पुस्तक चर्चा: स्वदेश दीपक का आत्मकथात्मक उपन्यास “मैंने मांडू नहीं देखा”

भारती पाठक

जितनी अजीबोगरीब ये दुनिया है उतने ही विलक्षण व्यक्तित्व और व्यवहार भी हमें यहीं देखने सुनने को मिल जाते हैं । कितनी ही ऐसी बातें हैं जिन पर किसी का वश नहीं चलता और नियति के हाथों कठपुतली बने हम उसी के अनुरूप आचरण करते हैं । हालांकि हमेशा ऐसा ही हो ये भी जरूरी नहीं, विशेषकर अपने अनुभव या जीवन को आधार बना कर जब कोई लेखक या कवि कुछ लिखता है तो वह पूर्णरूप से सचेत होता होता है अपनी बातों, अपने विचारों के सन्दर्भ में और पूरी जिम्मेदारी से लिखता होगा ऐसा मैं मानती हूँ । वैसे तो इस विचार से सहमत होने की कोई बाध्यता नहीं फिर भी कुछ पढ़ते या लिखते समय अपने आँख कान खुले रखना और बात की तह तक पहुँचने की जिज्ञासा होना स्वाभाविक पाठक के लक्षण होने चाहिए ।

आज जिस किताब को आप सभी के साथ शेयर कर रही वह कुछ ऐसी ही जिज्ञासाएं स्वयं में समोये हुए है जो इसे पढ़ते समय मैंने महसूस किया । ये है प्रसिद्ध नाटककार, उपन्यासकार और लघु कहानी लेखक स्वदेश दीपक जी की बहुचर्चित किताब “ मैंने मांडू नहीं देखा है ।” 1942 में जन्मे स्वदेश दीपक जी ने हिंदी और अंग्रेजी विषय से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की और २६ वर्ष अम्बाला के गाँधी मेमोरियल कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक रहे । इनकी १५ से भी अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानी संग्रह अश्वारोही, मातम, प्रतिनिधि कहानियां, बाल भगवान्, किसी अप्रिय घटना का समाचार नही है, मसखरे कभी नहीं रोते, और निर्वाचित कहानियां । उपन्यास नम्बर ५७ स्क्वाड्रन और मायापोत । नाटक बाल भगवान्, कोर्ट मार्शल, जलता हुआ रथ, सबसे उदास व्यक्ति, और काल कोठरी तथा आत्मकथात्मक उपन्यास, मैंने मांडू नहीं देखा ।

सन 2004 में इन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है । कोर्ट मार्शल इनका सबसे प्रसिद्ध नाटक है जिसका भारत भर में तकरीबन ४५० बार मंचन किया जा चुका है । इसमें देश के कई जाने माने कलाकारों ने अभिनय किया है ।

लेखक लगभग 7 वर्ष तक सीजोफ्रेनिया नामक मनोरोग से ग्रसित रहा जिसमें रोगी एक प्रकार के भ्रम में जीता है कि लोग मेरे बारे में बातें कर रहें हैं, मुझे और मेरे परिवार को हानि पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, कोई मेरे दिमाग को कण्ट्रोल करने की कोशिश कर रहा है, इत्यादि । इसके अलावा किसी के न बोलने पर भी आवाजें सुनाई देना, चीजें दिखना, मन में आशंका, क्रोध और दुःख का भाव आना जाना, भूख कम होना, नींद न आना तथा उत्तेजित हो जाना भी होता है ।

लेखक ने तीन बार मरने की भी असफल कोशिश की और बीमारी की ही स्थिति में ही एक दिन सिगरेट पीते हुए बैठे रहे जबकि पूरे शरीर में आग लग चुकी थी । वे ५ माह पी जी आई चंडीगढ़ में भरती रहे जहाँ वे बर्न विभाग और मानसिक रोग विभाग के साझा मरीज थे । लम्बे उपचार के बाद ठीक होने पर जब स्मृतियाँ लौटने लगीं तब दोस्तों की सलाह पर इन्होंने सात सालों की धुंधला चुकी स्मृतियों को समेट कर यह अत्मकथात्मक उपन्यास लिखा जो सिलसिलेवार नहीं बल्कि खंडित है । इसमें कोई क्रम नहीं है, यह लेखक की स्मृतियों का स्वतःस्फूर्त प्रवाह जैसा है । लेखक को जब-जब जो याद आता गया उसे ही क्रम बना दिया तो किताब कोलाज जैसे अनोखे ढंग की बन गयी है, जिसमे नौ खंड हैं ।

