लोक संगीत की विरासत को फिल्म संगीत में बढ़ावा देने वाले एसडी बर्मन: जयंती पर विशेष

नवीन शर्मा
हम में से बहुत सारे लोग शायद यह बात नहीं जानते हो कि सचिन तेंदुलकर का नाम सचिन एसडी बर्मन के नाम पर ही रखा गया था। ये सचिन देव बर्मन के संगीत की लोकप्रियता को दर्शाने वाला एक बेहतरीन उदाहरण है।
त्रिपुरा के राजघराने से ताल्लुक रखने वाले सचिन देव बर्मन ने संगीत की दुनिया में सितारवादन के साथ कदम रखा। कलकत्ता विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने 1932 में कलकत्ता रेडियो स्टेशन पर गायक के तौर पर अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने बाँग्ला फिल्मों तथा फिर हिंदी फिल्मों की ओर रुख किया।
एस डी बर्मन- द वर्ल्ड ऑफ़ हिज़ म्यूज़िक किताब लिखने वाले खगेश बताते हैं, “सचिन देव बर्मन ने अपनी संगीत प्रतिभा से करोड़ों भारतवासियों का दिल जीता. शास्त्रीय और लोक संगीत का जितना सुंदर समिश्रण एसडी के संगीत में मिलता है उतना शायद कहीं नहीं। उन्होंने ही सबसे पहले संगीत पहले और शब्द बाद में की परंपरा शुरू की थी। वो फ़िल्म की सिचुएशन के हिसाब से संगीत बनाते और फिर गीतकार से कहते कि धुन को ध्यान में रख कर गीत लिखे.”।
बाजी से हिंदी सिनेमा में बनी पहचान
एसडी बर्मन की लम्बी संगीत यात्रा के शुरुआत दौर में नवकेतन फिल्म्स के बैनर में बनी फिल्म बाज़ी को महत्वपूर्ण ब्रेक माना जाता है हालांकि इसके पहले भी वे सफल संगीत की रचना कर चुके थे। बाज़ी (1951) में गीता दत्त का गाया हुआ, ‘तदबीर से बिगड़ी हुयी तक़दीर’ और ‘सुनो गज़र क्या कहे’ ने न सिर्फ एसडी बर्मन को ऊंचाइयां दीं बल्कि गीता दत्त को भी एक नयी और ‘मॉर्डन’ गायिका रूप में स्थापित किया।
जीवन के सफ़र में राही
1955 में उन्होंने किशोर कुमार से ‘जीवन के सफ़र में राही’ (मुनीम जी) गवाया।इसी साल आई फिल्म देवदास में उन्होंने तलत महमूद से ‘मितवा लागी रे ये कैसी’ (देवदास) गवाया।
गुरुदत्त के फेवरेट, प्यासा का लाजवाब संगीत
देवदास का संगीत ही था जिसने गुरु दत्त को एसडी बर्मन को प्यासा (1957) में लेने के लिए प्रेरित किया जबकि उनकी पहली पसंद ओपी नैय्यर थे। प्यासा ने लोगों को एक ऐसा संगीत दिया जिसकी प्यास शायद ही कभी बुझे। बर्मन दादा ने ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ के लिए मोहम्मद रफी की दर्द भरी आवाज इस्तेमाल की। वहीं ‘जाने वो कैसे लोग थे’ में एक असफल प्रेमी के दर्द को उजागर करने के लिए हेमंत कुमार की अलहदा मिज़ाज को लिया। गीता दत्त की आवाज़ में ‘आज सजन मोहे अंग लगा लो’ के साथ बर्मन दा ने बंगाली कीर्तन का हिंदी फिल्म संगीत में अनूठा प्रयोग किया।
वक़्त ने किया क्या हंसी सितम’
