पुस्तक चर्चा: राही मासूम रज़ा का उपन्यास “टोपी शुक्ला”

भारती पाठक

कहते हैं किताबें हम नहीं चुनते बल्कि वे अपना पाठक खुद चुन लेती हैं अपनी विशेषताओं से अपनी ओर खींच कर । ऐसे समय में जब इतना कुछ लिखा जा रहा हो, किताबों के ढेर से कुछ अनोखा और प्रासंगिक मिल जाना पढ़ने वाले के लिए सौभाग्य जैसा है । इसी की कड़ी है उपन्यास “टोपी शुक्ला” जिसे डॉ राही मासूम रज़ा जी ने लिखा है ।

डॉ राही मासूम रज़ा का नाम आते ही बचपन में दूरदर्शन पर देखे गये “ नीम का पेड़” धारावाहिक का ध्यान आ गया । उम्र के उस दौर में जब इस धारावाहिक के विषय की गहराई का अंदाजा भी नहीं था, ये लेखक के लेखन का ही कमाल था जो गंभीर विषय को लेकर लिखे गए इस कथा के संवाद और कहानी के पात्र अपनी संवेदनशीलता के चलते स्मृति में अंकित हो गए ।

डॉ राही मासूम रज़ा का जन्म १ सितम्बर १९२५ को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में हुआ । प्रारम्भिक शिक्षा गाजीपुर से ही प्राप्त की और आगे की पढ़ाई अलीगढ़ विश्वविद्यालय से हुई । वहीं से उन्होंने “उर्दू साहित्य के भारतीय व्यक्तित्व” पर पी एच डी की । कई वर्ष तक वहीँ उर्दू साहित्य पढ़ाते रहे । बाद में फिल्म लेखन के लिए बम्बई चले गए जहाँ काफी संघर्ष किया और ताउम्र फ़िल्मी लेखन के साथ-साथ सृजनात्मक लेखन भी करते रहे ।

दूरदर्शन धारावाहिक महाभारत के संवाद लेखक के रूप में इनकी बहुत प्रशंसा हुयी जबकि शुरू में जब बी आर चोपड़ा ने इनसे इसके संवाद लिखने को कहा तो बताते हैं कि इन्होंने मना कर दिया था । इनके बारे में कुंवरपाल सिंह जी ने लिखा कि “जब बी आर चोपड़ा ने घोषणा की कि राही जी इसके संवाद लिखेंगे तो लोगों ने उन्हें तमाम पत्र लिखे कि सारे हिन्दू मर गए हैं क्या जो आप एक मुसलमान से महाभारत लिखवा रहे हैं ? बी आर चोपड़ा ने वो सभी पत्र राही जी के पास भिजवा दिये । राही जी की ये कमजोर नस थी । वे भारतीय संस्कृति और सभ्यता के बहुत बड़े अध्येता थे । अगले दिन उन्होंने चोपड़ा जी को फ़ोन किया कि “अब तो महाभारत मैं ही लिखूंगा । मैं गंगा का बेटा हूँ । मुझसे ज्यादा हिन्दुस्तान की संस्कृति और सभ्यता को कौन जानता है ?” वे तन मन से एक ऐसे कवि और कथाकार थे जिनके लिए भारतीयता आदमीयत का पर्याय रही ।

इनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं : आधा गाँव, टोपी शुक्ला, हिम्मत जौनपुरी, सीन:७५, असंतोष के दिन, ओस की बूँद, दिल एक सादा कागज, कटरा बी आर्जू, नीम का पेड़, (हिंदी उपन्यास ) कारोबारे तमन्ना, क़यामत, मुहब्बत के सिवा ( उर्दू उपन्यास ) मैं एक फेरीवाला ( हिंदी कविता संग्रह ); नया साल, मौजे गुल : मौजे सबा, रक्से-मय, अजनबी शहर : अजनबी रास्ते ( उर्दू कविता संग्रह ) ; अट्ठारह सौ सत्तावन ( हिंदी उर्दू महाकाव्य ) तथा छोटे आदमी की बड़ी कहानी ( जीवनी ) ।
आज इनके इसी “टोपी शुक्ला” उपन्यास की मैं चर्चा कर रही हूँ । राही जी के शब्दों में “ये संभवतः हिंदी का पहला उपन्यास है जो शिया मुसलामानों तथा सम्बद्ध लोगों का ग्रामीण जीवन अपने समग्र यथार्थ में पूरी तीव्रता के साथ सामने आता है ।”

ये किताब हाथ में आते ही सबसे पहले अपने शीर्षक से पाठक का ध्यान खींचती है सो मैं भी इसके जादू से बच नहीं पायी जब एक साथ मंगाई गयी १२ किताबों में सबसे पहले पढ़ने के लिए इस पर ही नज़र पड़ी । वैसे भी राही मासूम रज़ा जी के उपन्यासों में एक भारतीयपन झलकता है जिसकी आत्मा तक इनको पढ़ कर ही पहुंचा जा सकता है । ११५ पन्नों की इस किताब को शुरू करके बिना ख़त्म किये छोड़ना मुश्किल है । तो सबसे पहले जानते हैं कि ये टोपी शुक्ल कौन हैं और इनका ये नाम क्यों पड़ा । शुरू के कुछ पन्नों में ही इस जिज्ञासा का उत्तर मिल जाता है ।

