैंने और कहीं नहीं पिया ।

वहां से चले तो करीब 40 मिनट के बाद जिस मंदिर पर पहुंचे वह एक छोटी पहाड़ी पर था । मैसूर से 13 किलोमीटर की दूरी पर चामुंडी पहाड़ी पर स्थित ये चामुंडा माता का मंदिर है । मंदिर तक सवारियां नहीं जाती तो बस भी काफी पहले ही रोक दी गई । हम भी पैदल ही मंदिर तक गए । यह एक अत्यंत विशाल परिसर में बना बेहद सुन्दर मंदिर था जिसे देख कर एक बार को मदुरै के मीनाक्षी मंदिर की याद आ गयी । चामुंडेश्वरी को कर्नाटक के लोग ‘नाडा देवाथे’ के नाम से पुकारते हैं जिसका अर्थ है ‘राज्य की देवी’ यानि चामुंडा इनकी राज्य देवी है जो इनकी रक्षा करती है । चामुंडेश्वरी मंदिर को शक्तिपीठ और 18 महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है । इस क्षेत्र को पुराणिक काल में क्रोंच पुरी के नाम से जाना जाता था इसलिए इसे क्रोंच पीठम भी कहते हैं । कहा जाता है कि यहीं पर देवी ने महिषासुर का वध किया था और सती देवी के बाल यहीं गिरे थे । यहाँ नवरात्रि के त्यौहार पर बड़ी धूमधाम रहती है जब मैसूर के महाराजा द्वारा देवी का अभिषेक होता है और उनकी शोभायात्रा मंदिर के चारों ओर स्वर्ण पालकी में निकाली जाती है । मंदिर के आसपास काफी बड़ा बगीचा भी था जहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ यत्र-तत्र बिखरी थी । मंदिर में नंदी की विशाल प्रतिमा है जो पारे की बनी हुई है । कहते हैं कि इस मंदिर में स्वयं काल भैरव सदैव विराजमान रहते हैं और मंदिर की रक्षा करते हैं ।

मंदिर द्रविण वास्तुकला का अच्छा नमूना है । इस सात मंजिली ईमारत के गर्भगृह में स्थापित देवी की प्रतिमा शुद्ध सोने की बनी है । पहाड़ की चोटी से नीचे मैसूर शहर का मनोरम दृश्य दिखाई देता है । मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बहुत होती है तो अन्य मंदिरों की तरह यहाँ भी सामान्य के साथ ही विशेष दर्शन की सुविधा भी उपलब्ध है जिसके लिये निर्धारित शुल्क लेकर कूपन मिलता है । रुकने के लिए धर्मशालाएं और होटल भी उपलब्ध हैं । समय की कमी को देखते हुए हमने भी सुविधा शुल्क देकर ही दर्शन किये और अपने अगले पड़ाव की ओर चल पड़े ।

Mysore Zoo

जब हम मैसूर चिड़ियाघर यानि ‘श्री चमराजेन्द्र प्राणी उद्द्यान’ पहुंचे तो 11:30 बज चुके थे और सुबह का नाश्ता हज़म हो चुका था तो सबसे पहले चिड़ियाघर के पास ही एक भोजनालय में सबने गुजराती थाली का भोजन किया और फिर भीतर प्रवेश किया । चिड़ियाघर सुबह 8:30 से शाम 5:30 तक खुला रहता है जिसमें प्रवेश का शुल्क बड़ों के लिए 50 रुपये और बच्चों का 20 रुपये है ।
157 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह चिड़ियाघर भारत के सबसे पुराने और अच्छे प्राणी उद्यानों में से एक है यह बात बिना संदेह के कही जा सकती है । विदेशों का नहीं मालूम लेकिन भारत के जितने भी शहरों के प्राणी उद्यान देखे हैं मैंने उनमें ये सबसे ज्यादा सुव्यवस्थित और जीव-जंतुओं के अच्छे रख-रखाव से सम्पन्न दिखा ।
मैसूर पैलेस के समीप ही स्थित इस चिड़ियाघर का निर्माण 1892 में शाही संरक्षण में हुआ जिसे बाद में राज्य सरकार को सौंप दिया गया । एक खास बात थी कि वहां के प्राणियों को किसी न किसी ने गोद ले रखा है और उनके देख-रेख का खर्चा भी वही उठाते हैं । किस पक्षी या जानवर को किसने गोद लिया ये भी वहां अंकित था । ऐसा ही पेड़ों के लिए भी था जिन पर गोद लिए हुए अभिभावक के नाम की पट्टी लगी हुई थी । चिड़ियाघर के प्राणियों और वृक्षों को गोद लेने का यह रिवाज अद्भुत है । इससे एक ओर तो राज्य के स्रोतों के अभाव में चिड़ियाघर बदहाली से बच सकते हैं , दूसरे बच्चों और बड़ों को इससे बहुत ही सुंदर सबक मिलते हैं ।
पक्षियों की इतनी प्रजाति मैंने और कहीं नहीं देखी । यहाँ की करंजी झील में अपने मौसम में प्रवासी पक्षी भी आते हैं । यहाँ 40 से भी ज्यादा देशों से लाये गए जानवरों को रखा गया है । हाथी, सफ़ेद मोर, दरियाई घोड़े, गैंडे, गोरिल्ला और जिराफ भी देखने को मिला । यहाँ एक जैविक उद्यान भी है जिसमें भारतीय और विदेशी पेड़ों की 85 के करीब प्रजातियाँ रखी गयी हैं । बेहद हरा-भरा और मनोरम वातावरण कि घूमते हुए कब 2 घंटे हो गए पता ही नहीं चला । भिन्न-भिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधों, जीव-जंतु और पक्षियों को देखकर बच्चे बहुत खुश थे । मैसूर जाएँ तो तो मैसूर चिड़ियाघर को लिस्ट में रखना न भूलें और समय लेकर जाएँ ।

