इतिहास के अनजाने पहलू: एक थी ‘छप्पन छुरी’ !

Basant Tripathi
जानकी बाई का जन्म 1864 में वाराणसी के एक गाँव में हुआ था । उनके पिता शिव बालक जानकी के जन्म के बाद चेतगंज में आकर रहने लगे । उनकी मिठाई, पूड़ी की दूकान थी । वे हलवाई जाति के थे ।
साँवली जानकी के चेहरे पर चेचक के दाग थे । ईश्वर ने उन्हें सूरत नहीं सीरत बख्शी थी । उनका कण्ठ बहुत सुरीला था । वे काशी के मंदिरों में होने वाले भजन कीर्तन सुनतीं और गुनगुनातीं । एक पड़ोसी संगीतज्ञ ने उन्हें संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दी । शीघ्र ही वे गायन में निपुण हो गईं । 1876 में काशी की एक संगीत प्रतियोगिता में उन्होंने प्रख्यात गायक रघुनंदन दुबे को पराजित किया था । प्रतियोगिता में काशी की रानी साहिबा ने जानकी को पुरस्कार दिया था ।
कहा जाता है कि महज़ 12 वर्ष की जानकी से हारने पर रघुनंदन दुबे ने उन्हें जान से मारना चाहा । सब्जी काटने वाले चाकू से रघुनंदन दुबे ने जानकी पर अनगिनत वार किए । जानकी के शरीर पर कुल 56 घाव थे, इसीलिए उन्हें छप्पन छुरी कहा जाने लगा । काशी की रानी साहिबा ने मिशन अस्पताल में जानकी का इलाज कराया । 6 साल के इलाज के बाद जानकी ठीक हुईं ।
पार्वती नाम की एक महिला के प्रभाव में आकर जानकी का परिवार इलाहाबाद आ गया । वे चौक में घंटा घर के पास एक मकान में रहने लगीं । जानकी को उस्ताद हस्सू खाँ साहब से गायन का, घसीटे से सारंगी का और रहीमुद्दीन से तबले का विधिवत प्रशिक्षण मिला । जानकी बाई गीत भी लिखती थीं और स्वरचित गीत भी गाती थीं ।
जानकी बाई उत्तर तथा मध्य भारत की प्रमुख रियासतों तथा संगीत के आयोजनों में जाती थीं । दूर-दूर तक उनके गायन की धूम थी । संगीत आयोजनों में गायन के लिए वह एक दिन का एक हजार लेती थीं, लेकिन मंदिरों और धार्मिक समारोहों में गायन के लिए कुछ नहीं लेती थीं ।
एक बार जानकी बाई अतरसुइया में एक चबूतरे पर गा रही थीं तो चबूतरा चाँदी के रुपयों से पट गया था । गिनने पर 14070 रुपये निकले । ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें कई अंगरक्षक और दुनाली बंदूक का लाइसेंस दिया था ।
जानकी बाई के गज़ल गायन का विशेष अंदाज था । वे प्रायः अकबर इलाहाबादी के घर जाकर शायरी की बारीकियों पर विचार विमर्श करती थीं । अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू और फारसी का उन्हें ज्ञान था । साहित्य की समझ होने के कारण उनका गायन भावों के अनुरूप होता था । अकबर इलाहाबादी उनकी गजल गायकी के मुरीद थे ।
जानकी बाई ठुमरी गायन में प्रवीण थीं तो दादरा का उनका अपना अंदाज था । जब वे ” गुलनारों में राधा प्यारी बसे ” दादरा गातीं तो श्रोता सम्मोहित हो जाते । जानकी बाई को लोक धुनों की बहुत अच्छी समझ थी । पूरबी, चैती, कजरी, बन्नी बन्ना, सोहर फाग और गारी भी जानकी बाई गाती थीं ।
समधी देखो बाँका निराला है रे
तोरी बोलिया सुनै कोतवाल तूती बोलै ले