राही मासूम रज़ा

पुस्तक के नायक हैं बलभद्र शुक्ला जो अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं । “ यूनिवर्सिटी में नंगे सिर बोलने की परंपरा नहीं थी । लेकिन टोपी की जिद है कि मैं तो टोपी नहीं पहनूंगा । इसलिए होता यह है कि जैसे ही टोपी बोलने के लिए खड़े होते हैं सारा यूनियन हाल एक साथ टोपी टोपी का नारा लगाने लगता है । धीरे धीरे टोपी और बलभद्र नारायण का रिश्ता गहरा होने लगता है । नतीजा यह हुआ की बलभद्र को छोड़ दिया गया और इन्हें टोपी शुक्ल कहा जाने लगा ।”

ये तो रही बलभद्र शुक्ला के टोपी शुक्ला नाम पड़ने की कहानी, लेकिन टोपी की कहानी तो कुछ और ही है । उपन्यास में कोई क्रम नहीं है । शुरूआत वर्तमान से होती है तो बीच बीच में अतीतावलोकन भी होता चलता है लेकिन कहीं से भी इसका फर्क कहानी की रोचकता को भंग नहीं करता । जब टोपी एक छोटा सा बच्चा था तो शारीरिक कुरूपता के चलते परिवार में जिस स्नेह का पात्र उसे होना चाहिए वह उसे अपने माता-पिता, भाई यहाँ तक कि दादी से भी नहीं मिलता । एक दिन माँ की मार से तंग आकर साढ़े छह साल का टोपी घर से भाग जाता है । मोहल्ले से बाहर निकलने पर उसकी मुलाकात इफ्फन से होती है जिसकी किसी से लड़ाई हो रही थी । टोपी उसकी मदद करता है और वहीँ से दोनों की दोस्ती शुरू होती है ।

इफ्फन से बातों बातों में टोपी को पता चलता है कि इफ्फन का घर का भी एक नाम है । वह महसूस करता है कि खुद वह इतना गया गुजरा है कि उसका एक घर का नाम भी नहीं । इफ्फन के घर उसकी मुलाकात इफ्फन की दादी से होती है जो टोपी को बहुत अच्छी लगती हैं । लेखक ने तत्कालीन सामाजिक धार्मिक ताने-बाने का इतना सजीव वर्णन किया है कि पाठक मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता ।

“इफ्फन मियाँ ! इन्हें कुछ खिलाइए ।” उस आदमी (इफ्फन के अब्बा )ने कहा ।
“तू मियाँ हो जी ?”
“मियाँ ?” इफ्फन बौखला गया ।
“तूं मुसलमान हौ?”
“हाँ ।”
“तब हम हियाँ कुछ खा ओ ना सकते ।”

सबने कोशिश की कि वह कुछ खा ले लेकिन वह टस से मस न हुआ । हाँ साइकिल देखकर बहुत खुश हुआ । इफ्फन कलक्टर का बेटा है लेकिन उसने कभी टोपी से भेदभाव नहीं किया । यहाँ तक कि उसे अपनी नयी चमचमाती साइकिल भी खेलने को दे दी । साइकिल के जोश में वह भूल गया कि घर से भाग गया था । भूख लगने पर वह फिर घर लौट आया ।

साइकिल के सपनो में खोया जब वह घर पहुंचा तो उसकी माँ का तीसरा प्रसव होने को है । घर की नौकरानी उससे पूछती है कि-“भाई होई की बहिन ?
“साइकिल न हो सकती का ! टोपी ने सवाल किया ।” बूढी नौकरानी हँसते-हँसते लोटपोट हो गयी । माँ मुस्कुरा दी । दादी सुभ्रदा देवी ने नफीस उर्दू में टोपी की मूर्खता का रोना रोया । परन्तु किसी ने नहीं सोचा कि टोपी को एक अदद साइकिल की जरूरत है ।”

उसके मासूम दिल को इफ्फन और उसकी दादी समझते हैं । यहाँ तक कि एक दिन टोपी इफ्फन से अपनी दादी से उसकी दादी को बदलने की बात करता है और इफ्फन के मना करने पर दोस्ती का हवाला देते हुए कहता है कि “तूं हम्में एक ठो दादियों ना दे सकत्यों ?”