कागज़ के फूल (1960) की कल्पना ‘वक़्त ने किया क्या हंसी सितम’ और ‘देखी ज़माने की यारी’ जैसे गीतों के बिना हो ही नहीं सकती. एसडी बर्मन के लिए ‘डार्क म्यूजिक’ पसंदीदा क्षेत्र नहीं था। इसलिए प्यासा और कागज़ के फूल के बाद उन्होंने ऐसे संगीत पर दुबारा काम नहीं किया।
लता से विवाद और छह साल की दूरी
एक बार बर्मन दा के दिए एक इंटरव्यू से नाराज़ होकर लता मंगेशकर ने उनसे दूरियां बढ़ा लीं। ये वही लता थीं जिनके लिए बर्मन दा ने एक बार कहा था कि ‘मुझे हारमोनियम और लता दो, मैं संगीत बना दूंगा’। छह साल बाद जब ये दूरियां दूर हुईं और बंदिनी (1963) में यह जोड़ी दोबारा बनी तो फिर कमाल हो गया।‘मोरा गोरा अंग लै ले’ और ‘जोगी जब से तू आया मेरे द्वार’ जैसे गीत हर जुबान पर छा गए. इसी फिल्म में बर्मन दा का खुद का गाया ‘मोरे साजन हैं उस पार’ भी था।
साहिर लुधियानवी से पंगा
प्यासा’ फ़िल्म के बनने के दौरान एसडी बर्मन की साहिर लुधियानवी से तक़रार हो गई।मुद्दा था कि नग़मे में ज़्यादा रचनात्मकता है या संगीत। साहिर ने ज़ोर दिया कि उन्हें बर्मन से एक रुपया ज़्यादा पारिश्रमिक दिया जाए। साहिर का मानना था कि एसडी के संगीत की लोकप्रियता में उनका बराबर का हाथ था। बर्मन ने साहिर की शर्त को मानने से इंकार कर दिया और फिर दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया।
गाइड सदाबहार गीतों का गुलदस्ता
नवकेतन फिल्म्स की गाइड (1965) में काम करते हुए एक गाने के बाद ही एसडी बर्मन काफी गंभीर रूप से बीमार पड़े। बर्मन दादा ने देव आनंद को किसी और संगीतकार को लेने का सुझाव दिया लेकिन किसी और संगीतकार को लेने की बजाय देव आनंद ने फिल्म को सिर्फ एक ही गाने के साथ ही रिलीज़ करने का फैसला किया। शायद इसी विश्वास और दोस्ती ने ही बर्मन दा को जल्द से जल्द ठीक होने की शक्ति दी, और वह जूनून भी जिससे गाइड के संगीत ने नवकेतन की पिछली सभी फिल्मों को भी पीछे छोड़ दिया।‘क्या से क्या हो गया’, ‘दिल ढल जाए रात ना जाए’, ‘तेरे मेरे सपने’, ‘पिया तोसे नैना लागे रे’, ‘मोसे छल किये जाए’ और ‘गाता रहे मेरा दिल’ जैसे गीत बने जो आज तक संगीत प्रेमियों के पसंदीदा हैं. दरअसल गाइड के संगीत ने एसडी बर्मन को अतुलनीय साबित किया. अफ़सोस कि उस साल फिल्मफेयर पुरस्कारों की चयन मंडली ने शंकर-जयकिशन को फिल्म सूरज के लिए पहली पसंद माना।
अभिमान के बेहतरीन गीत
बर्मन दा के लाजवाब संगीत का बेहतरीन उदाहरण हम अभिमान (1973) फिल्म सुन सकते हैं। इसके सभी सात गाने सुपर हिट हुए. ‘मीत ना मिला रे मन का’ से लेकर ‘पिया बिना पिया बिना’ तक इसमें संगीत के सभी रंग थे। इसके साथ ही उन्हें 20 साल बाद फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला।
– ‘बड़ी सूनी-सूनी है जिंदगी ये जिंदगी
1975 में फिल्म मिली के एक गाने की रिहर्सल चल रही थी. इसी दौरान एसडी बर्मन की तबीयत बिगड़नी शुरू हुई जिसके बाद वे कोमा में चले गए और फिर कभी होश में नहीं लौटे. यह गाना था – ‘बड़ी सूनी-सूनी है जिंदगी ये जिंदगी’. किशोर कुमार के गाए इस गीत में आज भी संगीत प्रेमी एक प्रियजन के बिछड़ने का दर्द महसूस कर सकते हैं।
