नहीं रहे ‘इतनी शक्ति हमें दे ना दाता’ लिखने वाले गीतकार अभिलाष

नवीन शर्मा

नहीं रहे ‘इतनी शक्ति हमें दे ना दाता’ लिखने वाले गीतकार अभिलाष. अभिलाष को लिवर का कैंसर था। वो पिछले 10 महीने से बिस्तर पर थे। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। अभिलाष की पत्नी नीरा ने इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसाइटी (IPRS) से अर्जेंट फाइनेंशियल हेल्प मांगी थी। उनका लिवर ट्रांसप्लांट होना था। लेकिन पैसों की तंगी के चलते यह हो नहीं सका।

फिल्म निर्देशक एन चंद्रा ने अपनी फिल्म अंकुश (1985) में प्रार्थना गीत ‘इतनी शक्ति हमें दे ना दाता’ का इस्तेमाल किया था। इस गीत के मेल और फीमेल दो वर्जन हैं।एक में सुषमा श्रेष्ठ, पुष्पा पागधरे आदि की आवाज है, दूसरे में घनश्याम वासवानी, अशोक खोसला, शेखर सावकार और मुरलीधर की आवाज है। बेरोजगार युवाओं के हालात को दिखाने वाली और उनके गुंडे मवालियों से लड़ने वाली कहानी वाली नाना पाटेकर के लीड रोल वाली यह फिल्म हिट हुई थी। गीतकार अभिलाष ने यह बेहद मर्मस्पर्शी और प्रेरक गीत लिखा था। रविवार को इनका लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वे कैंसर से जूझ रहे थे।

इतनी शक्ति हमें दे ना दाता’ गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था।  

अंकुश फिल्म में शामिल हुआ गीत. संगीतकार कुलदीप सिंह ने इस गीत को एन चंद्रा की फिल्म अंकुश (1985) के लिए संगीतबद्ध किया था। इससे पहले फिल्म ‘साथ साथ’ में कुलदीप सिंह का संगीत सुपरहिट हो चुका था। एक दिन एन चंद्रा कुलदीप सिंह के पास गए और बोले- पापा जी, मैंने स्ट्रगल कर रहे कलाकारों की एक टीम बनाई है और उन्हें लेकर एक फिल्म कर रहा हूं। कुलदीप सिंह ने बिना फीस मांगे फिल्म ‘अंकुश’ का संगीत दिया।  गीतकार अभिलाष का विश्व प्रसिद्ध गीत ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ हिंदुस्तान के 600 विद्यालयों में प्रार्थना गीत के रूप में गाया जाता है. विश्व की आठ भाषाओं में इस गीत का अनुवाद हो चुका है और इसे वहां भी प्रार्थना गीत के रूप में गाया जाता है.

 

इन फिल्मों के लिए लिखे थे गाने

अभिलाष ने ‘रफ्तार’ (1975), ‘जहरीली’ (1977), ‘सावन को आने दो’ (1979),’लाल चूड़ा’ (1974), ‘अंकुश’ (1986), ‘हलचल’ (1995) और ‘मोक्ष’ (2013) जैसी फिल्मों के लिए गाने लिखे थे। इसके अलावा ‘जय जगन्नाथ’ (2007) के डायलॉग्स और ‘जीते हैं शान से’ (1988) की एडिशनल स्टोरी के लिए भी उन्हें क्रेडिट दिया गया है।

‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ गीत के अलावा अभिलाष के लिखे सांझ भई घर आजा (लता), आज की रात न जा (लता), वो जो खत मुहब्बत में (ऊषा), तुम्हारी याद के सागर में (ऊषा), संसार है इक नदिया (मुकेश), तेरे बिन सूना मेरे मन का मंदिर (येसुदास) आदि गीत भी बेहद लोकप्रिय हुए. अभिलाष 40 सालों से फिल्म जगत में सक्रिय थे. गीत के अलावा उन्होंने कई फिल्मों में बतौर पटकथा-संवाद लेखक भी योगदान दिया है. कई टीवी धारावाहिकों की स्क्रिप्ट लिखी है. इतनी शक्ति हमें दे ना दाता के अलावा अभिलाष को अपना लिखा फिल्म ‘रफ्तार’ का गीत ‘संसार है एक नदिया’ भी बहुत पसंद था। अभिलाष का मानना था कि इस गाने को लिखने के बाद उन्हें आत्मिक संतुष्टि मिली थी। फिल्मों में गाने लिखने के अलावा अभिलाष रेडियो के लिए भी लिखते थे।

इन अवॉर्ड्स से सम्मान‍ित किए जा चुके हैं

अभ‍िलाष पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह द्वारा कलाश्री अवार्ड से सम्मानित हुए हैं। इसके अलावा
संवाद लेखन और गीत लेखन के लिए अभिलाष को सुर आराधना अवार्ड, मातो श्री अवार्ड, सिने गोवर्स अवार्ड, फ‍िल्म गोवर्स अवार्ड, अभिनव शब्द शिल्पी अवार्ड, विक्रम उत्सव सम्मान, हिंदी सेवा सम्मान और दादा साहेब फाल्के अकादमी अवार्ड से सम्मानित किया गया है।

लोकप्रिय धारावाहिकों में गीत लिखे

अभिलाष ने लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में गीत लिखे। अदालत, धूप छांव, दुनिया रंग रंगीली, अनुभव, संसार, चित्रहार, रंगोली और ॐ नमो शिवाय जैसे अनेक लोकप्रिय धारावाहिकों में अभिलाष ने अपनी कलम की छाप छोड़ी है। अभिलाष स्क्रीन राइटर एसोसिएशन के ज्वाइंट सेक्रेटरी और आईपीआरएस के डायरेक्टर का पद भी संभाल चुके हैं।साथ ही वे अपने प्रोडक्शन हाउस मंगलाया क्रिएशन के तहत टीवी के लिए कई धारवाहिकों का निर्माण भी कर चुके हैं।

‘अज़ीज़’ के नाम से नज्म-गजलें प्रकाश‍ित हुई

गीतकार अभिलाष का जन्म 13 मार्च 1946 को दिल्ली में हुआ था। दिल्ली में उनके पिता का व्यवसाय था। बारह साल की उम्र में अभिलाष ने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। मैट्रिक के बाद वे मंच पर भी सक्रिय हो गए. उनका वास्तविक नाम ओम प्रकाश है।उन्होंने अपना तखल्लुख ‘अज़ीज़’ रख लिया। ओमप्रकाश ‘अज़ीज़’ के नाम से उनकी गज़लें, नज़्में और कहानियां कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। ‘अज़ीज़’ देहलवी नाम से अभिलाष ने मुशायरों में शिरकत की।

साहिर साहब ने दिया सुझाव

दिल्ली के एक मुशायरे में साहिर लुधियानवी से ‘अज़ीज़’ देहलवी ने आशीर्वाद लिया। साहिर साहब को कुछ नज़्में सुनाईं. साहिर ने कहा- मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं तुम्हारे मुंह से अपनी नज़्में सुन रहा हूं। ऐसी ग़ज़लें और नज़्में लिखो जिसमें तुम्हारा अपना रंग दिखाई पड़े। साहिर का मशवरा मानकर वे अपने रंग में ढल गए। ओमप्रकाश ‘अज़ीज़’ सिने जगत में बतौर गीतकार दाख‍िल हुए तो उन्होंने अपना नाम अभिलाष रख लिया।


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