यह संस्मरणात्मक उपन्यास प्रसिद्ध चीनी लेखक ल्यू शुन की लंबी कहानी “एक पागल की डायरी” की याद दिलाता है जिसमें एक सामान्य व्यक्ति इस मानसिक रोग के चलते अंदर कमरे में बंद कर दिया जाता है जहां वह सारा दिन हरेक व्यक्ति की गतिविधि के बारे में यही सोचता है कि वह उसे मारकर खाने के बारे में योजना बना रहा है । वह एक हारर कहानी की तरह है ।

दीपक जी के “मैने मांडू नहीं देखा” में भी माहौल कुछ वायवी ही है । ‘कलकत्ता । वर्ष 1991 का ग्यारहवां महीना । मायाविनी ने मेरे माथे में कील ठोंक दी थी । मुझे बहुत देर से पता चला । मेरी दुनिया बहुआयामी से एक रंगी हो गयी, बीमार और बदसूरत । मेरी नदी खो गई । मेरा कहीं कोई पुल नहीं था ।’

यह भूमिका की शुरुआत है जो उत्सुकता जगाती है उस मायाविनी के प्रति जिसकी चर्चा लेखक ने पूरी किताब में की है और उसे सेडक्ट्रेस (रिझाने वाली ) कहा है, लेकिन कहीं भी सही नाम नहीं लिया ।

कलकत्ता शहर में लेखक के प्रसिद्ध नाटक कोर्ट मार्शल के मंचन के सभागार में एक आकर्षक महिला लेखक के सामने साथ में मांडू (मांडू का “रानी रूपमती महल” रानी रूपमती और बाज बहादुर के प्रेम का प्रतीक ) चलने का प्रस्ताव रखती हैं । लेखक, जिसे लगता है कि वह इतना आकर्षक और सुदर्शन है कि कोई भी स्त्री उसकी कामना करे, इस तरह एक अजनबी महिला के प्रस्ताव पर क्रोधित हो उसे अपमानित कर देता है । लेकिन जब उसे पता चलता है की महिला शहर की प्रतिष्ठित डॉक्टर और हिंदी थिएटर की प्रशंसक है तो उसे ग्लानि होती है । इसी के बाद से वह हमेशा इस महिला को मायाविनी के रूप में अपनी कल्पना में देखता और व्यथित होता रहता है । हालांकि उसका साथ छोड़ना भी नहीं चाहता और अपनी मन की गिरह भी उसी के सामने खोलता है ।

पूरी किताब में इस मायाविनी के अपने आस पास होने का आभास करते हुए लेखक ने तमाम ऐसी यादें लिखीं हैं जिसे पढ़ते हुए कहीं-कहीं भ्रम होने लगता है कि ये सचमुच आत्म-कथ्यात्मक संस्मरण है या कोई काल्पनिक उपन्यास । लेकिन ये भ्रम ख़ारिज हो जाता है क्योंकि किताब के भीतर की दुनिया में लेखक ने अपने कई ऐसे लेखक मित्रों और परिचितों के व्यक्तित्व और चरित्र के बारे में लिखा है जिनमें से कईयों के बारे में हम जानते-सुनते रहते हैं । जैसे निर्मल वर्मा, शीला संधू, गगन गिल, अशोक माहेश्वरी, कृष्णा सोबती, अरुण कमल, सौमित्र मोहन, आलोक धन्वा, निधि, गीता ( पत्नी ), मंजूर, सुकांत, वसुधा, अस्पताल के डॉक्टर्स ( इनमें से डॉक्टर पार्थ चौधरी जो मेरी मित्र सूची में हैं, से थोड़ी जानकारी भी ली मैंने ), स्वदेश जी के अभिन्न मित्र विकास, बड़ी बहन और सरदार जी आदि । अपनी विस्मृतियों से जूझते स्वदेश जी अपनी उग्रता और अति संवेदनशीलता के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश भी करते नजर आते हैं ।