नदी नारे न जाओ स्याम पैयाँ परूं
तू ही बाटू जग में जवान साँवर गोरिया
बाबू दरोगा कौने करनवा धइला पियवा मोर
उन दिनों लोगों की जुबान पर थे ।
जानकी बाई की नाटकों में भी बहुत रुचि थी ।
हलकी छींटाकसी या बाज़ारू टिप्पणियाँ उन्हें सख्त नापसंद थीं । ऐसे में वे गायन रोक देतीं ।
जानकी बाई जब ” श्री राम चन्द्र कृपालु भज मन ….” गातीं तो श्रोता भक्ति रस में विभोर हो जाते, कबीर का निर्गुण गातीं तो माहौल बदल जाता । फ़रमाइश पर जब वे ” मजा ले ला रसिया नई झुलनी का ” या ” मतवारे नैना जुलुम करें ” गातीं तो उपस्थित जन श्रृंगार रस में डूब जाते । जानकी बाई का स्वर भेद का ज्ञान अद्भुत था ।
जानकी बाई प्रबुद्ध श्रोताओं के मध्य ही गाती थीं । नगर में वे कम ही सुलभ रहती थीं, क्योंकि उन्हें देश भर के संगीत आयोजनों में बुलाया जाता था । नगर में उनके प्रशंसकों में सर तेज बहादुर सप्रू, मोती लाल नेहरू, तेज नारायण मुल्ला, जस्टिस कन्हैया लाल, सुरेन्द्र नाथ सेन, मुंशी ईश्वर शरण, लाला राम दयाल, हृदय नाथ कुंजरू और अमर नाथ झा आदि थे ।
जानकी बाई का पारिवारिक जीवन सुखमय नहीं था । शुभचिंतकों के मना करने पर भी उन्होंने रसूलाबाद के एक वकील अब्दुल हक से शादी कर ली और इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया । अब्दुल हक की निगाह उनकी बेशुमार दौलत पर थी । जानकी बाई की कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने अब्दुल अजीज नाम के एक लड़के को गोद ले लिया , जिसे प्यार से वह बच्चा बुलाती थीं । बुरी संगत में पड़ कर बच्चा आवारा हो गया । जानकी बाई ने बच्चा की शादी कर दी, तब भी वह नहीं सुधरा । बच्चा की बेहूदा हरकतों से तंग आकर जानकी बाई ने उससे नाता तोड़ लिया । रसूलाबाद में वह बच्चा की पत्नी के साथ रहती थीं । बच्चा की पत्नी की भी मृत्यु हो गई तो जानकी बाई और भी टूट गयीं । किसी को पता भी नहीं चला और 18 मई 1934 को जानकी बाई का निधन हो गया । कहते हैं कि उनके लिए न जनाज़े की नमाज़ पढ़ी गई और न ही जनाज़े में लोग शरीक हुए । किराए के चार मजदूरों और चन्द लोगों ने उन्हें काला डांडा कब्रिस्तान में दफ़न कर दिया ।
इतनी महान शख्सियत का ऐसा अंत ! कितना निर्मम है दैव ।
जानकी बाई सभी की खुले दिल से मदद करती थीं । गरीब बच्चों की पढ़ाई और बेसहारा लड़कियों की शादी के लिए वह सदा तत्पर रहती थीं । 1907 में रामबाग रेलवे स्टेशन पर तीर्थ यात्रियों के लिए जानकी बाई ने मुसाफ़िर खाना बनवाया, जहाँ रहने के साथ खाना भी मुफ्त था ।
इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद भी अन्य धर्मों के प्रति जानकी बाई का लगाव पूर्ववत था । रसूलाबाद में रहने के दौरान वे प्रायः गंगा स्नान करने जाती थीं । नगर में जानकी बाई के लगभग दर्जन भर मकान थे तथा उनके पास अपार सम्पदा थी । वे पालकी से चलती थीं और पालकी के आगे पीछे सरकारी संतरी चलते थे ।

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