बाप बेटे में मुकाबला
एसडी बर्मन अगर कुछ साल और जीवित रहते तो राहुल देव बर्मन की सबसे बड़ी टक्कर अपने पिता से ही होती। चुपके-चुपके का मशहूर रोमांटिक गाना, ‘अब के सजन सावन में’, एसडी बर्मन ने 31 अक्टूबर 1975 को इस दुनिया को अलविदा कहने से कुछ समय पहले ही बनाया था। इसी तरह अभिमान का हिट गीत, ‘मीत ना मिला रे मन का’ बनाते वक़्त बर्मन साहब की उम्र 67 वर्ष थी। 1971 में जब आरडी बर्मन ‘रैना बीती जाए’ (अमर प्रेम) के साथ सफलता की सीढियां चढ़ रहे थे, तो इसी साल एसडी बर्मन ‘मेघा छाये आधी रात’ (शर्मीली) जैसे कालजयी गीत की रचना कर रहे थे।ये और ऐसे कई उदाहरण बताते हैं कि एसडी बर्मन एक ऐसे असाधारण संगीतकार थे जो अपने आखिरी वक्त तक न सिर्फ काम करते रहे बल्कि दिल से युवा भी रहे।
बेटे का नाम हुआ तो खुश हुए
एसडी एक दिन सुबह की सैर पर निकले तो पीछे से किसी ने पुकारा वो देखो आरडी बर्मन के पिता जा रहे हैंह लौटकर उन्होंने अपने बेटे से कहा- आज मैं बहुत खुश हूँ।अभी तक मैं सचिन देव बर्मन के नाम से जाना जाता था. आज मुझे किसी ने पहली बार राहुल के पिता के रूप में पहचाना.”।
खुद भी गाये लाजवाब गीत
बहुत कम संगीतकार ऐसे हुए हैं जो खुद भी अच्छे गायक हों। बर्मन दा उन्हीं अपवादों में शामिल हैं। उनका गाया गीत वहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहां अगर आपने सुना है तो आप इस बात से जरूर सहमत होंगे। इसी तरह बंदिनी फिल्म का गीत ओ माझी मेरे साजन हैं उस पर मैं इस पार सुनेंगे तो उस गीत के दर्द को कितनी शिद्दत से बर्मन दा की आवाज बयान करती है कि आप उनके गायन के मुरीद हो जाएंगे। इसी तरह से मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में गीत भी उनकी आवाज का बेहतर उदाहरण है।
टेनिस के शौकीन फुटबाल के दिवाने
एसडी बर्मन टेनिस के बहुत शौकीन थे. फ़ुटबॉल के लिए तो वो पागल थे.. ईस्ट बंगाल उनका पसंदीदा फ़ुटबॉल क्लब था।
एसडी बर्मन पर किताब लिखनेवाले खगेश देव बर्मन बताते हैं, “मिली की रिकीर्डिंग के दौरान उन्हें स्ट्रोक हो गया और वो कोमा में चले गए और अपनी मौत तक छह महीने लगातार कोमा में रहे। उसी दौरान जब उनके क्लब ईस्ट बंगाल ने आईएफ़ शील्ड फ़ाइनल में मोहन बगान को 5-0 से हरा दिया और राहुल ने उनके कान में चिल्लाकर उन्हें ये ख़बर दी, तो ईस्ट बंगाल के इस सबसे बड़े समर्थक ने अपनी आँखे खोल दीं.”
संगीत के इस राजकुमार ने इसके बाद कभी आँखें नहीं खोलीं और 31 अक्तूबर, 1975 को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।
प्रसिद्ध गीत
खायी है रे हमने कसम’ (तलाश, 1969)
दिल आज शायर’ (गैम्बलर, 1971)
मेघा छाये आधी रात’ (शर्मीली, 1971)

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