दोपहर हो चली थी और हमें और कई जगहें देखना था । वैसे भी मैसूर कोई एक दिन में देख पाने वाली जगह तो है नहीं । यह शहर छः शताब्दी तक मैसूर राज्य की राजधानी रहा है जिसमें हैदर अली और टीपू सुल्तान के थोड़े से समय को छोड़कर वाडयार राजवंश का शासन रहा है । यह सर्वविदित है कि वाडयार कला और संस्कृति के प्रेमी और संरक्षक रहे । इसमें टीपू सुल्तान और हैदर अली ने भी भी अपना योगदान दिया ।
इसीलिए मैसूर का उपनाम कर्नाटक की सांस्कृतिक राजधानी भी है । यहां मेरी पसंद की कितनी ही चीजें हैं जिन्हें भला बिना देखे, बिना चखे और कुछ को साथ ले जाए बिना कैसे जाया जा सकता था । मैसूर पाक नाम की मिठाई, मैसूर सेंडल सोप, मैसूर सिल्क की साड़ियां, मैसूर के चमेली के फूल । पता नहीं इतने समय में कितना हो पायगा और कितना फिर किसी बार के लिए छूट जाएगा । चलो कुछ रह जायगा तो दुबारा आने का बहाना छोड़ जायगा । फिलहाल तो बस एक ही जुनून कि जितना देख सकें देख लें ।
तो जल्दी से बाहर आये और मैसूर पैलेस के लिए निकले क्योंकि सुना था ये काफी बड़ा और दर्शनीय है जिसमें काफी समय लगता है ।
पैलेस के बाहर काफी लम्बे चौड़े क्षेत्र में वाहनों के पर्किंग की व्यवस्था थी । सप्ताहांत होने के कारण काफी भीड़ भी थी जिसमें स्कूलों के बच्चे बड़ी संख्या में थे जो शायद स्कूल की तरफ से शैक्षिक भ्रमण के लिए आये थे । वैसे भी अपने वैभवशाली अतीत के गवाह ऐतिहासिक स्थलों से हमारी नयी पीढ़ी को परिचित कराना भी चाहिए ।

Mysore Royal Palace

महाराजा मैसूर का महल जिसे ‘अम्बा विलास’ के नाम से भी जाना जाता है शहर के बीचों-बीच स्थित है । बताते हैं कि इसका निर्माण 14वीं सदी में वाडयार राजाओं ने कराया था जबकि डिजाइन ब्रिटिश वास्तुकार हेनरी इरविन ने तैयार किया था । यह द्रविड़, पूर्वी और रोमन कला का अद्भुत संगम दिखता है । बताते हैं कि पहले जो महल था वो चन्दन की लकड़ियों से बना था जो कि एक दुर्घटना में काफी क्षतिग्रस्त हो गया तो दूसरे महल का निर्माण कराया गया । पुराने महल को भी ठीक कराकर संग्रहालय का रूप दे दिया गया है । महल रविवार और सार्वजनिक छुट्टियों को छोड़कर बाकी दिन सुबह 10 बजे से सायं 5:30 खुला रहता है । एंट्री फीस वयस्कों के लिए 70 रूपये और बच्चों के लिए 30 रुपये थी ।
मुख्य द्वार के ठीक सामने रंग बिरंगे फूलों से सजी वाटिका और बायीं ओर स्लेटी रंग की दीवारों और गुलाबी गुम्बद वाला महल दिख रहा था । अन्दर जाने पर गुम्बदों की शोभा देखते ही बनती है जो कि सोने के पत्तरों से सजे थे । छत रंगीन कांच की बनी थी और फर्श पर भी चमकदार पत्त्थर के टुकड़े लगे थे । विशाल नक्काशीदार दरवाजे, छतों में बड़े-बड़े झाड़ फानूस बेहद सुन्दर लग रहे थे ।
ऐसी धरोहरों को देखते हुए स्वाभाविक रूप से ह्रदय अपने देश के गौरवशाली अतीत के प्रति नतमस्तक हो उठता है । वहां और भी कई कक्ष थे जिनमें राज परिवार की स्मृतियाँ संग्रह करके रखी गयी हैं । महल के दूसरे तले पर दरबार का हॉल था जहाँ रानियों और दरबारियों के बैठने की अलग-अलग जगह बनी हुई थीं ।