अचानक एक दिन इफ्फन की दादी परलोक सिधार जाती हैं तब टोपी को अपने दिल के टूटने की आवाज सुनाई देती है । लेखक कहते हैं कि “ इफ्फन की दादी और टोपी में एक ऐसा सम्बन्ध हो चुका था जो मुस्लिम लीग, कांग्रेस और जनसंघ से बड़ा था । इफ्फन के दादा जीवित होते तो वो भी ये सम्बन्ध नहीं समझ पाते जैसे टोपी के घरवाले न समझ पाए थे । दोनों अलग अलग अधूरे थे । एक ने दूसरे को पूरा कर दिया । दोनों प्यासे थे । एक दूसरे की प्यास बुझा दी । दोनों अपने घरों में अजनबी और भरे घरों में अकेले थे । दोनों ने एक दूसरे का अकेलापन मिटा दिया था । एक बहत्तर बरस की थी और दूसरा आठ साल का ।”

“तौरी दादी की जगह हमारी दादी मर गयी होतीं त ठीक भया होता ।” टोपी ने इफ्फन को पुरसा दिया ।

कुछ दिनों बाद ही इफ्फन के पिता का तबादला मुरादाबाद हो गया और वह चला गया । टोपी ने कसम खायी कि अब ऐसे किसी लडके से दोस्ती नहीं करेगा जिसका बाप ऐसी नौकरी करता हो जिसमें बदली होती हो ।

टोपी अकेला हुआ तो जनसंघियों के सम्पर्क में आया और जनसंघी हो गया । कक्षा में एक मुस्लिम बच्चा पास हो जाये और टोपी फेल तो उसकी रही सही इज्ज़त भी गयी । इस घटना का निष्कर्ष टोपी ने यह निकाला कि जब तक इस देश में मुसलमान हैं तब तक हिन्दू चैन की सांस नहीं ले सकता ।

यहाँ लेखक एकतरफ़ा बिलकुल नहीं सोचते हैं । वे मुसलमानों को भी इस भाव से अछूता नहीं पाते और कहते हैं कि- “इफ्फन के दादा और परदादा मौलवी थे । काफिरों के देश पैदा हुए । काफिरों के देश मरे । परन्तु वसीयत करके मरे कि लाश कर्बला ले जाई जाये । उनकी आत्मा ने इस देश में एक सांस तक ना ली ।“

लेखक हमारी संकीर्ण सोच और रुढ़ियों पर बहुत बेबाकी से व्यंगात्मक चोट करते हैं । आगे की कहानी टोपी के अलीगढ जाकर पढ़ने की है जहाँ फिर से उसकी मुलाकात इफ्फन और उसकी बीवी सकीना से होती है । उसकी जनसंघी विचारधारा की मुलाक़ात कम्युनिस्टों से होती है और अलग ही आकार ले लेती है लेकिन दोनों की गहरी दोस्ती पर कहीं से भी इन बातों का असर नहीं होता ।

विश्वविद्यालय की राजनीति में लोग उसके साथ इफ्फन की बीवी सकीना का नाम जोड़कर बाते बनाते हैं जिससे टोपी सकीना से खुद को राखी बांधने को कहता है लेकिन सकीना का भी अपना एक दुखद अतीत है जिससे वह इस बात के लिए राजी नहीं होती है । हिन्दू मुसलामानों के बीच आपसी अविश्वासों और मानसिक दूरी के पीछे के कारणों पर लेखक इन तीनों के माध्यम से बताने की कोशिश करते हैं ।

उपन्यास के अंत में टोपी आत्महत्या कर लेता है । टोपी का यह कदम कहीं न कहीं एक सभ्यता की पराजय है और वह ऐसा क्यों करता है इसके लिए उपन्यास को पढ़ने का विकल्प खुला है ।

किताब वास्तव में एक उपन्यास न होकर व्यंग्य अधिक लगती है क्योंकि हिन्दू मुस्लिम संबंधों और पूर्वाग्रहों पर एक से बढ़कर एक धारदार व्यंग्य लेखक ने किये हैं और ऐसा करते हुए उन्होंने हिन्दू मुस्लिम में कोई भेदभाव नहीं किया है । टोपी एक किरदार ही नहीं अपने आप में एक समय है जहाँ हममें से कोई भी हो सकता है । वह समय जब एक धर्म के व्यक्ति का दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ रहना मुश्किल होता जा रहा है । यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है और कहानी के परिप्रेक्ष्य में हर आदमी अपने आप में टोपी शुक्ला है ।

भाषा की बात करें तो जिन्होंने राही मासूम रज़ा जी के उपन्यासों को पढ़ा होगा वे जानते हैं उनकी भाषा इतनी सरल है कि उसे कंठस्थ किया जा सके । यही खूबी इस उपन्यास की भाषा में भी है जो इतनी सरस है कि मन को बाँध देती है खासकर बचपन में टोपी और इफ्फन के बीच के संवाद जिन पर क्षेत्र विशेष की छाप दिखती है । राही जी के लिए धर्म निरपेक्षता का बहुत व्यापक अर्थ है जिस पर उन्होंने कहा था कि-

मेरा नाम मुसलमानों जैसा है
क़त्ल करो और मेरे घर में आग लगा दो
लेकिन मेरी रग रग में गंगा का पानी दौड़ रहा है
मेरे लहू से चुल्लू भर महादेव के मुंह पर फेंको
और उस योगी से कह दो – महादेव
अब इस गंगा को वापस ले लो
यह जलील तुर्कों के बदन में गाढ़ा गरम
लहू बनकर दौड़ रही है”


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