लेखक अपने व्यवहार, लगातार विषम परिस्थितियों और बीमारी से थकी पत्नी गीता की कटूक्त्तियों पर कोई प्रतिक्रिया न देकर लिखते हैं कि “ पुरुष जब बिस्तर में बेकार हो जाये, बेरोजगार हो जाए, बीमार हो जाये तो पत्नी को सारे सच्चे-झूठे झगड़े याद आनेलगते हैं । तब वह आतातायी बन जाती है । उसके सर्पीले दांत बाहर आ जाते हैं । गीता के नाखून एकदम लम्बे होना शुरू हो गए ।”

हालांकि दूसरी ओर वे डाक्टर अवनीत शर्मा की बात भी याद रखते हैं कि “इस बीमारी का सामना करने के लिए पहाड़ जितनी सहनशीलता चाहिए । पत्नी ठीक गालियाँ देती है । ठीक मारती है । आप तो बीमारी से जूझ रहे हैं । उसे तो सामाजिक कलंक और बीमारी दोनों का सामना करना है । आपके साथ अनोखा कुछ नहीं हो रहा है ।”

पढ़ते हुए एक बात महसूस होती है कि किताब के बाकी चरित्रों के बारे में उदारता से लिखने वाले लेखक पूरी किताब में खुद के वास्तविक स्वभाव का पता नहीं चलने देते हैं । अपने बारे में कुछ भी सीधे-सीधे नहीं लिखा, बस बिम्बों के माध्यम से पाठक को जैसे भ्रमित रखा है जिससे उसकी लेखक के प्रति सहानुभूति बनी रहती है । कहीं-कहीं ऐसा लगता है मानो वह साधारण इंसान की तरह दिखना ही नहीं चाहते । शायद उन्होंने अपनी खूबसूरती, गर्म-मिजाज और कड़वी बोली को मष्तिष्क में इस तरह कस कर बिठा लिया है कि फिर इससे उबर नहीं पाए । उपन्यास में कई बार इन चीजों की इस अहमन्यता से पुनरावृत्ति होती है कि पाठक थोड़ा असहज हो जाता है और विरोध को आकुल भी । किताब में वे खूबसूरत औरतों और लड़कियों से चिढ़ते भी दिखते हैं और उन्हीं की बार-बार चर्चा भी करते हैं । ये बातें विरोधाभास उत्पन्न करने वाली हैं ।

किताब पढ़ने योग्य है, न सिर्फ इसलिए कि इसमें उन बातों और परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन है कि मानसिक रोग के दौरान क्या-क्या घटित होता है बल्कि इसलिए भी कि ये लेखक का साहस है कि वे इस अँधेरी दुनिया से न सिर्फ बाहर आये बल्कि उसका ब्यौरा भी प्रस्तुत किया । हाँ ये जरूर है कि तमाम घटनाओं का वर्णन करते हुए भी उन्होंने अपनी भावनाओं के बारे में कुछ नहीं बताया । डॉक्टरों के बार-बार कहने पर भी वे उनसे नहीं खुले, अगर खुलकर अपनी भावनाएं कह पाए होते तो शायद स्थितियां इतनी विपरीत न हुयी होतीं और वे जल्दी ठीक हो गए होते ।

अपने ठीक होने और इस किताब के प्रकाशन के तीन वर्ष पश्चात स्वदेश जी 7 जून 2006 की एक सुबह टहलने के लिए निकले तो फिर लौट कर घर नहीं आये । लोगों को यह तक नहीं मालूम कि वे जीवित भी हैं या नहीं । शायद उनकी बीमारी फिर से उभरने लगी थी ।

उपन्यास की भाषा ऐसी है जैसे कोई मायालोक में विचरण करता बोल रहा हो, बिना इस बात की परवाह किये कि उसके आस-पास के लोग उसकी भाषा समझ भी पा रहे या नहीं । लेखक जो जीवन और रचना में अन्याय के खिलाफ थे उनकी इस 331 पेज के बेहद रोचक दस्तावेज में और भी बहुत कुछ है जो पढ़े जाने और समझे जाने योग्य है । तो बाकी दायित्व आपका, क्योंकि इसमें कथा का वैसा सूत्र और प्रवाह नहीं है कि मैं सिलसिलेवार उसका सार-संक्षेप समझा सकूं । वह तो स्वयं आपको ही पढ़कर पाना होगा……….।


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