पता चला कि सप्ताहांत में और ख़ास छुट्टियों और दशहरे के अवसर पर महल को रंग -बिरंगी रौशनी से सजाया जाता है जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते है जिसमें प्रवेश निशुल्क होता है । शाम को प्रकाश और ध्वनि शो भी होता है । यहाँ एक गुडिया घर भी है जिसे ‘गोम्बे थोट्टी’ कहते हैं जहाँ 19 वीं से लेकर 20 वीं शताब्दी के शुरू के दौर की गुड़ियों का संग्रह है । यहीं 84 किलो वजन का सोने का हौद भी रखा है जो हाथी की पीठ पर तब रखा जाता था जब राजा उस पर सवारी करते थे । इसी गुडिया घर के ठीक सामने सात तोपें रखी हुई हैं जिन्हें दशहरे के आरम्भ और समापन के अवसर पर दागा जाता है ।
महल देखते हुए करीब 4:30 बज गए थे, बच्चे थकने लगे और हमें भी चाय पीने की इच्छा हो रही थी तो गार्डन का चक्कर लगाते हुए हम बाहर आये और वहीं एक दुकान पर सबने चाय पी । 15 मिनट में तरोताजा होकर हम उस जगह को देखने के लिए निकले जो मैसूर का नाम आने पर सबसे पहले जुबान पर आता है और वहां जाने का सही समय भी शाम को ही है – यानि बृन्दावन गार्डन ।
यह विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कावेरी नदी पर बने कृष्णासागर बाँध से सटा हुआ है । 1927 में इस जगह की आधारशिला रखी गयी और यह करीब 5 वर्षों यानि 1932 में बनकर तैयार हुआ । उद्यान से लगा बाँध बेहद भव्य दिखता है और ऐसा लगता है जैसे एक ओर से उद्यान को घेरे हुए हो । करीब 60 एकड़ में फैले इस उद्यान के वास्तुकार “जी एच क्रिम्बिगल” थे जो उस समय मैसूर सरकार के उद्यान के लिए उच्चाधिकारी नियुक्त थे । यहाँ पर प्रवेश शुल्क है 15 रुपये प्रति व्यक्ति तो हमने भी लिया टिकट और चले देखने बृन्दावन गार्डन ।

Musical Fountain Mysore Garden

मैसूर के सबसे प्रमुख आकर्षणों में से एक यह उद्यान मुग़ल शैली में कश्मीर के शालीमार बाग़ जैसा ही बना है । बीचों-बीच में एक झील भी थी जहाँ नाव की सवारी की जा सकती थी । उसमें झील के पार जाने और आने दोनों का टिकट एक साथ भी लिया जा सकता है और एक तरफ का भी । हालाँकि पैदल भी झील के दूसरी तरफ जाया जा सकता है लेकिन उस लम्बे चौड़े उद्यान को देखकर और दिन भर के थके शरीर के साथ पैदल चलने की इच्छा नहीं थी तो हमने भी नाव की सवारी करने का निश्चय किया और दोनों तरफ का टिकट ले लिया ।
उद्यान में तरह-तरह के सुन्दर पेड़-पौधे, लतायें, पौधों को काट-छांट कर बनायी गयी जानवरों की आकृतियां तो हैं ही लेकिन मुख्य आकर्षण है झील के दूसरी तरफ होने वाला संगीतमय फौवारा शो जो निशुल्क देखा जा सकता है । इस उद्यान की अन्य तमाम खूबियों में सबसे प्रमुख यही शो देखने पर्यटक आते हैं । शो नियमित शाम 6:30 से 7:30 तक और सप्ताहांत को 6:30 से 8:30 तक होता है ( हो सकता है समय में कुछ परिवर्तन हुआ हो ) ।
लोग ख़ुशी से झूम रहे थे अलग-अलग गीतों की धुनों पर फव्वारो के साथ ही थिरक भी रहे थे और उत्साह से भरे थे । करीब एक घंटे तक हमने भी उस शो का आनंद लिया, फिर नाव से ही वापस आये ।
बाहर तरह तरह की दुकानें हमें बुला रही थीं लेकिन समय को देखते हुए हमने लौटने के लिए कदम बढ़ा दिए । बस में बैठकर जब आँखें मूंदी तब एहसास हुआ कि यह जीवन का कितना ख़ास दिन था जो हमें कितने ही नए अनुभवों और नयी जगहों से परिचय करा गया । यात्रायें सचमुच हमें शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से कितना समृद्ध करती हैं ।


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